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Shloka 4

चिरकारि-उपाख्यानम् / The Exemplum of Cirakārī: Deliberation Before Irreversible Action

अपि हाक्तानि धर्म्याणि व्यवस्यन्त्युत्तरावरे । लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियम: कृत:

शास्त्रों में जो धर्मानुकूल कर्म बताए गए हैं, उन्हें ही प्रधान और अप्रधान—सब लोग निश्चयपूर्वक धर्म मानते हैं। इस लोक-यात्रा के निर्वाह के लिए ही महर्षियों ने यहाँ धर्म की मर्यादा स्थापित की है।

भीष्म उवाच