Adhyaya 245
Shanti ParvaAdhyaya 24537 Verses

Adhyaya 245

सूक्ष्मभूत-भूतात्मविज्ञानम् (Knowing the subtle principle and the bhūtātman through yoga)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Sub-episode on the subtle self, dream-cognition, and yogic perception

Vyāsa describes how the subtle principle associated with the embodied being is understood by those trained in śāstra and disciplined cognition. He employs analogies: subtle entities move like visible rays; the self is apprehended as a reflected likeness, like the sun’s heat/perception mirrored in water. Those with controlled senses are said to perceive subtle beings freed from the body, each according to its own nature. The chapter then correlates waking and dream: the cognizer experiences pleasure and pain in dreams, performs actions with emotional afflictions (anger, greed), and can also experience satisfaction and “gain,” suggesting continuity of karmic patterning across states. Yet, beings dominated by tamas and rajas fail to recognize the luminous principle situated in the heart. The instruction recommends śāstra-yoga orientation and indicates that yoga in samādhi is characterized as śama (ascribed to Śāṇḍilya). Finally, knowledge of “seven subtle” factors and the six-limbed great Lord, together with correct application of prakṛti/primordial principle (pradhāna-viniyoga), is stated to lead toward realization of the supreme Brahman.

Chapter Arc: व्यास शुकदेव से कहते हैं—ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के संस्कारों को साधकर अब परम-परमार्थ की ओर एकाग्र होकर सुनो: संन्यास (पारिव्राज्य) का उत्तम मार्ग। → व्यास क्रमशः आश्रम-क्रम का संकेत देते हैं—पूर्वोक्त तीन अवस्थाओं में कषाय (राग-द्वेषादि मल) को पकाकर/जला कर, फिर ‘श्रेणिस्थान’ (आध्यात्मिक सोपान/स्थितियों) में स्थिर होकर अकेले, असहाय-सा, सिद्धि के लिए एकधर्मचारी बनकर प्रव्रज्या ग्रहण करने की शिक्षा देते हैं। यह ‘एकाकी धर्म’ मन के लिए कठिन है—क्योंकि सहारा, संग्रह, प्रतिष्ठा और विवाद-प्रवृत्ति सब छोड़नी पड़ती है। → अहिंसा को सर्वधर्म-शिरोमणि की तरह प्रतिष्ठित किया जाता है—जो हिंसा में प्रवृत्त नहीं होता, वह ‘अमृत’ के समान नित्य वास करता है। साथ ही बाह्य यज्ञों के स्थान पर ‘आत्मयज्ञ’ का उत्कर्ष आता है: हृदय-प्रदेश से निकले प्राणों को आत्मा में ही होम करना—यही उसका अग्निहोत्र है, जो देवसहित समस्त लोकों में मान्य है। → व्यास संन्यासी-लक्षणों का चित्र खींचते हैं—रोष-मोह से अछूता, समलोष्टकाञ्चन (मिट्टी-स्वर्ण सम), निन्दा-स्तुति, प्रिय-अप्रिय, संधि-विग्रह से उदासीन; मन की ‘सम्प्रसाद’ (प्रसन्न-शुद्ध) अवस्था को जगत-शरीर का आधार बताकर, उसी में स्थित भिक्षु के निर्भय, अनन्त लोक-प्राप्ति का निष्कर्ष देते हैं।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २४४ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ “लोक मिलाकर कुल ३१३ “लोक हैं) शीश (0) आल आन+- > ७ प्राणाय स्वाहा, * अपानाय स्वाहा, ७ व्यानाय स्वाहा, * समानाय स्वाहा, $ उदानाय स्वाहा--ये प्राणाग्निहोत्रके पाँच मन्त्र हैं, भोजन आरम्भ करते समय पहले आचमन करके इनमेंसे एक-एक मन्त्रको पढ़कर एक-एक ग्रास अन्न मुँहमें डाले। इस प्रकार पाँच ग्रास पूरे होनेपर पुन: आचमन कर ले। यही प्राणाग्निहोत्र कहलाता है। पज्चचत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान्‌ संन्यासीकी प्रशंसा शुक उवाच वर्तमानस्तथैवात्र वानप्रस्थाश्रमे यथा । योक्तव्यो55त्मा कथं शक्‍त्या वेद्यं वै काड्क्षता परम्‌,शुकदेवजीने पूछा--पिताजी! ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंमें जैसे शास्त्रोक्त नियमके अनुसार चलना आवश्यक है, उसी प्रकार इस वानप्रस्थ आश्रममें भी शास्त्रोक्त नियमका पालन करते हुए चलना चाहिये। यह सब तो मैंने सुन लिया। अब मैं यह जानना चाहता हूँ, जो जानने योग्य परब्रह्म परमात्माको पाना चाहता हो, उसे अपनी शक्तिके अनुसार उस परमात्माका चिन्तन कैसे करना चाहिये?

शुकदेवजी ने पूछा—पिताजी! जैसे ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रमों में शास्त्रोक्त नियमों के अनुसार चलना आवश्यक है, वैसे ही इस वानप्रस्थ आश्रम में भी शास्त्रीय अनुशासन का पालन करना चाहिए—यह सब मैंने सुन लिया। अब जो जानने योग्य परब्रह्म को पाना चाहता हो, वह अपनी शक्ति के अनुसार आत्मसंयम और चिन्तन कैसे करे?

