Adhyaya 210
Shanti ParvaAdhyaya 21048 Verses

Adhyaya 210

Vyaktāvyakta-Viveka and Nivṛtti as Paramā Gati (Manifest–Unmanifest Discrimination and the Supreme Path of Withdrawal)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Vyaktāvyakta–Pravṛtti–Nivṛtti Discourse Unit

A guru-voice instructs that higher dharma is not grasped without knowing a ‘catuṣṭaya’ (a fourfold analytic), anchored in discriminating vyakta (manifest, tied to mortality) from avyakta (unmanifest, characterized as deathless). The discourse defines pravṛtti-dharma as a mode associated with return (punarāvṛtti), while nivṛtti-dharma is presented as the highest destination (paramā gati). Two subtle, beginningless and endless principles—avyakta and puruṣa—are treated as difficult to apprehend, and the kṣetrajña is characterized as the witness of prakṛti and its transformations, not constituted by guṇas. The chapter then explains how embodied identity is linguistically and karmically constructed through conjunction, action, and the instruments of action, while the self is ‘covered’ by sattva, rajas, and tamas. Practical disciplines follow: tapas defined as purifying action that diminishes rajas and tamas, including bodily austerities (brahmacarya, ahiṃsā) and mental disciplines (restraint of speech and mind, equanimity). Regulation of food and gradual, non-distressing practice are recommended to support knowledge, especially toward life’s end. The text concludes with binding metaphors: craving as an endless fiber/thread that stitches saṃsāra, and liberation as the state of being free from thirst through correct knowledge of prakṛti, vikāra, and the eternal puruṣa, attributed to Nārāyaṇa’s compassionate instruction for the welfare of beings.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि ‘सनातन’ और मोक्ष-तत्त्व को समझाने हेतु वे एक प्राचीन इतिहास—गुरु और शिष्य के संवाद—का उपाख्यान सुनाते हैं। → शिष्य ब्रह्म-गुह्य अध्यात्म का रहस्य पूछता है; गुरु इन्द्रियों और मन के सूक्ष्म रूपान्तरण, पंचमहाभूत-गुणों के साथ इन्द्रियों के सम्बन्ध, तथा जगत् के आधार-तत्त्व का क्रमशः निरूपण करते हैं—जिससे साधक के भीतर ‘मैं कौन हूँ’ का प्रश्न तीव्र होता जाता है। → गुरु निर्णायक रूप से बताते हैं कि मन ही भिन्न-भिन्न क्रियाओं में रसना/वाणी आदि इन्द्रियों का रूप धारण करता है; जिह्वा-जल, गन्ध-पृथ्वी, श्रोत्र-आकाश, चक्षु-अग्नि, स्पर्श-वायु—इन गुण-संबंधों के पार जो रजोगुण-रहित परमात्म-आश्रय है वही समस्त चराचर का आधार है, और जीव कर्मानुसार देह त्यागकर अन्य देह ग्रहण करता है। → उपदेश का फल यह स्थापित होता है कि त्रैलोक्य चक्रवत् परिवर्तित है; देह-इन्द्रिय-मन के परिवर्तनशील संघात से परे आत्म-तत्त्व का आश्रय लेना ही मोक्षमार्ग है, और शिष्य को इस श्रवण का अधिकारी मानकर गुरु कल्याणमय परम-तत्त्व (वार्ष्णेय-माहात्म्य/परमात्म-आश्रय) की ओर बुद्धि स्थिर करने को प्रेरित करते हैं। → परम कल्याणमय तत्त्व/वार्ष्णेय-माहात्म्य का संकेत देकर अध्याय समाप्त होता है—अगले प्रसंग में उसके विस्तृत प्रतिपादन की अपेक्षा बनी रहती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८६३ “लोक मिलाकर कुल १२२६ “लोक हैं) भस्न्ैमा सन () अं िमाने + इस श्लोकमें वर्णित भावके अनुसार सनातन शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये--नादनेन सहितः सनादन:। दकारस्थाने तकारो छान्दस:। जो नादके साथ हो, वह 'सनादन” कहलाता है। सनादनके दकारके स्थानमें तकार हो जानेसे “सनातन” बनता है। ३. आश्रावय, २. अस्तु श्रौषट्‌, ३. यज, ४. ये यजामहे, ५. वषट्‌। दशाधिकद्वधिशततमो< ध्याय: गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन युधिछिर उवाच योगं मे परमं तात मोक्षस्य वद भारत | तमहं तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि वदतां वर,युधिष्ठिरने कहा--वक्ताओंमें श्रेष्ठ तात भरतनन्दन! आप मुझे मोक्षके साधनभूत परम योगका उपदेश कीजिये। मैं उसे यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ

Yudhiṣṭhira said: “O revered one, O Bhārata—teach me the supreme discipline that leads to liberation. I wish to understand it in its true nature; O best among speakers, please explain.”

Verse 2

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । संवादं मोक्षसंयुक्त शिष्यस्य गुरुणा सह,भीष्मजी बोले--राजन्‌! इस विषयमें एक शिष्यका गुरुके साथ जो मोक्षसम्बन्धी संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है

Bhishma said: “O King, in this matter too an ancient precedent is cited: a venerable old account describing a dialogue on liberation that took place between a disciple and his teacher.”

