Adhyaya 159
Shanti ParvaAdhyaya 15939 Verses

Adhyaya 159

Adhyāya 159 — Dāna–Dakṣiṇā, Āpaddharma Measures, and Prāyaścitta Classifications

Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Instruction on Royal Duty) — Dana, Dakṣiṇā, and Apaddharma Norms

Bhīṣma outlines criteria for identifying worthy brahmin recipients—those engaged in Vedic learning, ritual performance, or obligations toward teacher, ancestors, and household—emphasizing that dāna should be directed by qualification and especially by vidyā-viśeṣa (learning). He distinguishes ordinary gifts from prescribed dakṣiṇā and insists that sacrifices must be supported with food and fees; deficient dakṣiṇā is portrayed as injurious to social and spiritual outcomes. The discourse then addresses governance under constraint: the ruler may requisition resources from categories described as failing ritual obligations or civic giving, aiming to preserve sacrificial order and public duty. The chapter proceeds to normative boundaries and cautions regarding speech and conduct toward brahmins, and it catalogues offenses and their consequences, including graded prāyaścitta (expiations) for transgressions such as intoxicant use, prohibited relations, theft, and association with the fallen. It further notes exceptional allowances (limited “non-fault” untruths in specific contexts) and prescribes purification regimens—vows, austerities, and ritual acts—framed as mechanisms for restoring social and moral standing. Overall, the adhyāya functions as a juridical-ethical digest linking patronage, ritual correctness, royal intervention, and expiatory repair.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर में भीष्म पाप के ‘अधिष्ठान’—उस मूल आसन—को उजागर करने का वचन देते हैं, मानो एक अदृश्य शत्रु का नाम लेकर उसे प्रकाश में खींच लाते हों। → भीष्म लोभ को ‘महाग्राह’ कहकर पाप, अधर्म और ‘अनुत्तम दुःख’ की जड़ बताते हैं। लोभ से शठता, छल-कपट, साहसिक दुष्कर्म, पराये धन का अपहरण, परायी स्त्रियों पर अत्याचार, वाणी-मन के वेग का अनियंत्रण, निन्दा और सामाजिक विघटन जैसी प्रवृत्तियाँ क्रमशः उभरती जाती हैं—मानो लोभ की लहरें एक-एक कर सभी मर्यादाओं को डुबो रही हों। → लोभी की असंतोष-ग्रंथि का तीखा चित्रण आता है: बहुत लाभ पाकर भी वह न प्रसन्न होता है, न भोगों से तृप्त—उसकी तृष्णा देव-गन्धर्व-मनुष्य किसी से भी नहीं भरती। इसी बिंदु पर लोभ का ‘अतृप्त’ स्वभाव अध्याय का शिखर बनता है, क्योंकि यही उसे निरंतर पाप की ओर धकेलता है। → भीष्म प्रतिपक्ष में धर्मनिष्ठ साधुओं का स्वरूप रखते हैं—जिन्हें सत्कर्म से विचलित नहीं किया जा सकता, जिनकी वृत्ति पूर्व साधुओं द्वारा रची मर्यादा में स्थिर रहती है। वे युधिष्ठिर को ऐसे काम-क्रोध-रहित, निर्मम, निरहंकारी, सुव्रती, स्थिर-सीमाओं वाले जनों की उपासना और उनसे प्रश्न करने का उपदेश देते हैं; और अंततः मन-इन्द्रिय संयम वाले पुरुष को मोह सहित लोभ पर विजय पाने की शिक्षा देकर अध्याय को समेटते हैं। → अध्याय का अंत ‘आपन्मूलभूत दोष’ के रूप में लोभ की स्थापना करके आगे के उपदेश के लिए भूमि तैयार करता है—अब प्रश्न यह रह जाता है कि आपत्ति-काल में भी लोभ से बचते हुए व्यवहारिक निर्णय कैसे किए जाएँ।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ा भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धार्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १५७ ॥। ऑपनऔक्रात बछ। अ्-क्ज अष्टपञ्चाशर्दाधिकशततमो& ध्याय: समस्त अनर्थोका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण युधिछिर उवाच पापस्य यदधिष्ठानं यतः पापं प्रवर्तते । एतदिच्छाम्यहं श्रीतुं तत््वेन भरतर्षभ,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि पापका अधिष्ठान क्या है और किससे उसकी प्रवृत्ति होती है?

युधिष्ठिर ने कहा— भरतश्रेष्ठ! मैं तत्त्वतः यह सुनना चाहता हूँ कि पाप का अधिष्ठान क्या है और किससे पाप की प्रवृत्ति होती है?

