Adhyaya 208
Shanti ParvaAdhyaya 20843 Verses

Adhyaya 208

अध्याय २०८ — इन्द्रियनिग्रहः, सत्याहिंसात्मकवाक्, कर्मफलविवेकः (Restraint of the Senses, Non-harming Truthful Speech, and Discernment of Karmic Consequence)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Instruction on restraint, speech-ethics, and karmaphala (context for Adhyāya 208)

A guru delineates a liberation-oriented program grounded in psychological diagnosis and ethical technique. First, attachment to sense-objects is identified as the cause of decline, while non-attachment is linked to the highest attainment (1). Observing the continuous cycle of birth, death, aging, disease, and mental strain, the intelligent person is urged to strive for mokṣa (2). Purity of speech, mind, and body, absence of egoism, tranquility, knowledge, and non-dependence are presented as the profile of a happy wandering mendicant (3). Compassion may reveal mental entanglement, yet one should maintain equanimity through understanding the world as structured by karmaphala (4). Past action—merit or demerit—ripens for the agent; therefore one should enact auspicious deeds through speech, intellect, and bodily conduct (5). A concise virtue-set is enumerated: ahiṃsā, truthful speech, straightforwardness toward all beings, forgiveness, and vigilance (6–7). The chapter then details attention-training: keep the mind collected, avoid malicious rumination, craving, and ungrounded ideation (8). Speech-ethics is refined: speak only what is true, non-harming, non-slanderous, non-harsh, and limited, with undistracted awareness (9–10). Unrestrained mind and passion-driven speech lead to dark action and painful consequences; steadiness in mind–speech–body is prescribed (11–12). Through metaphors of misdirection and burden, the text urges abandonment of rajas/tamas actions and adoption of sattvic restraint (13–14). The ascetic regimen is sketched—non-possessiveness, solitude, light diet, tapas, and sense-control—culminating in knowledge that burns affliction and a mind made inward (15–16). Practical method is reiterated: restrain intellect, restrain mind by intellect, and withdraw senses from objects; with control, the inner ‘deities’ (faculties) become luminous, and detachment leads toward brahma-bhāva (17–19). Optional yogic techniques and regulated diet are advised, with gradual cultivation likened to kindling fire; knowledge shines when fueled by disciplined practice (20–23). Finally, the text distinguishes knowledge from ignorance and indicates liberation through understanding separation/association and overcoming passion, attaining the imperishable (24–26).

Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न पर भीष्म वचन उठाते हैं—जगत् में दिशाओं के अधिपति कौन हैं, कौन-से ऋषि किस दिशा में प्रतिष्ठित हैं, और सृष्टि-परम्परा का यह विराट मानचित्र कैसे समझा जाए। → भीष्म सृष्टि के आदिस्रोत की ओर ले जाते हैं: स्वयम्भू सनातन ब्रह्मा, उनके महात्मा पुत्र, प्रजापतियों की वंश-परम्परा, फिर देव-समूहों और दिशाओं में स्थित ब्रह्मर्षियों की क्रमबद्ध सूची—नाम, कुल, और स्थान का विस्तृत विधान। → दिशा-दिशा में प्रतिष्ठित ब्रह्मर्षियों का निर्णायक ‘स्थापन’—दक्षिण और पश्चिम आदि दिशाओं के ऋषि-समूहों का उद्घोष, तथा अश्विनीकुमारों जैसे देव-वंश (मार्तण्ड-सूर्य के पुत्र) का स्पष्ट वंश-निर्धारण; मानो ब्रह्माण्ड का नक्शा एक श्लोक-श्रृंखला में स्थिर हो जाता है। → अध्याय देवताओं/दिशाओं/वर्ण-व्यवस्था के वर्णन को समेटते हुए फलश्रुति की ओर झुकता है—जो प्रातः उठकर इन देव-समूहों का कीर्तन/स्मरण करता है, वह स्वकृत-परकृत पापों से प्रमुक्त होता है। → यह ब्रह्माण्ड-गणना आगे भी चलती है—अगले प्रसंग में अन्य दिशाओं/समूहों का विस्तार और मोक्षधर्म की व्यापक कड़ी जुड़ने का संकेत।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-- मा बछ। अ<-छऋाज - पुरुष (श्रीकृष्ण) ही यह सब कुछ हैं। अष्टाधिकद्विशततमो< ध्याय: ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन युधिछिर उवाच के पूर्वमासन्‌ पतय: प्रजानां भरतर्षभ । के चर्षयो महाभागा दिक्षु प्रत्येकश: स्मृता:,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कौन-कौन-से लोग प्रजापति थे और प्रत्येक दिशामें किन-किन महाभाग महर्षियोंकी स्थिति मानी गयी है