Verse 3

वश्चिद्‌ ब्राह्मणमासीनमाचार्यमृषिसत्तमम्‌ | तेजोराशिं महात्मानं सत्यसंध॑ जितेन्द्रियम्‌,किसी समयकी बात है, एक दिद्वान्‌ ब्राह्मण श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। वे आचार्यकोटिके पण्डित और श्रेष्ठतम महर्षि थे। देखनेमें महान्‌ तेजकी राशि जान पड़ते थे। बड़े महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। एक दिन उनकी सेवामें कोई परम मेधावी कल्याणकामी एवं समाहितचित्त शिष्य आया (जो चिरकालतक उनकी शुश्रूषा कर चुका था), वह उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़ सामने खड़ा हो इस प्रकार बोला --

Bhishma said: Once there was a learned brāhmaṇa seated in a place of honor—an ācārya, the foremost among sages. He appeared like a mass of radiance: a great-souled man, steadfast in truth, and master of his senses. (The narrative sets up an ethical exemplar—one whose authority rests on learning, self-control, and fidelity to truth—before introducing the disciple who approaches him in reverence.)

Verse 4

शिष्य: परममेधावी श्रेयो<र्थी सुसमाहित: । चरणावुपसंगृहा[ स्थित: प्राउजलिरब्रवीत्‌,किसी समयकी बात है, एक दिद्वान्‌ ब्राह्मण श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। वे आचार्यकोटिके पण्डित और श्रेष्ठतम महर्षि थे। देखनेमें महान्‌ तेजकी राशि जान पड़ते थे। बड़े महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। एक दिन उनकी सेवामें कोई परम मेधावी कल्याणकामी एवं समाहितचित्त शिष्य आया (जो चिरकालतक उनकी शुश्रूषा कर चुका था), वह उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़ सामने खड़ा हो इस प्रकार बोला --

भीष्म बोले—एक परम मेधावी, कल्याणकामी और समाहितचित्त शिष्य अपने गुरु के पास आया। उसने श्रद्धापूर्वक दोनों चरणों का स्पर्श कर प्रणाम किया, फिर हाथ जोड़कर सामने खड़ा हुआ और इस प्रकार बोला—

Verse 5

उपासनात्‌ प्रसन्नोडसि यदि वै भगवन्‌ मम । संशयो मे महान्‌ कश्रित्‌ तन्मे व्याख्यातुमरहसि । कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्‌ सम्यग्ब्रूहि यत्परम्‌,“भगवन्‌! यदि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं तो मेरे मनमें जो एक बड़ा भारी संदेह है, उसे दूर करनेकी कृपा करें--ेरे प्रश्नकी विशद व्याख्या करें। मैं इस संसारमें कहाँसे आया हूँ और आप भी कहाँसे आये हैं? यह भलीभाँति समझाकर बताइये। इसके सिवा जो परम तत्त्व है, उसका भी विवेचन कीजिये

“भगवन्! यदि आप मेरी सेवा से प्रसन्न हैं, तो मेरे मन में उठे एक महान् संदेह का निवारण कीजिए। कृपा करके इसका स्पष्ट विवेचन करें—मैं इस संसार में कहाँ से आया हूँ और आप कहाँ से आए हैं? यह यथार्थ रूप से बताइए; और जो परम तत्त्व है, उसका भी उपदेश कीजिए।”

Verse 6

कथं च सर्वभूतेषु समेषु द्विजसत्तम | सम्यग्वृत्ता निवर्तन्ते विपरीता: क्षयोदया:,द्विजश्रेष्ठ) पृथ्वी आदि सम्पूर्ण महाभूत सर्वत्र समान हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर उन्हींसे निर्मित हुए हैं तो भी उनमें क्षय और वृद्धि--ये दोनों विपरीतभाव क्‍यों होते हैं?

“हे द्विजश्रेष्ठ! जब पृथ्वी आदि महाभूत सर्वत्र समान हैं और समस्त प्राणियों के शरीर उन्हीं से बने हैं, तब प्राणियों में क्षय और वृद्धि—ये परस्पर विपरीत अवस्थाएँ—क्यों उत्पन्न होती हैं? और वे किस नियम से आती-जाती हैं?”

Verse 7

वेदेषु चापि यद्‌ वाक्‍्यं लौकिकं व्यापकं च यत्‌ । एतद्‌ विद्वन्‌ यथातत्त्वं सर्व व्याख्यातुमहसि,“वेदों और स्मृतियोंमें भी जो लौकिक और व्यापक धर्मोका वर्णन है, उनमें भी विषमता है। अतः विद्वन्‌! इन सबकी आप यथार्थरूपसे व्याख्या करें!

