Adhyaya 192
Shanti ParvaAdhyaya 19220 Verses

Adhyaya 192

जापक–इक्ष्वाकु–सत्यविवादः (The Jāpaka, Ikṣvāku, and the Dispute on Truth and Merit)

Upa-parva: Dharma–Satya–Japa Phala Saṃvāda (Śānti-parva, Adhyāya 192 context unit)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to recount an earlier-mentioned dispute involving Kāla, Mṛtyu, and Yama. Bhīṣma narrates an ancient account: a renowned brāhmaṇa reciter (Paippalādi Kauśika) performs prolonged disciplined japa near the हिमवत् (Himālaya) and receives a boon from Sāvitrī—growth in devotion to recitation and mental concentration, along with assurance of a lofty destination and a foretold encounter with Kāla, Mṛtyu, and Yama. Dharma appears, urges him toward relinquishing the body for higher worlds; the brāhmaṇa declines, preferring embodied practice and doubting heaven without the self/body complex. Kāla, Mṛtyu, and Yama arrive; the brāhmaṇa receives them with ritual hospitality. King Ikṣvāku arrives on pilgrimage and requests a gift; the brāhmaṇa, identifying as nivṛtta (withdrawn from accepting gifts), refuses material exchange but offers “by speech” the fruit of his japa when the king asks for it. A dispute arises when the king hesitates to accept an unknown fruit; the brāhmaṇa argues that truth is superior to ritual and that breaking one’s word is adharma. Dharma and Svarga intervene to settle the matter, declaring an equitable outcome. The episode culminates in an allegorical disclosure: the disputants Virūpa and Vikṛta are Kāma and Krodha, demonstrating how desire and anger test ethical stability. Bhīṣma closes with a doctrinal note on the destinies attained by reciters and the movement from attachment to dispassion toward brahma-sthāna.

Chapter Arc: भरद्वाज ऋषि धर्म के सूक्ष्म फल-निर्णय को जानने की उत्कंठा से प्रश्न उठाते हैं—दान, सदाचार और तप का वास्तविक फल क्या है, और कौन-सा आचरण मनुष्य को शान्ति तथा परलोक-कल्याण देता है? → भृगु (भृगु/भगु) उत्तर देते हुए कर्मों के भिन्न-भिन्न फल गिनाते हैं—अग्निहोत्र से पाप-शमन, स्वाध्याय से उत्तम शान्ति, दान से भोग-सम्पदा, तप से स्वर्ग-प्राप्ति। फिर दान के ‘दो प्रकार’ बताकर (परत्रार्थ/इहैव) यह तनाव रचते हैं कि एक ही कर्म (दान) भी उद्देश्य और भाव के अनुसार भिन्न फल देता है। → गृहस्थाश्रम का निर्णायक महात्म्य-प्रतिपादन: गृहस्थ को ‘द्वितीय आश्रम’ कहकर उसके सम्यक् आचार-लक्षण, अतिथि-सत्कार का तीखा नैतिक विधान (जिसके घर से अतिथि निराश लौटे, वह गृहस्थ अपना पुण्य खोकर पाप दे बैठता है) और त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) की सिद्धि का सूत्र—यहीं अध्याय का शिखर बनता है। → भृगु गृहस्थ-धर्म का संतुलित आदर्श रखते हैं—भोग-साधनों का वर्णन करते हुए भी ‘उञ्छवृत्ति/स्वधर्म-रत/त्यक्तकामसुखारम्भ’ गृहस्थ को स्वर्ग-सुलभ बताते हैं; अर्थात् गृहस्थ जीवन भोग का नहीं, संयमित कर्तव्य का क्षेत्र है, जहाँ दान, अतिथि-पूजा, स्वाध्याय और यज्ञ-भाव से लोक-परलोक दोनों साधे जाते हैं।

Shlokas

Verse 1

अप ह< बक। है २ >> एकनवर्त्याधिकशततमो< ध्याय: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन भरद्वाज उवाच दानस्य कि फल प्राहुर्धर्मस्थ चरितस्य च । तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य वा,भरद्वाजने पूछा--ब्रह्मन! आचरणमें लाये हुए दानरूप धर्मका, भलीभाँति की हुई तपस्याका तथा स्वाध्याय और अग्निहोत्रका क्या फल बताया गया है?

