
Śarīrin, Buddhi, and the Limits of Sense-Perception (इन्द्रियबुद्धिशरीरिविचारः)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Mokṣa-dharma-parvan) — Discourse on liberation and the nature of the Self
Manu articulates an epistemology of the embodied knower (śarīrin) and the constraints of indriya-based cognition. The chapter argues that while the senses register prior experiences and objects, the ‘buddhi-form’ principle persists even when sense faculties are impaired, indicating a superior organizing capacity. The śarīrin is described as one, moving according to capacity, and entering the senses as fire enters fuel or wind animates a locus. A key claim is reflexive asymmetry: the senses do not perceive their own selfhood, whereas the kṣetrajña (knower of the field) ‘sees’ the senses and their operations. Multiple analogies support non-visibility without non-existence: unseen sides of Himavat, the moon’s invisibility on new-moon night, and the changing ‘sheaths’ (kośa) through which the moon appears to wax and wane—paralleling how embodiment changes while the embodied principle is not directly observed. The text further distinguishes the observable alterations of manifest forms (birth, growth, decay) from the unobserved status of the śarīrin, and uses Rahu-like imagery to indicate that certain entities are only cognized when conjoined with perceptible supports. The chapter concludes by stressing method: the knowable is grasped by knowledge, as like apprehends like, and not by an instrument incapable of reaching beyond its domain.
Chapter Arc: भीष्म, शोकाकुल युधिष्ठिर के सामने, मोक्ष की ओर ले जाने वाले ‘ध्यानयोग’ का चार प्रकारों में विधान करने का संकल्प लेते हैं—ऐसा ज्ञान जो जान लेने पर शाश्वत सिद्धि का द्वार खोल दे। → वे बताते हैं कि महर्षि-योगी जैसे ध्यान करते हैं वैसा ही साधक को करना चाहिए: इन्द्रियों को समेटकर, द्वन्द्वों से अप्रभावित होकर, काष्ठवत् स्थिर आसन में मन को एकाग्र धारण करना। पर मन-इन्द्रियाँ बार-बार भटकती हैं; साधक को उन्हें भीतर खींचकर पुनः संयमित करना पड़ता है। → संयम के पूर्व अभ्यास के बाद भी भीतर का ‘छठा’—मन—अचानक बिजली की तरह उछलता-भटकता है; उसी क्षण साधक की परीक्षा है: वह पाँच इन्द्रियों सहित मन को फिर से बुद्धि द्वारा समेटकर एकाग्रता में टिकाए। → धीरे-धीरे, क्रमशः (शनैः शनैः) परिभावना से ध्यान पकता है—जैसे सूखे चूर्ण का संस्कार धीरे-धीरे एकरस होता है। ध्यानजन्य सुख से संयुक्त योगी उसी कर्म में स्थिर होकर निर्वाण—निरामय, दोषरहित शान्ति—की ओर गमन करते हैं; वे संसार-दोषों से मुक्त होकर पुनर्जन्म के बन्धन में नहीं लौटते।
Verse 1
