Śrī–Indra–Bali Saṃvāda: The Departure and Fourfold Placement of Lakṣmī
इष्टसत्रेण संसिद्धों भूयश्व॒ तपसा55सुरि: । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोव्र्यक्ति बुबुधे देवदर्शन:
iṣṭasatreṇa saṃsiddho bhūyaś ca tapasa āsuriḥ | kṣetra-kṣetrajñayor vyaktiṃ bubudhe deva-darśanaḥ ||
भीष्म बोले—ज्ञान-यज्ञरूप इष्टसत्र से सिद्धि पाकर और पुनः तपस्या द्वारा, दिव्यदृष्टि-सम्पन्न आसुरि ने ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के भेद को स्पष्ट रूप से जान लिया।
भीष्म उवाच