Verse 2

व्यास उवाच प्राप्प संस्कारमेताभ्यामाश्रमा भ्यां तत: परम्‌ । यत्कार्य परमार्थ तु तदिहैकमना: शूणु,व्यासजीने कहा--बेटा! ब्रह्मचर्य और गृहस्थाश्रमके धर्मोद्वारा चित्तका संस्कार (शोधन) करनेके अनन्तर मुक्तिके लिये जो वास्तविक कर्तव्य है, उसे बताता हूँ, तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो

व्यासजी बोले—बेटा! ब्रह्मचर्य और गृहस्थ—इन दोनों आश्रमों के धर्मों से चित्त का संस्कार (शोधन) प्राप्त करके, अब मैं तुम्हें परमार्थ—मुक्ति—की वास्तविक साधना बताता हूँ। तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो।

Verse 3

कषायं पाचयित्वा$<शु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु । प्रव्रजेच्च परं स्थान पारिव्राज्यमनुत्तमम्‌,पंक्तिक्रमसे स्थित पूर्वोक्त तीन आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थमें चित्तके राग- द्वेष आदि दोषोंको पकाकर--उन्हें नष्ट करके शीघ्र ही सर्वोत्तम चतुर्थ आश्रम संन्‍्यासको ग्रहण कर ले

व्यासजी बोले—पूर्वोक्त तीन क्रमबद्ध आश्रमों में रहकर राग-द्वेष आदि कषायों को पकाकर—अर्थात् जला-नष्ट करके—शीघ्र ही सर्वोत्तम परावस्था, अनुत्तम पारिव्राज्य—संन्यास—को ग्रहण करे।

Verse 4

तत्‌ भवानेवमभ्यस्थ वर्ततां श्रूयतां तथा । एक एव चरेद्‌ धर्म सिद्धयर्थमसहायवान्‌,बेटा! तुम इस संन्यास-धर्मके नियमोंको सुनो और उन्हें अभ्यासमें लाकर उसीके अनुसार बर्ताव करो। संन्यासीको चाहिये कि वह सिद्धि प्राप्त करनेके लिये किसीको साथ न लेकर अकेला ही संन्यास-धर्मका पालन करे

बेटा! तुम इस संन्यास-धर्म के नियमों को सुनो, उन्हें अभ्यास में लाकर उसी के अनुसार आचरण करो। सिद्धि की प्राप्ति के लिए संन्यासी को बिना किसी सहचर के, अकेले ही संन्यास-धर्म का पालन करना चाहिए।

Verse 5

एकश्चरति य: पश्यन्‌ न जहाति न हीयते । अनग्निरनिकेतश्न ग्राममन्नार्थमा श्रयेत्‌,जो आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करके एकाकी विचरता रहता है, वह सर्वव्यापी होनेके कारण न तो स्वयं किसीका त्याग करता है और न दूसरे ही उसका त्याग करते हैं। संन्यासी कभी न तो अग्निकी स्थापना करे और न घर या मठ ही बनाकर रहे; केवल भिक्षा लेनेके लिये ही गाँवमें जाय

जो आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करके एकाकी विचरता है, वह न किसी का त्याग करता है और न कोई उसका त्याग करता है। संन्यासी न अग्नि की स्थापना करे, न घर या मठ बनाकर बसे; केवल भिक्षा के लिए ही गाँव में प्रवेश करे।

Verse 6

अश्वस्तनविधाता स्यान्मुनिर्भावसमाहित: । लघ्वाशी नियताहार: सकृदन्ननिषेविता,वह दूसरे दिनके लिये अन्नका संग्रह न करे। चित्त-वृत्तियोंको एकाग्र करके मौनभावसे रहे। हलका और नियमानुकूल भोजन करे तथा दिन-रातमें केवल एक ही बार अन्न ग्रहण करे

वह दूसरे दिन के लिए अन्न का संग्रह न करे। चित्त-वृत्तियों को एकाग्र करके मौनभाव से रहे। हलका और नियमानुकूल भोजन करे तथा दिन-रात में केवल एक ही बार अन्न ग्रहण करे।

Verse 7

कपाल वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता । उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद्‌ भिक्षुलक्षणम्‌,भिक्षापात्र एवं कमण्डलु रखे। वृक्षकी जड़में सोये या निवास करे। जो देखनेमें सुन्दर न हो, ऐसा वस्त्र धारण करे। किसीको साथ न रखे और सब प्राणियोंकी उपेक्षा कर दे। ये सब संन्यासीके लक्षण हैं

भिक्षापात्र और कमण्डलु रखे। वृक्ष की जड़ में सोए या निवास करे। जो देखने में सुन्दर न हो, ऐसा वस्त्र धारण करे। किसी को साथ न रखे और सब प्राणियों के प्रति उपेक्षा (आसक्ति-द्वेष से रहित) रखे। ये ही संन्यासी के लक्षण हैं।