ऑपनआ प्रात बछ। >> 2 पज्चनवर्त्याधेकशततमो< ध्याय: ध्यानयोगका वर्णन भीष्म उवाच हन्त वक्ष्यामि ते पार्थ ध्यानयोगं चतुर्विधम् । य॑ंज्ञात्वा शाश्वतीं सिद्धि गच्छन्तीह महर्षय:,भीष्मजी कहते हैं--कुन्तीनन्दन! अब मैं तुमसे ध्यानयोगका वर्णन करूँगा जो आलम्बनके भेदसे चार प्रकारका होता है। जिसे जानकर महर्षिगण यहीं सनातन सिद्धिको प्राप्त करते हैं
भीष्मजी कहते हैं—आओ, पार्थ! अब मैं तुमसे ध्यानयोग का वर्णन करूँगा, जो आलम्बन (आश्रय/विषय) के भेद से चार प्रकार का है। इसे जानकर महर्षिगण इसी जीवन में सनातन, शाश्वत सिद्धि को प्राप्त करते हैं।
Verse 2
यथा स्वनुष्ठितं ध्यानं तथा कुर्वन्ति योगिन: । महर्षयो ज्ञानतृप्ता निर्वाणणतमानसा:,निर्वाणस्वरूप मोक्षमें मन लगानेवाले ज्ञानतृप्त योगयुक्त महर्षिगण उसी उपायका अवलम्बन करते हैं, जिससे ध्यानका भलीभाँति अनुष्ठान हो सके
योगीजन ध्यान का ऐसा अभ्यास करते हैं कि उसका सम्यक् अनुष्ठान हो सके। जो महर्षि सत्यज्ञान से तृप्त हैं और जिनका मन निर्वाण में स्थित है, वे उसी उपाय का आश्रय लेते हैं जिससे ध्यान भलीभाँति सिद्ध हो, और मोक्षस्वरूप में ही चित्त को स्थिर करते हैं।
Verse 3
नावर्तन्ते पुनः पार्थ मुक्ता: संसारदोषत: । जन्मदोषपरिक्षीणा: स्वभावे पर्यवस्थिता:,कुन्तीनन्दन! वे संसारके काम, क्रोध आदि दोषोंसे मुक्त तथा जन्मसम्बन्धी दोषसे शून्य होकर परमात्माके स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं, इसलिये पुनः इस संसारमें उन्हें नहीं लौटना पड़ता
हे पार्थ! जो संसार के दोषों से मुक्त हो जाते हैं, वे फिर लौटकर नहीं आते। जन्म-सम्बन्धी दोषों का क्षय कर, वे अपने स्वभाव—परमात्मस्वरूप—में स्थिर हो जाते हैं।
Verse 4
निर्दन्द्धा नित्यसत्त्वस्था विमुक्ता नियमस्थिता: । असड्ान्यविवादीनि मन:शान्तिकराणि च,ध्यानयोगके साधकोंको चाहिये कि सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्धोंसे रहित, नित्य सत्त्वगुणमें स्थित, सब प्रकारके दोषोंसे रहित और शौच-संतोषादि नियमोंमें तत्पर रहें। जो स्थान असंग (सब प्रकारके भोगोंके संगसे शून्य), ध्यानविरोधी वस्तुओंसे रहित तथा मनको शान्ति देनेवाले हों, वहीं इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेटकर काठकी भाँति स्थिरभावसे बैठ जाय और मनको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें लगा दे
ध्यानयोग के साधक द्वन्द्वों—जैसे शीत-उष्ण—से रहित, नित्य सत्त्वगुण में स्थित, दोषों से मुक्त और शौच-संतोष आदि नियमों में दृढ़ रहें। वे ऐसे स्थानों का सेवन करें जो असंग हों, विवाद-रहित हों और मन को शान्ति देने वाले हों।
Verse 5
तत्र ध्यानेन संश्लिष्टमेकाग्रं धारयेन्मन: । पिण्डीकृत्येन्द्रियग्राममासीन: काष्ठवन्मुनि:,ध्यानयोगके साधकोंको चाहिये कि सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्धोंसे रहित, नित्य सत्त्वगुणमें स्थित, सब प्रकारके दोषोंसे रहित और शौच-संतोषादि नियमोंमें तत्पर रहें। जो स्थान असंग (सब प्रकारके भोगोंके संगसे शून्य), ध्यानविरोधी वस्तुओंसे रहित तथा मनको शान्ति देनेवाले हों, वहीं इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेटकर काठकी भाँति स्थिरभावसे बैठ जाय और मनको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें लगा दे