Verse 2

भीष्म उवाच पापस्य यदधिष्ठानं तच्छृणुष्व नराधिप । एको लोभो महाग्राहो लोभात्‌ पापं प्रवर्तते,भीष्मजीने कहा--नरेश्वर! पापका जो अधिष्ठान है, उसे सुनो। एकमात्र लोभ ही पापका अधिष्ठान है। वह मनुष्यको निगल जानेके लिये एक बड़ा ग्राह है। लोभसे ही पापकी प्रवृत्ति होती है

भीष्म ने कहा— नरेश्वर! पाप का जो अधिष्ठान है, उसे सुनो। एकमात्र लोभ ही महाग्राह के समान है; लोभ से ही पाप प्रवृत्त होता है।

Verse 3

अत: पापमधर्मश्च यथा दुःखमनुत्तमम्‌ | निकृत्या मूलमेतद्धि येन पापकृतो जना:,लोभसे ही पाप, अधर्म तथा महान्‌ दुःखकी उत्पत्ति होती है। शठता तथा छल- कपटका भी मूल कारण लोभ ही है। इसीके कारण मनुष्य पापाचारी हो जाते हैं

अतः लोभ से ही पाप, अधर्म तथा अनुपम दुःख उत्पन्न होते हैं। निकृति—शठता और छल—का भी यही मूल है; इसी से लोग पापकर्मी बन जाते हैं।

Verse 4

लोभात्‌ क्रोध: प्रभवति लोभात्‌ काम: प्रवर्तते । लोभान्मोहश्न माया च मान: स्तम्भ: परासुता,लोभसे ही क्रोध प्रकट होता है, लोभसे ही कामकी प्रवृत्ति होती है और लोभसे ही माया, मोह, अभिमान उद्दण्डता तथा पराधीनता आदि दोष प्रकट होते हैं

भीष्म ने कहा—लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से ही काम की प्रवृत्ति चलती है। लोभ से ही मोह और माया, अभिमान, हठपूर्ण उद्दण्डता तथा पराधीनता जैसे दोष प्रकट होते हैं, जो धीरे-धीरे धर्माचरण को क्षीण कर देते हैं।

Verse 5

अक्षमा ह्वीपरित्याग: श्रीनाशो धर्मसंक्षय: । अभिध्याप्रख्यता चैव सर्व लोभात्‌ प्रवर्तते,असहनशीलता, निर्लज्जता, सम्पत्तिनाश, धर्मक्षय, चिन्ता और अपयश-ये सब लोभसे ही सम्भव होते हैं

भीष्म ने कहा—असहनशीलता, लज्जा का त्याग, सम्पत्ति का नाश और धर्म का क्षय; तथा लोभपूर्ण चिन्ता और अपयश का प्रसार—ये सब लोभ से ही प्रवृत्त होते हैं।

Verse 6

अत्यागश्चातितर्षश्न विकर्मसु च या: क्रिया: । कुलविद्यामदश्नैव रूपैश्चर्यमदस्तथा,लोभसे ही कृपणता, अत्यन्त तृष्णा, शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें प्रवृत्ति, कुल और विद्याविषयक अभिमान, रूप और ऐश्वर्यका मद, समस्त प्राणियोंके प्रति द्रोह, सबका तिरस्कार, सबके प्रति अविश्वास तथा कुटिलतापूर्ण बर्ताव होते हैं

भीष्म ने कहा—लोभ से कृपणता और अत्यन्त तृष्णा उत्पन्न होती है, और शास्त्रविरुद्ध कर्मों में प्रवृत्ति होती है। उसी से कुल और विद्या का अभिमान, तथा रूप और ऐश्वर्य का मद भी उठता है।

Verse 7

सर्वभूतेष्वभिद्रोह: सर्वभूतेष्वसत्कृति: । सर्वभूतेष्वविश्वास: सर्वभूतेष्वनार्जवम्‌,लोभसे ही कृपणता, अत्यन्त तृष्णा, शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें प्रवृत्ति, कुल और विद्याविषयक अभिमान, रूप और ऐश्वर्यका मद, समस्त प्राणियोंके प्रति द्रोह, सबका तिरस्कार, सबके प्रति अविश्वास तथा कुटिलतापूर्ण बर्ताव होते हैं

भीष्म ने कहा—समस्त प्राणियों के प्रति द्रोह, समस्त प्राणियों का तिरस्कार, सबके प्रति अविश्वास और सबके साथ कुटिलता—ये अधर्ममय वृत्ति के लक्षण हैं, जो सदाचार का नाश करते हैं।

Verse 8

हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम्‌ | वाग्वेगो मनसो वेगो निन्दावेगस्तथैव च

भीष्म ने कहा—पराये धन का हरण, परस्त्री का अपमान/अतिक्रमण, वाणी का वेग, मन का वेग और निन्दा का वेग—ये सब मनुष्य को पाप की ओर ढकेलने वाले आवेग हैं; धर्म के पथ पर इन्हें संयमित करना चाहिए।

