Adhyaya 195
Shanti ParvaAdhyaya 19567 Verses

Adhyaya 195

मनु-उपदेशः — भूत-उत्पत्ति, इन्द्रिय-निवृत्ति, तथा पर-स्वभाव-विवेकः (Manu’s Instruction on Elemental Origination, Sense-Withdrawal, and Discrimination of the Supreme Nature)

Upa-parva: Mokṣadharma (Liberation Teachings) — Elemental Cosmology and the Inner Witness (Contextual Unit for Adhyāya 195)

This chapter presents Manu’s compact metaphysical exposition. It begins with a cosmogonic sequence: from the imperishable (akṣara) arises space (kha), then wind (vāyu), fire/light (jyotis/tejas), water (jalam), and earth (jagatī), from which the manifest world proceeds. The discourse then contrasts beings that ‘return’ to elemental dissolution with those oriented to the ‘parama’ attainment, introducing a soteriological distinction grounded in cognition and practice. The ‘parama’ is described apophatically—neither hot nor cold, neither taste nor smell nor form—indicating a principle beyond sensory predicates. A functional psychology follows: skin, tongue, nose, ear, and eye grasp touch, taste, smell, sound, and form, yet the untrained do not grasp what is beyond. By withdrawing each sense from its object, one ‘sees’ one’s own nature. Causality is analyzed via kāraṇa and upāya: that by which actions are initiated and accomplished is termed the cause/means; the supreme cause is portrayed as pervasive and efficacious. Karma and knowledge are linked: auspicious/inauspicious action conditions embodied experience. Multiple analogies (lamp and illumination; ministers reporting to a king; flames/winds/rays/waters moving; fire latent in wood revealed by friction; dream and subtle transition) illustrate how senses are partial, how subtle continuity proceeds via liṅga (subtle body), and how the witness ‘sees’ the senses though they do not see it. The chapter closes by mapping senses to elements (ear–space, nose–earth, form/vision–fire, taste/sweat–water, touch–wind), placing manas and buddhi as coordinators of sensory and moral life.

Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से पूछते हैं—शास्त्रों में ‘अध्यात्म’ नाम से जिस ज्ञान का विचार किया गया है, वह वास्तव में क्या है और कैसा है? → भीष्म अध्यात्म का विवेचन आरम्भ करते हैं: पंचमहाभूतों से देह-रचना, जीव का उस वैषम्य को न देख पाना, इन्द्रियों-मन-बुद्धि की देख-रेख, और त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम) के प्रभाव से बुद्धि का सुख-दुःख-मोह में डोलना—इन सबके बीच आत्मतत्त्व की पहचान कठिन प्रतीत होती है। → त्रिगुणों के अधीन बुद्धि इन्द्रियों को प्रवृत्त करती है; पर जो पुरुष धर्म-अर्थ-काम (त्रिवर्ग) को ठीक-ठीक जानकर भी आसक्ति से रहित, मन से तत्त्व का अन्वेषण करता है, वही ‘तत्त्वदर्शी’ होकर उद्वेग से परे हो जाता है—यहीं अध्यात्म-ज्ञान का निर्णायक संकेत प्रकट होता है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि अध्यात्म-ज्ञान देह-इन्द्रिय-गुणों के खेल को पहचानकर, बुद्धि के सुख-दुःख-मोह से ऊपर उठते हुए आत्मस्वरूप की ओर स्थिर होना है; बाह्य आचरण (जैसे भोजन से पूर्व शुद्धि) भी मन की सजगता और संयम का सहचर है। → अगले अध्यायों में त्रिगुणों के सूक्ष्म भेद, बुद्धि-जीव-परमात्मा के सम्बन्ध और मोक्षमार्ग की अधिक विशद पद्धति का विस्तार होने का संकेत।

Shlokas

Verse 1

7-2 ड-ऑ का - तात्पर्य यह कि भोजनके लिये जाते समय तत्काल हाथ

युधिष्ठिर ने कहा—पितामह! ‘अध्यात्म’ नाम से यहाँ पुरुष के संबंध में जिस अंतःतत्त्व का चिन्तन किया जाता है, वह अध्यात्म क्या है और उसे किस प्रकार समझना चाहिए—यह मुझे बताइए।

Verse 2

युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अध्यात्मके नामसे जिसका विचार किया जाता है, वह अध्यात्मज्ञान क्या है और कैसा है? यह मुझे बताइये ।।

युधिष्ठिर ने कहा—पितामह! शास्त्रों में मनुष्यों के लिए ‘अध्यात्म’ नाम से जिस विषय का विचार किया गया है, वह अध्यात्म-ज्ञान क्या है और उसका स्वरूप कैसा है? कृपा करके मुझे बताइए। हे ब्राह्मण! यह स्थावर-जंगम समस्त जगत् किससे उत्पन्न हुआ है, और प्रलय के समय इसका लय किस प्रकार होता है? आप ही इसका वर्णन करने योग्य हैं।

