
अध्याय १७८ — प्राणवायुगतिः तथा शारीराग्निव्यवस्था (Adhyāya 178 — The courses of prāṇa-vāyu and the regulation of the bodily fire)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Mokṣadharma-parvan) — Yogic physiology: Prāṇa and the internal fire (Agni)
Bharadvāja inquires how the ‘bodily fire’ (śārīra-agni) arises when supported by the earthly element, and how wind (anila/vāyu) operates through differentiated spaces. Bhṛgu responds with a technical exposition of vāyu’s functions in embodied beings: agni is said to be stationed at/near the head in a protective sense while prāṇa operates in relation to head and fire; the ‘person’ is described as the enduring principle associated with mind, intellect, ego, elements, and sense-objects. The chapter then enumerates the principal vāyus: prāṇa sustaining, samāna coordinating from behind and within the digestive region, apāna moving in the lower tract carrying urine and feces, udāna acting in effort, action, and strength, and vyāna pervading the joints and body. Samāna is linked to the spreading of agni through the dhātus, processing rasa and doṣa-like factors; agni is located between prāṇa and apāna and ‘cooks’ food properly. The text describes a continuous channeling system (srotas) from mouth to anus, the generation of heat (ūṣmā) as agni from the convergence of prāṇas, and the upward impulse of fire via prāṇa’s rebound at the lower end. It locates pakvāśaya and āmāśaya relative to the navel, gathers prāṇas at the navel-center, and describes nāḍīs carrying nutritive essence from the heart in all directions under prāṇic impetus. The closing frames this as a yogic pathway: disciplined practitioners place awareness at the crown, with agni steadily contained like fire in a vessel.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पूछते हैं—मनुष्य धन और भोग की दौड़ में क्यों जलता है, और किस प्रकार तृष्णा का त्याग करके परम सुख पाया जा सकता है? → भीष्म बताते हैं कि सुख का मूल बाह्य संग्रह नहीं, बल्कि भीतर की अवस्था है—सबमें समता, अनायास (अकृत्रिम सरलता), सत्यवचन, निर्वेद (वैराग्य) और अविधित्सा (अनावश्यक चेष्टा/लालसा का अभाव) जिनमें हो, वही सुखी है। फिर वे दिखाते हैं कि ‘विधित्सा’ (धन-प्राप्ति की निरंतर प्रवृत्ति) का कोई अंत नहीं; शरीर और जीवन के प्रति आसक्ति से तृष्णा मंद व्यक्ति में और बढ़ती जाती है। → मड्कि का निर्णायक बोध: वह काम से सीधे संवाद करता है—‘काम! मैं तेरी जड़ जानता हूँ; तू संकल्प से जन्मता है; मैं तुझे संकल्पित ही नहीं करूँगा, तो तू समूल नष्ट हो जाएगा।’ इसी के साथ वह देह-आश्रित भूतसमूह को भी ‘यथाकाम’ जाने देता है—अहंकार-आसक्ति ढीली पड़ती है और तृष्णा की गाँठ टूटती है। → मड्कि घोषित करता है कि काम और लोभ का त्याग करके वह वर्तमान में सुख को प्राप्त हुआ है; अब लोभवश होकर दुःख में नहीं गिरेगा। भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि काममूल छिन्न होने से महान सुख और ‘अमृतत्व’ (मुक्ति-स्वरूप स्थैर्य) का स्वाद मिलता है।
Verse 1
है ० बक। ] अतडि्ऑशाड< सप्तसप्तत्याधेकशततमोब< ध्याय: मड्किगीता--धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति युधिछिर उवाच ईहमान: समारम्भान् यदि नासादयेद् धनम् | धनतृष्णाभिभूतश्न कि कुर्वन् सुखमाप्नुयात्,युधिष्ठिरने पूछा--दादाजी! यदि कोई मनुष्य धनकी तृष्णासे ग्रस्त होकर तरह-तरहके उद्योग करनेपर भी धन न पा सके तो वह क्या करे, जिससे उसे सुखकी प्राप्ति हो सके?
युधिष्ठिर ने कहा—हे पूज्य पितामह! यदि कोई मनुष्य धन की तृष्णा से अभिभूत होकर अनेक उद्योग-प्रयत्न करे, पर धन न पा सके, तो वह क्या करे कि उसे सुख प्राप्त हो?