वहाँ ध्यान में संयुक्त होकर मन को एकाग्र और स्थिर धारण करे। इन्द्रियों के समस्त समूह को समेटकर मुनि काष्ठ के समान निश्चल बैठ जाए और मन को परमात्म-चिन्तन में लगाए।
Verse 6
शब्दं न विन्देच्छोत्रेण स्पर्श त्वचा न वेदयेत् । रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्दया न रसांस्तथा,योगको जाननेवाले समर्थ पुरुषको चाहिये कि कानोंके द्वारा शब्द न सुने, त्वचासे स्पर्शका अनुभव न करे, आँखसे रूपको न देखे और जिह्ढासे रसोंको ग्रहण न करे एवं ध्यानके द्वारा समस्त सूँघने योग्य वस्तुओंको भी त्याग दे तथा पाँचों इन्द्रियोंको मथ डालनेवाले इन विषयोंकी कभी मनसे भी इच्छा न करे
योग को भलीभाँति जानने वाला समर्थ साधक कान से शब्द न खोजे, त्वचा से स्पर्श का अनुभव न करे, आँख से रूप का ग्रहण न करे और जिह्वा से रसों को न पकड़े। इसी प्रकार ध्यान-नियम से गन्ध के विषयों को भी त्याग दे; और पाँचों इन्द्रियों को मथ डालने वाले इन विषयों की इच्छा मन में भी न आने दे।
Verse 7
प्रेयाण्यपि च सर्वाणि जह्याद् ध्यानेन योगवित् | पज्चवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान्,योगको जाननेवाले समर्थ पुरुषको चाहिये कि कानोंके द्वारा शब्द न सुने, त्वचासे स्पर्शका अनुभव न करे, आँखसे रूपको न देखे और जिह्ढासे रसोंको ग्रहण न करे एवं ध्यानके द्वारा समस्त सूँघने योग्य वस्तुओंको भी त्याग दे तथा पाँचों इन्द्रियोंको मथ डालनेवाले इन विषयोंकी कभी मनसे भी इच्छा न करे
योग का ज्ञाता ध्यान के द्वारा इन्द्रियों के प्रिय विषयों को भी त्याग दे। वीर्यवान् पुरुष पाँचों इन्द्रियों के समूह को मथ डालने वाले इन विषयों की इच्छा तक न करे।
Verse 8
ततो मनसि संगृहा पञ्चवर्ग विचक्षण: । समाददध्यान्मनो भ्रान्तमिन्द्रियेः सह पठ्चभि:,तत्पश्चात् बुद्धिमान एवं विद्वान् पुरुष पाँचों इन्द्रियोंको मनमें स्थिर करे। उसके बाद पाँचों इन्द्रियोंसहित चंचल मनको परमात्माके ध्यानमें एकाग्र करे
तदनन्तर बुद्धिमान पुरुष पाँचों इन्द्रियों के समूह को मन में समेट ले। फिर पाँचों इन्द्रियों सहित भटकते हुए मन को परमात्म-ध्यान में स्थिर करके एकाग्र करे।
Verse 9
विसंचारि निरालम्बं पठ्चद्वारं चलाचलम् । पूर्व ध्यानपथे धीर: समादध्यान्मनो5न्तरा,मन नाना प्रकारके विषयोंमें विचरण करनेवाला है। उसका कोई स्थिर आलम्बन नहीं है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ उसके इधर-उधर निकलनेके द्वार हैं तथा वह अत्यन्त चंचल है। ऐसे मनको धीर योगी पुरुष पहले अपने हृदयके भीतर ध्यानमार्ममें एकाग्र करे
मन नाना विषयों में विचरता है, उसका कोई स्थिर आलम्बन नहीं; पाँच इन्द्रियाँ उसके बाहर निकलने के द्वार हैं और वह अत्यन्त चंचल है। इसलिए धीर योगी पहले इस मन को भीतर—हृदय के ध्यान-पथ में—स्थिर करके एकाग्र करे।
Verse 10
इन्द्रियाणि मनश्वैव यदा पिण्डीकरोत्ययम् । एष ध्यानपथ: पूर्वो मया समनुवर्णित:,जब यह योगी इन्द्रियोंसहित मनको एकाग्र कर लेता है, तभी उसके प्रारम्भिक ध्यानमार्गका आरम्भ होता है। युधिष्ठिर! यह मैंने तुम्हारे निकट प्रथम ध्यानमार्गका वर्णन किया है
