
Kāpavya-carita (कापव्यचरित) — Reforming Dasyus through Regulated Rāja-Dharma
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Parva (राजधर्मानुशासन पर्व) — Ethical Governance and Discipline
Bhīṣma introduces an ancient exemplum asserting that a boundaryless outlaw (dasyu) need not be spiritually ruined if reoriented to dharma. He describes Kāpavya, born of a Niṣāda mother and a kṣatriya father, who retains kṣatra-dharma while living in the forest: skilled in terrain, hunting, and protection, he supports blind and aged parents and sustains forest-dwelling renunciant brāhmaṇas with provisions. Disorderly raiders invite him to become their leader; he accepts on ethical conditions, issuing rules of engagement: do not harm women, children, ascetics, or noncombatants; do not seize women by force; ensure welfare for cows and brāhmaṇas; do not damage crops or disrupt ploughing; uphold reverence for gods, ancestors, and guests; and never insult brāhmaṇas, whose curse is portrayed as socially and cosmically decisive. He clarifies that punishment is for discipline, not gratuitous killing, while those who oppress the righteous merit decisive restraint. The raiders follow his governance, gain stable livelihood, abandon wrongdoing, and Kāpavya attains “siddhi” through protective leadership. A closing phalaśruti states that reciting this account dispels fear from forest beings and from humans and nonhumans alike, marking Kāpavya as a guardian figure of the wilderness.
Chapter Arc: युधिष्ठिर, पितामह भीष्म से पूछते हैं—जब समय अत्यन्त हीन हो, राज्य-रक्षा का आधार टूट जाए और आपत्ति सिर पर हो, तब ब्राह्मण कैसे जीवित रहे कि धर्म भी न टूटे और कुल भी न बिखरे? → भीष्म ‘विज्ञानबल’ (विवेक, शास्त्र-बुद्धि, आत्मसंयम) को आश्रय बनाकर जीवन-निर्वाह की बात कहते हैं, पर साथ ही चेताते हैं कि आपत्ति में भी अधर्म का बहाना न बने: निन्दा न करनी, न सुननी; दुष्ट संगति से हट जाना; और राजा को भी सुशिक्षित, वश में, भार-वहन में समर्थ बैलों की तरह संयमित होकर प्रजा-भार उठाना चाहिए। → भीष्म का तीखा निष्कर्ष—जो व्यक्ति ‘व्याज’ से धन खोजता है और विकर्म में पड़ता है, उसे देवता भी पतन की ओर ढकेलते हैं; ऐसे धन से धर्म क्षीण होता है। धर्म का पथ एक-एक पद रक्त-चिह्न की तरह सूक्ष्म संकेतों से पहचाना जाता है—जैसे घायल मृग के रक्त-लेप से उसका मार्ग जाना जाता है। → धर्म वही है जो वेद-विहित, स्मृति-सम्मत, सज्जन-सेवित और अंतःकरण से अनुमोदित हो; आपत्ति में भी उसी सूक्ष्म पथ पर चलना चाहिए। युधिष्ठिर को राजर्षियों के आचरण—सज्जनों के मार्ग—का अनुसरण करने का उपदेश देकर भीष्म अध्याय का उपसंहार करते हैं।
Verse 1
ऑपन-- माल बक। अकाल द्वात्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओंके धर्मका वर्णन तथा धर्मकी गतिको सूक्ष्म बताना युधिछिर उवाच हीने परमके धर्मे सर्वलोकाभिसंहिते । सर्वस्मिन् दस्युसादूभूते पृथिव्यामुपजीवने,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! यदि राजाका सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षापर अवलम्बित परम धर्म न निभ सके और भूमण्डलमें आजीविकाके सारे साधनोंपर लुटेरोंका अधिकार हो जाय, तब ऐसा जघन्य संकटकाल उपस्थित होनेपर यदि ब्राह्मण दयावश अपने पुत्रों तथा पौत्रोंका परित्याग न कर सके तो वह किस वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करे?
