Tapas, Tīrtha, and Moral Rehabilitation (Śānti-parva 148)
स विनिन्दंस्तथा55त्मानं पुन: पुनरुवाच ह । अविद्वास्य: सुदुर्बुद्धिः सदा निकृतिनिश्चय:
वह इस प्रकार बार-बार अपनी निंदा करता हुआ फिर-फिर कहने लगा—“मैं अत्यन्त दुष्ट बुद्धि का, अविश्वसनीय मनुष्य हूँ; छल और क्रूरता ही मेरा निश्चय बन गया है।”
भीष्म उवाच