Verse 8

यस्मिन्‌ वाच: प्राविशन्ति कूपे त्रस्ता द्विपा इव । न कक्तारं पुनर्यान्ति स कैवल्याश्रमे वसेत्‌

जिसमें वाणी ऐसे प्रवेश कर जाती है जैसे भयभीत हाथी कुएँ में गिर पड़ते हैं और फिर अपने महावत के पास लौटते नहीं—वह पुरुष कैवल्य-आश्रम में वास करे।

Verse 9

जैसे डरे हुए हाथी भागकर किसी जलाशयमें प्रवेश कर जाते हैं, फिर सहसा निकलकर अपने पूर्व स्थानको नहीं लौटते उसी प्रकार जिस पुरुषमें दूसरोंके कहे हुए निन्दात्मक या प्रशंसात्मक वचन समा जाते हैं, परंतु प्रत्युत्तरके रूपमें वे वापस पुनः नहीं लौटते अर्थात्‌ जो किसीकी की हुई निन्दा या स्तुतिका कोई उत्तर नहीं देता, वही संन्यास- आश्रममें निवास कर सकता है ।। नैव पश्येन्न शृणुयादवाच्यं जातु कस्यचित्‌ | ब्राह्मणानां विशेषेण नैव ब्रूयात्‌ कथंचन,संन्यासी किसीकी निन्‍दा करनेवाले पुरुषकी ओर आँख उठाकर देखे नहीं, कभी किसीका निन्दात्मक वचन सुने नहीं तथा विशेषत:ः ब्राह्मणोंके प्रति किसी प्रकार न कहने योग्य बात न कहे

व्यासजी बोले—जैसे भयभीत हाथी दौड़कर किसी जलाशय में घुस जाते हैं और फिर सहसा निकलकर अपने पूर्व स्थान पर लौटते नहीं, वैसे ही जिस पुरुष में दूसरों के निन्दा या प्रशंसा के वचन समा जाते हैं और प्रत्युत्तर बनकर बाहर नहीं निकलते—अर्थात् जो निन्दा और स्तुति दोनों का कोई उत्तर नहीं देता—वही संन्यास-आश्रम में रहने योग्य है। संन्यासी निन्दा करने वाले पुरुष की ओर आँख उठाकर भी न देखे; कभी किसी का अवाच्य वचन न सुने; और विशेषतः ब्राह्मणों के विषय में किसी प्रकार भी अनुचित बात न कहे।

Verse 10

यद्‌ ब्राह्मणस्य कुशलं तदेव सततं वदेत्‌ । तूष्णीमासीत निन्दायां कुर्वन्‌ भैषज्यमात्मन:,जिससे ब्राह्मणोंका हित हो, वैसा ही वचन सदा बोले। अपनी निन्दा सुनकर भी चुप रह जाय--इस मौनावलम्बनको भवरोगसे छूटनेकी दवा समझकर इसका सेवन करता रहे

ब्राह्मणों का जिससे हित हो, वही वचन सदा बोले। अपनी निन्दा सुनकर भी चुप रहे—इस मौन-धर्म को संसार-रोग से छूटने की औषधि मानकर निरन्तर इसका सेवन करे।

Verse 11

येन पूर्णमिवाकाशं भवत्येकेन सर्वदा | शून्यं येन जनाकीर्ण त॑ देवा ब्राह्मणं विदु:,जो सदा अपने सर्वव्यापी स्वरूपसे स्थित होनेके कारण अकेले ही सम्पूर्ण आकाभमें परिपूर्ण-सा हो रहा है तथा जो असंग होनेके कारण लोगोंसे भरे हुए स्थानको भी सूना समझता है, उसे ही देवतालोग ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं

जो सदा अपने सर्वव्यापी स्वरूप में स्थित होकर अकेला ही मानो समस्त आकाश को पूर्ण कर देता है, और जो असंग होने के कारण जनसमूह से भरे स्थान को भी शून्य समझता है—उसी को देवता ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं।

Verse 12

येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचिदाशित: । यत्र क्वचन शायी च त॑ देवा ब्राह्मणं विदु:,जो जिस किसी भी (वस्त्र-वल्कल आदि) वस्तुसे अपना शरीर ढक लेता है, समयपर जो भी रूखा-सूखा मिल जाय, उसीसे भूख मिटा लेता है और जहाँ कहीं भी सो रहता है, उसे देवता ब्रह्मज्ञानी समझते हैं

जो जिस किसी वस्त्र-वल्कल आदि से अपना शरीर ढक लेता है, समय पर जो भी रूखा-सूखा मिल जाए उसी से भोजन कर लेता है, और जहाँ कहीं भी सो रहता है—उसे देवता ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं।

Verse 13

अहेरिव गणादू्‌ भीत: सौहित्यान्नरकादिव । कुणपादिव च स्त्रीभ्यस्तं देवा ब्राह्मणं विदु:,जो जनसमुदायको सर्प-सा समझकर उसके निकट जानेसे डरता है, स्वादिष्ट भोजनजनित तृप्तिको नरक-सा मानकर उससे दूर रहता है और स्त्रियोंको मुर्दोके समान समझकर उनकी ओरसे विरक्त होता है, उसे देवता ब्रह्मज्ञानी मानते हैं