युधिष्ठिर ने कहा—भरतश्रेष्ठ! पूर्वकाल में प्रजाओं के अधिपति (प्रजापति) कौन-कौन थे? और प्रत्येक दिशा में किन-किन महाभाग महर्षियों का निवास माना गया है?

Verse 2

भीष्म उवाच श्रूयतां भरतश्रेष्ठ यन्मां त्वं परिपृच्छसि । प्रजानां पतयो ये5स्मिन्‌ दिक्षु ये चर्षय: स्मृता:,भीष्मजीने कहा--भरतश्रेष्ठ) इस जगतमें जो प्रजापति रहे हैं तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें जिन-जिन ऋषियोंकी स्थिति मानी गयी है, उन सबको जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछते हो; मैं बताता हूँ, सुनो

भीष्म ने कहा—भरतश्रेष्ठ! जो बात तुम मुझसे पूछते हो, उसे सुनो। इस जगत में जो प्रजाओं के स्वामी प्रजापति हुए हैं और जिन-जिन दिशाओं में जिन ऋषियों का अधिष्ठान परंपरा से माना गया है, उनका मैं वर्णन करता हूँ।

Verse 3

एक: स्वयम्भूर्भगवानाद्यो ब्रह्मा सनातन: । ब्रह्मण: सप्त वै पुत्रा महात्मान: स्वयम्भुव:,एकमात्र सनातन भगवान्‌ स्वयम्भू ब्रह्मा सबके आदि हैं। स्वयम्भू ब्रह्माके सात महात्मा पुत्र बताये गये हैं

भीष्म ने कहा—एकमात्र स्वयम्भू, सनातन, आद्य भगवान् ब्रह्मा ही सबके आरम्भ हैं। उसी ब्रह्मा के स्वयम्भू, महात्मा सात पुत्र कहे गए हैं।

Verse 4

मरीचिरुत्र्यड्विरसौ पुलस्त्य: पुलह: क्रतु: । वसिष्ठश्न महाभाग: सदृशो वै स्वयम्भुवा,उनके नाम इस प्रकार हैं--मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा महाभाग वसिष्ठ। ये सभी स्वयम्भू ब्रह्माके समान ही शक्तिशाली हैं

भीष्म ने कहा—उनके नाम हैं: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महाभाग वसिष्ठ। ये सभी स्वयम्भू ब्रह्मा के समान ही सामर्थ्य और तेज से युक्त हैं।

Verse 5

सप्तब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गता: । अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि सवनिव प्रजापतीन्‌,पुराणमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। अब मैं समस्त प्रजापतियोंका वर्णन आरम्भ करता हूँ

भीष्म ने कहा—पुराणों में ये ‘सप्त ब्रह्मा’ के नाम से निश्चयपूर्वक प्रसिद्ध हैं। अब आगे मैं समस्त प्रजापतियों का वर्णन करता हूँ।