Verse 2
भीष्म उवाच सर्वसाम्यमनायासं सत्यवाक्यं च भारत । निर्वेदश्चाविधित्सा च यस्य स्यात् स सुखी नर:,भीष्मजीने कहा--भारत! सबमें समताका भाव, व्यर्थ परिश्रमका अभाव, सत्यभाषण, संसारसे वैराग्य और कर्मासक्तिका अभाव--ये पाँचों जिस मनुष्यमें होते हैं, वह सुखी होता है
भीष्म ने कहा—हे भारत! जिसके भीतर सबके प्रति समभाव, व्यर्थ परिश्रम का अभाव, सत्यवचन, संसार से निर्वेद (वैराग्य) और कर्मों में आसक्ति-जन्य लालसा का अभाव हो—वही मनुष्य सुखी है।
Verse 3
एतान्येव पदान्याहु: पड्च वृद्धा: प्रशान्तये । एष स्वर्गश्न धर्मश्व सुखं चानुत्तमं मतम्,ज्ञानवृद्ध पुरुष इन्हीं पाँच वस्तुओंको शान्तिका कारण बताते हैं। यही स्वर्ग है, यही धर्म है और यही परम उत्तम सुख माना गया है
भीष्म ने कहा—शान्ति के लिए ज्ञानी वृद्ध इन्हीं पाँच पदों (उपायों) को बताते हैं। यही स्वर्ग है, यही धर्म है, और यही परम उत्तम सुख माना गया है।
Verse 4
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । निर्वेदान्मड़किना गीतं तन्निबोध युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। मड़॒कि नामक मुनिने भोगोंसे विरक्त होकर जो उद्गार प्रकट किया था, वही इस इतिहासमें वर्णित है। उसे बताता हूँ, सुनो
भीष्म ने कहा—इस विषय में वे एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण भी देते हैं। युधिष्ठिर! निर्वेद से मड़कि मुनि द्वारा गाया गया वह वचन सुनो; वही मैं तुम्हें बताता हूँ।
Verse 5
ईहमानो धनं मड्किर्भग्नेहश्व॒ पुन: पुन: । केनचिद् धनशेषेण क्रीतवान् दम्यगोयुगम्,मड्कि धनके लिये अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते थे; परंतु हर बार उनका प्रयत्न व्यर्थ हो जाता था। अन्तमें जब बहुत थोड़ा धन शेष रह गया तो उसे देकर उन्होंने दो नये बछड़े खरीदे
भीष्म बोले—मङ्कि धन पाने के लिए अनेक प्रकार से बार-बार प्रयत्न करता रहा, परन्तु हर बार उसका उद्योग निष्फल हो जाता। अन्त में जब बहुत थोड़ा धन शेष रह गया, उसी से उसने दो नये बछड़ों की एक जोड़ी खरीद ली।
Verse 6
सुसम्बद्धौ तु तौ दम्यौ दमनायाभिनि:सृतौ । आसीनमुष्टं मध्येन सहसैवाभ्यधावताम्,एक दिन उन दोनों बछड़ोंको परस्पर जोड़कर वे हल चलानेकी शिक्षा देनेके लिये ले जा रहे थे। जब वे दोनों बछड़े गाँवसे बाहर निकले तो बैठे हुए एक ऊँटको बीचमें करके सहसा दौड़ पड़े
भीष्म बोले—वे दोनों अजित बछड़े प्रशिक्षण के लिए दृढ़ता से जोते जाकर बाहर निकाले गए थे। गाँव से बाहर निकलते ही, बीच में बैठे हुए एक ऊँट को पाकर, वे सहसा उछलकर दौड़ पड़े।
Verse 7
तयो: सम्प्राप्तयोरुष्ट: स्कन्धदेशममर्षण: । उत्थायोत्क्षिप्प तौ दम्यौ प्रससार महाजव:,जब वे उसकी गर्दनके पास पहुँचे तो ऊँटके लिये यह असहा हो उठा। वह रोषमें भरकर खड़ा हो गया और उन दोनों बछड़ोंको ऊपर लटकाये बड़े जोरसे भागने लगा
भीष्म बोले—जब वे दोनों उसकी गर्दन-स्कन्ध के पास पहुँचे, तो ऊँट को यह असह्य लगा। वह क्रोध से उठ खड़ा हुआ, उन दोनों बछड़ों को उछालकर ऊपर उठा लिया और फिर बड़े वेग से भाग चला।
Verse 8
ह्ियमाणोौ तु तौ दम्यौ तेनोष्टेण प्रमाथिना । ग्रियमाणौ च सम्प्रेक्ष्य मड्किस्तत्राब्रवीदिदम्,बलपूर्वक अपहरण करनेवाले उस ऊँटके द्वारा उन दोनों बछड़ोंको अपहृत होते और मरते देख मड़किने इस प्रकार कहा--
भीष्म बोले—उस उग्र ऊँट द्वारा बलपूर्वक ले जाए जाते हुए उन दोनों बछड़ों को, और उन्हें घसीटे जाकर नष्ट होते देख, मङ्कि ने वहीं यह वचन कहा।
Verse 9
न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम् । युक्तेन श्रद्धया सम्यगीहां समनुतिष्ठता,“मनुष्य कैसा ही चतुर क्यों न हो, जो उसके भाग्यमें नहीं है, उस धनको वह श्रद्धापूर्वक भलीभाँति प्रयत्न करके भी नहीं पा सकता
भीष्म बोले—मनुष्य कितना ही दक्ष क्यों न हो, जो धन उसके भाग्य में नहीं है, उसे वह श्रद्धा और संयम से युक्त होकर भी, सम्यक् प्रयत्न करता हुआ भी, प्राप्त नहीं कर सकता।
Verse 10
कृतस्य पूर्व चानर्थरयुक्तस्याप्यनुतिष्ठत: । इमं पश्यत संगत्या मम दैवमुपप्लवम्,'पहले मैंने जो प्रयत्न किया था उसमें अनेक प्रकारके अनर्थ खड़े हो गये थे। उन अनर्थोंसे युक्त होनेपर भी मैं धनोपार्जनकी ही चेष्टामें लगा रहा; परंतु देखो, आज इन बछड़ोंकी सड़तिसे मुझपर कैसा दैवी उपद्रव आ गया?