Verse 9

उपस्थोदरयोवेंगो मृत्युवेगश्च॒ दारुण: । ईष्यविगश्न बलवान्‌ मिथ्यावेगश्च दुर्जय:

भीष्म ने कहा—जननेन्द्रिय और उदर (भोजन-लालसा) के वेग अत्यन्त प्रबल हैं; मृत्यु की ओर ले जाने वाला वेग भयानक है। ईर्ष्या का वेग भी बलवान है और असत्य की प्रवृत्ति को जीतना अत्यन्त कठिन है।

Verse 10

रसवेगश्न दुर्वार्य: श्रोत्रवेगश्न॒ दुःसह: । कुत्सा विकत्था मात्सर्य पापं दुष्करकारिता

भीष्म ने कहा—रस (स्वाद) का वेग रोकना कठिन है और श्रोत्र (सुनी हुई बातों) का वेग सहना कठिन है। निन्दा/तिरस्कार, बढ़-चढ़कर अपनी बड़ाई करना, मत्सरता, पाप-प्रवृत्ति और दुष्कर (हानिकर) कर्मों की ओर ढकेलने वाली प्रवृत्ति—ये भीतर के वे बल हैं जो मनुष्य को विचलित कर धर्ममार्ग से हटाते हैं।

Verse 11

साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा । पराये धनका अपहरण, परायी स्त्रियोंके प्रति बलात्कार, वाणीका वेग, मनका वेग, निन्दा करनेकी विशेष प्रवृत्ति, जननेन्द्रियका वेग, उदरका वेग, मृत्युका भयंकर वेग अर्थात्‌ आत्महत्या, ईर्ष्याका प्रबल वेग, मिथ्या का दुर्जय वेग, अनिवार्य रसनेन्द्रियका वेग, दुःसह श्रोत्रेन्द्रियका वेग, घृणा, अपनी प्रशंसाके लिये बढ़-बढ़कर बातें बनाना, मत्सरता, पाप, दुष्कर कर्मोमें प्रवृत्ति, न करने योग्य कार्य कर बैठना--इन सबका कारण भी लोभ ही है || ८--१० $ || जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवा:,नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधि: । कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य जन्मकालमें, बाल्यावस्थामें तथा कौमार और यौवनावस्थामें जिसके कारण अपने बुरे कर्मोको छोड़ नहीं पाते हैं, जो मनुष्यके वृद्ध होनेपर भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है। जिस प्रकार गहरे जलवाली बहुत-सी नदियोंके मिल जानेसे भी समुद्र नहीं भरता है, उसी प्रकार कितने ही पदार्थोका लाभ क्‍यों न हो जाय, लोभका पेट कभी नहीं भरता है

भीष्म ने कहा—सभी प्रकार के साहसिक और अकार्य कर्मों का मूल लोभ ही है। लोभ से मनुष्य पराया धन हड़पता है, पराई स्त्री का अपमान/बलात्‌गमन करता है; वाणी और मन के उग्र वेगों से चल पड़ता है; निन्दा में विशेष प्रवृत्त हो जाता है; जननेन्द्रिय और उदर के वेगों से प्रेरित होता है; मृत्यु का भयानक वेग—अर्थात् आत्मविनाश—उसे घेर लेता है; प्रबल ईर्ष्या उसे बहा ले जाती है; मिथ्या का दुर्जय वेग उसे जीत लेता है; रसना का अनिवार्य वेग और श्रोत्र का दुःसह वेग उसे खींचते हैं; वह घृणा में गिरता है, अपनी प्रशंसा के लिए बढ़-चढ़कर बातें बनाता है, मत्सरता करता है, पाप में प्रवृत्त होता है और दुष्कर तथा निषिद्ध कर्मों की ओर दौड़ पड़ता है—इन सबका कारण लोभ ही है। कुरुश्रेष्ठ! जन्म से लेकर बाल्य, कौमार और यौवन तक मनुष्य जिन बुरे कर्मों को नहीं छोड़ पाता, और जो वृद्धावस्था में भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है। जैसे गहरे जल वाली अनेक नदियाँ मिलकर भी समुद्र को नहीं भरतीं, वैसे ही कितना भी लाभ हो जाए, लोभ का पेट कभी नहीं भरता।

Verse 12

न संत्यजन्त्यात्मकर्म यो न जीर्य॑ति जीर्यत: । यो न पूरयितुं शक्‍यो लोभ: प्राप्त्या कुरूद्गबह

भीष्म ने कहा—मनुष्य वृद्ध होने पर भी अपने स्वभावगत कर्मों को नहीं छोड़ता; और कुरुवंश-ध्वज! लोभ ऐसा है जो प्राप्ति से भी कभी भरा या तृप्त नहीं किया जा सकता।