“वेदों में भी जो वचन हैं, और जो स्मृतियों में लौकिक तथा व्यापक धर्म का उपदेश है—उनमें भी मुझे विषमता दिखाई देती है। अतः हे विद्वन्! आप इन सबका यथातत्त्व विवेचन कीजिए, जिससे उनका वास्तविक अभिप्राय समझ में आ जाए।”

Verse 8

गुरुउ्वाच शृणु शिष्य महाप्राज्ञ ब्रह्मगुह्ममिदं परम्‌ । अध्यात्मं सर्वविद्यानामागमानां च यद्धसु,गुरुने कहा--वत्स! सुनो। महामते! तुमने जो बात पूछी है, वह वेदोंका उत्तम एवं गूढ़ रहस्य है। यही अध्यात्मतत्त्व है तथा यही समस्त विद्याओं और शास्त्रोंका सर्वस्व है जैसे ऋतु-परिवर्तनके साथ ही भिन्न-भिन्न ऋतुओंके नाना प्रकारके वे-ही-वे लक्षण प्रकट होते रहते हैं, वैसे ही प्रत्येक कल्पके आरम्भमें पूर्व कल्पोंके अनुसार तदनुरूप भावोंकी अभिव्यक्ति होती रहती है ।। अथ यद्यद्‌ यदा भाति कालयोगाद्‌ू युगादिषु | तत्‌ तदुत्पद्यते ज्ञानं लोकयात्राविधानजम्‌

गुरु बोले—“वत्स! सुनो। महामते! तुमने जो पूछा है, वह ब्रह्म का परम और गूढ़ रहस्य है। यही अध्यात्म है; यही समस्त विद्याओं और आगम-शास्त्रों का सार है। और युगों के आरम्भ आदि में, काल के संयोग से जो-जो जैसा प्रकट होता है, उसी के अनुरूप ज्ञान भी बार-बार उत्पन्न होता है—लोक-यात्रा के विधान से, प्राणियों की आवश्यकता के अनुसार।”

Verse 9

वासुदेव: परमिदं विश्व॒स्य ब्रह्मणो मुखम्‌ । सत्यं ज्ञानमथो यज्ञस्तितिक्षा दम आर्जवम्‌,सम्पूर्ण वेदका मुख जो प्रणव है वह तथा सत्य, ज्ञान, यज्ञ, तितिक्षा, इन्द्रिय-संयम, सरलता और परम तत्त्व--यह सब कुछ वासुदेव ही है

भीष्म ने कहा—वासुदेव ही इस विश्व का परम आधार और ब्रह्म का ‘मुख’ (प्रधान प्रकाश) हैं। सत्य, ज्ञान, यज्ञ, तितिक्षा, इन्द्रिय-संयम और आर्जव—ये सब गुण और जिनकी ओर वे संकेत करते हैं वह परम तत्त्व—स्वरूपतः वासुदेव ही हैं।

Verse 10

पुरुषं सनातन विष्णुं यं त॑ वेदविदो विदु: । स्वर्गप्रलयकर्तारमव्यक्तं ब्रह्म शाश्वतम्‌,वेदज्ञजन उसीको सनातन पुरुष और विष्णु भी मानते हैं। वही संसारकी सृष्टि और प्रलय करनेवाला अव्यक्त एवं सनातन ब्रह्म है

भीष्म ने कहा—वेदवेत्ता उन्हें सनातन पुरुष—विष्णु—के रूप में जानते हैं। वही जगत की सृष्टि और प्रलय करनेवाले, अव्यक्त और शाश्वत ब्रह्म हैं।

Verse 11

तदिदं ब्रह्म वाष्णेयमितिहासं शृणुष्व मे । ब्राह्मणो ब्राह्मुणै: श्राव्यो राजन्य: क्षत्रियैस्तथा,वही ब्रह्म वृष्णिकुलमें श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुआ, इस कथाको तुम मुझसे सुनो। ब्राह्मण ब्राह्मणको, क्षत्रिय क्षत्रियको, वैश्य वैश्यको तथा शूद्र महामनस्वी शूद्रको, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णुका माहात्म्य सुनावे

भीष्म ने कहा—अब तुम मुझसे वृष्णिकुल-सम्बद्ध इस ब्रह्म-इतिहास को सुनो। ब्राह्मण को ब्राह्मणों में, और राजन्य (क्षत्रिय) को क्षत्रियों में इसका पाठ कराना चाहिए।

Verse 12

वैश्यो वैश्यैस्तथा श्राव्य: शूद्र: शूद्रैमहामना: । माहात्म्यं देवदेवस्य विष्णोरमिततेजस:,वही ब्रह्म वृष्णिकुलमें श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुआ, इस कथाको तुम मुझसे सुनो। ब्राह्मण ब्राह्मणको, क्षत्रिय क्षत्रियको, वैश्य वैश्यको तथा शूद्र महामनस्वी शूद्रको, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णुका माहात्म्य सुनावे

वैश्य को वैश्यों से, और महामना शूद्र को शूद्रों से यह उपदेश सुनाया जाए। इस प्रकार देवाधिदेव, अमित तेजस्वी विष्णु का माहात्म्य कहा जाए।

Verse 13

अ्हस्त्वमसि कल्याण वार्ष्णेयं शृणु यत्परम्‌ । कालचक्रमनाद्यन्तं भावाभावस्वलक्षणम्‌

भीष्म ने कहा—हे कल्याणमय वृष्णिवंशी, तुम असहाय नहीं हो। अब परम उपदेश सुनो—कालचक्र, जिसका न आदि है न अन्त, और जिसका स्वलक्षण है भाव और अभाव का उदय-अस्त।

Verse 14

यत्तदक्षरमव्यक्तममृतं ब्रह्म शाश्वतम्‌ | वदन्ति पुरुषव्याप्र केशवं पुरुषर्षभम्‌,पुरुषसिंह! पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको ही अक्षर, अव्यक्त, अमृत एवं सनातन परब्रह्म कहते हैं