जो जनसमुदाय से सर्प की भाँति डरता है, स्वादिष्ट भोजन से उत्पन्न तृप्ति को नरक के समान मानकर उससे दूर रहता है, और स्त्रियों से मुर्दे के समान विरक्त रहता है—उसे देवता ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं।

Verse 14

न क़ुद्धयेन्न प्रह्ष्येच्च मानितो$मानितश्न यः । सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदु:,जो सम्मान प्राप्त होनेपर हर्षित, अपमानित होनेपर कुपित नहीं होता तथा जिसने सम्पूर्ण प्राणियोंको अभय दान कर दिया है, उसे ही देवता लोग ब्रह्मज्ञानी मानते हैं

जो सम्मान पाकर हर्षित नहीं होता, अपमान पाकर क्रोधित नहीं होता, और जिसने समस्त प्राणियों को अभयदान दे दिया है—उसी को देवता ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण मानते हैं।

Verse 15

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्‌ । कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भूतको यथा,संन्‍न्यासी न तो जीवनका अभिनन्दन करे और न मृत्युका ही। जैसे सेवक स्वामीके आदेशकी प्रतीक्षा करता रहता है, उसी प्रकार उसे भी कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये

संन्यासी न तो जीवन का अभिनन्दन करे और न मृत्यु का। जैसे सेवक स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही उसे भी केवल काल की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

Verse 16

अनभ्याहतचित्त: स्यादनभ्याहतवाग भवेत्‌ । निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्थ कि भयम्‌,संन्यासी अपने चित्तको राग-द्वेष आदि दोषोंसे दूषित न होने दे। अपनी वाणीको निन्दा आदि दोषोंसे बचावे और सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सर्वथा शत्रुहीन हो जाय। जिसे ऐसी स्थिति प्राप्त हो उसे किसीसे क्या भय हो सकता है?

संन्यासी अपने चित्त को राग-द्वेष आदि से आहत न होने दे, और अपनी वाणी को निन्दा व हानिकारक वचन से दूषित न करे। समस्त पापों से मुक्त होकर, शत्रुरहित हो जाए—ऐसी अवस्था वाले को फिर किससे भय हो सकता है?

Verse 17

अभयं सर्वभूते भ्यो भूतानामभयं तत: । तस्य मोहाद्‌ विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन

सब प्राणियों के प्रति अभय हो—और सब प्राणियों की ओर से भी अभय प्राप्त हो। जो मोह से मुक्त है, उसके लिए कहीं से भी भय उत्पन्न नहीं होता।

Verse 18

जिसे सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय प्राप्त है तथा जिसकी ओरसे किसी भी प्राणीको कोई भय नहीं है, उस मोहमुक्त पुरुषको किसीसे भी भय नहीं होता ।। यथा नागपदे<न्यानि पदानि पदगामिनाम्‌ । सर्वाण्येवापिधीयन्ते पदजातानि कौज्जरे,जैसे पैरोंद्वारा चलनेवाले अन्य प्राणियोंके सम्पूर्ण पदचिह्न हाथीके पदचिह्ममें समा जाते हैं, उसी प्रकार सारा धर्म और अर्थ अहिंसाके अन्तर्भूत है। जो किसीकी हिंसा नहीं करता, वह सदा अमृत (जन्म और मृत्युके बन्धनसे मुक्त) होकर निवास करता है

जिसे समस्त प्राणियों से अभय प्राप्त है और जिसकी ओर से किसी भी प्राणी को भय नहीं—वह मोहमुक्त पुरुष किसी से भी नहीं डरता। जैसे पैरों से चलने वाले अन्य प्राणियों के सब पदचिह्न हाथी के पदचिह्न में समा जाते हैं, वैसे ही समस्त धर्म और अर्थ अहिंसा में समाहित हैं। जो किसी की हिंसा नहीं करता, वह सदा अमृत—जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त—होकर निवास करता है।

Verse 19

एवं सर्वमहिंसायां धर्मार्थमपिधीयते । अमृत: स नित्यं वसति यो हिंसां न प्रपद्यते,जैसे पैरोंद्वारा चलनेवाले अन्य प्राणियोंके सम्पूर्ण पदचिह्न हाथीके पदचिह्ममें समा जाते हैं, उसी प्रकार सारा धर्म और अर्थ अहिंसाके अन्तर्भूत है। जो किसीकी हिंसा नहीं करता, वह सदा अमृत (जन्म और मृत्युके बन्धनसे मुक्त) होकर निवास करता है

जैसे पैरों से चलने वाले समस्त प्राणियों के पदचिह्न हाथी के पदचिह्न में समा जाते हैं, वैसे ही समस्त धर्म और अर्थ अहिंसा में अंतर्भूत हैं। जो किसी की हिंसा नहीं करता, वह सदा अमृत—जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त—होकर निवास करता है।

Verse 20

अहिंसक: सम: सत्यो धृतिमान्‌ नियतेन्द्रिय: । शरण्य: सर्वभूतानां गतिमाप्रोत्यनुत्तमाम्‌,जो हिंसा न करनेवाला, समदर्शी, सत्यवादी, धैर्यवान्‌, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाला है, वह अत्यन्त उत्तम गति पाता है

