अज्ञान–लोभयोः परस्परहेतुत्वम्
Mutual Causality of Ignorance and Greed
त्यजतां जीवितं श्रेयो निवृत्ते पुण्यपापके । इस संसारके सम्पूर्ण प्राणियोंमें जब दुःख ही नहीं है
śaunaka uvāca | tyajatāṃ jīvitaṃ śreyo nivṛtte puṇya-pāpake |
जिनके पुण्य और पाप दोनों निवृत्त हो चुके हैं, उनके लिए तो जीवन का त्याग भी श्रेयस्कर कहा गया है। क्योंकि इस संसार में दुःख के बिना सुख कहाँ मिलता है? सुख और दुःख—ये प्रकृतिस्थ प्राणियों के धर्म हैं, जो संसर्ग के दोषों से उत्पन्न होते हैं। पर जिन्होंने ममता और अहंकार के साथ सब कुछ त्याग दिया है, और जिनके पुण्य-पाप दोनों शांत हो गए हैं—ऐसे पुरुषों का जीवन ही कल्याणमय हो जाता है।
शौनक उवाच