
आपद्धर्मे कोशबलन्यायः | Treasury, Force, and Crisis-Ethics for the King
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Instruction on Kingship)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to define the proper course for a ruler who is abandoned by allies, surrounded by many adversaries, weakened in force, and suffering a depleted treasury, with counsel compromised and the kingdom destabilized. Bhīṣma responds that the inquiry is subtle and context-bound: dharma is refined and must be learned through śāstra and disciplined conduct. He then advances a central rājadharma thesis: depletion of the treasury produces depletion of strength; therefore the king must regenerate the kośa in timely ways, because different dharmas apply in prosperity and in distress (āpaddharma). For a kṣatriya facing livelihood obstruction, taking resources is permitted with exclusions (not from ascetics and Brahmins), since protection of subjects defines the office. Begging and certain livelihoods are rejected as unsuitable for kingship; instead, the king must preserve state capacity and maintain mutual protection between ruler and realm in emergencies. Bhīṣma further argues that wealth enables both worldly and ethical aims, including ritual obligations; thus, acquiring resources through multiple lawful or necessity-framed means is treated as instrumentally justified for sustaining order. An analogy of cutting trees for a sacrificial post illustrates that collateral actions can be ethically evaluated by their public-purpose necessity and governance intent.
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—हे राजशार्दूल, एक समय तीर्थ-यात्रा करते हुए मैं दिव्य नर-नारायण आश्रम पहुँचा, जहाँ बदरीवन, वैहायस-ह्रद और वेदपाठी अश्वशिरा की पवित्र उपस्थिति है। → आश्रम-परिसर में एक कृश, भयभीत ब्राह्मण को देखकर कथावाचक-राजा (भीष्म के स्मरण में) विचलित होता है; उसके असामान्य भय और दीनता के पीछे छिपे कारण को जानने की उत्कंठा बढ़ती है। तनु मुनि ध्यानमग्न होकर राजा की बात सुनते हैं और मौन-गंभीरता से प्रसंग को धर्म-कारण की ओर मोड़ते हैं। → तनु मुनि निर्णायक कारण बताते हैं—राजन्, तुम्हारे पुत्र ने पूर्व में मूढ़-बुद्धि के वशीभूत होकर अपने दुर्भाग्य से एक पूजनीय महर्षि का अपमान किया था; उसी अपराध का फल आज भय, पतन और क्लेश के रूप में प्रकट है। → नर-नारायण आश्रम की मर्यादा, वैहायस-कुण्ड में स्नान, देव-पितृ तर्पण और ऋषि-संग के माध्यम से कथा प्रायश्चित्त, विनय और धर्म-शुद्धि की दिशा दिखाती है—अपराध का मूल अहंकार है और उसका उपचार श्रद्धा, क्षमा-याचना तथा सत्संग है।
Verse 1