व्यासजी कहते हैं—जो अहिंसक, समदर्शी, सत्यवादी, धैर्यवान, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों को शरण देनेवाला है, वह अत्यन्त उत्तम, अनुपम गति को प्राप्त होता है।

Verse 21

एवं प्रज्ञानतृप्तस्य निर्भयस्य निराशिष: । न मृत्युरतिगो भाव: स मृत्युमधिगच्छति,इस प्रकार जो ज्ञानानन्दसे तृप्त होकर भय और कामनाओंसे रहित हो गया है, उसपर मृत्युका जोर नहीं चलता। वह स्वयं ही मृत्युको लाँध जाता है

व्यासजी कहते हैं—जो प्रबुद्ध ज्ञान से तृप्त, निर्भय और निराश (कामनारहित) हो गया है, उस पर मृत्यु का बल नहीं चलता। वह स्वयं ही मृत्यु को लाँघ जाता है।

Verse 22

विमुक्तं सर्वसड्रेभ्यो मुनिमाकाशवत्‌ स्थितम्‌ । अस्वमेकचरं शान्तं त॑ देवा ब्राह्म॒णं विदु:

व्यासजी कहते हैं—जो समस्त आसक्तियों से मुक्त मुनि आकाश के समान स्थित है—अबंधन, अवरोधरहित; जो किसी वस्तु को अपना नहीं मानता, एकाकी विचरता और अंतःकरण से शान्त है—उसे देवता भी सच्चा ब्राह्मण मानते हैं।

Verse 23

जो सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर मुनिवृत्तिसे रहता है, आकाशकी भाँति निर्लेप और स्थिर है, किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता, एकाकी विचरता और शान्तभावसे रहता है, उसे देवता ब्रह्मवेत्ता मानते हैं ।। जीवितं यस्य धर्मार्थ धर्मो हर्यर्थमेव च । अहोगात्राश्न पुण्यार्थ त॑ देवा ब्राह्मणं विदु:

व्यासजी कहते हैं—जिसका जीवन धर्म के लिए है, जिसका धर्म केवल हरि के लिए है, और जो देह-धारण हेतु अन्न-ग्रहण को भी केवल पुण्यार्थ मानता है—उसे देवता सच्चा ब्राह्मण, ब्रह्मवेत्ता मानते हैं।

Verse 24

जिसका जीवन धर्मके लिये और धर्म भगवान्‌ श्रीहरिके लिये होता है, जिसके दिन और रात धर्म-पालनमें ही व्यतीत होते हैं, उसे देवता ब्रह्मज्ञ मानते हैं ।। निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम्‌ | निर्मुक्ते बन्धनै: सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदु:,जो कामनाओंसे रहित तथा सब प्रकारके आरम्भोंसे रहित है, नमस्कार और स्तुतिसे दूर रहता तथा सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होता है, उसे ही देवता ब्रह्मज्ञानी मानते हैं

व्यासजी बोले—जो ब्राह्मण आशा‑आकांक्षाओं से रहित, सब प्रकार के आरम्भों से विरक्त, नमस्कार और स्तुति‑लोलुपता से दूर, तथा समस्त बन्धनों से मुक्त होता है, उसे देवता ब्रह्मज्ञानी मानते हैं। जिसका जीवन धर्म के लिए और धर्म भगवान् श्रीहरि के लिए होता है, जिसके दिन‑रात धर्मपालन में ही बीतते हैं, वही सच्चा ब्रह्मवेत्ता है।

Verse 25

सर्वाणि भूतानि सुखे रमन्ते सर्वाणि दुःखस्य भृशं त्रसन्ते । तेषां भयोत्पादनजातखेद: कुर्यान्न कर्माणि हि श्रद्धधान:,सम्पूर्ण प्राणी सुखमें प्रसन्न होते और दुःखसे बहुत डरते हैं; अतः प्राणियोंपर भय आता देखकर जिसे खेद होता है, उस श्रद्धालु पुरुषको भयदायक कर्म नहीं करना चाहिये

व्यासजी बोले—समस्त प्राणी सुख में रमते हैं और दुःख से अत्यन्त भयभीत होते हैं। इसलिए जो श्रद्धावान पुरुष प्राणियों में भय उत्पन्न होते देखकर दुःखी होता है, उसे दूसरों में भय पैदा करने वाले कर्म नहीं करने चाहिए।

Verse 26

दान॑ हि भूताभयदक्षिणाया: सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह । तीक्ष्णां तनुं यः प्रथमं जहाति सो5<नन्त्यमाप्रोत्य भयं प्रजाभ्य:,इस जगतमें जीवोंको अभयकी दक्षिणा देना सब दानोंसे बढ़कर है। जो पहलेसे ही हिंसाका त्याग कर देता है, वह सब प्राणियोंसे निर्भय होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है