युधिष्ठिर बोले— पितामह! जब समस्त लोकों की रक्षा पर आधारित राजधर्म रूप परम धर्म निभ न सके और पृथ्वी पर आजीविका के सब साधन लुटेरों के वश में चले जाएँ, तब ऐसे जघन्य संकट-काल में यदि कोई ब्राह्मण करुणावश अपने पुत्र-पौत्रों का त्याग न कर सके, तो वह किस वृत्ति से जीवन धारण करे?
Verse 2
केन स्विद् ब्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते । असंत्यजनू पुत्रपौत्राननुक्रोशात् पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! यदि राजाका सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षापर अवलम्बित परम धर्म न निभ सके और भूमण्डलमें आजीविकाके सारे साधनोंपर लुटेरोंका अधिकार हो जाय, तब ऐसा जघन्य संकटकाल उपस्थित होनेपर यदि ब्राह्मण दयावश अपने पुत्रों तथा पौत्रोंका परित्याग न कर सके तो वह किस वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करे?
युधिष्ठिर बोले— पितामह! जब अत्यन्त जघन्य समय आ पहुँचे और आजीविका के सामान्य आधार नष्ट हो जाएँ, तब ब्राह्मण किस उपाय से जीवित रहे? यदि वह करुणावश पुत्र-पौत्रों का त्याग न करे, तो उस आपत्ति में उसके लिए कौन-सी वृत्ति उचित है?
Verse 3
भीष्म उवाच विज्ञानबलमास्थाय जीवितव्यं तथागते । सर्व साध्वर्थमेवेदमसाध्वर्थ न किंचन,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठि!! ऐसी परिस्थितिमें ब्राह्मगको तो अपने विज्ञान-बलका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करना चाहिये। इस जगतमें यह जो कुछ भी धन आदि दिखायी देता है, वह सब कुछ श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये ही है, दुष्टोंके लिये कुछ भी नहीं है
भीष्म बोले— युधिष्ठिर! ऐसी स्थिति आ जाने पर मनुष्य को विवेक और सत्य-ज्ञान के बल का आश्रय लेकर जीवन धारण करना चाहिए। इस जगत में जो धन आदि दिखाई देता है, वह सब साधु-पुरुषों के लिए है; दुष्टों के लिए वास्तव में कुछ भी नहीं।
Verse 4
असाधुभ्यो<र्थमादाय साधुभ्यो य: प्रयच्छति । आत्मानं संक्रमं कृत्वा कृच्छूधर्मविदेव सः,जो अपनेको सेतु बनाकर दुष्ट पुरुषोंसे धन लेकर श्रेष्ठ पुरुषोंको देता है, वह आपद्धर्मका ज्ञाता है
जो दुष्टों से धन लेकर साधु-पुरुषों को देता है और अपने को उस दान-प्रवाह का सेतु बना लेता है, वही कठिन आपत्ति-धर्म का सच्चा ज्ञाता है।
Verse 5
आकाड़क्षन्नात्मनो राज्यं राज्ये स्थितिमकोपयन् । अदत्तमेवाददीत दातुर्वित्तं ममेति च,जो अपने राज्यको बनाये रखना चाहे, उस राजाको उचित है कि वह राज्यकी व्यवस्थाका बिगाड़ न करते हुए ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाके उद्देश्यसे ही राज्यके धनियोंका धन मेरा ही है, ऐसा समझकर उनके दिये बिना भी बलपूर्वक ले ले
भीष्म बोले— जो राजा अपने राज्य की रक्षा चाहता हो, उसे शासन-व्यवस्था की मर्यादा बिगाड़े बिना, ब्राह्मण आदि प्रजा की रक्षा के लिए, धनी जनों के धन को ‘यह राज्य का है—मेरा है’ ऐसा मानकर, उनके न देने पर भी आवश्यकतानुसार बलपूर्वक लेना चाहिए।
Verse 6
विज्ञानबलपूतो यो वर्तते निन्दितेष्वपि । वृत्तिविज्ञानवान् धीर: कस्तं वा वक्तुमहति,जो तत्त्वज्ञानके प्रभावसे पवित्र है और किस वृत्तिसे किसका निर्वाह हो सकता है, इस बातको अच्छी तरह समझता है, वह धीर नरेश यदि राज्यको संकटसे बचानेके लिये निन्दित कर्मोमें भी प्रवृत्त होता है तो कौन उसकी निन्दा कर सकता है?