भीष्म ने कहा—हे पुरुषसिंह! जिस अक्षर, अव्यक्त, अमृत और सनातन परब्रह्म का वर्णन किया जाता है, वही केशव हैं—श्रीकृष्ण, पुरुषों में श्रेष्ठ, पुरुषों में सिंह, परम पुरुष।

Verse 15

पितृन देवानृषींश्वैव तथा वै यक्षराक्षसान्‌ | नागासुरमनुष्यांश्ष सृूजते परमोडव्यय:,ये अविनाशी परमात्मा श्रीकृष्ण ही पितर, देवता, ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, असुर और मनुष्य आदिकी रचना करते हैं

वही परम, अविनाशी प्रभु पितरों, देवताओं, ऋषियों तथा यक्ष-राक्षसों को; और इसी प्रकार नागों, असुरों और मनुष्यों को भी रचते हैं।

Verse 16

तथैव वेदशास्त्राणि लोकधर्माश्च शाश्वतान्‌ । प्रलयं प्रकृति प्राप्प युगादौ सृजते पुन:,इसी प्रकार प्रलयकाल बीतनेपर कल्पके आरम्भमें प्रकृतिका आश्रय ले भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही ये वेद-शास्त्र और सनातन लोक-धर्मोंको पुनः प्रकट करते हैं

इसी प्रकार वेद-शास्त्र और सनातन लोक-धर्म भी—प्रलय में प्रकृति में लीन होकर—नए युग के आरम्भ में फिर से प्रकट किए जाते हैं।

Verse 17

यथर्र्तावृतुलिड्रानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु

जैसे ऋतुओं के चिह्न अपने आवर्तन में अनेक रूप धारण करते हुए भी बार-बार वही-के-वही दिखाई देते हैं, वैसे ही युगों के आरम्भ में भाव-स्थितियाँ भी पुनः-पुनः प्रकट होती हैं।

Verse 18

काल-क्रमसे युगादिमें जब-जब जो-जो वस्तु भासित होती है, लोक-व्यवहारवश तब- तब उसी-उसी विषयका ज्ञान प्रकट होता रहता है

काल-क्रम से युग के आरम्भ में जब-जब जो-जो वस्तु प्रकट होती है, तब-तब लोक-व्यवहार के कारण उसी-उसी विषय का ज्ञान भी बार-बार प्रकट होता रहता है।

Verse 19

युगान्ते5न्तर्हितान्‌ वेदान्‌ सेतिहासान्‌ महर्षय: । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता: स्वयम्भुवा,कल्पके अन्तमें लुप्त हुए वेदों और इतिहासोंको कल्पके आरम्भमें स्वयम्भू ब्रह्माके आदेशसे महर्षियोंने तपस्याद्वारा सबसे पहले उपलब्ध किया था

युग के अंत में जब वेद और इतिहास लुप्त हो गए थे, तब स्वयम्भू ब्रह्मा की आज्ञा पाकर महर्षियों ने कल्प के आरम्भ में तपस्या के बल से उन्हें सबसे पहले पुनः प्राप्त किया।

Verse 20

वेदविद्‌ वेद भगवान्‌ वेदाड़नि बृहस्पति: । भार्गवो नीतिशास्त्रं तु जगाद जगतो हितम्‌,उस समय स्वयं भगवान्‌ ब्रह्माको वेदोंका, बृहस्पतिजीको वेदांगोंका और शुक्राचार्यको नीति-शास्त्रका ज्ञान हुआ तथा उन लोगोंने जगत्‌के हितके लिये उन सब विषयोंका उपदेश किया

उस समय वेदों के ज्ञाता स्वयं भगवान् ब्रह्मा ने वेदों का, बृहस्पति ने वेदाङ्गों का और भार्गव (शुक्राचार्य) ने नीति-शास्त्र का उपदेश किया—यह सब जगत् के हित के लिए था।

Verse 21

गान्धर्व नारदो वेद भरद्वाजो धर्नुग्रहम्‌ । देवर्षिचरितं गार्ग्य: कृष्णात्रेयश्विकित्सितम्‌,नारदजीको गान्धर्व वेदका, भरद्वाजको धरनुर्वेदका, महर्षि गार्ग्यको देवर्षियोंके चरित्रका तथा कृष्णात्रेयको चिकित्साशास्त्रका ज्ञान हुआ

नारद को गान्धर्ववेद का, भरद्वाज को धनुर्वेद का, गार्ग्य महर्षि को देवर्षियों के चरित्र का और कृष्णात्रेय को चिकित्साशास्त्र का ज्ञान प्राप्त हुआ।

Verse 22

न्यायतन्त्राण्यनेकानि तैस्तैरुक्तानि वादिभि: । हेत्वागमसदाचारैर्यदुक्ते तदुपास्यताम्‌,तर्कशील दिद्वानोंने तर्कशास्त्रके अनेक ग्रन्थोंका प्रणणयन किया। उन महर्षियोंने युक्तियुक्त शास्त्र और सदाचारके द्वारा जिस ब्रह्मका उपदेश किया है, उसीकी तुम भी उपासना करो