पहले जब मैंने प्रयत्न किया, तो अनेक प्रकार के अनर्थ उठ खड़े हुए। उन अनर्थों से घिरा हुआ भी मैं धन-संग्रह के उद्योग में लगा रहा; पर देखो—इस आसक्ति के कारण मुझ पर कैसा दैवी उपद्रव आ पड़ा है।
Verse 11
उद्यम्योद्यम्य मे दम्यौ विषमेणैव गच्छत: । उत्क्षिप्प काकतालीयमुत्पथेनैव धावत:,'यह ऊँट मेरे बछड़ोंको उछाल-उछालकर विषम मार्गसे ही जा रहा है। काकतालीयन्यायसे- (अर्थात् दैवसंयोगसे) इन्हें गर्दनपर उठाकर बुरे मार्गसे ही दौड़ रहा है। इस ऊँटके गलेमें मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियोंके समान लटक रहे हैं। यह केवल दैवकी ही लीला है। हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थसे क्या होता है?
यह ऊँट मेरे दोनों बछड़ों को बार-बार उछालता हुआ विषम मार्ग से ही चला जा रहा है। काक-तालीय न्याय के समान दैव-संयोग से इन्हें गर्दन पर उठा कर कुपथ से दौड़ रहा है। ऊँट के कंठ में मेरे प्रिय बछड़े दो मणियों की भाँति लटक रहे हैं। यह तो दैव की ही लीला है; हठपूर्वक किए हुए पुरुषार्थ से क्या होता है?
Verse 12
मणी वोष्टस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरो मम । शुद्ध हि दैवमेवेदं हठेनैवास्ति पौरुषम्,'यह ऊँट मेरे बछड़ोंको उछाल-उछालकर विषम मार्गसे ही जा रहा है। काकतालीयन्यायसे- (अर्थात् दैवसंयोगसे) इन्हें गर्दनपर उठाकर बुरे मार्गसे ही दौड़ रहा है। इस ऊँटके गलेमें मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियोंके समान लटक रहे हैं। यह केवल दैवकी ही लीला है। हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थसे क्या होता है?
मेरे दोनों प्रिय बछड़े इस ऊँट के गले में दो मणियों की भाँति लटक रहे हैं। यह तो निश्चय ही दैव का ही विधान है; हठ मात्र से किया हुआ पुरुषार्थ क्या कर सकता है?
Verse 13
यदि वाप्युपपद्येत पौरुषं नाम करहिचित् | अन्विष्यमाणं तदपि दैवमेवावतिष्ठते,“यदि कभी कोई पुरुषार्थ सफल होता दिखायी देता है तो वहाँ भी खोज करनेपर दैवका ही सहयोग सिद्ध होता है
यदि कभी पुरुषार्थ सफल होता हुआ भी दिखे, तो खोज करने पर वहाँ भी निर्णायक आधार के रूप में दैव ही स्थित पाया जाता है।
Verse 14
तस्मान्निवेंद एवेह गन्तव्य: सुखमिच्छता । सुखं स्वपिति निर्विण्णो निराशश्वार्थसाधने,“अत: सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको धन आदिकी ओरसे वैराग्यका ही आश्रय लेना चाहिये। धनोपार्जनकी चेष्टासे निराश होकर जो विरक्त हो जाता है, वह सुखकी नींद सोता है
इसलिए जो इसी जीवन में सुख चाहता है, उसे वैराग्य का ही आश्रय लेना चाहिए। क्योंकि जो पुरुष अर्थ-साधन में निराश होकर विरक्त हो जाता है, वह निश्चिंत होकर सुख से सोता है—लाभ-प्राप्ति की चिंता और आशा से मुक्त।
Verse 15
अहो सम्यक् शुकेनोक्तं सर्वतः परिमुच्यता । प्रतिष्ठता महारण्यं जनकस्य निवेशनात्,“अहा! शुकदेव मुनिने जनकके राजमहलसे विशाल वनकी ओर जाते समय सब ओरसे बन्धनमुक्त हो क्या ही अच्छा कहा था?
भीष्म बोले—अहो! शुकदेव ने कितना यथार्थ कहा—‘सब ओर से बन्धनमुक्त हो जाओ।’ जनक के राजनिवास से महावन की ओर प्रस्थान करते हुए उसने वैराग्य का वही मार्ग बताया, जो केवल स्थान-परिवर्तन नहीं, सर्वतोमुखी आसक्ति-क्षय है।
Verse 16
यः कामानाप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् । प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते,जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओंको पा लेता है; तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है--इन दोनोंके कार्योंमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करनेकी अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है
भीष्म बोले—जो मनुष्य समस्त कामनाएँ प्राप्त कर ले, और जो उन्हें केवल त्याग दे—इन दोनों मार्गों में सब कामनाओं की प्राप्ति से उनका परित्याग ही श्रेष्ठ है। शान्तिपर्व के धर्मोपदेश में तृष्णा-विजय को भोग-प्राप्ति से ऊँची विजय कहा गया है।
Verse 17
नान्तं सर्वविधित्सानां गतपूर्वोडस्ति कश्नन । शरीरे जीविते चैव तृष्णा मन्दस्य वर्धते,“कोई भी पहले कभी धन आदिके लिये होनेवाली सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंका अन्त नहीं पा सका है। शरीर और जीवनके प्रति मूर्ख मनुष्यकी ही तृष्णा बढ़ती है
भीष्म बोले—धनादि की प्राप्ति के लिए होने वाली असंख्य प्रवृत्तियों का अन्त कोई पहले कभी नहीं पा सका। पर शरीर और जीवन के प्रति मूढ़ मनुष्य की तृष्णा ही बढ़ती जाती है; उसे तृप्ति नहीं मिलती, इसलिए वह फैलती रहती है।
Verse 18
निवर्तस्व विधित्साभ्य: शाम्य निर्विद्य कामुक | असकृच्चासि निकृतो न च निर्विद्यसे ततः,“ओ कामनाओंके दास मन! तू सब प्रकारकी चेष्टाओंसे निवृत्त हो जा और वैराग्यपूर्वक शान्ति धारण कर। तू धनकी चेष्टा करके बारंबार ठगा गया है तो भी उसकी ओरसे वैराग्य नहीं होता है
भीष्म बोले—हे कामुक मन! सब प्रकार की चेष्टाओं से लौट आ; वैराग्य धारण कर शान्त हो जा। तू धन और भोग की दौड़ में बार-बार ठगा गया, फिर भी उससे विरक्ति नहीं होती।
Verse 19
यदि नाहं विनाश्यस्ते यद्येवं रमसे मया । मा मां योजय लोभेन वृथा त्वं वित्तकामुक,“ओ धनकी कामनावाले मन! यदि तुझे मेरा विनाश नहीं करना है, यदि तू इसी प्रकार मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहना चाहता है तो मुझे व्यर्थ लोभमें न फँसा
भीष्म बोले—हे धनकामुक मन! यदि तू मेरा विनाश नहीं चाहता, यदि तू इसी प्रकार मेरे साथ संतोषपूर्वक रहना चाहता है, तो मुझे व्यर्थ लोभ के जुए में मत जोत।
Verse 20
संचितं संचितं द्रव्यं नष्टं तव पुनः पुनः । कदाचिन्मोक्ष्यसे मूढ धनेहां धनकामुक,'तूने बार-बार द्रव्यका संचय किया और वह बारंबार नष्ट होता चला गया। धनकी इच्छा रखनेवाले मूढ! क्या कभी तू धनकी इस तृष्णा और चेष्टाका त्याग भी करेगा?