Verse 3

भीष्म उवाच अध्यात्ममिति मां पार्थ यदेतदनुपृच्छसि । तद्‌ व्याख्यास्यामि ते तात श्रेयस्करतमं सुखम्‌

भीष्म ने कहा—तात! कुन्तीनन्दन! तुम जिस अध्यात्म-ज्ञान के विषय में पूछ रहे हो, उसकी व्याख्या मैं तुम्हारे लिए करता हूँ; वह परम कल्याणकारी और सुखस्वरूप है।

Verse 4

सृष्टिप्रलयसंयुक्तमाचार्य : परिदर्शितम्‌ । यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विन्दति । फललाभश्न तस्य स्यात्‌ सर्वभूतहितं च तत्‌

आचार्यों ने सृष्टि और प्रलय के विवेचन के साथ अध्यात्म-ज्ञान का प्रतिपादन किया है। उसे जानकर मनुष्य इस लोक में प्रसन्नता और सुख पाता है; उसे अभीष्ट फल की प्राप्ति भी होती है। वह अध्यात्म-ज्ञान समस्त प्राणियों के लिए हितकर है।

Verse 5

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्न॒ पठचमम्‌ । महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ,पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि--ये पाँच महाभूत सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ अग्नि—ये पाँच महाभूत हैं। समस्त प्राणियों के लिए यही उत्पत्ति और प्रलय के आधार हैं।

Verse 6

यतः: सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति पुनः पुनः । महाभूतानि भूतेभ्य: सागरस्योर्मयो यथा

जिससे ये उत्पन्न होते हैं, उसी में वे बार-बार लौटकर लीन हो जाते हैं। जैसे समुद्र से उठी लहरें फिर उसी में समा जाती हैं, वैसे ही महाभूत भी प्राणियों सहित अपने मूल में बारंबार विलीन होते हैं।

Verse 7

प्रसार्य च यथाड्रनि कूर्म: संहरते पुन: । तहद्‌ भूतानि भूतात्मा सृष्टानि हरते पुन:

जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाकर फिर समेट लेता है, वैसे ही समस्त भूतों के अन्तरात्मा परमात्मा अपने रचे हुए प्राणियों को प्रकट करके समय आने पर उन्हें अपने भीतर ही पुनः समेट लेते हैं।

Verse 8

महाभूतानि पज्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत्‌ । अकरोत्‌ तेषु वैषम्यं तत्तु जीवो न पश्यति

समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले परमात्मा ने सबके शरीरों में वही पाँच महाभूत स्थापित किए हैं; परन्तु उनमें विषमता रखी है—कहीं किसी तत्त्व का अंश अधिक, कहीं कम। उस सूक्ष्म वैषम्य को साधारण जीव नहीं देख पाता।

Verse 9

शब्द: श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम्‌ । वायो: स्पर्शस्तथा चेष्टा त्वक्‌ चैव त्रितयं स्मृतम्‌

शब्दगुण, श्रोत्रेन्द्रिय तथा शरीर के छिद्र—ये तीन आकाश से उत्पन्न माने गए हैं। स्पर्श, चेष्टा और त्वचा—ये तीन वायु के कार्य कहे गए हैं।

Verse 10

रूप॑ चक्षुस्तथा पाकस्त्रिविधं तेज उच्यते । रस: क्लेदश्न जिह्दा च त्रयो जलगुणा: स्मृता:

रूप, नेत्र और परिपाक (पाचन)—ये तीन तेज के कार्य कहे गए हैं। रस, क्लेद (गीलापन) और जिह्वा—ये तीन जल के गुण माने गए हैं।

Verse 11

घ्रेयं प्राणं शरीरं च एते भूमिगुणास्त्रय: । महाभूतानि पज्चैव षष्ठं च मन उच्यते

गन्ध, प्राण और शरीर—ये तीन भूमि के गुण (कार्य) कहे गए हैं। इस प्रकार इस देह में पाँच महाभूत हैं और छठा मन बताया गया है।

Verse 12

इन्द्रियाणि मनश्लैव विज्ञानान्यस्थ भारत । सप्तमी बुद्धिरित्याहु: क्षेत्रज्ञ: पुनरष्टम:

भीष्म ने कहा—हे भारत! इन्द्रियाँ, मन और ज्ञान के भेद—ये आठ माने गए हैं। उनमें सातवीं बुद्धि कही गई है और आठवाँ क्षेत्रज्ञ—क्षेत्र का ज्ञाता, साक्षी-स्वरूप आत्मा—फिर से कहा गया है।