भरद्वाज बोले— हे ब्राह्मण! धर्म में स्थित होकर किए गए दान का फल विद्वान क्या बताते हैं? और भली-भाँति किए गए तप, वेद-स्वाध्याय तथा अग्नि में किए गए हवन का फल क्या कहा गया है?

Verse 2

भूगुरुवाच हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्यायै: शान्तिरुत्तमा दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्तुयात्‌,भगुजीने कहा--मुने! अग्निहोत्रसे पापका निवारण किया जाता है, स्वाध्यायसे उत्तम शान्ति मिलती है, दानसे भोगोंकी प्राप्ति बतायी गयी है और तपस्यासे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है

भृगु बोले— मुनि! अग्निहोत्र-हवन से पाप शांत होता है, स्वाध्याय से उत्तम शांति मिलती है, दान से भोग-समृद्धि की प्राप्ति कही गई है और तप से मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।

Verse 3

दानं तु द्विविध॑ प्राहुः परत्रार्थमिहैव च । सद्धभयो यद्‌ दीयते किंचित्‌ तत्परत्रोपतिष्ठते,दान दो प्रकारका बताया जाता है--एक परलोकके लिये है और दूसरा इहलोकके लिये। सत्पुरुषोंको जो कुछ दिया जाता है, वह दान परलोकमें अपना फल देनेके लिये उपस्थित होता है और असत्पुरुषोंको जो दान दिया जाता है, उसका फल यहीं भोगा जाता है। जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही उसका फल भी भोगनेमें आता है

दान दो प्रकार का कहा गया है— एक परलोक के लिए और दूसरा इसी लोक के लिए। सत्पात्रों को जो कुछ, चाहे थोड़ा ही, दिया जाता है, वह परलोक में फल देने के लिए संचित हो जाता है।

Verse 4

असद्धयो दीयते यत्तु तद्‌ दानमिह भुज्यते । यादृशं दीयते दानं तादृश॑ फलमश्चुते,दान दो प्रकारका बताया जाता है--एक परलोकके लिये है और दूसरा इहलोकके लिये। सत्पुरुषोंको जो कुछ दिया जाता है, वह दान परलोकमें अपना फल देनेके लिये उपस्थित होता है और असत्पुरुषोंको जो दान दिया जाता है, उसका फल यहीं भोगा जाता है। जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही उसका फल भी भोगनेमें आता है

परंतु जो दान असत्पात्रों को दिया जाता है, उसका फल इसी लोक में भोगा जाता है। जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही फल मनुष्य प्राप्त करता है।

Verse 5

भरद्वाज उवाच कि कस्य धर्माचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम्‌ | धर्म: कतिविधो वापि तद्‌ भवान्‌ वक्तुमहति

भरद्वाज बोले— धर्म का आचरण किसके लिए (और किस प्रकार) है? धर्म का लक्षण क्या है? और धर्म कितने प्रकार का है? कृपा करके आप मुझे यह बताने योग्य हैं।

Verse 6

भरद्वाजने पूछा--ब्रह्म! किसका धर्माचरण कैसा होता है अथवा धर्मका लक्षण क्या है? या धर्मके कितने भेद हैं? यह सब आप मुझे बतानेकी कृपा करें ।। भूगुरुवाच स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवन्ति मनीषिण: । तेषां स्वर्गफलावाप्तियोडन्यथा स विमुहाते,भूगुजीने कहा--मुने! जो मनीषी पुरुष अपने वर्णाश्रमोचित धर्मके आचरणमें सावधानीके साथ लगे रहते हैं, उन्हें स्वर्गरूपी फलकी प्राप्ति होती है। जो इसके विपरीत अधर्मका आचरण करता है, वह मोहके वशीभूत होता है