तर्कशील वादियों ने न्याय-तर्क के अनेक तन्त्र कहे हैं; परन्तु उन महर्षियों ने युक्ति, आगम और सदाचार के द्वारा जिस परम तत्त्व का उपदेश किया है—उसी का तुम भी उपासना-आश्रय करो।

Verse 23

अनाट्य॑ तत्परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः । एकस्तदू वेद भगवान्‌ धाता नारायण: प्रभु:,वह परब्रह्म अनादि और सबसे परे है। उसे न देवता जानते हैं न ऋषि। उसे तो एकमात्र जगत्पालक नारायण ही जानते हैं

वह परब्रह्म अनादि और सबसे परे है; उसे न देवता जानते हैं, न ऋषि। उसे तो एकमात्र जगत् के धाता-प्रभु नारायण ही यथार्थतः जानते हैं।

Verse 24

नारायणादृषिगणास्तथा मुख्या: सुरासुरा: । राजर्षय: पुराणाश्न परमं दुःखभेषजम्‌,नारायणसे ही ऋषियों, मुख्य-मुख्य देवताओं, असुरों तथा प्राचीन राजर्षियोंने उस ब्रह्मको जाना है; वह ब्रह्म-ज्ञान ही समस्त दुःखोंका परम औषध है

भीष्म बोले—नारायण से ही ऋषिगण, देवों और असुरों में जो श्रेष्ठ हैं, तथा प्राचीन राजर्षि—सबने उस परम दुःख-भेषज को जाना है। वही परम ब्रह्म-ज्ञान समस्त दुःखों का अंतिम औषध कहा गया है।

Verse 25

पुरुषाधिछितान्‌ भावान्‌ प्रकृति: सूयते यदा । हेतुयुक्तमत: पूर्व जगत्‌ सम्परिवर्तते,पुरुषद्वारा संकल्पमें लाये गये विविध पदार्थोकी रचना प्रकृति ही करती है। इस प्रकृतिसे सर्वप्रथम कारणसहित जगत्‌ उत्पन्न होता है

भीष्म बोले—जब प्रकृति, पुरुष के अधिष्ठान में स्थित विविध भावों और रूपों को प्रकट करती है, तब पुरुष के संकल्प से कल्पित अनेक पदार्थों की रचना वही प्रकृति करती है। इसी प्रकृति से कारण-क्रम सहित सर्वप्रथम जगत् उत्पन्न होता है; फिर यह विश्व चक्रवत् परिवर्तित होता रहता है।

Verse 26

दीपादन्ये यथा दीपा: प्रवर्तन्ते सहस्रश: । प्रकृति: सूयते तद्धदानन्त्यान्‌ नापचीयते

भीष्म बोले—जैसे एक दीपक से सहस्रों दीपक प्रज्वलित हो उठते हैं, वैसे ही प्रकृति निरन्तर अनेक रूपों को उत्पन्न करती है; परन्तु इस अनन्त सृष्टि को प्रकट करते हुए भी उसका क्षय नहीं होता।

Verse 27

जैसे एक दीपकसे दूसरे सहस्रों दीप जला लिये जाते हैं और पहले दीपकको कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार एक प्रकृति ही असंख्य पदार्थोंको उत्पन्न करती है और अनन्त होनेके कारण उसका क्षय नहीं होता ।। अव्यक्तकर्मजा बुद्धिरहंकारं प्रसूयते । आकाशं चाप्यहंकाराद्‌ वायुराकाशसम्भव:,अव्यक्त प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर जिस बुद्धि (महत्तत्त्व) की उत्पत्ति होती है, वह बुद्धि अहंकारको जन्म देती है। अहंकारसे आकाश और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है

भीष्म बोले—जैसे एक दीपक से सहस्रों दीपक जला लिये जाते हैं और पहले दीपक को कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार एक ही प्रकृति असंख्य पदार्थों को उत्पन्न करती है और अनन्त होने के कारण उसका क्षय नहीं होता। जब अव्यक्त प्रकृति में क्षोभ होता है, तब बुद्धि (महत्तत्त्व) उत्पन्न होती है; उस बुद्धि से अहंकार जन्म लेता है। अहंकार से आकाश और आकाश से वायु की उत्पत्ति होती है।

Verse 28

वायोस्तेजस्ततश्चाप अद्भ्योडथ वसुधोद्गता । मूलप्रकृतयो हराष्टी जगदेतास्ववस्थितम्‌,वायुसे अग्निकी, अग्निसे जलकी और जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार ये आठ मूल-प्रकृतियाँ बतायी गयी हैं। इन्हींमें सम्पूर्ण जगत्‌ प्रतिष्ठित है

वायु से तेज (अग्नि) उत्पन्न हुआ, तेज से आप (जल) और जल से वसुधा (पृथ्वी) प्रकट हुई। इस प्रकार आठ मूल-प्रकृतियाँ कही गयी हैं; इन्हीं में सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है।

Verse 29

ज्ञानेन्द्रियाण्यत: पठच पज््च कर्मेन्द्रियाण्यपि । विषया: पञ्च चैकं॑ च विकारे षोडशं मन:,पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय और एक मन--ये सोलह विकार कहे गये हैं। (इनमें मन तो अहंकारका विकार है और अन्य पन्द्रह अपने-अपने कारणरूप सूक्ष्म महाभूतोंके विकार हैं)

इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। पाँच विषय और एक मन—ये सोलह विकार कहे गए हैं। जो देहगत इन तत्त्वों को यथार्थ जान लेता है, वह आत्मा को बदलते उपकरणों से अलग पहचानकर संयम और सदाचार में स्थित होता है।

Verse 30

श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिद्ना प्राणं ज्ञानेन्द्रियाण्यथ । पादौ पायुरुपस्थश्न हस्तौ वाक्कर्मणी अपि,श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्ला और नासिका--ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ (लिंग) और वाक्‌ू--ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं

श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाणी—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं।

Verse 31

शब्द: स्पर्शक्ष रूपं च रसो गन्धस्तथैव च । विज्ञेयं व्यापकं चित्तं तेषु सर्वगतं मन:,शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँच विषय हैं तथा इनमें व्यापक जो चित्त है, उसीको मन समझना चाहिये। मन सर्वगत कहा गया है

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय हैं। जो चित्त इनमें व्यापक है, उसी को मन जानना चाहिए; मन सर्वत्र व्याप्त कहा गया है, क्योंकि वह सब इन्द्रिय-क्षेत्रों में प्रवृत्त होता है।

Verse 32

रसज्ञाने तु जिद्देयं व्याहृते वाक्‌ तथोच्यते । इन्द्रियैविविधैर्युक्त सर्व व्यक्त मनस्तथा

रस के ज्ञान के समय वही मन जिह्वा-रूप कहा जाता है; और जब वह उच्चरित होता है, तब वही वाक् कहलाता है। विविध इन्द्रियों से युक्त होकर जो कुछ भी व्यक्त होता है, वह सब मन के ही संयोग से प्रकट होता है।

Verse 33

रस-ज्ञानके समय मन ही यह रसना (जिह्ला)-रूप हो जाता है तथा बोलनेके समय वह मन ही वागिन्द्रिय कहलाता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंके साथ मिलकर उन सबके रूपमें मन ही व्यका होता है ।। विद्यात्‌ तु षोडशैतानि दैवतानि विभागश: । देहेषु ज्ञानकर्तारमुपासीनमुपासते,दस इन्द्रिय, पञजच महाभूत और एक मन--ये सोलह तत्त्व इस शरीरमें विभागपूर्वक रहते हैं। इनको देवतारूप जानना चाहिये। शरीरके भीतर जो ज्ञान प्रकट करनेवाला परमात्माके निकटस्थ जीवात्मा है, उसकी ये सोलहों देवता उपासना करते हैं

रस के ज्ञान के समय मन ही जिह्वा-रूप हो जाता है और बोलने के समय वही मन वागिन्द्रिय कहलाता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के साथ मिलकर मन ही उन सबके रूप में प्रकट होता है। और इन सोलहों को विभागपूर्वक देवता-रूप जानना चाहिए; वे शरीर में अपने-अपने भागों में स्थित रहते हैं और देह के भीतर ज्ञान प्रकट करने वाले, परमात्मा के निकटस्थ ज्ञाता जीवात्मा की उपासना करते हैं।

Verse 34

तद्धत्‌ सोमगुणा जिद्ना गन्धस्तु पृथिवीगुण: । श्रोत्रं नभोगुणं चैव चक्षुरग्नेर्गुणस्तथा । स्पर्श वायुगुणं विद्यात्‌ सर्वभूतेषु सर्वदा,जिह्ना जलका कार्य है, प्राणेन्द्रिय पृथ्वीका कार्य है, श्रवणेन्द्रिय आकाशका और नेत्रेन्द्रिय अग्निका कार्य है तथा सम्पूर्ण भूतोंमें त्वचा नामकी इन्द्रियको सदा वायुका कार्य समझना चाहिये

भीष्म ने कहा—जिह्वा को सोम-गुण (रस) से युक्त जानना चाहिए; गन्ध पृथ्वी का गुण है। श्रवण आकाश का गुण है और नेत्र अग्नि का गुण है। तथा स्पर्श को सदा, सब प्राणियों में, वायु का गुण समझना चाहिए। इस प्रकार इन्द्रियाँ भूत-गुणों के द्वारा ही अपना-अपना कार्य करती हैं।

Verse 35

मन: सत्त्वगुणं प्राहु: सत्त्वमव्यक्तजं तथा । सर्वभूतात्मभूतस्थं तस्माद्‌ बुद्धोत बुद्धिमान्‌,मनको महत्तत्त्वका कार्य कहा है और महत्तत्त्वको अव्यक्त प्रकृतिका कार्य कहा है। अतः बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह समस्त भूतोंके आत्मारूप परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें स्थित जाने

भीष्म ने कहा—मन को सत्त्वगुणमय कहा गया है और सत्त्व को भी अव्यक्त (प्रकृति) से उत्पन्न बताया गया है। इसलिए जाग्रत और विवेकी पुरुष को चाहिए कि वह समस्त भूतों के आत्मारूप परमेश्वर को सब प्राणियों में स्थित जाने।

Verse 36

एते भावा जगत्‌ सर्व वहन्ति सचराचरम्‌ | श्रिता विरजसं देव॑ यमाहु: प्रकृतेः परम्‌

भीष्म ने कहा—ये भाव और तत्त्व समस्त जगत्—चर और अचर—का भार वहन करते हैं। ये सब उस निर्मल, रजोरहित देव के आश्रित हैं, जिसे ज्ञानीजन प्रकृति से परे कहते हैं।