तूने बार-बार धन का संचय किया, और वह बार-बार नष्ट होता चला गया। हे धन-लोलुप मूढ़! क्या तू कभी इस धन-तृष्णा और धन के लिए होने वाली व्याकुल चेष्टा को छोड़ भी सकेगा?
Verse 21
अहो नु मम बालिश्यं यो5हं क्रीडनकस्तव । कि नैवं जातु पुरुष: परेषां प्रेष्यतामियात्,“अहो! यह मेरी कैसी नादानी है? जो मैं तेरे हाथका खिलौना बना हुआ हूँ। यदि ऐसी बात न होती तो क्या कोई समझदार पुरुष कभी दूसरोंकी दासता स्वीकार कर सकता है?
अहो! यह मेरी कैसी नादानी है कि मैं तेरे हाथ का खिलौना बन गया हूँ। यदि ऐसा न होता, तो कोई समझदार पुरुष कभी दूसरों की दासता कैसे स्वीकार करता?
Verse 22
न पूर्वे नापरे जातु कामानामन्तमाप्नुवन् । त्यक्त्वा सर्वसमारम्भान् प्रतिबुद्धो5स्मि जागूमि,'पूर्वकालके तथा पीछेके मनुष्य भी कभी कामनाओंका अन्त नहीं पा सके हैं, अतः मैं समस्त कर्मोका आयोजन त्यागकर सावधान हो गया हूँ और मैं पूर्णतः जग गया हूँ
न तो पूर्वकाल के लोग और न ही बाद के लोग कभी कामनाओं का अन्त पा सके। इसलिए मैं समस्त कर्म-आरम्भों को त्यागकर सावधान हो गया हूँ; मैं पूर्णतः जाग उठा हूँ।
Verse 23
नूनं ते हृदयं काम वज़सारमयं दृढम् | यदनर्थशताविष्टं शतधा न विदीर्यते,“काम! निश्चय ही तेरा हृदय फौलादका बना हुआ है: अतएव अत्यन्त सुदृढ़ है। यही कारण है कि सैकड़ों अनर्थोसे व्याप्त होनेपर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते
हे काम! निश्चय ही तेरा हृदय वज्र-सार से बना हुआ, अत्यन्त दृढ़ है; क्योंकि सैकड़ों अनर्थों से घिर जाने पर भी वह सौ टुकड़ों में नहीं फटता।
Verse 24
जानामि काम त्वां चैव यच्च किंचित् प्रियं तव । तवाहं प्रियमन्विच्छन्नात्मन्युपलभे सुखम्,“काम! मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ और जो कुछ तुझे प्रिय लगता है, उससे भी परिचित हूँ। चिरकालसे तेरा प्रिय करनेकी चेष्टा करता चला आ रहा हूँ; परंतु कभी मेरे मनमें सुखका अनुभव नहीं हुआ
हे काम! मैं तुझे भी भलीभाँति जानता हूँ और जो कुछ तुझे प्रिय है, उसे भी। चिरकाल से मैं तेरे प्रिय का अन्वेषण करता रहा, पर अपने भीतर सुख का अनुभव नहीं कर सका।
Verse 25
काम जानामि ते मूलं संकल्पात् किल जायसे । न त्वां संकल्पयिष्यामि समूलो न भविष्यसि,“काम! मैं तेरी जड़को जानता हूँ। निश्चय ही तू संकल्पसे उत्पन्न होता है। अब मैं तेरा संकल्प ही नहीं करूँगा, जिससे तू समूल नष्ट हो जायगा
भीष्म बोले— हे काम! मैं तेरी जड़ जानता हूँ; तू निश्चय ही संकल्प से उत्पन्न होता है। अब मैं तेरा संकल्प ही नहीं करूँगा; तब तू जड़ समेत नष्ट हो जाएगा।
Verse 26
ईहा धनस्य न सुखा लब्ध्वा चिन्ता च भूयसी । लब्धनाशे यथा मृत्युर्लब्धं भवति वा न वा,“धनकी इच्छा अथवा चेष्टा सुखदायिनी नहीं है। यदि धन मिल भी जाय तो उसकी रक्षा आदिके लिये बड़ी भारी चिन्ता बढ़ जाती है और यदि एक बार मिलकर वह नष्ट हो जाय, तब तो मृत्युके समान ही भयंकर कष्ट होता है और उद्योग करनेपर भी धन मिलेगा या नहीं, यह निश्चय नहीं होता
भीष्म बोले— धन की चाह या उसके लिए किया गया उद्योग सुखद नहीं है। धन मिल भी जाए तो उसकी रक्षा-व्यवस्था की चिंता और बढ़ जाती है। और यदि प्राप्त धन नष्ट हो जाए तो मृत्यु के समान भयंकर पीड़ा होती है। फिर भी परिश्रम करने पर भी धन मिलेगा या नहीं—यह निश्चित नहीं।
Verse 27
परित्यागे न लभते ततो दुःखतरं नु किम् । न च तुष्यति लब्धेन भूय एव च मार्गति,“शरीरको निछावर कर देनेपर भी मनुष्य जब धन नहीं पाता है तो उसके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? यदि धनकी उपलब्धि हो भी जाय तो उतनेसे ही वह संतुष्ट नहीं होता है अपितु अधिक धनकी तलाश करने लग जाता है
भीष्म बोले— जब मनुष्य त्याग-बलिदान करके भी धन नहीं पाता, तब उससे बढ़कर दुःख और क्या? और यदि धन मिल भी जाए तो वह उससे तृप्त नहीं होता; फिर भी अधिक की खोज करता रहता है।
Verse 28
अनुतर्षुल एकार्थ: स्वादु गाड़मिवोदकम् | मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धो5स्मि संत्यज,“काम! स्वादिष्ट गड़्ाजलके समान यह धन तृष्णाकी ही वृद्धि करनेवाला है। मैं अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह तृष्णाकी वृद्धि मेरे विनाशका कारण है; अतः तू मेरा पिण्ड छोड़ दे