Verse 6

अत्रिवंशसमुत्पन्नो ब्रह्मयोनि: सनातन: । प्राचीनबर्हिर्भगवांस्तस्मात्‌ प्राचेतसलो दश,अत्रिकुलमें उत्पन्न जो सनातन ब्रह्मययोनि भगवान्‌ प्राचीनबर्हि हैं, उनसे प्राचेतस नामवाले दस प्रजापति उत्पन्न हुए

भीष्म ने कहा—अत्रिवंश में उत्पन्न सनातन, ब्रह्मयोनि भगवान् प्राचीनबर्हि हुए। उन्हीं से ‘प्राचेतस’ नाम वाले दस प्रजापति उत्पन्न हुए।

Verse 7

दशानां तनयस्त्वेको दक्षो नाम प्रजापति: । तस्य द्वे नामनी लोके दक्ष: क इति चोच्यते,उन दसोंके एकमात्र पुत्र दक्ष नामसे प्रसिद्ध प्रजापति हैं। उनके दो नाम बताये जाते हैं --'दक्ष' और “क'

भीष्म ने कहा—उन दसों का एक ही पुत्र था, जो ‘दक्ष’ नाम से प्रसिद्ध प्रजापति था। लोक में उसे दो नामों से पुकारते हैं—‘दक्ष’ और ‘क’।

Verse 8

मरीचे: कश्यप: पुत्रस्तस्य द्वे नामनी स्मृते । अरिष्टनेमिरित्येके कश्यपेत्यपरे विदु:,मरीचिके पुत्र जो कश्यप हैं, उनके भी दो नाम माने गये हैं। कुछ लोग उन्हें अरिष्टनेमि कहते हैं और दूसरे लोग उन्हें कश्यपके नामसे जानते हैं

भीष्म ने कहा—मरीचि के पुत्र कश्यप के भी दो नाम स्मरण में आते हैं। कुछ लोग उन्हें ‘अरिष्टनेमि’ कहते हैं और दूसरे ‘कश्यप’ नाम से जानते हैं।

Verse 9

अन्रेश्नैवौरस: श्रीमान्‌ राजा सोमश्न वीर्यवान्‌ | सहस्र॑ यश्व दिव्यानां युगानां पर्युपासिता,अत्रिके औरस पुत्र श्रीमान्‌ और बलवान राजा सोम हुए, जिन्होंने सहस्र दिव्य युगोंतक भगवानकी उपासना की थी

भीष्म ने कहा—अत्रि के औरस वंश में ‘सोमश्रवा’ नाम का तेजस्वी और पराक्रमी राजा हुआ। वह सहस्र दिव्य युगों तक प्रभु की उपासना में अडिग रहा।

Verse 10

अर्यमा चैव भगवान्‌ ये चास्य तनया विभो । एते प्रदेशा: कथिता भुवनानां प्रभावना:,प्रभो! भगवान्‌ अर्यमा और उनके सभी पुत्र--ये प्रदेश (आदेश देनेवाले शासक) तथा प्रभावन (उत्तम स्रष्टा) कहे गये हैं

भीष्म ने कहा—हे विभो! भगवान् अर्यमा और उनके जो पुत्र हैं, वे सब ‘प्रदेश’—अर्थात् अधिकारयुक्त शासक—और ‘प्रभावन’—अर्थात् लोकों को समर्थ करने वाले—कहे गए हैं।

Verse 11

शशबिन्दोश्व भार्याणां सहस्राणि दशाच्युत । एकैकस्यां सहस्नं तु तनयानामभूत्‌ तदा,धर्मसे विचलित न होनेवाले युधिष्ठिर! शशबिन्दुके दस हजार स्त्रियाँ थीं। उनमेंसे प्रत्येकके गर्भसे एक-एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन महात्माके एक करोड़ पुत्र थे। वे उनके सिवा किसी दूसरे प्रजापतिकी इच्छा नहीं करते थे

भीष्म ने कहा—हे धर्म से अच्युत युधिष्ठिर! राजा शशबिन्दु की दस हजार रानियाँ थीं। उन में से प्रत्येक से उस समय एक-एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए।

