जनक-राज्ञः मौण्ड्य-परिव्रज्या-विवादः
Janaka’s Renunciation Questioned; Discourse on Dāna and Detachment
सतां वै ददतोऊन्न॑ च लोकेडस्मिन् प्रकृतिर्धुुवा न चेद् राजा भवेद् दाता कुत:ः स्युर्मोक्षकांक्षिण:
इस लोक में सत्पुरुषों की जीविका का निश्चित आधार दाताओं का अन्न ही है। यदि राजा दाता न हो, तो मोक्ष की आकांक्षा रखने वाले साधु-संन्यासी कैसे जीवित रहेंगे?
अजुन उवाच