भीष्म बोले— हे काम! स्वादिष्ट गहरे जल के समान यह धन केवल तृष्णा ही बढ़ाता है। मैं जाग्रत होकर जान गया हूँ कि तृष्णा की यह वृद्धि मेरे विनाश का कारण है; अतः मुझे छोड़ दे, मेरे पिण्ड को मुक्त कर।
Verse 29
य इमं मामकं देहं भूतग्राम: समाश्रितः । स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम्,“मेरे इस शरीरका आश्रय लेकर जो पाँचों भूतोंका समुदाय स्थित है, वह इसमेंसे अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक चला जाय या इसमें रहे, इसकी मुझे परवा नहीं है
भीष्म बोले— मेरे इस शरीर का आश्रय लेकर जो भूतसमूह स्थित है, वह चाहे तो अपनी इच्छा से यहाँ से चला जाए, या चाहे तो यहीं सुखपूर्वक रहे—मुझे उससे कोई आसक्ति नहीं।
Verse 30
न युष्मास्विह मे प्रीति: कामलो भानुसारिषु । तस्मादुत्सृज्य कामान् वै सत्त्वमेवाश्रयाम्यहम्,“पंचभूतगण! अहंकार आदिके साथ तुम सब लोग काम और लोभके पीछे लगे रहनेवाले हो। अतः तुमपर यहाँ मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं है। इसलिये मैं समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल अब सत्त्वगुणका आश्रय ले रहा हूँ
भीष्म ने कहा—हे पंचभूतगण! तुम सब काम और लोभ के पीछे दौड़ने वाले हो; इसलिए यहाँ तुम पर मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं। अतः मैं समस्त कामनाओं को त्यागकर अब केवल सत्त्वगुण का ही आश्रय लेता हूँ।
Verse 31
सर्वभूतान्यहं देहे पश्यन् मनसि चात्मन: । योगे बुद्धि श्रुते सत्त्वं मनो ब्रह्मणि धारयन्,“मैं अपने शरीरमें मनके अंदर सम्पूर्ण भूतोंको देखता हुआ बुद्धिको योगमें, एकाग्रचितको श्रवण-मनन आदि साधनोंमें और मनको परब्रह्म परमात्मामें लगाकर रोग- शोकसे रहित एवं सुखी हो सम्पूर्ण लोकोंमें अनासक्त भावसे विचरूँगा, जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखोंमें न डाल सकेगा
भीष्म ने कहा—मैं अपने शरीर में और मन में, आत्मस्वरूप से समस्त प्राणियों को देखता हुआ, बुद्धि को योग में स्थिर करूँगा; श्रवण-मनन आदि वेदविद्या के साधनों में सत्त्व (अन्तःकरण की शुद्धि और दृढ़ निश्चय) को स्थापित करूँगा; और मन को ब्रह्म में धारण करूँगा। इस प्रकार रोग और शोक से रहित, सुख में स्थित होकर, मैं समस्त लोकों में अनासक्त भाव से विचरूँगा—ताकि तुम मुझे फिर इस प्रकार दुःखों में न डाल सको।
Verse 32
विहरिष्याम्यनासक्त: सुखी लोकान् निरामय: । यया मां त्वं पुनर्नैंवं दुःखेषु प्रणिधास्यसि,“मैं अपने शरीरमें मनके अंदर सम्पूर्ण भूतोंको देखता हुआ बुद्धिको योगमें, एकाग्रचितको श्रवण-मनन आदि साधनोंमें और मनको परब्रह्म परमात्मामें लगाकर रोग- शोकसे रहित एवं सुखी हो सम्पूर्ण लोकोंमें अनासक्त भावसे विचरूँगा, जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखोंमें न डाल सकेगा
भीष्म ने कहा—मैं अनासक्त होकर, सुखी और निरामय, समस्त लोकों में विचरूँगा; और उसी उपाय से तुम मुझे फिर इस प्रकार दुःखों में नहीं डाल सकोगे।
Verse 33
त्वया हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते | तृष्णाशोकश्रमा्णां हि त्वं काम प्रभव: सदा,“काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम--इनका उत्पत्तिस्थान सदा तू ही है। जबतक तू मुझे प्रेरित करके इधर-उधर भटकाता रहेगा तबतक मेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है
भीष्म ने कहा—तुम्हारे द्वारा प्रेरित होकर मेरे लिए दूसरी कोई गति नहीं रहती। हे काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम—इन सबका उद्गम सदा तुम ही हो। जब तक तुम मुझे उकसाकर इधर-उधर भटकाते रहोगे, तब तक मेरे लिए कोई अन्य आश्रय या दिशा नहीं।
Verse 34
धननाशे<धिकं दुःखं मन्ये सर्वमहत्तरम् ज्ञातयो हावमन्यन्ते मित्राणि च धनाच्च्युतम्,“मैं तो समझता हूँ कि धनका नाश होनेपर जो अत्यन्त दुःख होता है, वही सबसे बढ़कर है; क्योंकि जो धनसे वज्चित हो जाता है, उसे अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमानित करने लगते हैं
भीष्म ने कहा—मैं मानता हूँ कि धन के नाश पर जो दुःख होता है, वह सब दुःखों से बढ़कर है; क्योंकि जो मनुष्य धन से च्युत हो जाता है, उसे अपने ज्ञाति-बन्धु और मित्र भी तुच्छ समझकर अपमानित करने लगते हैं।