Verse 13

भरतनन्दन! श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियाँ और मन--ये जीवात्माको विषयोंका ज्ञान करानेवाले हैं। शरीरमें इन छः के अतिरिक्त सातवीं बुद्धि और आठवाँ क्षेत्रज्ञ है ।।

भीष्म ने कहा—हे भरतनन्दन! श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियाँ और मन—ये जीव को विषयों का ज्ञान कराने वाले साधन हैं। शरीर में इन छह के अतिरिक्त सातवीं बुद्धि है और आठवाँ क्षेत्रज्ञ (आत्मा) है। नेत्र दर्शन के लिए है; मन संदेह और विकल्प उठाता है; बुद्धि निश्चय कराती है; और क्षेत्रज्ञ साक्षी की भाँति स्थित रहता है।

Verse 14

ऊर्ध्व पादतलाभ्यां यदर्वाक्चोर्ध्व॑ च पश्यति । एतेन सर्वमेवेदं विद्धयभिव्याप्तमन्तरम्‌

भीष्म ने कहा—पैरों के तलवों से ऊपर तक जो देह-रूप क्षेत्र है, उसे जो साक्षी-चेतना ऊपर-नीचे और सब ओर से देखती है—जान लो कि वही भीतर और बाहर सर्वत्र इस समस्त क्षेत्र में व्याप्त है।

Verse 15

पुरुषैरिन्द्रियाणीह वेदितव्यानि कृत्स्नश: । तमो रजश्न सत्त्वं च तेडपि भावास्तदाश्रिता:

भीष्म ने कहा—इस लोक में मनुष्यों को अपनी इन्द्रियों (और अंतःकरण) को भली-भाँति जानना और उनकी देख-रेख करनी चाहिए; क्योंकि तम, रज और सत्त्व—ये तीनों गुण उन्हीं का आश्रय लेकर प्रवृत्त होते हैं।

Verse 16

एतां बुद्ध्वा नरो बुद्ध्या भूतानामागतिं गतिम्‌ । समवेक्ष्य शनैश्वैव लभते शममुत्तमम्‌

भीष्म ने कहा—मनुष्य अपनी बुद्धि से यह सब और प्राणियों के आने-जाने की गति को जानकर, फिर उस पर धीरे-धीरे सम्यक् विचार करता हुआ, उत्तम शान्ति को प्राप्त होता है।

Verse 17

गुणैनेनीयते बुद्धिर्बुद्धेरेवेन्द्रियाण्पपि । मन:षष्ठानि सर्वाणि तदभावे कुतो गुणा:

गुणों के अनुसार बुद्धि प्रवृत्त होती है; और बुद्धि के ही अनुसार मन को छठा मानकर समस्त इन्द्रियाँ भी चलती हैं। जब वह (नियामक बुद्धि) ही न रहे, तो गुण कहाँ से उत्पन्न हों?

Verse 18

तम आदि गुण बुद्धिको बारंबार विषयोंकी ओर ले जाते हैं; तथा बुद्धिके साथ-साथ मनसहित पाँचों इन्द्रियोंकोी और उनकी समस्त वृत्तियोंको भी ले जाते हैं। उस बुद्धिके अभावमें गुण कैसे रह सकते हैं? ।।

इस प्रकार यह समस्त जगत्—स्थावर और जङ्गम—उसी तत्त्व का ही स्वरूप है। उसी में लीन होता है और उसी से फिर उद्भूत होता है; इसलिए उसे इसी प्रकार निरूपित किया जाता है।

Verse 19

यह चराचर जगत्‌ बुद्धिके उदय होनेपर ही उत्पन्न होता है और उसके लयके साथ ही लीन हो जाता है; इसलिये यह सारा प्रपंच बुद्धिमय ही है; अतएव श्रुतिने सबकी बुद्धिरूपताका ही निर्देश किया है ।।

जिसके द्वारा (बुद्धि) देखती है, उसे नेत्र कहते हैं; और जिसके द्वारा सुनती है, उसे श्रोत्र कहा जाता है। इसी प्रकार जिससे वह सूँघती है, उसे प्राण कहते हैं; और जिह्वा के द्वारा रस को जानती है।

Verse 20

त्वचा स्पर्शयते स्पर्श बुद्धिर्विक्रियतेड्सकृत्‌ । येन प्रार्थयते किज्चित्‌ तदा भवति तनमन:

त्वचा के द्वारा (बुद्धि) स्पर्श को जानती है; और इस प्रकार वह बार-बार विकार को प्राप्त होती है। जिस करण के द्वारा वह किसी वस्तु का अनुभव करना चाहती है, तब मन उसी का रूप धारण कर लेता है।

Verse 21

अधिष्ठानानि बुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा । इन्द्रियाणीति यान्याहुस्तान्यदृश्योडधितिष्ठति