जब यह साधक इन्द्रियों सहित मन को एकत्र करके एक ही लक्ष्य में स्थिर कर देता है, तभी ध्यान का प्रथम पथ आरम्भ होता है। हे युधिष्ठिर! यह मैंने तुम्हें ध्यान-मार्ग का प्रारम्भिक विधान बताया है।
Verse 11
तस्य तत् पूर्वसंरुद्धमात्मन: षष्ठमान्तरम् । स्फुरिष्यति समुदशभ्रान्ता विद्युदम्बुधरे यथा,इस प्रकार प्रयत्न करनेसे जो इन्द्रियोंसहित मन कुछ देरके लिये स्थिर हो जाता है, वही फिर अवसर पाकर जैसे बादलोंमें बिजली चमक उठती है, उसी प्रकार पुनः बारंबार विषयोंकी ओर जानेके लिये चंचल हो उठता है
पूर्व प्रयत्न से इन्द्रियों सहित मन कुछ समय के लिए संयमित होकर स्थिर भी हो जाए, तो भी अवसर पाकर वह फिर भड़क उठता है—जैसे मेघ के भीतर बिजली सहसा चमक उठती है। उसी प्रकार मन बार-बार विषयों की ओर दौड़कर चंचल हो जाता है; इसलिए आत्मसंयम में सतत सावधानी और अभ्यास आवश्यक है।
Verse 12
जलबिन्दुर्यथा लोल: पर्णस्थ: सर्वतश्नलः । एवमेवास्य चित्तं च भवति ध्यानवर्त्मनि,जैसे पत्तेपर पड़ी हुई पानीकी बूँद सब ओरसे हिलती रहती है, उसी प्रकार ध्यानमार्ममें स्थित साधकका मन भी प्रारम्भमें चंचल होता रहता है
जैसे पत्ते पर ठहरी जल-बूँद चारों ओर डोलती रहती है, वैसे ही ध्यान-मार्ग पर स्थित साधक का चित्त आरम्भ में चंचल रहता है।
Verse 13
समादितं क्षणं किज्चिद् ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति । पुनर्वायुपथं भ्रान्तं मनो भवति वायुवत्,एकाग्र करनेपर कुछ देर तो वह ध्यानमें स्थित रहता है; परंतु फिर नाड़ी मार्ममें पहुँचकर भ्रान्त-सा होकर वायुके समान चंचल हो उठता है
एकाग्र किए जाने पर वह मन कुछ क्षण ध्यान-मार्ग में ठहरता है; पर फिर प्राण-वायु के पथ में भटककर भ्रमित हो जाता है और वायु के समान चंचल हो उठता है।
Verse 14
अनिर्वेदो गतक्लेशो गततन्द्रिरमत्सरी । समाददध्यात् पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित्,ध्यानयोगको जाननेवाला साधक ऐसे विक्षेपके समय खेद या क्लेशका अनुभव न करे; अपितु आलस्य और मात्सर्यका त्याग करके ध्यानके द्वारा मनको पुनः एकाग्र करनेका प्रयत्न करे
विक्षेप के समय ध्यानयोग का ज्ञाता साधक खिन्न न हो, न क्लेश माने। आलस्य और मात्सर्य का त्याग करके वह ध्यान के द्वारा मन को फिर से समेटकर स्थिर करे।
Verse 15
विचारश्न विवेकश्न वितर्कश्षोपजायते । मुने: समादधानस्य प्रथमं ध्यानमादितः,योगी जब ध्यानका आरम्भ करता है, तब पहले उसके मनमें ध्यानविषयक विचार, विवेक और वितर्क आदि प्रकट होते हैं
योगी-मुनि जब ध्यान का आरम्भ करके मन को समाधि में स्थिर करने लगता है, तब प्रारम्भ में ही ध्यान-विषय से सम्बद्ध विचार, विवेक और वितर्क आदि मनोवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। यही अन्तःशासन की प्रथम अवस्था है, जहाँ मन चञ्चलता से हटकर स्पष्टता की ओर मुड़ना सीखता है।
Verse 16
मनसा क्लिश्यमानस्तु समाधानं च कारयेत् । न निर्वेद॑ मुनिर्गच्छेत् कुयादिवात्मनो हितम्,ध्यानके समय मनमें कितना ही क्लेश क्यों न हो, साधकको उससे ऊबना नहीं चाहिये; बल्कि और भी तत्परताके साथ मनको एकाग्र करनेका प्रयत्न करना चाहिये। ध्यानयोगी मुनिको सर्वथा अपने कल्याणका ही प्रयत्न करना चाहिये