Verse 12

एवं शतसहस्राणां शतं तस्य महात्मन: । पुत्राणां च न ते कंचिदिच्छन्त्यन्यं प्रजापतिम्‌,धर्मसे विचलित न होनेवाले युधिष्ठिर! शशबिन्दुके दस हजार स्त्रियाँ थीं। उनमेंसे प्रत्येकके गर्भसे एक-एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन महात्माके एक करोड़ पुत्र थे। वे उनके सिवा किसी दूसरे प्रजापतिकी इच्छा नहीं करते थे

इस प्रकार उस महात्मा नरेश के पुत्रों के सौ समूह थे—प्रत्येक में एक-एक लाख; उनकी संतान अपार थी। और वे पुत्र उनके सिवा किसी अन्य प्रजापति को अपना स्वामी मानना नहीं चाहते थे।

Verse 13

प्रजामाचक्षते विप्रा: पुराणा: शाशबिन्दवीम्‌ | स वृष्णिवंशप्रभवो महावंश: प्रजापते:,प्राचीनकालके ब्राह्मण अधिकांश प्रजाकी उत्पत्ति शशबिन्दुसे ही बताते हैं। प्रजापतिका वह महान्‌ वंश ही वृष्णिवंशका उत्पादक हुआ

प्राचीन ब्राह्मण ऋषि प्रजाओं की उत्पत्ति शशबिन्दु से ही बताते हैं। प्रजापति का वही महान वंश आगे चलकर वृष्णिवंश का उत्पादक हुआ।

Verse 14

एते प्रजानां पतय: समुद्दिष्टा यशस्विन: । अतः पर प्रवक्ष्यामि देवांस्त्रिभुवनेश्वरान्‌,युधिष्ठि!! ये सब यशस्वी प्रजापति बताये गये हैं। अब मैं तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले देवताओंका परिचय दूँगा

ये सब यशस्वी प्रजापति गिनाए जा चुके। अब, हे युधिष्ठिर, मैं तीनों लोकों पर शासन करने वाले देवताओं का वर्णन करूँगा।

Verse 15

भगों5शश्षार्यमा चैव मित्रो5थ वरुणस्तथा । सविता चैव धाता च विवस्वांश्ष महाबल:,भग, अंश, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, महाबली विवस्वान्‌, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे गये हैं। ये बारह आदित्य हैं, जो कश्यप और अदितिके पुत्र हैं

भग, अंश, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता और महाबली विवस्वान्—ये आदित्यों में गिने जाते हैं।

Verse 16

त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते । इत्येते द्वादशादित्या: कश्यपस्यात्मसम्भवा:,भग, अंश, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, महाबली विवस्वान्‌, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे गये हैं। ये बारह आदित्य हैं, जो कश्यप और अदितिके पुत्र हैं

त्वष्टा, पूषा और इन्द्र भी उन्हीं में हैं, और बारहवें विष्णु कहे गए हैं। इस प्रकार ये बारह आदित्य कश्यप के आत्मज हैं।

Verse 17

नासत्यश्वैव दख्रश्न॒ स्मृतौ द्वावश्विनावपि । मार्तण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य महात्मन:

भीष्म ने कहा—स्मृतियों में नासत्य और दध्रश्न—ये दोनों अश्विनीकुमार कहे गए हैं। ये दोनों अष्टम महात्मा आदित्य मार्तण्ड (सूर्य) के पुत्र हैं।

Verse 18

नासत्य और दखस्न--ये दोनों अश्विनीकुमार बताये गये हैं। ये दोनों अष्टम आदित्य महात्मा सूर्यके पुत्र हैं ।। ते च पूर्व सुराश्षैति द्विविधा: पितर: स्मृता: । त्वष्टश्वैवात्मज: श्रीमान्‌ विश्वरूपो महायशा:

भीष्म ने कहा—नासत्य और दसर—ये दोनों अश्विनीकुमार प्रसिद्ध हैं। ये दोनों तेजस्वी, महात्मा, अष्टम आदित्य सूर्य के पुत्र हैं। और प्राचीन परंपराओं में पितर भी दो प्रकार के माने गए हैं; तथा त्वष्टा का श्रीमान्, महायशस्वी पुत्र विश्वरूप (भी) है।

Verse 19

ये तथा पूर्वोक्त देवता-दो प्रकारके पितर माने गये हैं। त्वष्टाके पुत्र महायशस्वी श्रीमान्‌ विश्वरूप हुए ।। अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोडथ रैवत: । हरश्न बहुरूपश्न त्र्यम्बकश्न सुरेश्वर:,अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सुरेश्वर, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित--ये ग्यारह रुद्र हैं। महाभाग आठ वसुओंके नाम पहले ही बताये गये हैं

भीष्म ने कहा—जैसा पहले कहा गया, देवता और पितर—दो प्रकार के माने जाते हैं। त्वष्टा से श्रीमान्, महायशस्वी विश्वरूप उत्पन्न हुआ। अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सुरेश्वर, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये ग्यारह रुद्र हैं। महाभाग, आठ वसुओं के नाम पहले ही कहे जा चुके हैं।

Verse 20

सावित्रश्न॒ जयन्तश्न॒ पिनाकी चापराजित: । पूर्वमेव महाभागा वसवोड ष्टौ प्रकीर्तिता:,अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सुरेश्वर, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित--ये ग्यारह रुद्र हैं। महाभाग आठ वसुओंके नाम पहले ही बताये गये हैं

भीष्म ने कहा—सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये भी (रुद्रों में) नाम से गिने गए हैं। और हे महाभाग, आठ वसुओं का वर्णन पहले ही किया जा चुका है।

Verse 21

एत एवंविधा देवा मनोरेव प्रजापते: । ते च पूर्व सुराक्षेति द्विविधा: पितर: स्मृता:,इस प्रकार ये देवता प्रजापति मनुकी ही संतान हैं। वे तथा पूर्वोक्त देवता-ये दो प्रकारके पितर माने गये हैं

भीष्म ने कहा—इस प्रकार के ये देवता प्रजापति मनु की ही संतान हैं। और ये, पूर्वोक्त देवताओं के साथ, पितर के दो भेदों में स्मरण किए गए हैं।

Verse 22

शीलयौवनतत्त्वन्यस्तथान्य: सिद्धसाध्ययो: । ऋतभवो मरुतश्वैव देवानां चोदितो गण:,देवताओंमें एक वर्ग ऐसा है, जो सुन्दर शील-स्वभाव और अक्षय यौवनसे सम्पन्न है। दूसरा वर्ग सिद्धों और साध्योंका है। ऋभु और मरुतू-ये देवताओंके समुदायोंके नाम हैं

भीष्म ने कहा—देवताओं में अनेक गण हैं। एक गण सुन्दर शील-स्वभाव में स्थित और अक्षय यौवन से सम्पन्न है; दूसरा सिद्धों और साध्यों का है। ऋभु और मरुत भी देवताओं के नियत कर्मों में नियुक्त दिव्य समुदाय—देवगण—कहलाते हैं।

Verse 23

एवमेते समाम्नाता विश्वेदेवास्तथाश्विनौ । आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशश्षु मरतस्तथा,इसी प्रकार ये विश्वेदेव और अश्विनीकुमार भी देवताओंके गण माने गये हैं। इन देवताओंमें आदित्यगण क्षत्रिय और मरुद्गण वैश्य माने जाते हैं

भीष्म ने कहा—इसी प्रकार परम्परा से विश्वेदेव और दोनों अश्विनीकुमार भी देवगण माने गए हैं। इन देवताओं में आदित्यगण क्षत्रिय कहे जाते हैं और मरुद्गण वैश्य माने जाते हैं।

