आपद्धर्मनिर्णयः — विश्वामित्र-श्वपचसंवादः
Apaddharma Determination: Dialogue of Viśvāmitra and the Śvapaca
यो यस्मिन् जीवति स्वार्थ पश्येत् पीडां न जीवति । स तस््य मित्र तावत् स्याद् यावन्न स्याद् विपर्यय:
जो किसी के जीवित रहते अपना स्वार्थ सधता देखता है और उसके मर जाने पर अपनी हानि मानता है, वह तब तक उसका मित्र बना रहता है—जब तक इस दशा में कोई उलट-फेर न हो जाए।
भीष्म उवाच