ध्यान के समय मन कितना ही क्लेशित क्यों न हो, साधक को उससे निराश या ऊबा नहीं होना चाहिए; अपितु और अधिक तत्परता से मन को स्थिर कर एकाग्र करने का प्रयत्न करना चाहिए। मुनि को सदा अपने परम हित के लिए ही कर्म करना चाहिए।
Verse 17
पांसुभस्मकरीषाणां यथा वै राशयश्िता: । सहसा वारिणासिक्ता न यान्ति परिभावनम्,जैसे धूलि, भस्म और सूखे गोबरके चूर्णकी अलग-अलग इकट्टी की हुई ढेरियोंपर जल छिड़का जाय तो वे सहसा जलसे भीगकर इतनी तरल नहीं हो सकतीं कि उनके द्वारा कोई आवश्यक कार्य किया जा सके; क्योंकि बार-बार भिगोये बिना वह सूखा चूर्ण थोड़ा-सा भीगता है, पूरा नहीं भीगता; परंतु उसको यदि बार-बार जल देकर क्रमसे भिगोया जाय तो धीरे-धीरे वह सब गीला हो जाता है, उसी प्रकार योगी विषयोंकी ओर बिखरी हुई इन्द्रियोंको धीरे-धीरे विषयोंकी ओरसे समेटे और चित्तको ध्यानके अभ्याससे क्रमशः स्नेहयुक्त बनावे। ऐसा करनेपर वह चित्त भलीभाँति शान्त हो जाता है
जैसे धूलि, भस्म और सूखे गोबर के चूर्ण की ढेरियाँ सहसा जल छिड़कने से तुरंत भलीभाँति गीली होकर काम की नहीं बनतीं, वैसे ही मन भी अचानक किए गए प्रयत्न से स्थिर ध्यान के योग्य नहीं होता। बार-बार और क्रमशः भिगोने से ही सूखा चूर्ण भीतर तक नरम होता है; उसी प्रकार योगी को विषयों की ओर बिखरी इन्द्रियों को धैर्यपूर्वक धीरे-धीरे समेटकर, ध्यानाभ्यास से चित्त को क्रमशः स्निग्ध और शान्त बनाना चाहिए—तभी वह वास्तव में प्रशान्त होता है।
Verse 18
किज्चित् स्निग्धं॑ यथा चस्याच्छुष्कचूर्णम भावितम् । क्रमशस्तु शनैर्गच्छेत् सर्व तत्परिभावनम्,जैसे धूलि, भस्म और सूखे गोबरके चूर्णकी अलग-अलग इकट्टी की हुई ढेरियोंपर जल छिड़का जाय तो वे सहसा जलसे भीगकर इतनी तरल नहीं हो सकतीं कि उनके द्वारा कोई आवश्यक कार्य किया जा सके; क्योंकि बार-बार भिगोये बिना वह सूखा चूर्ण थोड़ा-सा भीगता है, पूरा नहीं भीगता; परंतु उसको यदि बार-बार जल देकर क्रमसे भिगोया जाय तो धीरे-धीरे वह सब गीला हो जाता है, उसी प्रकार योगी विषयोंकी ओर बिखरी हुई इन्द्रियोंको धीरे-धीरे विषयोंकी ओरसे समेटे और चित्तको ध्यानके अभ्याससे क्रमशः स्नेहयुक्त बनावे। ऐसा करनेपर वह चित्त भलीभाँति शान्त हो जाता है
जैसे जो सूखा चूर्ण अभी भलीभाँति भिगोया नहीं गया, वह एकाएक स्निग्ध और काम के योग्य नहीं हो सकता; वह तो धीरे-धीरे, क्रमशः ही पूरी तरह भीगकर वैसा बनता है। उसी प्रकार योगी को भी क्रम-क्रम से साधना बढ़ाकर मन को शान्ति से परिपक्व करना चाहिए।
Verse 19
एवमेवेन्द्रियग्रामं शनै: सम्परिभावयेत् । संहरेत् क्रमशश्नचैव स सम्यक् प्रशमिष्यति,जैसे धूलि, भस्म और सूखे गोबरके चूर्णकी अलग-अलग इकट्टी की हुई ढेरियोंपर जल छिड़का जाय तो वे सहसा जलसे भीगकर इतनी तरल नहीं हो सकतीं कि उनके द्वारा कोई आवश्यक कार्य किया जा सके; क्योंकि बार-बार भिगोये बिना वह सूखा चूर्ण थोड़ा-सा भीगता है, पूरा नहीं भीगता; परंतु उसको यदि बार-बार जल देकर क्रमसे भिगोया जाय तो धीरे-धीरे वह सब गीला हो जाता है, उसी प्रकार योगी विषयोंकी ओर बिखरी हुई इन्द्रियोंको धीरे-धीरे विषयोंकी ओरसे समेटे और चित्तको ध्यानके अभ्याससे क्रमशः स्नेहयुक्त बनावे। ऐसा करनेपर वह चित्त भलीभाँति शान्त हो जाता है