ऑपन-माज बक। डे सप्तविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: ऋषभका राजा सुमित्रको वीरद्युम्न और तनु मुनिका वृत्तान्त सुनाना भीष्म उवाच ततस्तेषां समस्तानामृषीणामृषिसत्तम: । ऋषभो नाम विदप्रर्षिविस्मयन्निदमब्रवीत्,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर उन समस्त ऋषियोंमेंसे मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि ऋषभने विस्मित होकर इस प्रकार कहा--
भीष्म बोले—तत्पश्चात उन समस्त ऋषियों में मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि ऋषभ, विस्मित होकर, इस प्रकार बोले।
Verse 2
पुराहं राजशार्दूल तीर्थान्यनुचरन् प्रभो । समासादितवान् दिव्यं नरनारायणाश्रमम्,नृपश्रेष्ठ पहलेकी बात है, मैं सब तीर्थोमें विचरण करता हुआ भगवान् नरनारायणके दिव्य आश्रममें जा पहुँचा
भीष्म बोले—हे राजशार्दूल! हे प्रभो! पूर्वकाल में मैं तीर्थों में विचरण करता हुआ भगवान् नर-नारायण के दिव्य आश्रम में जा पहुँचा।
Verse 3
यत्र सा बदरी रम्या हृदो वैहायसस्तथा । यत्र चाश्वशिरा राजन् वेदान् पठति शाश्वतान्
भीष्म बोले—हे राजन्! जहाँ वह रमणीय बदरी है, जहाँ वैहायस-ह्रद है, और जहाँ अश्वशिरा सनातन वेदों का पाठ करते हैं।
Verse 4
'राजन्! जहाँ वह रमणीय बदरीका वृक्ष है, जहाँ वैहायस- कुण्ड है तथा जहाँ अश्वशिरा (हयग्रीव) सनातन वेदोंका पाठ करते हैं (वहीं नरनारायणाश्रम है) ।। तस्मिन् सरसि कृत्वाहं विधिवत् तर्पणं पुरा । पितृणां देवतानां च ततो55श्रममियां तदा
उस सरोवर में मैंने पूर्वकाल में पितरों और देवताओं के लिए विधिपूर्वक तर्पण किया; तत्पश्चात उसी समय मैं उस आश्रम की ओर गया।
Verse 5
अदूरादाश्रमं कज्चिद् वासार्थमगमं तदा,उसके बाद वहाँसे निकट ही एक-दूसरे आश्रममें मैं ठहरनेके लिये गया। वहाँ मुझे तनु नामवाले एक तपोधन ऋषि आते दिखायी दिये, जो चीर और मृगचर्म धारण किये हुए थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा और अत्यन्त दुर्बल था
भीष्म बोले—फिर वहाँ से अधिक दूर नहीं, मैं रहने के लिए एक दूसरे आश्रम में गया। वहाँ मैंने तनु नाम के तपोधन महर्षि को आते देखा—वे चीर-वस्त्र और मृगचर्म धारण किए हुए थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा और अत्यन्त कृश था।
Verse 6
तत्र चीराजिनधरं कृशमुच्चमतीव च । अद्राक्षमृषिमायान्तं तनुं नाम तपोधनम्,उसके बाद वहाँसे निकट ही एक-दूसरे आश्रममें मैं ठहरनेके लिये गया। वहाँ मुझे तनु नामवाले एक तपोधन ऋषि आते दिखायी दिये, जो चीर और मृगचर्म धारण किये हुए थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा और अत्यन्त दुर्बल था
वहाँ मैंने चीर और मृगचर्म धारण किए हुए, अत्यन्त ऊँचे और बहुत कृश—तपोधन ऋषि तनु को आते देखा।
Verse 7
अन्यैनरिरमहाबाहो वपुषाष्टगुणान्वितम् । कृशता चापि राजर्षे न दृष्टा तादृशी क्वचित्,महाबाहो! उन महर्षिका शरीर दूसरे मनुष्योंसे आठ गुना लंबा था। राजर्षे! मैंने उनकी- जैसी दुर्बलता कहीं भी नहीं देखी है
भीष्म बोले—महाबाहो! उस महर्षि का शरीर अन्य मनुष्यों की अपेक्षा आठ गुना ऊँचा था। राजर्षे! उनकी जैसी अत्यन्त कृशता मैंने कहीं भी नहीं देखी।
Verse 8
शरीरमपि राजेन्द्र तस्य कानिषप्ठिकासमम् । ग्रीवा बाहू तथा पादौ केशाश्षाद्भुतदर्शना:,'राजेन्द्र। उनका शरीर भी कनिष्ठिका अंगुलीके समान पतला था। उनकी गर्दन, दोनों भुजाएँ, दोनों पैर और सिरके बाल भी अद्भुत दिखायी देते थे