Verse 13

न प्रहृष्पति यो लाभै: कामैर्यश्न न तृप्पति,लोभी मनुष्य बहुत-सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता। भोगोंसे वह कभी तृप्त नहीं होता। नरेश्वर! न देवताओं, न गन्धर्वों, न असुरों, न बड़े-बड़े नागों और न सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा ही लोभका स्वरूप यथार्थ-रूपसे जाना जाता है

भीष्म ने कहा—जो लाभ पाकर भी हर्षित नहीं होता और काम्य भोगों से भी तृप्त नहीं होता, वह लोभी मनुष्य बहुत-सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता; भोगों से वह कभी तृप्त नहीं होता। नरेश्वर! लोभ का यथार्थ स्वरूप न देवताओं ने, न गन्धर्वों ने, न असुरों ने, न महा-नागों ने और न ही समस्त भूतगणों ने पूर्णतः जाना है।

Verse 14

यो न देवैर्न गन्धर्वैर्नासुरैर्न महोरगै: । ज्ञायते नृप तत्त्वेन सर्वैर्भूतगणैस्तथा,लोभी मनुष्य बहुत-सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता। भोगोंसे वह कभी तृप्त नहीं होता। नरेश्वर! न देवताओं, न गन्धर्वों, न असुरों, न बड़े-बड़े नागों और न सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा ही लोभका स्वरूप यथार्थ-रूपसे जाना जाता है

भीष्म ने कहा—हे नरेश! लोभ का यथार्थ स्वरूप न देवता जानते हैं, न गन्धर्व, न असुर, न महोरग (महान् नाग), और न ही समस्त भूतगण। लोभी मनुष्य बहुत-सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता; भोगों से वह कभी तृप्त नहीं होता।

Verse 15

स लोभ: सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना | दम्भो द्रोहश्च निन्‍्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा

भीष्म ने कहा—जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसे मोह सहित लोभ को जीतना चाहिए; तथा दम्भ, द्रोह, निन्दा, पैशुन्य (चुगली/परनिन्दा) और मत्सर (ईर्ष्या) को भी।

Verse 16

सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्ति बहुश्रुता:

भीष्म ने कहा—बहुश्रुत (बहुत सुनकर/पढ़कर विद्वान बने) जन अत्यन्त विशाल शास्त्रों को भी धारण कर लेते हैं।

Verse 17

द्वेषक्रोधप्रसक्ताश्व॒ शिष्टाचारबहिष्कृता:,वे दोष और क्रोधमें फँसकर शिष्टाचारको छोड़ देते हैं और ऊपरसे मीठे वचन बोलते हुए भी भीतरसे अत्यन्त कठोर हो जाते हैं। उनकी स्थिति घास-फूँससे ढके हुए कुएँके समान होती है। वे धर्मके नामपर संसारको धोखा देनेवाले क्षुद्र मनुष्य धर्मध्वजी होकर (धर्मका ढोंग फैलाकर) जगतको लूटते हैं

भीष्म ने कहा—जो द्वेष और क्रोध में आसक्त हैं, वे शिष्टाचार से बहिष्कृत हो जाते हैं। वे भीतर से क्रूर और वाणी से मधुर होते हैं—मानो घास-फूस से ढँका हुआ कुआँ। धर्म के नाम पर व्यापार करने वाले वे क्षुद्र जन, धर्मध्वजी बनकर जगत् को ठगते और लूटते हैं।

Verse 18

अन्तःक्रूरा वाड्मधुरा: कूपाश्छन्नास्तृणैरिव । धर्मवैतंसिका: क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत्‌,वे दोष और क्रोधमें फँसकर शिष्टाचारको छोड़ देते हैं और ऊपरसे मीठे वचन बोलते हुए भी भीतरसे अत्यन्त कठोर हो जाते हैं। उनकी स्थिति घास-फूँससे ढके हुए कुएँके समान होती है। वे धर्मके नामपर संसारको धोखा देनेवाले क्षुद्र मनुष्य धर्मध्वजी होकर (धर्मका ढोंग फैलाकर) जगतको लूटते हैं

भीष्म ने कहा—कुछ लोग भीतर से क्रूर और वाणी से मधुर होते हैं; वे घास-फूस से ढँके कुएँ के समान हैं। धर्म के नाम पर व्यापार करने वाले वे क्षुद्र जन, धर्मध्वजी बनकर जगत् को ठगते और लूटते हैं।

Verse 19

कुर्वते च बहून्‌ मार्गास्तान्‌ हेतुबलमाश्रिता: । सतां मार्गान्‌ विलुम्पन्ति लोभाज्ञानेषु निष्ठिता:,युक्तिबलका आश्रय लेकर बहुत-से असत्‌ मार्ग खड़े कर देते हैं तथा लोभ और अज्ञानमें स्थित हो सत्पुरुषोंके स्थापित किये हुए मार्गों (धर्ममर्यादाओं) का नाश करने लगते हैं