इसी प्रकार इन्द्रियों के समूचे समुदाय को भी धीरे-धीरे साधकर परिष्कृत करना चाहिए। क्रम-क्रम से उन्हें संहरना चाहिए; तब मन सम्यक् रूप से प्रशान्त हो जाता है।
Verse 20
स्वयमेव मनश्लैवं पञचवर्ग च भारत । पूर्व ध्यानपथे स्थाप्य नित्ययोगेन शाम्यति,भरतनन्दन! ध्यानयोगी पुरुष स्वयं ही मन और पाँचों इन्द्रियोंको पहले ध्यानमार्गमें स्थापित करके नित्य किये हुए योगाभ्यासके बलसे शान्ति प्राप्त कर लेता है
भीष्म बोले— हे भारत, हे भरतनन्दन! ध्यानयोगी पुरुष स्वयं ही मन और पाँचों इन्द्रियों को पहले ध्यान-मार्ग में स्थापित करके, नित्य योगाभ्यास के बल से अन्तःशान्ति प्राप्त करता है।
Verse 21
न तत्पुरुषकारेण न च दैवेन केनचित् । सुखमेष्यति तत् तस्य यदेवं संयतात्मन:,इस प्रकार मनोनिग्रहपूर्वक ध्यान करनेवाले योगीको जो दिव्य सुख प्राप्त होता है, वह मनुष्यको किसी दूसरे पुरुषार्थसे या दैवयोगसे भी नहीं मिल सकता
भीष्म बोले— इस प्रकार संयत आत्मा वाले योगी को जो सुख प्राप्त होता है, वह न तो किसी अन्य प्रकार के पुरुषार्थ से, न ही किसी दैवयोग से मिल सकता है; वह तो आत्मसंयम और ध्यान-निग्रह से ही उत्पन्न होता है।
Verse 22
सुखेन तेन संयुक्तो रंस्थते ध्यानकर्मणि । गच्छन्ति योगिनो होवं निर्वाणं तन्निरामयम्,उस ध्यानजनित सुखसे सम्पन्न होकर योगी उस ध्यानयोगमें अधिकाधिक अनुरक्त होता जाता है। इस प्रकार योगीलोग दुःख--शोकसे रहित निर्वाण (मोक्ष) पदको प्राप्त हो जाते हैं
भीष्म बोले— उस ध्यानजनित सुख से संयुक्त होकर योगी ध्यानकर्म में अधिकाधिक रमण करता है; और इसी प्रकार योगीजन दुःख-शोक से रहित निरामय निर्वाण (मोक्ष) पद को प्राप्त होते हैं।
Verse 194
इस प्रकार श्रीमहाभारतमें शान्तिपवके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें अध्यात्मतत््वका वर्णनविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में अध्यात्मतत्त्व के वर्णनविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
Verse 195
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ध्यानयोगकथने पजञ्चनवत्यधिकशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ध्यानयोगकथने पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः।
How the śarīrin/ātman can be affirmed when it is not directly perceived by the senses; the chapter answers by distinguishing sensory instruments from the knowing principle and by using inference supported by analogy.
The senses have limited scope and cannot reflexively certify themselves; buddhi functions as a higher lamp that organizes cognition, and the kṣetrajña is posited as the overseer that ‘knows’ sensory operations.
Yes: the chapter explicitly states that no aim is achieved without an appropriate means (upāya), and that the knowable (jñeya) is grasped by knowledge (jñāna), illustrated through ‘like apprehends like’ examples (animals grasped by their kind).