Bharadvāja asked: “O Brahman, what does the practice of dharma look like for a person? What is the defining mark of dharma, and how many kinds of dharma are there? Please explain all this to me.” Bhṛgu replied: “Those wise people who are diligently engaged in the practice of their own prescribed duty (svadharma), in accordance with their station and discipline of life, attain the fruit of heaven. But one who acts otherwise—turning to what is contrary to dharma—falls under delusion.”

Verse 7

भरद्वाज उवाच यदेतच्चातुराश्रम्यं ब्रह्मर्षिविहितं पुरा । तेषां स्वे स्वे समाचारास्तान्‌ मे वक्तुमिहाहसि,भरद्वाज ऋषिने पूछा--भगवन! ब्रह्मर्षियोंने पूर्वकालमें जो चार आश्रमोंका विभाग किया है, उनके अपने-अपने धर्म क्या हैं? उन्हें बतानेकी कृपा कीजिये

Bharadvāja said: “Revered one, in ancient times the Brahmarṣis established the fourfold system of āśramas. Please tell me here the respective codes of conduct and duties proper to each of them.”

Verse 8

भूगुरुवाच पूर्वमेव भगवता ब्रह्मणा लोकहितमनुतिष्ठता धर्मसंरक्षणार्थमाश्रमाश्ष॒त्वारो भिनिर्दिष्ट: | तत्र गुरुकुलवासमेव प्रथममाश्रममुदाहरन्ति । सम्यग्‌ यत्र शौचसंस्कारनियमव्रतविनियतात्मा उभे संध्ये भास्कराग्निदैवतान्युपस्थाय विहाय तन्द्रयालस्ये गुरोरभिवादनवेदा भ्यासश्रवणपवित्रीकृतान्तरात्मा त्रिषवणमुपस्पृश्य ब्रह्मचर्याग्निपरिचरणगुरुशुश्रूषानि-त्यभि क्षा भैक्ष्यादि सर्वनिवेदितान्तरात्मा गुरुवचननि-र्देशानुष्ठानाप्रतिकूलो गुरुप्रसादलब्धस्वाध्यायतत्पर: स्थात्‌,भगुजीने कहा--मुने! जगत्‌का कल्याण करनेवाले भगवान्‌ ब्रह्माने पूर्वकालमें ही धर्मकी रक्षाके लिये चार आश्रमोंका निर्देश किया था। उनमेंसे ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक गुरुकुलवासको ही पहला आश्रम कहते हैं। उसमें रहनेवाले ब्रह्मचारीको बाहर-भीतरकी शुद्धि, वैदिक संस्कार तथा व्रत-नियमोंका पालन करते हुए अपने मनको वशमें रखना चाहिये। सुबह और शाम दोनों संध्याओंके समय संध्योपासना, सूर्योपस्थान और अन्निहोत्रके द्वारा अग्निदेवकी आराधना करनी चाहिये। तन्द्रा और आलस्यको त्यागकर प्रतिदिन गुरुको प्रणाम करे और वेदोंके अभ्यास तथा श्रवणसे अपनी अन्तरात्माको पवित्र करे। सबेरे, शाम और दोपहर तीनों समय स्नान करे। ब्रह्मचर्यका पालन, अग्निकी उपासना और गुरुकी सेवा करे। प्रतिदिन भिक्षा माँगकर लाये। भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, वह सब गुरुको अर्पण कर दे। अपनी अनन्‍्तरात्माको भी गुरुके चरणोंमें निछावर कर दे। गुरुजी जो कुछ कहें जिसके लिये संकेत करें और जिस कार्यके निमित्त स्पष्ट शब्दोंमें आज्ञा दें, उसके विपरीत आचरण न करे। गुरुके कृपाप्रसादसे मिले हुए स्वाध्यायमें तत्पर होवे