Verse 35
अवज्ञानसहसैस्तु दोषा: कष्टतरा5धने । धने सुखकला या तु सापि दु:खैरविधीयते,“दरिद्रकों सहस्र-सहस्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; अतः निर्धन अवस्थामें बहुत-से कष्टदायक दोष हैं; और धनमें जो सुखका लेश प्रतीत होता है, वह भी दुःखोंसे ही सम्पादित होता है
दरिद्र को सहस्र-सहस्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; इसलिए निर्धनता में अनेक अत्यन्त कष्टदायक दोष होते हैं। और धन में जो सुख का थोड़ा-सा अंश प्रतीत होता है, वह भी वास्तव में दुःखों के द्वारा ही प्राप्त होता है।
Verse 36
धनमस्येति पुरुष पुरो निघ्नन्ति दस्यव: । क्लिश्यन्ति विविषधैर्दण्डैर्नित्यमुद्रेजयन्ति च,“जिस पुरुषके पास धन होनेका संदेह होता है, उसे उसका धन लूटनेके लिये लुटेरे मार डालते हैं अथवा उसे तरह-तरहकी पीड़ाएँ देकर सताते और सदा उद्वेगमें डाले रहते हैं
जिस पुरुष के पास धन होने का संदेह होता है, उसे धन लूटने के लिए लुटेरे मार डालते हैं; अथवा उसे तरह-तरह के दण्ड देकर सताते हैं और सदा भय व उद्वेग में डाले रखते हैं।
Verse 37
अर्थलोलुपता दुःखमिति बुद्ध चिरान्मया । यद् यदालम्बसे काम तत्तदेवानुरुध्यसे,“धनलोलुपता दुःखका कारण है, यह बात बहुत देरके बाद मेरी समझमें आयी है। काम! तू जिस-जिसका आश्रय लेता है, उसी-उसीके पीछे पड़ जाता है
बहुत समय के बाद मुझे यह समझ में आया कि धन-लोलुपता ही दुःख है। हे काम! तू जिस-जिसका आश्रय लेता है, उसी-उसी के पीछे बार-बार दौड़ता है।
Verse 38
अतत्त्वज्ञोडसि बालश्न दुस्तोषो5पूरणोडनल: । नैव त्वं वेत्थ सुलभ नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम्,तू तत्त्वज्ञानसे रहित और बालकके समान मूढ है, तुझे संतोष देना कठिन है। आगके समान तेरा पेट भरना असम्भव है। तू यह नहीं जानता कि कौन-सी वस्तु सुलभ है और कौन-सी दुर्लभ
तू तत्त्वज्ञान से रहित और बालक के समान मूढ़ है; तुझे संतुष्ट करना कठिन है, और अग्नि के समान तेरा पेट भरना असम्भव है। तू यह नहीं जानता कि क्या सुलभ है और क्या दुर्लभ।
Verse 39
पाताल इव दुष्पूरो मां दुःखैय्योक्तुमिच्छसि । नाहमद्य समावेष्ठूं शक्य: काम पुनस्त्वया,“काम! पातालके समान तुझे भरना कठिन है। तू मुझे दु:खोंमें फँसाना चाहता है; किंतु अब तू फिर मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता
हे काम! तू पाताल के समान दुष्पूर है। तू मुझे दुःखों में बाँधना चाहता है; पर आज से तू फिर मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।
Verse 40
निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद् यदृच्छया । निर्वत्तिं परमां प्राप्प नाद्य कामान् विचिन्तये,“अकस्मात् धनका नाश हो जानेसे वैराग्यको प्राप्त होकर मुझे परम सुख मिल गया है। अब मैं भोगोंका चिन्तन नहीं करूँगा
अकस्मात् धन का नाश हो जाने से मुझे वैराग्य प्राप्त हुआ और परम शान्ति-तृप्ति मिली। अब मैं भोग-विलास का चिन्तन नहीं करूँगा।
Verse 41
अतिकक्लेशान् सहामीह नाहं बुद्धयाम्यबुद्धिमान् । निकृतो धननाशेन शये सर्वाज्भविज्वर:,'पहले मैं बड़े-बड़े क्लेश सहता था, परंतु ऐसा बुद्धिहीन हो गया था कि “धनकी कामनामें कष्ट है,' इस बातको समझ ही नहीं पाता था। परंतु अब धनका नाश होनेसे उससे वंचित होकर मैं सम्पूर्ण अड़ोंमें क्लेश और चिन्ताओंसे मुक्त होकर सुखसे सोता हूँ
पहले मैं बड़े-बड़े क्लेश सहता था, पर बुद्धिहीन होने से यह नहीं समझ पाता था कि धन की लालसा ही दुःख का कारण है। अब धन नष्ट हो जाने से उससे वंचित होकर मैं समस्त ज्वर-चिन्ताओं से मुक्त, सुख से शयन करता हूँ।
Verse 42
परित्यजामि काम व्वां हित्वा सर्वमनोगती: । न त्वं मया पुन: काम वत्स्यसे न च रंस्यसे,“काम! मैं अपनी सम्पूर्ण मनोवृत्तियोंको दूर हटाकर तेरा परित्याग कर रहा हूँ। अब तू फिर मेरे साथ न तो रह सकेगा और न मौज ही कर सकेगा
हे काम! मैं मन की समस्त प्रवृत्तियों को हटाकर तेरा परित्याग करता हूँ। अब तू फिर न मेरे साथ रह सकेगा, न मुझमें रम सकेगा।
Verse 43