जो तत्त्वज्ञान के बल से पवित्र है और यह भली-भाँति जानता है कि किस वृत्ति से किसका निर्वाह होता है—ऐसा धीर, विवेकी राजा यदि राज्य को संकट से बचाने के लिए निन्दित कर्मों में भी प्रवृत्त हो, तो उसकी निन्दा करने योग्य कौन है?
Verse 7
येषां बलकृता वृत्तिस्तेषामन्या न रोचते । तेजसाभिप्रवर्तन्ते बलवन्तो युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! जो बल और पराक्रमसे ही जीविका चलानेवाले हैं, उन्हें दूसरी वृत्ति अच्छी नहीं लगती। बलवान पुरुष अपने तेजसे ही कर्मामें प्रवृत्त होते हैं
युधिष्ठिर! जिनकी जीविका बल और पराक्रम से चलती है, उन्हें दूसरी वृत्ति रुचिकर नहीं लगती। बलवान पुरुष अपने तेज से ही कर्मों में प्रवृत्त होते हैं।
Verse 8
यदैव प्राकृतं शास्त्रमविशेषेण वर्तते । तदैवमभ्यसेदेवं मेधावी वाप्यथोत्तरम्,जब आपद्धर्मोपयोगी प्राकृत शास्त्र ही सामान्यरूपसे चल रहा हो, उस आपफत्तिकालमें “अपने या दूसरेके राज्यसे जैसे भी सम्भव हो, धन लेकर अपना खजाना भरना चाहिये” इत्यादि वचनोंके अनुसार राजा जीवन-निर्वाह करे। परंतु जो मेधावी हो, वह इससे भी आगे बढ़कर “जो दो राज्योंमें रहनेवाले धनीलोग कंजूसी अथवा असदाचरणके द्वारा दण्ड पानेयोग्य हों, उनसे ही धन लेना चाहिये।' इत्यादि विशेष शास्त्रोंका अवलम्बन करे
जब सामान्य (प्राकृत) शास्त्र बिना किसी विशेष भेद के ही लागू हो, तब उसी के अनुसार आचरण करना चाहिए। पर जो मेधावी हो, वह स्थिति के अनुरूप उससे भी आगे बढ़कर अधिक विशिष्ट और उच्चतर निर्देशों का आश्रय ले।
Verse 9
ऋषत्विक्पुरोहिताचार्यान् सत्कृतानभिसत्कृतान् । न ब्राह्मणान् घातयीत दोषान् प्राप्रोति घातयन्,कितनी ही आपत्ति क्यों न हो, ऋत्विक्ू, पुरोहित, आचार्य तथा सत्कृत या असत्कृत ब्राह्मणोंसे, वे धनी हों तो भी धन लेकर उन्हें पीड़ा न दे। यदि राजा उन्हें धनापहरणके द्वारा कष्ट देता है तो पापका भागी होता है
कितनी ही आपत्ति क्यों न हो, ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य तथा सत्कृत या असत्कृत ब्राह्मणों को कष्ट न दे; वे धनी हों तो भी उनका धन छीनकर उन्हें पीड़ा न पहुँचाए। जो ब्राह्मणों को दुःख देता है, वह दोष (पाप) का भागी होता है।
Verse 10
एतत् प्रमाणं लोकस्य चक्षुरेतत् सनातनम् | तत् प्रमाणो&वगाहेत तेन तत् साध्वसाधु वा,यह मैंने तुम्हें सब लोगोंके लिये प्रमाणभूत बात बतायी है। यही सनातन दृष्टि है। राजा इसीको प्रमाण मानकर व्यवहारक्षेत्रमें प्रवेश करे तथा इसीके अनुसार आपत्तिकालमें उसे भले या बुरे कार्यका निर्णय करना चाहिये
यह मैंने तुम्हें सब लोगों के लिए प्रमाणभूत बात बताई है; यही सनातन दृष्टि है। राजा इसी को प्रमाण मानकर व्यवहार-क्षेत्र में प्रवेश करे और इसी के अनुसार आपत्तिकाल में भले-बुरे कर्म का निर्णय करे।
Verse 11