Verse 37

इस प्रकार ये सम्पूर्ण पदार्थ समस्त चराचर जगत्‌का भार वहन करते हैं। ये सब जो प्रकृतिसे अतीत रजोगुणरहित हैं, उस परमदेव परमात्माके आश्रित हैं ।। नदद्वारं पुरं पुण्यमेतैर्भावै: समन्वितम्‌ । व्याप्य शेते महानात्मा तस्मात्‌ पुरुष उच्यते,इन्हीं चौबीस पदार्थोंसे सम्पन्न इस नौ द्वारोंवाले पवित्र पुर (शरीर)-को व्याप्त करके इसमें इन सबसे जो महान्‌ है वह आत्मा शयन करता है; इसलिये उसे “पुरुष” कहते हैं

भीष्म ने कहा—इन्हीं तत्त्वों से युक्त यह नौ द्वारों वाला पवित्र पुर (शरीर) है। इसे भीतर से व्याप्त करके इसमें महान आत्मा शयन करता है; इसलिए वह ‘पुरुष’ कहलाता है—पुर में निवास करने वाला।

Verse 38

अजर: सो<मरश्वैव व्यक्ताव्यक्तोपदेशवान्‌ | व्यापक: सगुण: सूक्ष्म: सर्वभूतगुणाश्रय:,वह पुरुष जरा-मरणसे रहित, व्यापक, समस्त स्थूल-सूक्ष्म तत्त्वोंका प्रेरक, सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे युक्त, सूक्ष्म तथा सम्पूर्ण भूतों और उनके गुणोंका आश्रय है

भीष्म ने कहा—वह परम पुरुष अजर और अमर है। वह व्यक्त और अव्यक्त—दोनों का उपदेश देने वाला है; सर्वव्यापक है; गुणों से युक्त होकर भी सूक्ष्म है; और समस्त भूतों तथा उनके गुणों का आश्रय है।

Verse 39

यथा दीप: प्रकाशात्मा हस्वो वा यदि वा महान्‌ | ज्ञानात्मानं तथा विद्यात्‌ पुरुष सर्वजन्तुषु,जैसे दीपक छोटा हो या बड़ा, प्रकाशस्वरूप ही है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंमें स्थित जीवात्मा ज्ञानस्वरूप है, ऐसा समझे

भीष्म बोले—जैसे दीपक छोटा हो या बड़ा, वह स्वभाव से प्रकाशस्वरूप ही होता है; वैसे ही समस्त प्राणियों में स्थित अन्तरात्मा को ज्ञानस्वरूप (चैतन्य) समझना चाहिए।

Verse 40

श्रोत्रं वेदयते वेद्यं स शृणोति स पश्यति । कारणं तस्य देहो5यं स कर्ता सर्वकर्मणाम्‌,वही श्रवणेन्द्रियको उसके ज्ञेयभूत शब्दका बोध कराता है। तात्पर्य यह कि श्रवण और नेत्रोंद्राय वही सुनता और देखता है। यह शरीर उसके शब्द आदि विषयोंके अनुभवमें निमित्त है। वह जीवात्मा ही समस्त कर्मोका कर्ता है

भीष्म बोले—श्रवणेन्द्रिय ज्ञेय शब्द का बोध कराती है; पर वास्तव में वही अन्तरात्मा सुनता है, वही देखता है। यह देह उसके शब्दादि विषयों के अनुभव का केवल निमित्त है। वही जीवात्मा समस्त कर्मों का कर्ता है।

Verse 41

अग्निदरिंगतो यद्वद्‌ भिन्ने दारौ न दृश्यते । तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवानुदृश्यते,जिस प्रकार अग्नि काष्ठमें व्याप्त रहनेपर भी काष्ठके चीरनेपर भी उसमें दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा शरीरमें रहता है, परंतु दिखायी नहीं देता--योगसे ही उसका दर्शन होता है। जैसे मन्थन आदि उपायोंद्वारा काष्ठको मथकर उनमें अग्निको प्रत्यक्ष किया जाता है, उसी प्रकार योगके द्वारा शरीरस्थ आत्माका साक्षात्कार किया जा सकता है

भीष्म बोले—जिस प्रकार अग्नि काष्ठ में व्याप्त होकर भी काष्ठ के चीरने पर दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा शरीर में स्थित होकर भी प्रत्यक्ष नहीं होता; योग के द्वारा ही उसका साक्षात्कार होता है।

Verse 42

अग्निर्यथा हुपायेन मथित्वा दारु दृश्यते । तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवात्र दृश्यते,जिस प्रकार अग्नि काष्ठमें व्याप्त रहनेपर भी काष्ठके चीरनेपर भी उसमें दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा शरीरमें रहता है, परंतु दिखायी नहीं देता--योगसे ही उसका दर्शन होता है। जैसे मन्थन आदि उपायोंद्वारा काष्ठको मथकर उनमें अग्निको प्रत्यक्ष किया जाता है, उसी प्रकार योगके द्वारा शरीरस्थ आत्माका साक्षात्कार किया जा सकता है

