Adhyaya 254
Shanti ParvaAdhyaya 25415 Verses

Adhyaya 254

तुलाधार-उपदेशः (Tulādhāra’s Instruction to Jājali on Ahiṃsā and Abhaya-dāna)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Dialogues on Liberation and Subtle Dharma)

Bhīṣma recounts that, questioned by the wise merchant Tulādhāra, the austere brāhmaṇa Jājali asks how such settled wisdom was attained. Tulādhāra answers by defining the highest dharma as a livelihood grounded in non-harm: to live so that beings are not injured or made fearful. He describes his impartiality—neither praising nor cursing others, remaining equal toward all beings, and free from attachment to pleasant/unpleasant outcomes. He asserts that one who does not frighten beings attains a state of fearlessness, while one who causes fear through cruelty of speech or punitive harshness accrues great danger. Tulādhāra elevates ‘abhaya-dāna’ as the best of gifts and equates it with the fruits of sacrifices, austerity, and charity. He critiques unexamined social practices: the exploitation of animals, coercive labor, and especially harm embedded in certain livelihoods (including the violence implicit in agriculture and animal yoking), arguing that dharma is subtle and must be sought by reasoning about causes rather than by imitating common conduct. The chapter closes by praising a dharma grounded in rational justification (upapatti), practiced by disciplined persons, and marked by ethical skill rather than mere external observance.

Chapter Arc: धूमवर्चस्-सम तेजस्वी व्यास के वचन-स्मरण के साथ भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—अब मैं पंचभूत, मन और बुद्धि के गुणों का क्रमबद्ध निदर्शन फिर से करूँगा। → भूमि और जल आदि भूतों के स्थूल-लक्षणों से आरम्भ कर, संवाद सूक्ष्मतर होता जाता है—मन के नव गुणों का निरूपण आता है, और युधिष्ठिर की जिज्ञासा बुद्धि के ‘पाँच’ गुणों तथा इन्द्रियों के गुणों पर टिक जाती है। → युधिष्ठिर का तीक्ष्ण प्रश्न—“कथं पञ्चगुणा बुद्धिः?”—पर भीष्म का निर्णायक उत्तर उभरता है: बुद्धि के गुण केवल पाँच नहीं, भूत-विशिष्ट रूप से ‘षष्टि’ (साठ) गुणों का विस्तार भी कहा गया है; यह भेद दृष्टि-भेद और विवेचन-स्तर का है। → भीष्म युधिष्ठिर को ‘भूतार्थ-तत्त्व’ के सम्यक् ज्ञान की ओर मोड़ते हैं—तत्त्व को जानकर समस्त भूत-प्रभावों को समझो और शान्त-बुद्धि बनो; गणना/वर्गीकरण का उद्देश्य वैराग्य और स्थैर्य है, विवाद नहीं।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-मा_जल बछ। अकाल पजञ्चपञ्चाशदधिकद्धिशततमो< ध्याय: पज्चभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वर्णन भीष्म उवाच भूतानां परिसंख्यानं भूय: पुत्र निशामय । द्वैषायनमुखाद्‌ भ्रष्ट श्लाघया परयानघ

भीष्म बोले—हे निष्पाप पुत्र! पञ्चमहाभूतों के निरूपण का जो उपदेश द्वैपायन (व्यास) के मुख से प्रकट हुआ है, उसका क्रम मैं फिर से तुम्हें सुनाता हूँ। तुम परम आदर और उत्कंठा के साथ इसे सुनो।

Verse 2

दीप्तानलनिभ: प्राह भगवान्‌ धूमवर्चसे । ततो5हमपि वक्ष्यामि भूय: पुत्र निदर्शनम्‌

भीष्म बोले—प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, पर धूमवर्ण आभा वाले भगवान् (व्यास) ने शुकदेव से ऐसा कहा था। अतः हे पुत्र! वही दृष्टान्त और उसका तात्पर्य मैं भी फिर से तुम्हें बताऊँगा; इस सुनिश्चित विवेक-शास्त्र को ध्यान से सुनो।

Verse 3

भूमे: स्थैर्य गुरुत्वं च काठिन्यं प्रसवार्थता । गन्धो गुरुत्वं शक्तिश्व संघात: स्थापना धृति:

भीष्म बोले—स्थिरता, भारीपन, कठोरता, प्रसव-शक्ति (बीज को अंकुरित कर उत्पन्न करने की सामर्थ्य), गन्ध, विशालता, बल, संघात (एकत्रता/संघनता), स्थापना (आधार देने की शक्ति) और धृति (धारण-शक्ति)—ये पृथ्वी के दस गुण कहे गए हैं।

Verse 4

अपां शैत्यं रस: क्लेदो द्रवत्वं स्नेहसौम्यता । जिह्नदा विस्यन्दनं चापि भौमानां श्रपर्णं तथा

भीष्म ने कहा—जल के गुण हैं: शीतलता, रस, क्लेद (भिगोना/गलाना), द्रवत्व (पिघलकर बहना), स्नेह (चिकनाहट) और सौम्यता; टेढ़े-मेढ़े मार्गों में मुड़कर चलना, टपकना और रिसना; ओले या हिम बनकर जम जाना; तथा पृथ्वी से उत्पन्न धान्य-दाल आदि को नरम कर पकाना—ये सब जल के स्वभावगत लक्षण हैं।

Verse 5

अननेर्दूर्धर्षता ज्योतिस्ताप: पाक: प्रकाशनम्‌ | शोको रागो लघुस्तैक्ष्णयं सततं चोर्ध्वभासिता

भीष्म ने कहा—अग्नि के गुण हैं: दुर्धर्षता (जिसे सहना कठिन हो), ज्योति, ताप, पाक (पकाना), प्रकाश करना; तथा शोक-सदृश दाह, राग-सदृश लालिमा, लघुता, तीक्ष्णता, और उसकी ज्वाला का निरन्तर ऊपर की ओर उठते हुए प्रकाशित होना—ये सब अग्नि के लक्षण हैं।

Verse 6

वायोरनियमस्पर्शों वादस्थानं स्वतन्त्रता । बलं शैघ्र्यं च मोक्ष च कर्म चेष्टा55त्मता भव:

भीष्म ने कहा—वायु के गुण हैं: अनियत स्पर्श (जो एक स्थान में स्थिर नहीं), वाक्-इन्द्रिय का आधार, गमन-आगमन की स्वतन्त्रता, बल और शीघ्रगामिता; मल-मूत्र आदि का शरीर से निष्कासन; उत्क्षेपण आदि कर्म; क्रिया-शक्ति; प्राण-तत्त्व; तथा जन्म-मृत्यु से उसका सम्बन्ध—ये सब वायु के लक्षण हैं।

Verse 7

आकाश स्य गुण: शब्दो व्यापित्वं च्छिद्रतापि च | अनाश्रयमनालम्बमव्यक्तमविकारिता

भीष्म ने कहा—आकाश का गुण शब्द है; वह सर्वव्यापक है और छिद्रता (अवकाश देना) भी उसी का लक्षण है। वह किसी स्थूल पदार्थ का आश्रय नहीं लेता, स्वयं भी किसी आधार पर नहीं टिका; इन्द्रियों को अव्यक्त है और स्वभाव से निर्विकार रहता है।

Verse 8

अप्रतीघातिता चैव भूतत्वं विकृतानि च । गुणा: पज्चाशतं प्रोक्ता: पज्चभूतात्मभाविता:

भीष्म ने कहा—अप्रतिघातिता (अवरोध-रहितता), भूतत्व (तत्त्व-रूपता) और उससे उत्पन्न विकृतियाँ भी गिनी जाती हैं। इस प्रकार पंचमहाभूतों के स्वभाव पर आधारित पचास गुण कहे गये हैं।

Verse 9

धैर्योपपत्तिवर्यक्तिश्न विसर्ग: कल्पना क्षमा । सदसच्चाशुता चैव मनसो नव वै गुणा:,धैर्य, तर्क-वितर्कमें कुशलता, स्मरण, भ्रान्ति, कल्पना, क्षमा, शुभ एवं अशुभ संकल्प और चंचलता--ये मनके नौ गुण हैं