बहवो ग्रामवास्तव्या रोषाद् ब्रूयु: परस्परम् । न तेषां वचनाद् राजा सत्कुर्याद् घातयीत वा,यदि बहुत-से ग्रामवासी मनुष्य परस्पर रोषवश राजाके पास आकर एक- दूसरेकी निन्दा-स्तुति करें तो राजा केवल उनके कहनेसे ही किसीको न तो दण्ड दे और न किसीका सत्कार ही करे
यदि बहुत-से ग्रामवासी क्रोधवश परस्पर एक-दूसरे के विषय में राजा के सामने निन्दा-स्तुति करें, तो राजा केवल उनके कहने भर से न किसी को दण्ड दे और न किसी का सत्कार करे; बिना सम्यक् जाँच के जन-कलह और पक्षपाती वृत्तान्त को निर्णय का आधार न बनाए।
Verse 12
न वाच्य: परिवादो<यं न श्रोतव्य:ः कथड्चन । कर्णावथ पिधातव्यौ प्रस्थेयं चान्यतो भवेत्,किसीकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये और न उसे किसी प्रकार सुनना ही चाहिये। यदि कोई दूसरेकी निन्दा करता हो तो वहाँ अपने कान बंद कर ले अथवा वहाँसे उठकर अन्यत्र चला जाय
ऐसी निन्दा न तो कहनी चाहिए और न किसी प्रकार सुननी चाहिए। यदि कोई दूसरे की निन्दा करता हो, तो अपने कान बन्द कर ले अथवा वहाँ से उठकर अन्यत्र चला जाए।
Verse 13
असतां शीलमेतद् वै परिवादो5थ पैशुनम् । गुणानामेव वक्तार: सन्त: सत्सु नराधिप,नरेश्वर! दूसरोंकी निन्दा करना या चुगली खाना यह दुष्टोंका स्वभाव ही होता है। श्रेष्ठ पुरुष तो सज्जनोंके समीप दूसरोंके गुण ही गाया करते हैं
नरेश्वर! दूसरों की निन्दा और चुगली करना दुष्टों का स्वभाव है। सज्जन तो सज्जनों के बीच रहकर दूसरों के गुणों का ही वर्णन करते हैं।
Verse 14
यथा सुमधुरौ दम्यौ सुदान्तौ साधुवाहिनौ | धुरमुद्यम्य वहतास्तथा वर्तेत वै नृप:,जैसे मनोहर आकृतिवाले, सुशिक्षित तथा अच्छी तरहसे बोझ ढोनेमें समर्थ नयी अवस्थाके दो बैल कंधोंपर भार उठाकर उसे सुन्दर ढंगसे ढोते हैं, उसी प्रकार राजाको भी अपने राज्यका भार अच्छी तरह सँभालना चाहिये
जैसे मनोहर, सुशिक्षित, भली-भाँति वश में किए हुए और जुए का भार ढोने में समर्थ दो युवा बैल कन्धों पर धुरा उठाकर उसे स्थिरता से सुन्दर ढंग से वहन करते हैं, वैसे ही राजा को भी अपने राज्य-भार को कुशलता से धारण और संचालित करना चाहिए।
Verse 15
यथा यथास्य बहव: सहाया: स्युस्तथा परे | आचारमेव मन्यन्ते गरीयो धर्मलक्षणम्,जैसे-जैसे आचरणोंसे राजाके बहुत-से दूसरे लोग सहायक हों, वैसे ही आचरण उसे अपनाने चाहिये। धर्मज्ञ पुरुष आचारको ही धर्मका प्रधान लक्षण मानते हैं
राजा को जैसा आचरण बहुत-से सहायक और श्रेष्ठ जन स्वीकार करते हों, वैसा ही आचरण अपनाना चाहिए; क्योंकि धर्मज्ञ पुरुष आचार को ही धर्म का सबसे भारी लक्षण मानते हैं।
Verse 16
अपरे नैवमिच्छन्ति ये शंखलिखितप्रिया: । मात्सर्यादथवा लोभान्न ब्रूयुर्वाक्यमीदूशम्,किंतु जो शंख और लिखित मुनिके प्रेमी हैं--उन्हींके मतका अनुसरण करनेवाले हैं, वे दूसरे-दूसरे लोग इस उपर्युक्त मत (ऋत्विक् आदिको दण्ड न देने आदि) को नहीं स्वीकार करते हैं। वे लोग ईर्ष्या अथवा लोभसे ऐसी बात नहीं कहते हैं (धर्म मानकर ही कहते हैं)