भीष्म बोले—जिस प्रकार उचित उपाय से काष्ठ का मन्थन करने पर उसमें स्थित अग्नि प्रकट हो जाती है, उसी प्रकार शरीर में स्थित आत्मा का दर्शन यहाँ योग के द्वारा ही होता है।

Verse 43

नदीष्वापो यथा युक्ता यथा सूर्ये मरीचय: । संततत्वाद्‌ यथा यान्ति तथा देहा: शरीरिणाम्‌,जैसे नदियोंमें जल रहता ही है और सूर्यमें किरणें भी रहती ही हैं तथा वे जल और किरणें नदी और सूर्यसे नित्य सम्बद्ध होनेके कारण उनके साथ-साथ जाती हैं, उसी प्रकार देहधारियोंके सूक्ष्म शरीर भी जीवात्माके साथ ही रहते हैं और उसे साथ लेकर ही आते- जाते हैं

भीष्म बोले—जैसे नदियों में जल और सूर्य में किरणें निरन्तर संयुक्त रहती हैं और उस अविच्छिन्न सम्बन्ध के कारण उनके साथ-साथ चलती हैं, वैसे ही देहधारियों के सूक्ष्म देह जीवात्मा से जुड़े रहकर उसके आने-जाने में साथ चलते हैं।

Verse 44

स्वप्नयोगे यथैवात्मा पज्चेन्द्रियसमायुत: । देहमुत्सज्य वै याति तथैवात्मोपलभ्यते,जैसे स्वप्नमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसहित जीवात्मा इस शरीरको छोड़कर अन्यत्र चला जाता है, वैसे ही मृत्युके बाद भी वह इस शरीरको छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण कर लेता है

भीष्म ने कहा—जैसे स्वप्नावस्था में पाँच ज्ञानेन्द्रियों सहित आत्मा इस देह को छोड़कर मानो अन्यत्र चली जाती है, वैसे ही मृत्यु के बाद भी आत्मा इस शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर को ग्रहण करती है—ऐसा समझा जाता है।

Verse 45

कर्मणा बाध्यते रूपं कर्मणा चोपलभ्यते । कर्मणा नीयते<न्यत्र स्वकृतेन बलीयसा,कर्मके द्वारा ही इस देहका बाध होता है; कर्मसे ही अन्य देहकी उपलब्धि होती है तथा अपने किये हुए प्रबल कर्मके द्वारा ही वह अन्य शरीरमें ले जाया जाता है

भीष्म ने कहा—कर्म से ही देह-रूप बँधता और आकार पाता है; कर्म से ही दूसरा शरीर प्राप्त होता है। और अपने ही प्रबल कृत कर्मों के बल से जीव अन्यत्र—उस दूसरे शरीर में—ले जाया जाता है।

Verse 46

स तु देहाद्‌ यथा देहं त्यक्त्वान्यं प्रतिपद्यते । तथान्यं सम्प्रवक्ष्यामि भूतग्रामं स्वकर्मजम्‌,वह जीवात्मा जिस प्रकार एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करता है तथा अपने कर्मोसे उत्पन्न हुआ प्राणिसमुदाय जिस प्रकार अन्य देह धारण करता है, वह सब मैं तुम्हें बतलाता हूँ

भीष्म ने कहा—जैसे यह देहधारी आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे को प्राप्त करता है, वैसे ही मैं तुम्हें बताऊँगा कि अपने कर्मों से उत्पन्न प्राणियों का समुदाय किस प्रकार अन्य देह धारण करता है।

Verse 136

त्रैलोक्यं सर्वभूतेशे चक्रवत्परिवर्तते । तुम भी यह सब सुननेके योग्य अधिकारी हो; अतः भगवान्‌ श्रीकृष्णका जो कल्याणमय उत्कृष्ट माहात्म्य है, उसे सुनो। यह जो सृष्टि-प्रलयरूप अनादि, अनन्त कालचक्र है, वह श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। सर्वभूतेश्वर श्रीकृष्णमें ये तीनों लोक चक्रकी भाँति घूम रहे हैं

भीष्म ने कहा—तुम यह सब सुनने के योग्य अधिकारी हो; अतः भगवान् श्रीकृष्ण के कल्याणमय, उत्कृष्ट माहात्म्य को सुनो। सृष्टि और प्रलय के रूप में प्रकट यह अनादि-अनन्त कालचक्र स्वयं उन्हीं का स्वरूप है; और सर्वभूतेश्वर श्रीकृष्ण में ये तीनों लोक चक्र की भाँति निरन्तर घूमते रहते हैं।

Verse 230

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेया ध्यात्मक थने दशाधिकद्वधिशततमो<ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्व में वार्ष्णेय-संबन्धी अध्यात्म-स्थाने दो सौ दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The chapter foregrounds the choice between pravṛtti (continuing action-identity that tends toward recurrence) and nivṛtti (withdrawal from craving and misidentification), presenting the latter as the ethically and soteriologically superior trajectory.

Correct discrimination—knowing prakṛti and its modifications, and recognizing puruṣa/kṣetrajña as the non-guṇic witness—combined with disciplined tapas and dispassion, removes confusion at life’s end and supports liberation.

Yes: it states that knowing the fourfold analytic and maintaining accurate self-understanding prevents delusion at the end of life, and it frames Nārāyaṇa’s instruction as ‘amṛta’ given compassionately for the welfare of beings.