Bhṛgu said: Long ago, when the blessed Brahmā was engaged in promoting the welfare of the world, he laid down—so that dharma might be protected—the four āśramas (stages of disciplined life). Among them, they declare the first āśrama to be life in the teacher’s household, i.e., brahmacarya in the gurukula. There, the student should keep the mind under control, observing inner and outer purity, Vedic sacraments, and the prescribed vows and restraints. At both twilights, morning and evening, he should perform the proper acts of reverence—worship at the sandhyā, salutations to the Sun, and service to the sacred fire. Casting off drowsiness and laziness, he should daily bow to the teacher, and by study and hearing of the Veda make his inner self pure. He should perform the thrice-daily ablutions, maintain celibacy, tend the fire, and serve the teacher. He should go out for alms each day, and whatever is obtained should be offered entirely to the guru—indeed, he should surrender his whole inner being at the teacher’s feet. He must not act contrary to the teacher’s words, indications, or explicit commands, and he should devote himself to the self-study granted through the guru’s gracious favor.

Verse 9

भवति चात्र श्लोक:-- गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमवाप्रुयात्‌ । तस्य स्वर्गफलावाप्ति: सिध्यते चास्य मानसमिति,इस विषयमें यह श्लोक है-- जो द्विज गुरुकी आराधना करके वेदाध्ययन करता है, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है और उसका मानसिक संकल्प सिद्ध होता है

Verse 10

गार्स्थ्यं. खलु॒ द्वितीयमाश्रम॑ं वदन्ति । तस्य समुदाचारलक्षणं सर्वमनुव्याख्यास्याम: । समावृत्तानां सदाचाराणां सहधर्मचर्यफलार्थिना गृहाश्रमो विधीयते । धर्मार्थकामावाप्तिद्वात्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितिन कर्मणा धनान्यादाय स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षण. वा ब्रद्धार्षिनिर्मितेन वा अद्रिसारगतेन वा । हव्यकव्यनियमाभ्यासदैवत-प्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत्‌ । तद्धि सर्वाश्रमाणां मूलमुदाहरन्ति । गुरुकुलनिवासिन:ः परिव्राजका ये चान्ये संकल्पितव्रतनियम-धर्मानुष्ठायिनस्तेषामप्यत एव भिक्षाबलिसंविभागा: प्रवर्तन्ते,गार्हस्थ्यको दूसरा आश्रम कहते हैं। अब हम उसमें पालन करने योग्य समस्त उत्तम आचरणोंकी व्याख्या करेंगे। जो सदाचारका पालन करनेवाले ब्रह्मचारी विद्या पढ़कर गुरुकुलसे स्नातक होकर लौटते हैं, उन्हें यदि सहधर्मिणीके साथ रहकर धर्माचरण करने और उसका फल पानेकी इच्छा हो तो उनके लिये गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी विधि है। इस आश्रममें धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी प्राप्ति होती है; इसलिये त्रिवर्गसाधनकी इच्छा रखकर गृहस्थको उत्तम कर्मके द्वारा धन संग्रह करना चाहिये, अर्थात्‌ वह स्वाध्यायसे प्राप्त हुई विशिष्ट योग्यतासे, ब्रह्मर्षियोंद्वारा धर्मशास्त्रोंमें निश्चित किये हुए मार्गसे अथवा पर्वतसे उपलब्ध हुए उसके सारभूत मणि रत्न, दिव्यौषधि एवं स्वर्ण आदिसे धनका संचय करे। अथवा हव्य (यज्ञ), कव्य (श्राद्ध), नियम, वेदाभ्यास तथा देवताओंकी प्रसन्नतासे प्राप्त धनके द्वारा गृहस्थ पुरुष अपनी गृहस्थीका निर्वाह करे; क्योंकि गृहस्थ आश्रमको सब आश्रमोंका मूल कहते हैं। गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारी, वनमें रहकर संकल्पके अनुसार व्रत, नियम तथा धर्मोंका पालन करनेवाले अन्यान्य वानप्रस्थ एवं सब कुछ त्यागकर सर्वत्र विचरनेवाले संन्यासी भी इस गृहस्थाश्रमसे ही भिक्षा, भेंट, उपहार तथा दान आदि पाकर अपने-अपने धर्मके पालनमें प्रवृत्त होते हैं