युक्ति-बल का आश्रय लेकर लोग बहुत-से असत् मार्ग गढ़ लेते हैं; और लोभ तथा अज्ञान में स्थित होकर सत्पुरुषों द्वारा स्थापित मार्गों—धर्म-मर्यादाओं—को लूटने और नष्ट करने लगते हैं।

Verse 20

धर्मस्य द्वियमाणस्य लोभग्रस्तैर्दुरात्मभि: । या या विक्रियते संस्था ततः सापि प्रपद्यते,लोभग्रस्त दुरात्मा पुरुषोंद्वारा अपहृत (विकृत) होनेवाले धर्मकी जो-जो स्थिति बिगड़ जाती या बदल जाती है, वह उसी रूपमें प्रचलित हो जाती है

लोभग्रस्त दुरात्मा पुरुषों द्वारा धर्म के विभाजन और विकृति के समय, धर्म की जो-जो व्यवस्था बिगड़ती या बदलती है, वही विकृत रूप आगे चलकर प्रचलित मानक बन जाता है।

Verse 21

दर्प: क्रोधो मद: स्वप्रो हर्ष: शोको5तिमानिता । एत एव हि कौरव्य दृश्यन्ते लुब्धबुद्धिषु,कुरुनन्दन! जिनकी बुद्धि लोभमें फँसी हुई है, उन मनुष्योंमें दर्प, क्रोध, मद, दुःस्वप्र, हर्ष, शोक तथा अत्यन्त अभिमान--ये ही दोष दिखायी देते हैं

कुरुनन्दन! जिनकी बुद्धि लोभ में फँसी रहती है, उनमें दर्प, क्रोध, मद, दुःस्वप्न, हर्ष, शोक और अत्यन्त अभिमान—ये ही दोष दिखाई देते हैं।

Verse 22

एतानशिष्टान्‌ बुध्यस्व नित्यं लोभसमन्वितान्‌ | शिष्टांस्तु परिपृच्छेथा यान्‌ वक्ष्यामि शुचिव्रतान्‌,जो सदा लोभमें डूबे रहते हैं, ऐसे ही मनुष्योंको तुम अशिष्ट समझो। तुम्हें शिष्ट पुरुषोंसे ही अपनी शंकाएँ पूछनी चाहिये। पवित्र नियमोंका पालन करनेवाले उन शिष्ट पुरुषोंका मैं परिचय दे रहा हूँ

जो सदा लोभ से युक्त रहते हैं, उन्हें तुम अशिष्ट समझो। पर अपनी शंकाएँ शिष्ट पुरुषों से ही पूछो—पवित्र व्रतों का पालन करनेवाले जिनका मैं अब परिचय देता हूँ।

Verse 23

येष्वावृत्तिभयं नास्ति परलोकभयं न च | नामिषेषु प्रसंगो5स्ति न प्रियेष्वप्रियेषु च,जिन्हें फिर संसारमें जन्म लेनेका भय नहीं है, परलोकसे भी भय नहीं है, जिनकी भोगोंमें आसक्ति नहीं है तथा प्रिय और अप्रियमें भी जिनका राग-द्वेष नहीं है

जिन्हें पुनर्जन्म का भय नहीं, परलोक का भी भय नहीं; जिनकी भोगों में आसक्ति नहीं; और जिनमें प्रिय-अप्रिय के प्रति राग-द्वेष नहीं उठता—वे ही (शिष्ट) हैं।

Verse 24

शिष्टाचार: प्रियो येषु दमो येषु प्रतिष्ठित: । सुखं दुःखं सम॑ येषां सत्यं येषां परायणम्‌,जिन्हें शिष्टाचार प्रिय है। जिनमें इन्द्रिय-संयम प्रतिष्ठित है। जिनके लिये सुख और दुःख समान है। सत्य ही जिनका परम आश्रय है

भीष्म ने कहा—जिन्हें शिष्टाचार प्रिय है, जिनमें इन्द्रिय-संयम दृढ़ प्रतिष्ठित है, जिनके लिए सुख-दुःख समान हैं और जिनका परम आश्रय सत्य है—ऐसे जन धर्म को धारण करने वाले स्थिर नैतिक आदर्श के साक्षात् स्वरूप होते हैं।

Verse 25

दातारो न ग्रहीतारो दयावन्तस्तथैव च । पितृदेवातिथेयाश्र नित्योद्युक्तास्तथैव च,वे देते हैं, लेते नहीं। उनमें स्वभावसे ही दया भरी रहती है। वे देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंके सेवक होते हैं और सत्कर्म करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं

भीष्म ने कहा—वे दाता होते हैं, ग्राही नहीं; उनमें स्वभावतः करुणा निवास करती है। वे देवताओं, पितरों और अतिथियों की सेवा में नित्य तत्पर रहते हैं तथा सत्कर्म करने के लिए सदा उद्यत रहते हैं।