भीष्म बोले—परन्तु जो शंख और लिखित ऋषियों के भक्त हैं, वे इस मत को स्वीकार नहीं करते। फिर भी वे ईर्ष्या या लोभ से ऐसी बात नहीं कहते; जिसे वे धर्म मानते हैं, उसी के अनुसार कहते हैं।
Verse 17
आर्षमप्यत्र पश्यन्ति विकर्मस्थस्य पातनम् | न तादृक्सदृशं किज्चित् प्रमाणं दृश्यते क्वचित्,शास्त्र-विपरीत कर्म करनेवालेको दण्ड देनेकी जो बात आती है, उसमें वे आर्षप्रमाण भी देखते हैं-। ऋषियोंके वचनोंके समान दूसरा कोई प्रमाण कहीं भी दिखायी नहीं देता
यहाँ वे शास्त्र-विपरीत कर्म में लगे हुए व्यक्ति के पतन के विषय में आर्ष-प्रमाण भी देखते हैं। ऋषियों के वचनों के समान वैसा दूसरा कोई प्रमाण कहीं नहीं दिखाई देता।
Verse 18
देवताश्न विकर्मस्थं पातयन्ति नराधमम् | व्याजेन विन्दन वित्त हि धर्मात् स परिहीयते,देवता भी विपरीत कर्ममें लगे हुए अधम मनुष्यको नरकोंमें गिराते हैं; अतः जो छलसे धन प्राप्त करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है
भीष्म बोले—देवता भी विपरीत कर्म में लगे हुए अधम मनुष्य को नरकों में गिराते हैं। अतः जो छल और बहाने से धन प्राप्त करता है, वह धर्म से गिर जाता है और धर्महीन हो जाता है।
Verse 19
सर्वतः सत्कृत: सद्धिर्भूतिप्रवरकारणै: । हृदयेना भ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं व्यवस्यति,ऐश्वर्यकी प्राप्तिके जो प्रधान कारण हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष जिसका सब प्रकारसे सत्कार करते हैं तथा हृदयसे भी जिसका अनुमोदन होता है, राजा उसी धर्मका अनुष्ठान करे
ऐश्वर्य की प्राप्ति के जो प्रधान कारण हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष जिस धर्म का सब प्रकार से सत्कार करते हैं और जिसे हृदय भी स्वीकार करता है—राजा उसी धर्म का दृढ़ निश्चय करके अनुष्ठान करे।
Verse 20
यश्षतुर्गुणसम्पन्नं धर्म ब्रूयात् स धर्मवित् । अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम्,जो वेदविहित, स्मृतियोंद्वारा अनुमोदित, सज्जनोंद्वारा सेवित तथा अपनेको प्रिय लगनेवाला धर्म है, उसे चतुर्गुणसम्पन्न माना गया है। जो वैसे धर्मका उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है। सर्पके पदचिह्नकी भाँति धर्मके यथार्थ स्वरूपको ढूँढ़ निकालना बहुत कठिन है। जैसे बाणसे बिंधे हुए मृगका एक पैर पृथ्वीपर रक्तका लेप कर देनेके कारण व्याधको उस मृगके रहनेके स्थानको लक्षित कराकर वहाँ पहुँचा देता है, उसी प्रकार उक्त चतुर्गुणसम्पन्न धर्म भी धर्मके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है
जो चतुर्गुण-सम्पन्न धर्म का उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है; क्योंकि धर्म का यथार्थ ‘पदचिह्न’ सर्प के पदचिह्न की भाँति ढूँढ़ निकालना अत्यन्त कठिन है।
Verse 21