क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसित: । द्वेष्ययुक्त: प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम्,“अब जो लोग मुझपर आक्षेप या मेरा तिरस्कार करेंगे, उनके उस बर्तावको मैं चुपचाप सह लूँगा। जो लोग मुझे मारे-पीटेंगे या कष्ट देंगे, उनके साथ भी मैं बदलेमें वैसा बर्ताव नहीं करूँगा। द्वेषके योग्य पुरुषका भी यदि साथ हो जाय और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे तो मैं उसपर ध्यान न देकर उससे अप्रिय वचन नहीं बोलूँगा
जो लोग मुझ पर आक्षेप करेंगे, मैं उन्हें क्षमा करूँगा; और यदि मुझे कष्ट भी दिया जाए, तो मैं प्रतिहिंसा नहीं करूँगा। द्वेष के योग्य पुरुष के साथ भी यदि मेरा संग हो, तो उसके अप्रिय वचनों की उपेक्षा कर, मैं प्रिय वचन ही बोलूँगा; अप्रिय उत्तर नहीं दूँगा।
Verse 44
तृप्त: स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन् । न सकाम॑ करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मन:,“मैं सदा संतुष्ट एवं स्वस्थ इन्द्रियोंसे सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन-निर्वाह करता रहूँगा; परंतु तुओ कभी सफल न होने दूँगा; क्योंकि तू मेरा शत्रु है
मैं सदा तृप्त, इन्द्रियों को वश में रखकर, जो कुछ यथालाभ मिल जाए उसी से जीवन-निर्वाह करूँगा; और हे आत्मशत्रु काम! मैं तुझे कभी सफल न होने दूँगा।
Verse 45
निर्वेद निर्व॒तिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम् । सर्वभूतदयां चैव विद्धि मां समुपागतम्,'तू यह अच्छी तरह समझ ले कि मुझे वैराग्य, सुख, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव--ये सभी सदगुण प्राप्त हो गये हैं
भिष्म बोले—तू भली-भाँति जान ले कि मुझे वैराग्य, निर्वृति, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा तथा समस्त प्राणियों के प्रति दया—ये सभी सद्गुण प्राप्त हो गए हैं।
Verse 46
तस्मात् कामश्च लोभश्व तृष्णा कार्पण्यमेव च । त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो हास्मि साम्प्रतम्,“अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणताको चाहिये कि वे मोक्षकी ओर प्रस्थान करनेवाले मुझ साधकको छोड़कर चले जायाँ। अब मैं सत्त्वगुणमें स्थित हो गया हूँ
भिष्म बोले—अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणता—ये सब मोक्ष-पथ पर प्रतिष्ठित मुझ साधक को छोड़कर चले जाएँ; क्योंकि अब मैं सत्त्वगुण में स्थित हूँ।
Verse 47
प्रहाय कामं॑ लोभं॑ च सुखं प्राप्तो5स्मि साम्प्रतम् । नाद्य लोभवशं प्राप्तो दुःखं प्राप्स्याम्यनात्मवान्,“इस समय काम और लोभका त्याग करके मैं प्रत्यक्ष ही सुखी हो गया हूँ; अतः अजितेन्द्रिय पुरुषकी भाँति अब लोभमें फँसकर दुःख नहीं उठाऊँगा
भिष्म बोले—इस समय काम और लोभ का परित्याग करके मैं प्रत्यक्ष ही सुख को प्राप्त हुआ हूँ; अतः अब मैं अजितेन्द्रिय पुरुष की भाँति लोभ के वश में पड़कर दुःख नहीं भोगूँगा।
Verse 48
यद् यत् त्यजति कामानां तत् सुखस्याभिपूर्यते । कामस्य वशगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्यते,“मनुष्य जिस-जिस कामनाको छोड़ देता है, उस-उसकी ओरसे सुखी हो जाता है। कामनाके वशीभूत होकर तो वह सर्वदा दुःख ही पाता है
भिष्म बोले—मनुष्य जिस-जिस कामना का त्याग करता है, उतना-उतना ही वह सुख से परिपूर्ण होता जाता है; पर जो सदा कामना के वश में रहता है, वह केवल दुःख ही पाता है।
Verse 49
कामानुबन्ध॑ नुदते यत् किंचित् पुरुषो रज: । कामक्रोधोद्धवं दुः:खमहीररतिरेव च,“मनुष्य कामसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कुछ भी रजोगुण हो, उसे दूर कर दे। दुःख, निर्लज्जता और असंतोष--ये काम और क्रोधसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं
भिष्म बोले—मनुष्य को काम-सम्बन्धी जो कुछ भी रजोगुण है, उसे दूर कर देना चाहिए; क्योंकि दुःख, निर्लज्जता और असंतोष—ये सब काम और क्रोध से ही उत्पन्न होते हैं।
Verse 50
एष ब्रद्मप्रतिष्ठो5हं ग्रीष्मे शीतमिव हृदम् । शाम्यामि परिनिर्वामि सुखं मामेति केवलम्,जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें लोग शीतल जलवाले सरोवरमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अब मैं परब्रह्ममें प्रतिष्ठित हो गया हूँ, अतः शान्त हूँ, सब ओरसे निर्वाणको प्राप्त हो गया हूँ। अब मुझे केवल सुख-ही-सुख मिल रहा है