व्यासजी बोले—इस जगत में प्राणियों को अभय की दक्षिणा देना सब दानों से श्रेष्ठ है। जो सबसे पहले तीक्ष्ण देहधारी हिंसा का त्याग कर देता है, वह अनन्त पद (मोक्ष) को प्राप्त होकर समस्त प्राणियों के प्रति निर्भय हो जाता है।

Verse 27

उत्तान आस्ये न हविर्जुहोति लोकस्य नाभिर्जगत: प्रतिष्ठा । तस्याड्रमज्ननि कृताकृतं च वैश्वानर: सर्वमिदं प्रपेदे .,जो संन्यासी खोले हुए मुखमें “प्राणाय स्वाहा” इत्यादि मन्त्रोंसे प्राणोंके लिये अन्नकी आहुति नहीं देता, अपितु प्राणों (इन्द्रिय-मन आदि) को ही आत्मामें होम देता--लीन करता है, उसका मस्तक आदि सारा अंगसमुदाय तथा किया हुआ और नहीं किया हुआ कर्मसमूह अग्निका ही अवयव हो जाता है अर्थात्‌ वह उस अग्निका स्वरूप हो जाता है, जो सृष्टिके आरम्भसे ही प्राणियोंके नाभिस्थान--उदरमें जठरानलरूपमें विराजमान है तथा सम्पूर्ण जगत्‌का आश्रय है। उस वैश्वानर (अग्नि)-ने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है

व्यासजी बोले—संन्यासी खुले हुए मुख में (बाह्य अग्नि की भाँति) हवि नहीं डालता; वह प्राणों और अन्तःकरण की वृत्तियों को आत्मा में होम करता है। ऐसे पुरुष का समस्त शरीर और किया‑अकिया कर्मसमूह मानो अग्नि के ही अंग बन जाते हैं; वह उसी वैश्वानर से एक हो जाता है जो प्राणियों के नाभिस्थान—उदर में जठराग्नि रूप से स्थित, जगत का आधार है और समस्त विश्व में व्याप्त है।

Verse 28

प्रादेशमात्रे हृदि निःसृतं यत्‌ तस्मिन्‌ प्राणानात्मयाजी जुहोति । तस्याग्निहोत्रं हुतमात्मसंस्थं सर्वेषु लोकेषु सदेवकेषु,आत्मयज्ञ करनेवाला ज्ञानी पुरुष नाभिसे लेकर हृदयतकका जो प्रादेशमात्र स्थान है, उसमें प्रकट हुई जो चैतन्यज्योति है, उसीमें समस्त प्राणोंकी--इन्द्रिय, मन आदिकी आहुति देता है अर्थात्‌ समस्त प्राणादिका आत्मामें लय करता है। उसका प्राणाग्निहोत्र यद्यपि अपने शरीरके भीतर ही होता है तथापि वह सर्वात्मा होनेके कारण उसके द्वारा देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें प्राणाग्निहोत्रकर्म सम्पन्न हो जाता है; अर्थात्‌ उसके प्राणोंकी तृप्तिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके प्राण तृप्त हो जाते हैं

व्यासजी बोले—आत्मयज्ञ करने वाला ज्ञानी पुरुष हृदय में प्रादेशमात्र जो चैतन्य‑ज्योति प्रकट हुई है, उसी में समस्त प्राणशक्तियों की आहुति देता है—अर्थात् उन्हें आत्मा में लय करता है। यद्यपि उसका अग्निहोत्र अपने भीतर ही सम्पन्न होता है, तथापि सर्वात्मभाव के कारण वह देवताओं सहित समस्त लोकों में सम्पन्न माना जाता है; क्योंकि उसके अपने प्राण तृप्त होने से मानो समस्त ब्रह्माण्ड के प्राण तृप्त हो जाते हैं।

Verse 29

देवं त्रिधातु त्रिवृतं सुपर्ण ये विद्युरग्रयां परमात्मतां च । ते सर्वलोकेषु महीयमाना देवा: समर्त्या: सुकृतं वदन्ति,जो सम्पूर्ण जगत्‌में अपने चिन्मयस्वरूपसे प्रकाशित होता है, तीन धातु (वर्ण-अकार, उकार, मकार) अर्थात्‌ प्रणव जिसका वाचक है, जो सत्त्व आदि तीनों गुणोंमें--त्रिगुणमयी मायामें उसके नियन्तारूपसे विद्यमान है तथा जिसके जगत्‌-सम्बन्धी व्यापार वृक्षके सुन्दर पत्तोंक समान विस्तारको प्राप्त हुए हैं, उस अन्तर्यामी पुरुषको तथा उसकी उत्तम परब्रह्मस्वरूपताको जो जानते हैं, वे सम्पूर्ण लोकोंमें सम्मानित होते हैं और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण देवता उनके शुभकर्मकी प्रशंसा करते हैं

व्यास ने कहा—जो उस अन्तर्यामी प्रभु को यथार्थ रूप से जानते हैं—जिसका वाचक त्रिधातु (अ-उ-म) प्रणव है, जो त्रिगुणमयी माया के बीच नियन्ता रूप से स्थित है, और जिसकी जगत्-व्यापी क्रिया महान् वृक्ष के सुन्दर पत्तों की भाँति फैलती है—और जो उसकी परमात्म-स्वरूप सर्वोच्च स्थिति को भी जानते हैं, वे सब लोकों में सम्मानित होते हैं। देवता भी मनुष्यों सहित उनके शुभ आचरण के पुण्य का गान करते हैं।