यथा मृगस्य विद्धस्य पदमेकं पद नयेत् । लक्षेद् रुधिरलेपेन तथा धर्मपदं नयेत्,जो वेदविहित, स्मृतियोंद्वारा अनुमोदित, सज्जनोंद्वारा सेवित तथा अपनेको प्रिय लगनेवाला धर्म है, उसे चतुर्गुणसम्पन्न माना गया है। जो वैसे धर्मका उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है। सर्पके पदचिह्नकी भाँति धर्मके यथार्थ स्वरूपको ढूँढ़ निकालना बहुत कठिन है। जैसे बाणसे बिंधे हुए मृगका एक पैर पृथ्वीपर रक्तका लेप कर देनेके कारण व्याधको उस मृगके रहनेके स्थानको लक्षित कराकर वहाँ पहुँचा देता है, उसी प्रकार उक्त चतुर्गुणसम्पन्न धर्म भी धर्मके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है
भीष्म ने कहा—जैसे बाण से बिंधे हुए मृग के पदचिह्न रक्त के लेप से चिन्हित हो जाते हैं और शिकारी को कदम-कदम पर उसके ठिकाने तक पहुँचा देते हैं, वैसे ही धर्म के ‘पदचिह्न’ तक भी पहुँचा जा सकता है। धर्म का यथार्थ स्वरूप सर्प के पदचिह्न की भाँति अत्यन्त कठिनता से जाना जाता है; पर जो धर्म (1) वेद-विहित हो, (2) स्मृतियों द्वारा अनुमोदित हो, (3) सज्जनों द्वारा आचरित हो, और (4) अंतःकरण को प्रिय व हितकर लगे—वह चतुर्गुणसम्पन्न धर्म मार्गदर्शक बनकर धर्म के वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति करा देता है। जो ऐसे धर्म का उपदेश करता है, वही सच्चा धर्मज्ञ है।
Verse 22
एवं सद्धिर्विनीतेन पथा गन्तव्यमित्युत । राजर्षीणां वृत्तमेतदवगच्छ युधिछ्ठिर,युधिष्ठिर! इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम्हें भी चलना चाहिये। इसीको तुम राजर्षियोंका सदाचार समझो
भीष्म ने कहा—इस प्रकार कहा गया है कि श्रेष्ठ जनों द्वारा अपनाए गए संयमित और सु-नियंत्रित मार्ग पर ही चलना चाहिए। हे युधिष्ठिर, इसे राजर्षियों का स्थापित सदाचार समझो—यही आचरण ग्रहण करने और जीने योग्य है।
Verse 132
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि राजर्षिवृत्तं नाम द्वात्रिशयदिधिकशततमो<ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के आपद्धर्मपर्व में ‘राजर्षिवृत्त’ नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
How a leader can transform a violent, unregulated collective into a rule-bound community by restricting harm, protecting vulnerable groups, and redefining coercion as disciplined governance rather than predation.
Authority is legitimate only when bounded by prohibitions against harming noncombatants, when it safeguards productive and ritual life (crops, hospitality, cows, brāhmaṇas), and when punishment is corrective rather than arbitrary.
Yes. The text states that one who regularly recounts Kāpavya’s conduct does not experience fear from forest beings, nor fear from humans or nonhumans, presenting the narrative as a protective recollection tied to ethical order.