Verse 26

सर्वोपकारिणो वीरा: सर्वधधर्मानुपालका: । सर्वभूतहिताश्ैव सर्वदेयाश्न भारत,भरतनन्दन! वे वीर पुरुष सबका उपकार करनेवाले, सम्पूर्ण धर्मोंके रक्षक तथा समस्त प्राणियोंके हितैषी होते हैं। वे परहितके लिये सर्वस्व निछावर कर देते हैं

भीष्म ने कहा—भरतनन्दन! वे सच्चे वीर सबका उपकार करने वाले, समस्त धर्मों का पालन करने वाले और समस्त प्राणियों के हितैषी होते हैं। परहित के लिए वे अपना सर्वस्व तक अर्पित करने को तत्पर रहते हैं।

Verse 27

न ते चालयितुं शक्‍या धर्मव्यापारकारिण: । न तेषां भिद्यते वृत्तं यत्पुरा साधुभि: कृतम्‌,उन्हें सत्कर्मसे विचलित नहीं किया जा सकता। वे केवल धर्मके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं। पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने जिसका पालन किया है, उसी सदाचारका वे भी पालन करते हैं। उनका वह आचार कभी नष्ट नहीं होता

भीष्म ने कहा—जो धर्म के अनुष्ठान में लगे रहते हैं, उन्हें सत्कर्म से विचलित नहीं किया जा सकता। उनका आचरण नहीं टूटता; पूर्वकाल के साधुजनों ने जिस सदाचार का पालन किया है, उसी का वे भी अनुसरण करते हैं, और वह श्रेष्ठ अनुशासन उनमें कभी नष्ट नहीं होता।

Verse 28

न त्रासिनो न चपला न रौद्रा: सत्यथे स्थिता: । ते सेव्या: साधुभिननित्य॑ येष्वहिंसा प्रतिेष्ठिता,वे किसीको भय नहीं दिखाते, चपलता नहीं करते उनका स्वभाव किसीके लिये भंयकर नहीं होता है, वे सदा सन्मार्ममें ही स्थित रहते हैं, उनमें अहिंसा नित्य प्रतिष्ठित होती है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंका ही सदा सेवन करना चाहिये

भीष्म ने कहा—वे न किसी को भयभीत करते हैं, न चंचल होते हैं, न उनका स्वभाव कठोर और भयानक होता है; वे सत्य के लिए सदा स्थिर रहते हैं। जिनमें अहिंसा नित्य प्रतिष्ठित है—ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों का ही साधुजनों को सदा संग और सेवा करनी चाहिए।

Verse 29

कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहंकृता: | सुव्रता: स्थिरमर्यादास्तानुपास्व च पृच्छ च,जो काम और क्रोधसे रहित, ममता और अहंकारसे शून्य, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्ममर्यादाको स्थिर रखनेवाले हैं, उन्हीं महापुरुषोंका संग करो और उनसे अपना संदेह पूछो

भीष्म ने कहा—जो काम और क्रोध से रहित, ममता और अहंकार से शून्य, उत्तम व्रतों का पालन करने वाले और धर्म-मर्यादा को स्थिर रखने वाले हैं, उन्हीं महापुरुषों का संग करो। उनकी सेवा करो और अपने संदेहों का समाधान उनसे पूछकर करो।

Verse 30

न धनार्थ यशो<र्थ वा धर्मस्तेषां युधिष्ठिर । अवश्यं कार्य इत्येव शरीरस्य क्रियास्तथा,युधिष्ठिर! उनका धर्मपालन धन बटोरने या यश कमानेके लिये नहीं होता। वे धर्म तथा शारीरिक क्रियाओंको अवश्यकर्तव्य समझकर ही करते हैं

भीष्म ने कहा—युधिष्ठिर! उनका धर्मपालन धन बटोरने या यश कमाने के लिए नहीं होता। वे ‘धर्म करना ही है’—इस दृढ़ निश्चय से धर्म करते हैं; और शरीर की आवश्यक क्रियाएँ भी केवल कर्तव्य समझकर ही करते हैं।

Verse 31

न भयं क्रोधचापल्ये न शोकस्तेषु विद्यते | न धर्मध्वजिनश्वैव न गुहूं कज्चिदास्थिता:,उनमें भय, क्रोध, चपलता तथा शोक नहीं होता। वे धर्मध्वजी (पाखण्डी) नहीं होते, किसी गोपनीय पाखण्डपूर्ण धर्मका आश्रय नहीं लेते हैं

भीष्म ने कहा—उनमें न भय होता है, न क्रोध, न चंचलता, न शोक। वे धर्मध्वजी (पाखण्डी) नहीं होते; कोई भी गुप्त, कपटपूर्ण धर्म का आश्रय नहीं लेता।