भीष्म बोले—राजेन्द्र! उनका शरीर भी कनिष्ठिका के समान पतला था। उनकी गर्दन, दोनों भुजाएँ, दोनों पाँव और सिर के केश—सब अद्भुत प्रतीत होते थे।
Verse 9
शिर: कायानुरूपं च कर्णो नेत्रे तथैव च । तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम,शरीरके अनुरूप ही उनके मस्तक, कान और नेत्र भी थे। नृपश्रेष्ठ] उनकी वाणी और चेष्टा साधारण थी
भीष्म बोले—राजसत्तम! उनका मस्तक शरीर के अनुरूप था; वैसे ही उनके कान और नेत्र भी। पर उनकी वाणी और चेष्टा साधारण थी।
Verse 10
दृष्टवाहं तं कृश विप्रं भीत: परमदुर्मना: । पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थित: प्राउजलिरग्रत:,मैं उन दुबले-पतले ब्राह्मणको देखकर डर गया और मन-ही-मन बहुत दुखी हो गया; फिर उनके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ा हो गया
उस दुबले-पतले ब्राह्मण को देखकर मैं भयभीत हो गया और मन-ही-मन अत्यन्त व्याकुल हो उठा। फिर उनके चरणों में प्रणाम करके, दोनों हाथ जोड़कर, उनके सामने खड़ा हो गया।
Verse 11
निवेद्य नामगोत्रे च पितरं च नरर्षभ । प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम्,नरश्रेष्ठ) उनके सामने नाम, गोत्र और पिताका परिचय देकर उन्हींके दिये हुए आसन पर धीरेसे बैठ गया
नरश्रेष्ठ! उनके सामने अपना नाम, गोत्र और पिता का परिचय निवेदित करके, उन्हीं के बताए हुए आसन पर मैं धीरे-धीरे बैठ गया।
Verse 12
ततः स कथयामास कथां धर्मार्थसंहिताम् । ऋषिमध्ये महाराज तनुर्धर्मभूतां वर:,महाराज! तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु ऋषियोंके बीचमें बैठकर धर्म और अर्थसे युक्त कथा कहने लगे
महाराज! तत्पश्चात धर्मात्माओं में श्रेष्ठ तनु ऋषियों के बीच बैठकर धर्म और अर्थ से युक्त कथा कहने लगे।
Verse 13
तस्मिंस्तु कथयत्येव राजा राजीवलोचन: । उपायाज्जवनैरश्वे: सबल: सावरोधन:,उनके कथा कहते समय ही कमलके समान नेत्रोंवाले एक नरेश वेगशाली घोड़ोंद्वारा अपनी सेना और अन्तःपुरके साथ वहाँ आ पहुँचे
उनके कथा कहते ही, कमल-नेत्रोंवाले एक राजा वेगवान घोड़ों पर चढ़कर, अपनी सेना और अन्तःपुर सहित वहाँ आ पहुँचे।
Verse 14
स्मरन् पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मना: । भूरिद्युम्नपिता श्रीमान् वीरद्युम्नो महायशा:,उनका पुत्र जंगलमें खो गया था। उसकी याद करके वे बहुत दुखी हो रहे थे। उनके पुत्रका नाम था भूरिद्युम्न और वे उसके महायशस्वी पिता श्रीमान् वीरद्युम्न थे
वन में खोए हुए अपने पुत्र का स्मरण करके वे अत्यन्त दुःखी हो रहे थे। उनके पुत्र का नाम भूरिद्युम्न था और वे उसके श्रीमान्, महायशस्वी पिता वीरद्युम्न थे।
Verse 15
इह द्रक्ष्यामि त॑ पुत्र द्रक्ष्यामीहेति पार्थिव: । एवमाशाहतो राजा चरन् वनमिदं पुरा,यहाँ उस पुत्रको अवश्य देखूँगा। यहाँ वह निश्चय ही दिखायी देगा। इसी आशासे बँधे हुए पृथ्वीपति राजा वीरद्युम्न उन दिनों उस वनमें विचर रहे थे
“यहीं मैं उस पुत्र को अवश्य देखूँगा—यहीं वह निश्चय ही दिखाई देगा।” ऐसी आशा से बँधा हुआ पृथ्वीपति राजा, खोए हुए को पाने की उत्कंठा में, उन दिनों इस वन में विचरता रहा।