विषयों को पृथक्-पृथक् ग्रहण करने के लिए बुद्धि के जो पाँच अधिष्ठान हैं, उन्हीं को पाँच इन्द्रियाँ कहते हैं। अदृश्य जीवात्मा उन सबका अधिष्ठाता (अन्तर्नियन्ता) है।

Verse 22

पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते । कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदनुशोचति

भीष्म ने कहा—जब बुद्धि देहधारी पुरुष में स्थित रहती है, तब वह अनुभव की तीन अवस्थाओं में विचरती है। कभी वह प्रीति और तृप्ति पाती है, और कभी शोक-विलाप में डूब जाती है।

Verse 23

एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता

भीष्म ने कहा—इस प्रकार मनुष्यों के मन में वह तीन भावों में स्थित रहती है। पर वही भावात्मिका बुद्धि, जब समाधि में प्रविष्ट होती है, तब सुख, दुःख और मोह—इन तीनों को लाँघ जाती है। जैसे सरिताओं का स्वामी समुद्र ऊँची तरंगों से युक्त होकर कभी-कभी अपनी महान तटरेखा को भी पार कर जाता है।

Verse 24

सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते । सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान्‌

भीष्म ने कहा—यह भावात्मिका बुद्धि इन तीन भावों को भी अतिक्रम कर जाती है। जैसे सरिताओं का भर्ता समुद्र, ऊँची तरंगों से युक्त होकर, कभी-कभी अपनी महान तटभूमि को लाँघ जाता है।

Verse 25

अतिभावगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते । प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावमनुवर्तते

भीष्म ने कहा—भावों को लाँघ जाने पर भी, भावों में प्रविष्ट हुई बुद्धि सूक्ष्म रूप से मन में ही स्थित रहती है। फिर समाधि से उठते समय प्रवृत्तिशील रजोगुण उसी बुद्धि-भाव का अनुसरण करने लगता है।

Verse 26

इन्द्रियाणि हि सर्वाणि प्रवर्तयति सा तदा । ततः सत्त्वं तमोभाव: प्रीतियोगात्‌ प्रवर्तते

भीष्म ने कहा—उस समय वह (रज से युक्त) बुद्धि समस्त इन्द्रियों को प्रवृत्ति में लगा देती है। फिर विषय-संपर्क से प्रीति उत्पन्न होती है और सत्त्वगुण प्रकट होता है; उसके बाद आसक्ति आदि दोषों से तमोमय भाव उदित हो जाता है।

Verse 27

प्रीति: सत्त्वं रज: शोकस्तमो मोहस्तु ते त्रय: । ये ये च भावा लोके5स्मिन्‌ सर्वेष्वेतेषु वै त्रिषु

भीष्म ने कहा— प्रीति (हर्ष) सत्त्वगुण की है, शोक रजोगुण का है और मोह तमोगुण का—ये तीन हैं। इस लोक में जो-जो भाव उत्पन्न होते हैं, वे सब इन्हीं तीनों के अंतर्गत आते हैं। इसलिए भावों को परम सत्य न मानकर गुणों की चेष्टा समझो और धर्मानुसार जीने के लिए सत्त्व की निर्मलता का संवर्धन करो।

Verse 28

इति बुद्धिगति: सर्वा व्याख्याता तव भारत | इन्द्रियाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता

भीष्म ने कहा— हे भारत! इस प्रकार तुम्हें बुद्धि की समस्त गति का व्याख्यान कर दिया। अब जो वास्तव में बुद्धिमान है, उसे अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय (संयम) प्राप्त करनी चाहिए।

Verse 29

भारत! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष बुद्धिकी सम्पूर्ण गतिका विशद विवेचन किया है। बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि वह अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखे ।।

हे भारत! इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने बुद्धि की सम्पूर्ण गति का स्पष्ट विवेचन किया है। बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह अपनी समस्त इन्द्रियों को संयम में रखे। क्योंकि प्राणियों में सत्त्व, रज और तम—ये तीनों सदा आश्रित रहते हैं; और इसी के अनुसार समस्त प्राणियों में वेदना/अनुभूति भी त्रिविध दिखाई देती है।

Verse 30

सुखस्पर्श: सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुण: । तमोगुणेन संयुक्ती भवतो5व्यावहारिकौ

भीष्म ने कहा— सुख का स्पर्श कराने वाला सत्त्वगुण है और दुःख का स्पर्श कराने वाला रजोगुण। परन्तु जब ये दोनों तमोगुण (अन्धकार-मोह) से संयुक्त हो जाते हैं, तब वे व्यवहार के लिए उपयुक्त मार्गदर्शक नहीं रहते; क्योंकि तब मन की स्पष्टता और सम्यक् विवेक नष्ट हो जाता है। इसलिए समझो कि गुण ही अनुभव को आकार देते हैं, और विवेक से तम के विकार से बचते हुए कल्याण और कर्तव्य का अनुसरण करो।