Verse 32

येष्वलोभस्तथामोहो ये च सत्यार्जवे स्थिता: । तेषु कौन्तेय रज्येथा येषां न भ्रश्यते पुन:,कुन्तीनन्दन! जिनमें लोभ और मोहका अभाव है, जो सत्य और सरलतामें स्थित हैं तथा कभी सदाचारसे भ्रष्ट नहीं होते हैं, ऐसे पुरुषोंमें तुम्हें प्रेम रखना चाहिये

भीष्म ने कहा—कुन्तीनन्दन! जिनमें लोभ और मोह का अभाव है, जो सत्य और सरलता में स्थित हैं, और जो फिर कभी सदाचार से भ्रष्ट नहीं होते—ऐसे पुरुषों में तुम्हें प्रेम और विश्वास रखना चाहिए; क्योंकि उनका चरित्र धर्म से नहीं डगमगाता।

Verse 33

ये न हृष्यन्ति लाभेषु नालाभेषु व्यथन्ति च । निर्ममा निरहंकारा: सत्त्वस्था: समदर्शिन:,तात! जो लाभमें हर्षसे फूल नहीं उठते, हानिमें व्यथित नहीं होते, ममता और अहंकारसे शून्य हैं, जो सर्वदा सत्त्वगुणमें स्थित और समदर्शी होते हैं, जिनकी दृष्टिमें लाभ- हानि सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरण समान हैं, जो सुदृढ़ पराक्रमी, आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक और सत्त्वमय मार्ममें स्थित हैं, उन धर्मप्रेमी महानुभावोंकी तुम सावधान और जितेन्द्रिय रहकर सेवा-सत्कार करो। ये सब महापुरुष स्वभावसे ही बड़े गुणवान्‌ होते हैं। शुभ और अशुभके विषयमें उनकी वाणी यथार्थ होती है। दूसरे लोग तो केवल बातें बनानेवाले होते हैं

भीष्म ने कहा—जो लाभ में हर्ष से नहीं फूलते और हानि में व्यथित नहीं होते; जो ममता और अहंकार से शून्य, सत्त्वगुण में स्थित और समदर्शी हैं—ऐसे धर्मप्रिय महात्माओं की तुम सावधान और जितेन्द्रिय होकर सेवा-सत्कार करो। वे स्वभाव से ही गुणवान होते हैं; शुभ-अशुभ के विषय में उनकी वाणी यथार्थ होती है, केवल वाचालता नहीं।

Verse 34

लाभालाभौ सुखदु:खे च तात प्रियाप्रिये मरणं जीवितं च । समानि येषां स्थिरविक्रमाणां बुभुत्सतां सत्त्वपथे स्थितानाम्‌,तात! जो लाभमें हर्षसे फूल नहीं उठते, हानिमें व्यथित नहीं होते, ममता और अहंकारसे शून्य हैं, जो सर्वदा सत्त्वगुणमें स्थित और समदर्शी होते हैं, जिनकी दृष्टिमें लाभ- हानि सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरण समान हैं, जो सुदृढ़ पराक्रमी, आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक और सत्त्वमय मार्ममें स्थित हैं, उन धर्मप्रेमी महानुभावोंकी तुम सावधान और जितेन्द्रिय रहकर सेवा-सत्कार करो। ये सब महापुरुष स्वभावसे ही बड़े गुणवान्‌ होते हैं। शुभ और अशुभके विषयमें उनकी वाणी यथार्थ होती है। दूसरे लोग तो केवल बातें बनानेवाले होते हैं

भीष्म ने कहा—तात! जो स्थिर पराक्रमी, तत्त्व-बोध के इच्छुक और सत्त्वपथ में स्थित हैं, जिनकी दृष्टि में लाभ-हानि, सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरण समान हैं, जो ममता और अहंकार से रहित होकर द्वन्द्वों को समभाव से देखते हैं—ऐसे धर्मप्रिय महात्माओं की तुम सावधान रहकर और इन्द्रियों को वश में रखकर सेवा-सत्कार करो। शुभ-अशुभ के विषय में उनकी वाणी यथार्थ होती है; अन्य लोग तो केवल दिखावे की बातें करते हैं।

Verse 35

धर्मप्रियांस्तानू सुमहानु भावान्‌ दान्तो5प्रमत्तश्न॒ समर्चयेथा: । दैवात्‌ सर्वे गुणवन्तो भवन्ति शुभाशुभे वाक्प्रलापास्तथान्ये,तात! जो लाभमें हर्षसे फूल नहीं उठते, हानिमें व्यथित नहीं होते, ममता और अहंकारसे शून्य हैं, जो सर्वदा सत्त्वगुणमें स्थित और समदर्शी होते हैं, जिनकी दृष्टिमें लाभ- हानि सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरण समान हैं, जो सुदृढ़ पराक्रमी, आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक और सत्त्वमय मार्ममें स्थित हैं, उन धर्मप्रेमी महानुभावोंकी तुम सावधान और जितेन्द्रिय रहकर सेवा-सत्कार करो। ये सब महापुरुष स्वभावसे ही बड़े गुणवान्‌ होते हैं। शुभ और अशुभके विषयमें उनकी वाणी यथार्थ होती है। दूसरे लोग तो केवल बातें बनानेवाले होते हैं