Verse 30

वेदांश्व वेद्यं तु विधिं च कृत्स्न- मथो निरुक्त परमार्थतां च । सर्व शरीरात्मनि य: प्रवेद तस्यैव देवा: स्पृहयन्ति नित्यम्‌,सम्पूर्ण वेदशास्त्र, ज्ेय वस्तु (आकाश आदि भूत और भौतिक जगत्‌), समस्त विधि (कर्मकाण्ड), निरुक्त (शब्दप्रमाणगम्य परलोक आदि) और परमार्थता (आत्माकी सत्यस्वरूपता)--यह सब कुछ शरीरके भीतर विद्यमान आत्मामें ही प्रतिष्ठित है। ऐसा जो जानता है, उस सर्वात्मा ज्ञानी पुरुषकी सेवाके लिये देवता भी सदा लालायित रहते हैं

व्यास ने कहा—जो समस्त शरीरों में स्थित आत्मा को यथार्थ रूप से जानता है, वही सारतः वेदों को, ज्ञेय समस्त वस्तुओं को, सम्पूर्ण विधि-नियमों (कर्मकाण्ड) को, अर्थ-प्रकाशक निरुक्त को और परम सत्य को जान लेता है। ऐसे सर्वात्मा-ज्ञानी की सेवा के लिए देवता भी सदा लालायित रहते हैं।

Verse 31

भूमावसक्तं दिवि चाप्रमेयं हिरण्मयं यो5ण्डजमण्डमध्ये | पतत्त्रिणं पक्षिणमन्तरिक्षे यो वेद भोग्यात्मनि रश्मिदीप्त:,जो पृथ्वीपर रहकर भी उसमें आसक्त नहीं है, अनन्त आकाशमें अप्रमेयभावसे स्थित है, जो हिरण्मय (चिन्मय ज्योतिस्वरूप), अण्डज--ब्रह्माण्डके भीतर प्रादुर्भूत और अण्ड- पिण्डात्मक शरीरके मध्यभागमें स्थित हृदय-कमलके आसनपर, भोग्यात्मा (शरीर) के अन्तर्गत हृदयाकाशमें जीवरूपसे विराजमान है; जिसमें अनेक अंगदेवता छोटे-छोटे पंखोंके समान शोभा पाते हैं तथा जो मोद और प्रमोद नामक दो प्रमुख पंखोंसे शोभायमान है; उस सुवर्णमय पक्षीरूप जीवात्मा एवं ब्रह्मको जो जानता है, वह ज्ञानकी तेजोमयी किरणोंसे प्रकाशित होता है

व्यास ने कहा—जो उस तेजस्वी, सुवर्णमय आत्मा को जानता है—जो पृथ्वी पर रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होता, जो आकाश-सदृश असीम विस्तार में अप्रमेय रूप से स्थित है, जो ब्रह्माण्ड-अण्ड के भीतर प्रकट होकर देह के हृदय-कमल में अन्तराकाश में पक्षी की भाँति विचरता है—वह ज्ञानी ज्ञान की प्रज्वलित किरणों से प्रकाशित होकर स्वयं दीप्तिमान हो जाता है।

Verse 32

आवर्तमानमजरं विवर्तनं षण्णाभिकं द्वादशारं सुपर्व । यस्येदमास्ये परियाति विश्रृ तत्‌ कालचक्रं निहितं गुहायाम्‌,जो निरन्तर घूमता रहता है, कभी जीर्ण या क्षीण नहीं होता, जो लोगोंकी आयुको क्षीण करता है, छः ऋतुएँ जिसकी नाभि हैं, बारह महीने जिसके अरे हैं, दर्शपौर्णमास आदि जिसके सुन्दर पर्व हैं; यह सम्पूर्ण विश्व जिसके मुँहमें भक्ष्य पदार्थके समान जाता है, वह कालचक्र बुद्धिरूपी गुहामें स्थित है (उसे जो जानता है, देवगण उसके शुभकर्मकी प्रशंसा करते हैं)

व्यास ने कहा—निरन्तर घूमने वाला, कभी जीर्ण न होने वाला, सतत प्रवर्तमान यह कालचक्र है। छः ऋतुएँ इसकी नाभि हैं, बारह महीने इसके अरे हैं, और दर्श-पूर्णमास आदि इसके सुन्दर पर्व (सन्धियाँ) हैं। इस चक्र के मुख में यह समस्त विश्व अन्न के समान प्रवेश करता है। वह कालचक्र अन्तर्बुद्धि-रूपी गुहा में स्थित है; जो उसे यथार्थ जानता है, देवता उसके शुभ आचरण की प्रशंसा करते हैं।