Verse 31

तत्र यत्‌ प्रीतिसंयुक्ते काये मनसि वा भवेत्‌ | वर्तते सात्त्विको भाव इत्याचक्षीत तत्‌ तथा,जब शरीर या मनमें किसी प्रकारसे भी प्रसन्नताका भाव हो, तब यह कहना चाहिये कि सात्विक भावका उदय हुआ है

भीष्म ने कहा— जहाँ शरीर में या मन में प्रीति से संयुक्त प्रसन्नता का भाव उत्पन्न हो, वहाँ यह जानना और कहना चाहिए कि सात्त्विक भाव का उदय हुआ है।

Verse 32

अथ यद्‌ दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मन: । प्रवृत्त रज इत्येव तन्न संरभ्य चिन्तयेत्‌

जब मन में दुःख से युक्त और अप्रसन्नता उत्पन्न करने वाला भाव जागे, तब उसे रजोगुण की प्रवृत्ति ही समझे। इसलिए उस दुःख को पाकर मन को व्यर्थ चिन्ता से न मथे, क्योंकि चिन्ता से दुःख ही बढ़ता है।

Verse 33

अथ यन्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत्‌ | अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत्‌

जब मन में मोहयुक्त भाव उत्पन्न हो और इन्द्रियों का विषय स्पष्ट न हो, उस पर तर्क भी न चले और वह किसी प्रकार समझ में न आए, तब निश्चय करना चाहिए कि तमोगुण की वृद्धि हुई है।

Verse 34

प्रहर्ष: प्रीतिरानन्द: सुखं संशान्तचित्तता । कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते साक््चिका गुणा:

जब मन में किसी प्रकार भी अत्यन्त हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्त की शान्ति प्रकट हो, तब इनको सात्त्विक गुण समझना चाहिए।

Verse 35

अतुष्टि: परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा | लिज्रानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभि:

जिस समय किसी कारण से या बिना कारण ही असंतोष, संताप, शोक, लोभ और असहिष्णुता के भाव दिखायी दें, तो उन्हें रजोगुण के चिह्न जानना चाहिए।

Verse 36

अवमानस्तथा मोह: प्रमाद: स्वप्रतन्द्रिता । कथंचिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणा:

इसी प्रकार जब अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्न-निद्रा और आलस्य आदि दोष किसी तरह भी घेर लें, तो उन्हें तमोगुण के ही विविध रूप समझना चाहिए।

Verse 37

दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम्‌ । मन: सुनियतं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च

जिसका दूर तक दौड़ने वाला, अनेक विषयों की ओर जाने वाला, कामना से प्रेरित और संशय से भरा मन भली-भाँति संयमित और वश में हो जाता है, वह मनुष्य इस लोक में भी और मृत्यु के बाद परलोक में भी सुखी होता है।

Verse 38

सत्त्वक्षेत्रज््योरेतदन्तरं पश्य सूक्ष्मयो: । सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान्‌

सत्त्व (बुद्धि-प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)—इन दोनों सूक्ष्म तत्त्वों के बीच का यह अन्तर देखो। इनमें एक अनेक गुणों की सृष्टि करता है, पर वह एकमात्र आत्मा गुणों की सृष्टि नहीं करता।

Verse 39

मशकोदुम्बरौ वापि सम्प्रयुक्तो यथा सदा । अन्योन्यमेतौ ख्यातां च सम्प्रयोगस्तथा तयो:

जैसे मच्छर और गूलर (उदुम्बर) सदा साथ रहते हुए भी एक-दूसरे से भिन्न माने जाते हैं, वैसे ही बुद्धि और आत्मा का भी संयोग है—साथ रहते हैं, फिर भी भिन्न हैं।

Verse 40

पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा । यथा मत्स्यो जलं॑ चैव सम्प्रयुक्तो तथैव तौ

ये दोनों स्वभाव से पृथक् हैं, तो भी सदा परस्पर संयुक्त रहते हैं। जैसे मछली और जल भिन्न होकर भी साथ जुड़े रहते हैं, वैसे ही बुद्धि और आत्मा की स्थिति है।

Verse 41

न गुणा विदुरात्मानं स गुणान्‌ वेत्ति सर्वश: । परिद्रष्टा गुणानां तु संसृष्टान्मन्यते तथा

गुण आत्मा को नहीं जानते; पर आत्मा गुणों को सब प्रकार से जानता है। गुणों का साक्षी होने से वह उनसे सर्वथा भिन्न है, फिर भी वह अपने को उन गुणों से मिला-जुला मान लेता है।

Verse 42

इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थ कुरुते बुद्धिसप्तमै: । निर्विचेष्टेरजानद्धिः परमात्मा प्रदीपवत्‌