Verse 24

अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ । स्मृतास्त्वद्धिरसो देवा ब्राह्मणा इति निश्चय:,उग्र तपस्यामें लगे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंको शूद्र कहा जाता है। अंगिरा गोत्रवाले सम्पूर्ण देवता ब्राह्मण माने गये हैं। यही विद्वानोंका निश्चय है

भीष्म ने कहा—उग्र तपस्या में लगे हुए दोनों अश्विनीकुमार शूद्र कहे गए हैं। और आङ्गिरस गोत्र के देवता ब्राह्मण माने गए हैं—विद्वानों का यही निश्चय है।

Verse 25

इत्येतत्‌ सर्वदेवानां चातुर्वर्ण्य प्रकीर्तितम्‌ । एतान्‌ वै प्रातरुत्थाय देवान्‌ यस्तु प्रकीर्तयेत्‌

भीष्म ने कहा—इस प्रकार समस्त देवताओं के सम्बन्ध में चातुर्वर्ण्य का वर्णन किया गया। जो मनुष्य प्रातः उठकर इन देवताओं का नाम और कीर्ति का पाठ करता है…

Verse 26

यवक्रीतो<थ रैभ्यश्व अर्वावसुपरावसू

भीष्म ने कहा—तदनन्तर यवक्रीत, रैभ्यश्व तथा दोनों भ्राता अर्वावसु और परावसु (का भी उल्लेख हुआ)।

Verse 27

ऋषिर्मेधातिथे: पुत्र: कण्वो बर्हिषदस्तथा

भीष्म बोले—“मेधातिथि के पुत्र ऋषि कण्व तथा बर्हिषद्-वंश के (एक) महर्षि।”

Verse 28

उन्मुचो विमुचश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्व वीर्यवान्‌,एते ब्रह्मर्षयो नित्यमास्थिता दक्षिणां दिशम्‌ उन्मुच, विमुच, बलवान स्वस्त्यात्रेय, प्रमुच, इध्मवाह, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मित्रावरुणके प्रतापी पुत्र भगवान्‌ अगस्त्य--ये ब्रह्मर्षि सदा दक्षिण दिशामें रहते हैं

भीष्म बोले—“उन्मुच, विमुच और पराक्रमी स्वस्त्यात्रेय—ये ब्रह्मर्षि सदा दक्षिण दिशा में निवास करते हैं।”

Verse 29

प्रमुचश्चेध्मवाहश्च भगवांश्व दृढव्रत: । मित्रावरुणयो: पुत्रस्तथागस्त्य: प्रतापवान्‌

भीष्म बोले—“प्रमुच और इध्मवाह—दृढ़व्रती भगवद्-स्वरूप महर्षि—तथा मित्र और वरुण के पुत्र प्रतापी अगस्त्य।”

Verse 30

उषड्भु: कवषो धौम्य: परिव्याधश्च वीर्यवान्‌,एते चैव महात्मान: पश्चिमामाश्रिता दिशम्‌ | उषंगु, कवष, धौम्य, शक्तिशाली परिव्याध, एकत, द्वित, त्रित तथा अत्रिके प्रभावशाली पुत्र भगवान्‌ सारस्वत--ये महात्मा महर्षि पश्चिम दिशामें निवास करते हैं

भीष्म बोले—“उषड्भु, कवष, धौम्य और पराक्रमी परिव्याध—ये महात्मा पश्चिम दिशा में निवास करते हैं।”

Verse 31

एकततक्ष द्वितश्रैव त्रितश्वैव महर्षय: । अत्रे: पुत्रश्न भगवांस्तथा सारस्वत: प्रभु:

भीष्म बोले—“एकततक्ष, द्वित और त्रित—ये महर्षि; तथा अत्रि के पुत्र पूज्य (ऋषि) और प्रभु सारस्वत।”

Verse 32

आत्रेयश्व वसिष्ठश्न॒ कश्यपश्च महानृषि:

भीष्म ने कहा—आत्रेय, वसिष्ठ और महर्षि कश्यप—ये सभी महान् ऋषि थे।

Verse 33

गौतमो5थ भरद्वाजो विश्वामित्रो5थ कौशिक: । तथैव पुत्रो भगवानूचीकस्य महात्मन:

भीष्म ने कहा—फिर गौतम, भरद्वाज और विश्वामित्र (कौशिक) हुए; तथा महात्मा ऋषि ऊचीक के पुत्र भगवान् (जमदग्नि) भी।

Verse 34

जमदमन्निश्व सप्तैते उदीचीमाश्रिता दिशम्‌ | आत्रेय, वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र तथा महात्मा ऋचीकके पुत्र भगवान्‌ जमदग्नि--ये सात उत्तर दिशामें रहते हैं ।। एते प्रतिदिशं सर्वे कीर्तितास्तिग्मतेजस:,इस प्रकार प्रत्येक दिशामें रहनेवाले सम्पूर्ण तेजस्वी महर्षियोंका वर्णन किया गया। ये महात्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ एवं सबके साक्षी हैं। इनका हृदय बड़ा विशाल है। इस तरह ये प्रत्येक दिशामें निवास करते हैं

भीष्म ने कहा—ये सातों—जमदग्नि आदि—उत्तर दिशा में स्थित हैं: आत्रेय, वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र और महात्मा ऋचीक के पुत्र भगवान् जमदग्नि। इस प्रकार प्रत्येक दिशा में निवास करने वाले तीव्र तेजस्वी महर्षियों का वर्णन किया गया है।

Verse 35

साक्षिभूता महात्मानो भुवनानां प्रभावना: । एवमेते महात्मान: स्थिता: प्रत्येकशो दिशम्‌,इस प्रकार प्रत्येक दिशामें रहनेवाले सम्पूर्ण तेजस्वी महर्षियोंका वर्णन किया गया। ये महात्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ एवं सबके साक्षी हैं। इनका हृदय बड़ा विशाल है। इस तरह ये प्रत्येक दिशामें निवास करते हैं

ये महात्मा ऋषि सबके साक्षी हैं और भुवनों को धारण व प्रकट करने की शक्ति से युक्त हैं। इस प्रकार ये महात्मा प्रत्येक दिशा में अपने-अपने स्थान पर स्थित हैं।

Verse 36

एतेषां कीर्तन कृत्वा सर्वपापात्‌ प्रमुच्यते । यस्यां यस्यां दिशि होते तां दिशं शरणं गत: । मुच्यते सर्वपापेभ्य: स्वस्तिमांश्व गृहान्‌ व्रजेत्‌,इन सबका गुणगान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिस-जिस दिशामें ये महर्षि रहते हैं, उस-उस दिशामें जानेपर जो मनुष्य इनकी शरण लेता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और कुशलपूर्वक अपने घरको पहुँच जाता है

इन महर्षियों का कीर्तन करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। वे जिस-जिस दिशा में निवास करते हैं, उस दिशा में जाकर जो उनकी शरण लेता है, वह सब पापों से छूट जाता है और कल्याणपूर्वक अपने घर लौट आता है।

Verse 207

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में श्रीकृष्ण द्वारा प्रतिपादित सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति-विषयक दो सौ सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 208

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दिशास्वस्तिकं नाम अष्टाधिकद्विशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दिशास्वस्तिक नामक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ

इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में ‘दिशास्वस्तिक’ नामक दो सौ आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 266

ओऔशिजजश्चैव कक्षीवान्‌ बलश्नाड्रिरस: सुता: । यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, औशिज, कक्षीवान्‌ और बल--ये अंगिराके पुत्र हैं

भीष्म ने कहा—औशिजज, कक्षीवान् और बल; तथा यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु और परावसु—ये सब अंगिरा ऋषि के पुत्र कहे गए हैं।