भीष्म ने कहा—धैर्य, तर्क-वितर्क में कुशलता, स्पष्ट अभिव्यक्ति, त्याग (विसर्जन) की शक्ति, कल्पना, क्षमा, शुभ और अशुभ संकल्प, तथा चंचलता—ये मन के नौ गुण हैं। इनकी गति और सामर्थ्य को जानकर मनुष्य समझता है कि मन ही धर्म और भ्रम—दोनों का आधार है, और संयम से उसे धर्म की ओर मोड़ा जा सकता है।

Verse 10

इष्टनिष्टविपत्ति शक्ष॒ व्यवसाय: समाधिता । संशय: प्रतिपत्तिश्न बुद्धे! पजचगुणान्‌ विदु:,इष्ट और अनिष्ट वृत्तियोंका नाश, विचार, समाधान, संदेह और निश्चय--ये पाँच बुद्धिके गुण माने गये हैं

भीष्म ने कहा—इष्ट और अनिष्ट वृत्तियों का नाश (उन पर विजय), दृढ़ निश्चय, समाधि/एकाग्र स्थिरता, संदेह (जो परखता है), और प्रतिपत्ति अर्थात् स्पष्ट निर्णय—ये बुद्धि के पाँच गुण माने गए हैं। इन्हीं से मनुष्य आवेगों को रोकता, विकल्पों की जाँच करता और धर्म में निश्चयपूर्वक स्थित होता है।

Verse 11

युधिछिर उवाच कथं पज्चगुणा बुद्धि: कथं पज्चेन्द्रिया गुणा: । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूक्ष्मज्ञानं पितामह

युधिष्ठिर ने पूछा—पितामह! बुद्धि के पाँच ही गुण कैसे माने गए हैं? और पाँच इन्द्रियाँ भी ‘गुण’ कैसे कहलाती हैं? यह सारा सूक्ष्म ज्ञान आप मुझे विस्तार से बताइए।

Verse 12

भीष्म उवाच आहुः षष्टिं बुद्धिगुणान्‌ वै भूतविशिष्टा नित्यविषक्ता: । भूतविभूती श्चाक्षरसृष्टा: पुत्र न नित्यं तदिह वदन्ति

भीष्म ने कहा—वत्स! कहते हैं कि बुद्धि के साठ गुण हैं, जो भूतों के भेद से विशिष्ट हैं और नित्य चेतना से संयुक्त रहते हैं। पंचमहाभूत और उनकी विभूतियाँ अक्षर (अविनाशी) परमात्मा की सृष्टि हैं; परन्तु परिवर्तनशील होने के कारण तत्त्वज्ञ पुरुष इस जगत में उन्हें ‘नित्य’ नहीं कहते।

Verse 13

तत्‌ पुत्र चिन्ताकलिल तदुक्त- मनागतं वै तव सम्प्रतीह । भूतार्थतत्त्वं तदवाप्य सर्व भूतप्रभावाद्‌ भव शान्तबुद्धि:

भीष्म ने कहा—वत्स! उस चिंता-जाल को और जो कुछ अन्य वक्ताओं ने कहा है, उसे छोड़ दो। अब मैं तुम्हें यथार्थ बताता हूँ। समस्त भूतों से सम्बन्धित तत्त्व को भलीभाँति जानकर, सब प्राणियों में व्याप्त प्रभु-प्रभाव और प्रसाद से, हे युधिष्ठिर, तुम शान्तबुद्धि हो जाओ।

Verse 254

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दी सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में शुकदेव के अनुप्रश्न-विषयक दो सौ चौवनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 255

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने पञ्चपञ्चाशदधिकद्वधिशततमो< ध्याय:

इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्व में शुक के अनुप्रश्न-प्रसंग में दो सौ पचपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

That the supreme dharma is to live and act so that beings are not harmed or made fearful—ahiṃsā expressed as ‘abhaya’ in thought, speech, and conduct.

Tulādhāra models impartiality: he neither praises nor condemns others’ actions, aiming instead at inner steadiness and universal benevolence, treating praise and injury as equally non-binding.

Yes: it states dharma is subtle and not to be derived merely from popular custom; it should be sought through causal reasoning (kāraṇa) and justified consistency (upapatti), a stance that functions as the chapter’s methodological ‘phalashruti-like’ guidance.