भीष्म बोले—परमात्मा स्वयं न चेष्टा करता है, न उपकरणों की भाँति जानने वाला है; तथापि वह मन-बुद्धि सहित सात साधनों द्वारा इन्द्रियों को दीपक के समान प्रकाश का हेतु बना देता है। जैसे घड़े के भीतर रखा दीपक घड़े के छिद्रों से अपना प्रकाश फैलाकर वस्तुओं का ज्ञान कराता है, वैसे ही शरीर के भीतर स्थित परमात्मा, अन्यथा जड़ इन्द्रियों तथा मन-बुद्धि के द्वारा समस्त पदार्थों का अनुभव कराता है।

Verse 43

सृजते हि गुणान्‌ सच्चं क्षेत्रज्ञ: परिपश्यति । सम्प्रयोगस्तयोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुव:,बुद्धि गुणोंकी सृष्टि करती है और आत्मा साक्षी बनकर देखता रहता है। उन बुद्धि और आत्माका यह संयोग अनादि है

भीष्म बोले—बुद्धि (सत्त्व) ही गुणों और उनके व्यापारों की सृष्टि करती है; क्षेत्रज्ञ आत्मा तो केवल निर्मल चेतना से साक्षी होकर देखता रहता है। सत्त्व और क्षेत्रज्ञ—इन दोनों का यह संयोग ध्रुव और अनादि है।

Verse 44

आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्षन | सत्त्वं मनः संसृजते न गुणान्‌ वै कदाचन

भीष्म बोले—बुद्धि (सत्त्व) का परमात्मा के सिवा कोई दूसरा आश्रय नहीं, और क्षेत्रज्ञ का भी कोई अन्य आश्रय नहीं। मन ही सत्त्व की अवस्थाएँ रचता है; पर गुणों के साथ उसका साक्षात् स्पर्श कभी नहीं होता।

Verse 45

रश्मीस्तेषां स मनसा यदा सम्यड्नियच्छति । तदा प्रकाशते<स्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव

भीष्म बोले—जब मन के द्वारा वह इन्द्रियों की लगामों को भली-भाँति वश में कर लेता है, तब उसके भीतर का आत्मा घड़े में जलते दीपक के समान प्रकाशित हो उठता है।

Verse 46

त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनि: । सर्वभूतात्मभूस्तस्मात्‌ स गच्छेदुत्तमां गतिम्‌

भीष्म बोले—जो मुनि प्राकृत (सांसारिक) कर्मों का त्याग करके सदा आत्मा में ही रमण करता है, वह समस्त भूतों का आत्मा-स्वरूप हो जाता है; इसलिए वह उत्तम गति को प्राप्त होता है।

Verse 47

यथा वारिचर: पक्षी सलिलेन न लिप्यते । एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते,जैसे जलचर पक्षी जलसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार विशुद्धबुद्धि ज्ञानी पुरुष निर्लिप्त रहकर ही सम्पूर्ण भूतोंमें विचरता है

जैसे जल में रहने वाला पक्षी जल में विचरते हुए भी उससे लिप्त नहीं होता, वैसे ही कृतप्रज्ञ ज्ञानी पुरुष समस्त प्राणियों के बीच रहकर भी भीतर से निर्लिप्त रहता है।

Verse 48

एवं स्वभावमेवैतत्‌ स्वबुद्धया विहरेन्नर: । अशोचचन्नप्रहृष्यंश्व समो विगतमत्सर:

यह आत्मतत्त्व का स्वभाव ही ऐसा है—ऐसा अपनी बुद्धि से निश्चय करके मनुष्य शोक न करता हुआ, हर्ष न करता हुआ, मत्सर से रहित और सर्वत्र समभाव रखकर विचरे।

Verse 49

स्वभावयुकत्या युक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान्‌ । ऊर्णनाभिर्य था सूत्र विज्ञेयास्तन्तुवद्‌ गुणा:

स्वभाव की युक्ति से युक्त होकर आत्मा नित्य गुणों की सृष्टि करता है। जैसे मकड़ी अपने ही से सूत निकालकर जाला बुनती है, वैसे ही गुणों को तन्तुओं के समान समझना चाहिए।

Verse 50

प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिनोपलभ्यते । प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिध्यति

गुण नष्ट हुए प्रतीत हों तो भी वे सर्वथा निवृत्त नहीं होते; क्योंकि उनकी निवृत्ति प्रत्यक्ष नहीं देखी जाती। जो परोक्ष है, वह अनुमान से सिद्ध होता है।

Verse 51

एवमेके< ध्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे | उभयं सम्प्रधार्यतद्‌ व्यवस्येत यथामति

इसी प्रकार कुछ लोग ‘निवृत्ति’ का निश्चय करते हैं और कुछ दूसरे भिन्न मत रखते हैं। दोनों पक्षों पर भलीभाँति विचार करके अपनी बुद्धि के अनुसार सत्य का निश्चय करना चाहिए।