भीष्म बोले—अब मैं परब्रह्म में प्रतिष्ठित हो गया हूँ। जैसे ग्रीष्म की तपन में लोग शीतल जल वाले सरोवर में प्रवेश करते हैं, वैसे ही मैं उस परम तत्त्व में प्रविष्ट हो गया हूँ। इसलिए मैं शान्त हूँ; सब ओर से पूर्ण निर्वाण को प्राप्त हो गया हूँ। अब मेरे लिए केवल सुख ही है—केवल सुख।
Verse 51
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नाहत: षोडशीं कलाम्,“इस लोकमें जो विषयोंका सुख है तथा परलोकमें जो दिव्य एवं महान् सुख है, ये दोनों प्रकारके सुख तृष्णाके क्षयसे होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं
भीष्म बोले—इस लोक में विषयों से जो कामसुख मिलता है और परलोक में जो दिव्य तथा महान् सुख कहा गया है—ये दोनों ही तृष्णा के क्षय से उत्पन्न होने वाले सुख की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं।
Verse 52
आत्मना सप्तमं काम हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् | प्राप्पावध्यं ब्रह्मपुरं राजेव स्थामहं सुखी,“काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता--ये देहधारियोंके सात शत्रु हैं। इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है। उन सबके साथ इस महान् शत्रु कामका नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुरमें स्थित हो राजाके समान सुखी होऊँगा”
भीष्म बोले—अपने आत्मसंयम से सातवें, अर्थात् कामरूप उस परम शत्रु को, जैसे कोई दुर्जय वैरी को मार गिराए, वैसे ही नष्ट करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुर को प्राप्त करूँगा। वहाँ प्रतिष्ठित होकर मैं राजा के समान सुखी रहूँगा।
Verse 53
एतां बुद्धिं समास्थाय मड़्किरनिर्वेदमागतः । सर्वान् कामान् परित्यज्य प्राप्य ब्रह्म महत्सुखम्,राजन! इसी बुद्धिका आश्रय लेकर मड़कि धन और भोगोंसे विरक्त हो गये और समस्त कामनाओंका परित्याग करके उन्होंने परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लिया
राजन्! इसी बुद्धि का आश्रय लेकर मड्कि विरक्त हो गए; उन्होंने समस्त कामनाओं का परित्याग किया और परमानन्दस्वरूप परब्रह्म को प्राप्त कर महान् सुख पाया।
Verse 54
दम्यनाशकृते मड़किरमृतत्वं किलागमत् । अच्छिनत् काममूलं स तेन प्राप महत्सुखम्,बछड़ोंके नाशको निमित्त बनाकर ही मड्कि अमृतत्वको प्राप्त हो गये। उन्होंने कामकी जड़ काट डाली; इसीलिये महान् सुख प्राप्त कर लिया
भीष्म बोले—कहा जाता है कि बछड़ों के नाश को निमित्त बनाकर मड्कि अमृतत्व को प्राप्त हो गए। उन्होंने काम की जड़ काट डाली; इसलिए महान् सुख पा लिया।
Verse 176
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें श्म्पाकगीताविषयक एक यो छिह्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्व में शम्पाक-गीता-विषयक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 177
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मड़किगीतायां सप्तसप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्व में ‘मड़किगीता’ नामक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
He seeks a causal account of how śārīra-agni functions when grounded in material elements (notably the ‘earthy’ support) and how vāyu operates through distinct bodily ‘spaces’ to regulate movement and function.
The chapter presents a role-and-location model: prāṇa sustains and moves upward, apāna governs downward elimination, samāna coordinates digestion and distributes agni’s effect, udāna powers effort/strength and upward movement, and vyāna pervades the body (notably joints) enabling distribution and integration.
Yes: the description culminates in a yogic framing—this prāṇic pathway is identified as the route by which yogins proceed, and disciplined practitioners are said to place the self/awareness at the crown (mūrdhan), with agni held steady like fire contained in a vessel.