Verse 33

यः सम्प्रसादो जगत: शरीरं सर्वान्‌ स लोकानधिगच्छतीह । तस्मिन्‌ हित॑ तर्पयतीह देवां- स्ते वै तृप्तास्तर्पयन्त्यास्यमस्य,जो मनको प्रसन्नता प्रदान करता है, इस जगत्‌का शरीर है अर्थात्‌ सम्पूर्ण जगत्‌ जिसके विराट्‌ शरीरमें विराजित है, वह परमात्मा इस जगत्‌में सब लोकोंको घेरे हुए स्थित है। उस परमात्मामें ध्यानद्वारा स्थापित किया हुआ मन, इस देहमें स्थित देवताओं-- प्राणोंको तृप्त करता है और वे तृप्त हुए प्राण उस ज्ञानीके मुखको ज्ञानामृतसे तृप्त करते हैं

व्यास ने कहा—जो परमात्मा प्रसन्नता का स्वरूप है और जगत् का शरीर है, वही यहाँ सब लोकों को व्याप्त करके स्थित है। उस परम में ध्यान द्वारा स्थिर किया हुआ मन इस देह में स्थित देवताओं—प्राणशक्तियों—को तृप्त करता है; और वे तृप्त प्राण उस ज्ञानी के मुख को ज्ञानामृत से तृप्त करते हैं।

Verse 34

तेजोमयो नित्यमय: पुराणो लोकाननन्तानभयानुपैति । भूतानि यस्मान्न त्रसन्‍्ते कदाचित्‌ स भूतानां न त्रसते कदाचित्‌

वह तेजोमय, नित्यमय और पुरातन है; वह अनन्त, निर्भय लोकों को प्राप्त होता है। जिससे प्राणी कभी भयभीत नहीं होते, वह भी प्राणियों से कभी भय नहीं पाता।

Verse 35

जो ब्रह्मज्ञाममय तेजसे सम्पन्न और पुरातन नित्य-ब्रह्मपरायण है, वह भिक्षु अनन्त एवं निर्भय लोकोंको प्राप्त होता है। जिससे जगतके प्राणी कभी भयभीत नहीं होते, वह भी संसारके प्राणियोंसे कभी भय नहीं पाता है ।। अग्हणीयो न च गर्हते5न्यान्‌ स वै विप्र: परमात्मानमीक्षेत्‌ । विनीतमोहो व्यपनीतकल्मषो न चेह नामुत्र च सो5न्नमृच्छति,जो न तो स्वयं निन्दनीय है और न दूसरोंकी निन्दा करता है, वही ब्राह्मण परमात्माका दर्शन कर सकता है। जिसके मोह और पाप दूर हो गये हैं, वह इस लोक ओर परलोकके भोगोंमें आसक्त नहीं होता

जो ब्रह्म-ज्ञानजन्य तेज से सम्पन्न, पुरातन और नित्य ब्रह्म-परायण भिक्षु है, वह अनन्त और निर्भय लोकों को प्राप्त होता है। जिससे जगत के प्राणी कभी भयभीत नहीं होते, वह भी प्राणियों से कभी भय नहीं पाता। जो स्वयं निन्दनीय नहीं और दूसरों की निन्दा भी नहीं करता, वही ब्राह्मण परमात्मा का दर्शन कर सकता है। जिसका मोह विनीत हो गया और पाप दूर हो गए, वह न इस लोक के भोगों में आसक्त होता है, न परलोक के।

Verse 36

अरोषमोह: समलोष्टकाञउचन: प्रहीणकोशो गतसंधिविग्रह: । अपेतनिन्‍न्दास्तुतिरप्रियाप्रिय- श्वरन्नुदासीनवदेष भिक्षुक:,ऐसे संन्यासीको रोष और मोह नहीं छू सकते। वह मिट्टीके ढेले और सोनेको समान समझता है। पाँच कोशोंका अभिमान त्याग देता है और संधि-विग्रह तथा निन्दा-स्तुतिसे रहित हो जाता है। उसकी दृष्टिमें न कोई प्रिय होता है न अप्रिय। वह संन्यासी उदासीनकी भाँति सर्वत्र विचरता रहता है

ऐसे भिक्षु को न रोष छूता है न मोह। वह मिट्टी के ढेले और सोने को समान समझता है। वह ‘कोशों’ का अभिमान और संग्रह-भाव त्यागकर संधि-विग्रह की वृत्तियों से परे हो जाता है; निन्दा-स्तुति से रहित रहता है। उसकी दृष्टि में न कोई विशेष प्रिय है, न कोई अप्रिय; वह उदासीन की भाँति जगत में विचरता रहता है।

Verse 245

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने पजञ्चचत्वारिंशदधिकद्धिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मौक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ पैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में शुक के अनुप्रश्न-विषयक दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is epistemic: how to distinguish the subtle self-principle from body-based appearances when ordinary perception is conditioned by rajas/tamas and by karma-patterning evident in both waking and dream.

Reliable knowledge of the subtle principle is framed as dependent on disciplined perception—śāstra-informed yoga, sensory restraint, and mental quietude—rather than on untrained experience that is easily shaped by guṇas and afflictive drives.

Yes: the closing movement links technical knowledge (seven subtle factors, six-limbed Lord, correct engagement with pradhāna) with a stated soteriological endpoint—approach to or realization of the supreme Brahman—positioning the chapter as a step in mokṣa-oriented instruction.