Verse 52

इतीमं॑ हृदयग्रन्थिं बुद्धिभेदमयं दृढम्‌ । विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशय:

इस प्रकार बुद्धि के द्वारा कल्पित भेद ही हृदय की दृढ़ गाँठ है। उसे खोलकर, संशय-रहित होकर, ज्ञानवान् पुरुष सुख से स्थित रहे; वह कभी शोक नहीं करता।

Verse 53

मलिनाः: प्राप्तुयु: शुद्धि यथा पूर्णा नदीं नरा: । अवगाहा सुविद्धांसो विद्धि ज्ञानमिदं तथा

जैसे मलिन शरीरवाले मनुष्य जल से भरी नदी में स्नान करके शुद्ध हो जाते हैं, वैसे ही इस ज्ञान-नदी में अवगाहन करने से मलिनचित्त मनुष्य भी शुद्ध होकर यथार्थ बोध से सम्पन्न हो जाते हैं—ऐसा जानो।

Verse 54

महानद्या हि पारज्ञस्तप्यते न तदन्यथा । न तु तप्यति तत्त्वज्ञ: फले ज्ञाते तरत्युत

महानदी के पार को जाननेवाला पुरुष केवल जानने मात्र से कृतार्थ नहीं होता; जब तक वह नौका आदि से उस पार न पहुँच जाए, तब तक चिंता से तपता रहता है। पर तत्त्वज्ञ पुरुष ज्ञान मात्र से ही संसार-सागर को पार कर जाता है; उसे संताप नहीं होता, क्योंकि वही ज्ञान पुल के समान है।

Verse 55

एवं ये विदुराध्यात्मं केवल ज्ञानमुत्तमम्‌,जो मनुष्य बुद्धिसे जीवोंके इस आवागमनपर शनै:-शनै: विचार करके उस विशुद्ध एवं उत्तम आध्यात्मिक ज्ञानको प्राप्त कर लेता है, वह परम शान्ति पाता है

जो मनुष्य आत्मतत्त्व के इस विशुद्ध, केवल और उत्तम ज्ञान को यथार्थ रूप से जान लेते हैं, वे परम शान्ति को प्राप्त होते हैं।

Verse 56

एतां बुद्ध्वा नर: सर्वा भूतानामागतिं गतिम्‌ | अवेक्ष्य च शनैर्बुद्धया लभते शमनं तत:

यह जानकर कि समस्त प्राणियों का आना-जाना और उनकी गति कैसी है, जो मनुष्य निर्मल विवेक से धीरे-धीरे उसका निरीक्षण करता है, वह तत्पश्चात् शमन—परम शान्ति—को प्राप्त होता है।

Verse 57

त्रिवर्गो यस्य विदित: प्रेक्ष्य यश्चन विमुडचति । अन्विष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुक:

जिसे धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों का यथार्थ ज्ञान है, जो विचारपूर्वक उनसे मोहित नहीं होता, और जिसने मन से आत्मतत्त्व का अनुसंधान कर योगयुक्त होकर आत्मा से भिन्न वस्तुओं के प्रति उत्सुकता त्याग दी है—वही तत्त्वदर्शी है।

Verse 58

न चात्मा शक्‍्यते द्रष्टमिन्द्रियैश्न विभागश: । तत्र तत्र विसृष्टैश्न दुर्वार्यश्षाकृतात्मभि:

आत्मा इन्द्रियों से न तो प्रत्यक्ष देखा जा सकता है और न उसे भागों में विभक्त करके जाना जा सकता है। जिन्होंने मन को वश में नहीं किया है, वे भिन्न-भिन्न विषयों की ओर दौड़ती दुर्निवार इन्द्रियों के कारण आत्मसाक्षात्कार नहीं कर पाते।

Verse 59

एतद्‌ बुद्ध्वा भवेद्‌ बुद्धः किमन्यद्‌ बुद्धलक्षणम्‌ । विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिण:

इसे जानकर मनुष्य वास्तव में ज्ञानी हो जाता है—ज्ञान का इससे बढ़कर और क्या लक्षण हो सकता है? क्योंकि मनीषी पुरुष उस परम सत्य को जानकर ही अपने को कृतकृत्य मानते हैं।

Verse 60

न भवति विदुषां ततो भयं यदविदुषां सुमहद्‌ भयं भवेत्‌ | न हि गतिरधिकास्ति कस्यचित्‌ सति हि गुणे प्रवदन्त्यतुल्यताम्‌