आत्मसंयम और निरन्तर सावधानी के साथ उन धर्मप्रिय, अत्यन्त महानुभाव पुरुषों का सम्मान और सेवा करो। दैववश (और स्वभावतः) वे गुणसम्पन्न होते हैं; शुभ-अशुभ के विषय में उनकी वाणी सत्य और विश्वसनीय होती है, जबकि अन्य लोग केवल निरर्थक प्रलाप करते हैं।

Verse 123

नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधि: । कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य जन्मकालमें, बाल्यावस्थामें तथा कौमार और यौवनावस्थामें जिसके कारण अपने बुरे कर्मोको छोड़ नहीं पाते हैं, जो मनुष्यके वृद्ध होनेपर भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है। जिस प्रकार गहरे जलवाली बहुत-सी नदियोंके मिल जानेसे भी समुद्र नहीं भरता है, उसी प्रकार कितने ही पदार्थोका लाभ क्‍यों न हो जाय, लोभका पेट कभी नहीं भरता है

भीष्म ने कहा—हे कुरुश्रेष्ठ! जो जन्मकाल में, बाल्य में, कौमार में और यौवन में मनुष्य को अपने दुष्कर्म छोड़ने नहीं देता, और मनुष्य के वृद्ध हो जाने पर भी जो जीर्ण नहीं होता—वह लोभ ही है। जैसे गहरे जल वाली अनेक नदियाँ समुद्र में मिलकर भी उसे नहीं भर पातीं, वैसे ही कितने ही पदार्थों का लाभ हो जाए, लोभ का पेट कभी नहीं भरता।

Verse 156

भवन्त्येतानि कौरव्य लुब्धानामकृतात्मनाम्‌ | जिसने अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें कर लिया है, उस पुरुषको चाहिये कि वह मोहसहित लोभको जीते। कुरुनन्दन! दम्भ, द्रोह, निन्‍दा, चुगली, और मत्सरता--ये सभी दोष अजितात्मा लोभी पुरुषोंमें ही होते हैं

भीष्म ने कहा—हे कौरव्य! ये दोष उन्हीं लोभी पुरुषों में उत्पन्न होते हैं जिन्होंने अपने-आप को वश में नहीं किया है। जिसने मन और इन्द्रियों को काबू में कर लिया हो, उसे मोह के सहित लोभ को जीतना चाहिए। हे कुरुनन्दन! दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली और मत्सर—ये सब दोष अजितात्मा लोभी पुरुषों में ही पाए जाते हैं।

Verse 158

इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि आपन्मूलभूतदोषकथने अष्टपञज्चाशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें आपत्तिके यूलशूत दोषका वर्णनविषयक एक सौ अद्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत आपद्धर्मपर्व में ‘आपत्ति के मूलभूत दोषों’ के वर्णनविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 163

छेत्तार: संशयानां च क्लिश्यन्तीहाल्पबुद्धय: । बहुश्रुत विद्वान्‌ बड़े-बड़े शास्त्रोंकी कण्ठस्थ कर लेते हैं। सबकी शंकाओंका निवारण कर देते हैं; परंतु इस लोभमें फँसकर उनकी बुद्धि मारी जाती है और वे निरन्तर क्लेश उठाते रहते हैं

भीष्म बोले—जो बहुत पढ़े-लिखे और विद्वान् होते हैं, जो दूसरों के संशय काटकर प्रश्नों का समाधान कर देते हैं, वे भी यदि बुद्धि से अल्प हों तो इस लोक में क्लेश पाते हैं। लोभ और लाभ-यश की आसक्ति में फँसकर उनका विवेक ढँक जाता है और वे निरन्तर दुःख भोगते रहते हैं।

Frequently Asked Questions

How a ruler should uphold ritual and social obligations when resources, compliance, or competence are uneven—balancing regulated generosity with limited corrective intervention to prevent institutional collapse.

Normative order is sustained through properly directed giving, correctly supported rites, and repair mechanisms (prāyaścitta); ethical governance is framed as maintaining these systems with proportionality and rule-based discretion.

Yes: the chapter repeatedly links proper dakṣiṇā and disciplined conduct to auspicious outcomes, while portraying deficient support, prohibited conduct, and improper association as producing degradation that must be addressed through specified expiations.