ध्यानयोगवर्णनम्
Description of the Path of Meditation
शृणोति कथितं जीव: कर्णाभ्यां न शृणोति तत् । महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थक:
महर्षे! जीव पहले दोनों कानों से कही हुई बात सुनता है; पर मन व्यग्र हो तो सुनकर भी नहीं सुनता। इसलिए मन से भिन्न किसी जीव-तत्त्व की सत्ता मानना व्यर्थ है।
भरद्वाज उवाच