Bharadvāja said: “They declare householdership to be the second stage of life. I shall explain in full the marks of proper conduct that belong to it. For those disciplined students who, having completed their study and returned (as graduates) with good conduct, desire to live with a lawful partner, practice dharma, and obtain its fruits, entry into the householder’s order is prescribed. Since this āśrama is a gateway to the three aims—dharma, prosperity, and legitimate enjoyment—the householder, seeking the means to these three, should acquire wealth through blameless work: by excellence gained from study and training, by the paths laid down in the dharma-teachings fashioned by the ancient seers, or by resources obtained from the mountains and the earth’s essences. Or he may sustain his household with wealth gained through the proper performance of offerings to gods and ancestors, observances, Vedic recitation, and by the favor of the deities. For they call the householder’s order the root of all the āśramas: students dwelling in the teacher’s house, forest-dwellers devoted to vows and disciplines, and wandering renunciants as well—all are enabled to pursue their own dharma through alms, offerings, and shares that flow from the householders.”

Verse 11

वानप्रस्थानां च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधव: साधुपथ्यौदना: स्वाध्यायप्रसड्धिन-स्तीर्थाभिगमनदेशदर्शनार्थ. पृथिवीं पर्यटन्ति । तेषां प्रत्युत्थानाभिगमनाभिवादनानसूयवाक्‌प्रदानसुखश- क्त्यासनसुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति,वानप्रस्थोंके लिये धनका संग्रह करना निषिद्ध है। ये श्रेष्ठ लोग प्राय: शुद्ध एवं हितकर अन्नमात्रके इच्छुक होकर स्वाध्याय, तीर्थयात्रा एवं देश-दर्शनके निमित्त सारी पृथ्वीपर घूमते-फिरते हैं। ये घरपर पधारें तो उठकर, आगे बढ़कर इनका स्वागत करे। इनके चरणोंमें मस्तक झुकावे, दोषदृष्टि न रखकर उनसे उत्तम वचन बोले। यथाशक्ति सुखद आसन दे, सुखद शय्यापर उन्हें सुलावे और उत्तम भोजन करावे। इस प्रकार उनका पूर्ण सत्कार करे। यही उन श्रेष्ठ पुरुषके प्रति गृहस्थका कर्तव्य है

भारद्वाज ने कहा—जो वनप्रस्थ आश्रम में प्रविष्ट हैं, उनके लिए धन और उपस्करों का संचय प्रायः उचित नहीं माना जाता। वे साधुजन शुद्ध और हितकर अन्नमात्र की इच्छा रखते हुए स्वाध्याय, तीर्थयात्रा और देश-दर्शन के निमित्त समस्त पृथ्वी पर विचरते हैं। ऐसे वनप्रस्थ यदि किसी के घर पधारें तो गृहस्थ उठकर उनका स्वागत करे, आगे बढ़कर उन्हें ग्रहण करे और प्रणाम करे। दोषदृष्टि न रखकर मधुर वचन बोले, यथाशक्ति सुखद आसन और शय्या दे तथा उचित भोजन कराकर पूर्ण सत्कार करे। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों के प्रति यही गृहस्थ का कर्तव्य है।

Verse 12

भवन्ति चात्र श्लोका:-- अतिथ्थिर्यस्य भग्नाशो गृहात्‌ प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति

यहाँ यह श्लोक कहा गया है—जिसके घर से कोई अतिथि आशा भंग होकर लौट जाता है, वह अतिथि उस गृहस्थ को अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चला जाता है।

Verse 13

इस विषयमें ये श्लोक प्रसिद्ध हैं-- जिस गृहस्थके दरवाजेसे कोई अतिथि भिक्षा न पानेके कारण निराश होकर लौट जाता है, वह उस गृहस्थको अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ।। अपि चात्र यज्ञक्रियाभिददेवता: प्रीयन्ते । निवापेन पितरो विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषय: । अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति,इसके सिवा गृहस्थाश्रममें रहकर यज्ञ करनेसे देवता, श्राद्ध-तर्पण करनेसे पितर, वेद- शास्त्रोंके श्रवण, अभ्यास और धारणसे ऋषि तथा संतानोत्पादनसे प्रजापति प्रसन्न होते हैं

भारद्वाज ने कहा—इस विषय में ये श्लोक प्रसिद्ध हैं: जिस गृहस्थ के द्वार से कोई अतिथि भिक्षा न पाकर निराश होकर लौट जाता है, वह अतिथि उस गृहस्थ को अपना पाप देकर उसका पुण्य लेकर चला जाता है। और भी—गृहस्थाश्रम में यज्ञकर्म से देवता, श्राद्ध-तर्पण आदि निवाप से पितर, वेद-शास्त्रों के श्रवण, अभ्यास और धारण से ऋषि तथा संतानोत्पादन से प्रजापति प्रसन्न होते हैं।

Verse 14

श्लोकौ चात्र भवत:-- वात्सल्यात्सर्व भूते भ्यो वाच्या: श्रोत्रसुखा गिर: । परितापोपघातकश्न पारुष्यं चात्र गर्हितम्‌,इस विषयमें ये दो श्लोक प्रसिद्ध हैं-- वाणी ऐसी बोलनी चाहिये, जिसमें सब प्राणियोंके प्रति स्नेह भरा हो तथा जो सुनते समय कानोंको सुखद जान पड़े। दूसरोंको पीड़ा देना, मारना और कटुवचन सुनाना--ये सब निन्दित कार्य हैं

भारद्वाज ने कहा—यहाँ ये दो श्लोक प्रसिद्ध हैं: सब प्राणियों के प्रति स्नेह से युक्त, और सुनने में सुखद वाणी बोलनी चाहिए। दूसरों को कष्ट देना, मारना या चोट पहुँचाना तथा कटुवचन कहना—यहाँ ये सब निन्दित हैं।

Verse 15

अवज्ञानमहंकारो दम्भश्नैव विगर्हित: । अहिंसा सत्यमक्रोध: सर्वाश्रमगतं तप:,किसीका अनादर करना, अहंकार दिखाना और ढोंग करना--इन दुर्गुणोंकी भी विशेष निन्दा की गयी है। किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना और मनमें क्रोध न आने देना--यह सभी आश्रमवालोंके लिये उपयोगी तप है

भारद्वाज ने कहा—अनादर, अहंकार और दम्भ—ये निन्दित दोष हैं। सब प्राणियों के प्रति अहिंसा, सत्य और मन में क्रोध न उठने देने का संयम—यह सभी आश्रमों के लिए हितकारी तप है।

Verse 16

अपि चात्र माल्याभरणवत्त्रा भ्यड्डनित्योप भोग- नृत्यगीतवादित्रश्नुतिसुखनयनाभिरामदर्शनानां प्राप्तिर्भ- क्ष्यभोज्यलेह्पेयचोष्याणाम भ्यवहार्याणां विविधाना-मुपभोग: । स्वविहारसंतोष: कामसुखा-वाप्तिरिति,इसके सिवा इस गृहस्थ-आश्रममें फूलोंकी माला, नाना प्रकारके आभूषण, वस्त्र, अंगराग (तेल-उबटन), नित्य उपभोगकी वस्तु, नृत्य, गीत, वाद्य, श्रवणसुखद शब्द और नयनाभिराम रूपके दर्शनकी भी प्राप्ति होती है। भक्ष्य, भोज्य, लेह, पेय और चोष्यरूप नानाप्रकारके भोजनसम्बन्धी पदार्थ खाने-पीनेको भी मिलते हैं। अपने उद्यानमें घूमने- फिरनेका आनन्द प्राप्त होता है और कामसुखकी भी उपलब्धि होती है