Verse 273

त्रैलोक्यभावनास्तात प्राच्यां सप्तर्षयस्तथा । तात! मेधातिथिके पुत्र कण्वमुनि, बर्हिषद तथा त्रिलोकीको उत्पन्न करनेमें समर्थ सप्तर्षिगण हैं, जो पूर्व दिशामें स्थित होते हैं

भीष्म ने कहा—तात! पूर्व दिशा में भी सप्तर्षिगण स्थित हैं, जो त्रिलोकी को उत्पन्न करने और धारण करने में समर्थ हैं।

Verse 293

एते ब्रह्मर्षयो नित्यमास्थिता दक्षिणां दिशम्‌ उन्मुच, विमुच, बलवान स्वस्त्यात्रेय, प्रमुच, इध्मवाह, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मित्रावरुणके प्रतापी पुत्र भगवान्‌ अगस्त्य--ये ब्रह्मर्षि सदा दक्षिण दिशामें रहते हैं

भीष्म ने कहा—ये ब्रह्मर्षि सदा दक्षिण दिशा में रहते हैं—उन्मुच, विमुच, बलवान, स्वस्त्यात्रेय, प्रमुच, इध्मवाह और दृढ़तापूर्वक; तथा मित्र और वरुण के प्रतापी पुत्र, उत्तम व्रतों के पालन में दृढ़, भगवान् अगस्त्य भी। ये सब ब्रह्मर्षि नित्य दक्षिण दिशा में निवास करते हैं।

Verse 313

एते चैव महात्मान: पश्चिमामाश्रिता दिशम्‌ | उषंगु, कवष, धौम्य, शक्तिशाली परिव्याध, एकत, द्वित, त्रित तथा अत्रिके प्रभावशाली पुत्र भगवान्‌ सारस्वत--ये महात्मा महर्षि पश्चिम दिशामें निवास करते हैं

भीष्म ने कहा—ये महात्मा, महान् तपस्वी और महर्षि, जिनकी आध्यात्मिक शक्ति अत्यन्त प्रबल है, पश्चिम दिशा में निवास करते हैं—उषंगु, कवष, धौम्य, शक्तिशाली परिव्याध, तथा एकत, द्वित और त्रित; और अत्रि के प्रभावशाली पुत्र, वन्दनीय भगवान् सारस्वत। ये ही वे परम ऋषि हैं जो पश्चिम में रहते हैं।

Verse 2536

स्वजादन्यकृताच्चैव सर्वपापात्‌ प्रमुच्यते । इस प्रकार सम्पूर्ण देवताओंमें जो चार वर्ण हैं, उनका वर्णन किया गया। जो सबेरे उठकर इन देवताओंका कीर्तन करता है, वह स्वयं किये हुए तथा दूसरोंके संसर्गसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण पापसमूहसे मुक्त हो जाता है

भीष्म ने कहा—मनुष्य अपने ही कर्मों से उत्पन्न तथा दूसरों के कर्मों के संसर्ग से प्राप्त—समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार देवताओं में कहे गए चार ‘वर्णों’ का वर्णन किया गया। जो प्रातःकाल उठकर इन देवताओं का कीर्तन करता है, वह पापों के समस्त संचय से—चाहे वह स्वयं किया हुआ हो या दूसरों के संपर्क से आया हो—छूट जाता है।

Frequently Asked Questions

The dilemma is operational rather than situational: how to live compassionately in a world governed by karmaphala without falling into attachment, harmful speech, or passion-driven action that perpetuates suffering.

Liberation is approached through disciplined integration of mind, speech, and body—truthful non-injurious minimal speech, equanimity toward outcomes, ethical action, and gradual cultivation of knowledge through restraint and regulated living.

Rather than a formal phalāśruti, the chapter embeds outcome-claims: uncontrolled rajas/tamas conduct yields painful results, while restraint and knowledge lead toward brahma-bhāva and the imperishable (akṣara/avyaya) attainment.