जो संसार अज्ञानियों के लिए महान भय का कारण बनता है, वही विद्वानों के लिए भय का कारण नहीं होता। किसी की अंतिम गति किसी से ऊँची-नीची नहीं है; गुणों का संबंध रहने पर ही उनके अनुसार असमान गतियाँ कही जाती हैं, पर ज्ञानी के लिए—जिसका गुणों से बंधन छूट गया है—ऐसा भेद नहीं रहता।

Verse 61

य: करोत्यनभिसंधिपूर्वक॑ तच्च निर्णुदति यत्पुराकृतम्‌ । नाप्रियं तदुभयं कुतः प्रियं तस्य तज्जनयतीह सर्वतः

जो निष्काम भाव से—फल की गणना किए बिना—कर्म करता है, उसका वह कर्म पहले किए हुए कर्मों के संस्कारों को नष्ट कर देता है। तब पूर्वजन्म और इस जन्म—दोनों प्रकार के कर्म उसके लिए न अप्रिय फल उत्पन्न करते हैं और न प्रिय; क्योंकि कर्तापन के अहंकार और फलासक्ति से रहित होने पर वे कर्म सर्वत्र बंधनकारी परिणाम देना छोड़ देते हैं।

Verse 62

लोकमातुरमसूयते जन- स्तस्य तज्जनयतीह सर्वत:

भीष्म बोले—जो मनुष्य काम, क्रोध आदि दुर्व्यसनों से सदा आतुर रहता है, उसे लोग निन्दा करते हैं और विवेकी पुरुष धिक्कारते हैं। उसके निन्दनीय कर्म ही यहाँ उस दुःखित जन को सर्वत्र अनेक योनियों में—पशु-पक्षी आदि देहों में भी—जन्म दिलाने का कारण बनते हैं।

Verse 63

लोक आतुरजनान्‌ विराविण- स्तत्तदेव बहु पश्य शोचत: । तत्र पश्य कुशलानशोचतो ये विदुस्तदुभयं पदं सताम्‌

भीष्म बोले—इस लोक में भोगासक्ति के कारण जो लोग आतुर रहते हैं, उन्हें भली-भाँति देखो; वे स्त्री, पुत्र आदि के नाश या वियोग पर अत्यन्त शोक करते हैं और फूट-फूटकर विलाप करते हैं। फिर उन कुशल जनों को भी देखो जो शोक नहीं करते—जो सारासार-विवेक में निपुण हैं और सत्पुरुषों को प्राप्त होने वाले दो प्रकार के पद (सगुण-उपासना और निर्गुण-उपासना के फल) को जानते हैं। दोनों अवस्थाओं पर दृष्टि डालकर, अपने कल्याण के लिए जो पथ हितकर लगे, उसी का आश्रय लो।

Verse 193

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भीष्म-युधिष्टिरसंवादके प्रयंगमें आचारविधिविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में भीष्म-युधिष्ठिर संवाद के प्रसंग में आचार-विधि विषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 194

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अध्यात्मक थने चतुर्नवत्यधिकशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्व के अध्यात्म-स्थान में एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 293

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति भारत । भारत! सत्त्व, रज और तम--ये तीन गुण सदा ही प्राणियोंमें स्थित रहते हैं और इनके कारण उन सब जीवोंमें सात्विकी, राजसी और तामसी--यह तीन प्रकारकी अनुभूति देखी जाती है

भीष्म बोले—हे भारत! अनुभूति तीन प्रकार की होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। हे भरतवंशी! सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण सदा ही प्राणियों में स्थित रहते हैं; और इन्हीं के कारण समस्त जीवों में सात्त्विकी, राजसी और तामसी—ये तीन प्रकार की अनुभूति देखी जाती है।

Verse 2236

न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते । जीवात्माके आश्रित रहकर बुद्धि (सुख

भीष्म कहते हैं—अन्तरात्मा अपने स्वभाव से कभी भी न सुख से बँधती है, न दुःख से। परन्तु जब बुद्धि देहधारी जीवात्मा का आश्रय लेती है, तब वह तीन भावों में प्रकट होती है—सुख, दुःख और मोह। कभी वह प्रसन्नता का आस्वाद लेती है, कभी शोक में डूब जाती है, और कभी मोह से आच्छन्न होकर सुख-दुःख दोनों के अनुभव से रहित हो जाती है।

Frequently Asked Questions

It is characterized as beyond sensory attributes (taste, smell, sound, form, touch) and beyond ordinary predicates (hot/cold, sharp/mild), functioning as the witnessing ground that apprehends the senses rather than being apprehended by them.

The chapter implies a method of withdrawing each sense from its object (rasa, gandha, śabda, sparśa, rūpa) so that cognition can stabilize and disclose one’s ‘svabhāva’ beyond sensory dependence.

Yes: by distinguishing elemental dissolution from ‘parama’ attainment, and by describing the subtle continuity (liṅga) alongside the witness, it frames cosmology as a support for liberation-oriented discrimination rather than as mere physical description.