भरद्वाज बोले—इसके अतिरिक्त गृहस्थ-आश्रम में पुष्पमालाएँ, नाना प्रकार के आभूषण, उत्तम वस्त्र और सुगन्धित अंगराग (तेल-उबटन) सहज ही प्राप्त होते हैं; नित्य के उपभोग—नृत्य, गीत और वाद्य—भी मिलते हैं; कानों को प्रिय शब्द और नेत्रों को रमणीय रूपों के दर्शन भी होते हैं। भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्य—ऐसे अनेक प्रकार के खाद्य-पदार्थों का उपभोग भी होता है। अपने ही उद्यानों में विहार का संतोष और कामसुख की उपलब्धि भी होती है।

Verse 17

त्रिवर्गगुणनिर्व त्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे । स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात्‌,जिस पुरुषको गृहस्थाश्रममें सदा धर्म, अर्थ और कामके गुणोंकी सिद्धि होती रहती है, वह इस लोकमें सुखका अनुभव करके अन्तमें शिष्ट पुरुषोंकी गतिको प्राप्त कर लेता है

भरद्वाज बोले—जिस पुरुष के लिए गृहस्थ-आश्रम में सदा धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों पुरुषार्थों के गुण निरन्तर सिद्ध होते रहते हैं, वह इस लोक में सुख का अनुभव करके अन्त में शिष्ट और धर्मनिष्ठ पुरुषों की गति को प्राप्त होता है।

Verse 18

उज्छवृत्तिर्गुहस्थो यः स्वधर्माचरणे रत: । त्यक्तकामसुखारम्भ: स्वर्गस्तस्य न दुर्लभ:,जो गृहस्थ ब्राह्मण अपने धर्मके आचरणमें तत्पर हो उज्छवृत्तिसे (खेत या बाजारमें बिखरे हुए अनाजके एक-एक दानेको बीनकर) जीविका चलाता है तथा काम-सुखका परित्याग कर देता है, उसके लिये स्वर्ग कोई दुर्लभ वस्तु नहीं है

भरद्वाज बोले—जो गृहस्थ ब्राह्मण उञ्छवृत्ति से (बिखरे हुए दानों को बीनकर) जीवन-निर्वाह करता है, अपने स्वधर्म के आचरण में तत्पर रहता है और कामसुख-प्रेरित आरम्भों का त्याग कर देता है—उसके लिए स्वर्ग दुर्लभ नहीं है।

Verse 190

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भगु- भरद्वाजसंवादाविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में भृगु-भरद्वाज संवाद-विषयक एक सौ बानवेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 191

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भुगुभरद्वाजसंवादे एकनवत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भगु- भरद्वाजसंवादाविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में भृगु-भरद्वाज संवाद में एक सौ इक्यानवेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

Whether a spoken commitment to “give” (even if improvidently made) must be honored when the requested object is intangible (the fruit of japa), and whether refusing to accept or retracting the exchange constitutes a breach of satya and social trust.

Satya is framed as foundational: it authorizes and stabilizes ritual, austerity, and gifts; without truthfulness, other practices are depicted as ethically insufficient for higher ends.

Yes in functional terms: Bhīṣma outlines the post-mortem trajectories of the saṃhitā-reciter—movement through luminous realms and, with dispassion, attainment of brahma-sthāna—positioning the chapter as a mokṣa-oriented commentary on disciplined recitation and truth.