Verse 16
दुर्लभ: स मया द्र॒ष्ट नूनं परमधार्मिक: । एक: पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत् तदा,“वह बड़ा धर्मात्मा था। अब उसका दर्शन होना अवश्य ही मेरे लिये दुर्लभ है। एक ही बेटा था, वह भी इस विशाल वनमें खो गया' इन्हीं बातोंको वे बार-बार दुहराते थे
“वह परम धर्मात्मा था; अब उसका दर्शन मेरे लिए निश्चय ही दुर्लभ है। मेरा तो एक ही पुत्र था, और वह इस विशाल वन में खो गया”—ऐसी बातें वे तब बार-बार दुहराते रहते थे।
Verse 17
दुर्लभ: स मया द्रष्टमाशा च महती मम । तया परीतगात्रो5हं मुमूर्षुर्नात्र संशय:,“मेरे लिये उसका दर्शन दुर्लभ है तो भी मेरे मनमें उसके मिलनेकी बड़ी भारी आशा लगी हुई है। उस आशाने मेरे सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लिया है। इसमें संदेह नहीं कि मैं उसके लिये मौतको भी स्वीकार कर लेना चाहता हूँ
“मेरे लिए उसका दर्शन दुर्लभ है, फिर भी मेरे हृदय में उससे मिलने की बड़ी आशा जगी है। उसी आशा ने मेरे समूचे शरीर को जकड़ लिया है। इसमें संदेह नहीं—उसके लिए मैं मृत्यु को भी स्वीकार करने को तैयार हूँ।”
Verse 18
एतच्छुत्वा तु भगवांस्तनुर्मुनिवरोत्तम: । अवाक्शिरा ध्यानपरो मुहूर्तमिव तस्थिवान्,राजाकी यह बात सुनकर मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् तनु नीचे सिर किये ध्यानमग्न हो दो घड़ीतक चुपचाप बैठे रह गये
राजा की यह बात सुनकर मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् तनु ने सिर झुका लिया और ध्यान में लीन होकर कुछ समय तक मौन और स्थिर बैठे रहे।
Verse 19
तमनुध्यान्तमालक्ष्य राजा परमदुर्मना: । उवाच वाकयं दीनात्मा मन्दं मन्दमिवासकृत्,उनको चिन्तन करते देख परम दुखी हुए नरेश दीनहृदय हो मन्द-मन्द वाणीमें बारंबार इस प्रकार कहने लगे--
उन्हें ध्यान में लीन देखकर राजा अत्यन्त व्याकुल हो उठा। दीन हृदय होकर वह मन्द-मन्द स्वर में, बार-बार, जैसे शोक से रुक-रुककर, इस प्रकार बोलने लगा।
Verse 20
दुर्लभं कि नु देवर्षे आशायाश्वैव कि महत् । ब्रवीतु भगवानेतद् यदि गुह्यां न ते मयि,“देवर्ष! कौन वस्तु दुर्लभ है? और आशासे भी बड़ा क्या है? यदि आपकी दृष्टिमें यह बात मुझसे छिपानेयोग्य न हो तो आप इसे अवश्य बतावें"
भीष्म बोले—देवर्षे! वास्तव में कौन-सी वस्तु दुर्लभ है? और आशा से भी बढ़कर क्या है? यदि यह बात मुझसे छिपाने योग्य न हो, तो कृपा करके मुझे बताइए।
Verse 21
मुनिर्वाच महर्षिभ्भगवांस्तेन पूर्वमासीद् विमानित: । बालिशां बुद्धिमास्थाय मन्दभाग्यतया55त्मन:
मुनि बोले—पूर्वकाल में वह पूज्य महर्षि उसके द्वारा अपमानित किये गये थे। अपने ही दुर्भाग्य के कारण उसने मूर्खों की बुद्धि का आश्रय लिया, उनके स्तर पर उतर आया, और इसी से वह तिरस्कृत हुआ।
Verse 22
तब मुनिने कहा--राजन्! आपके उस पुत्रने पहले कभी मूढ़ बुद्धिका आश्रय लेकर अपने दुर्भाग्यके कारण एक पूजनीय महर्षिका अपमान कर दिया था ।। अर्थयन् कलशं राजन् काज्चनं वल्कलानि च | अवज्ञापूर्वकेनापि न सम्पादितवांस्तत: । निर्विण्ण: स तु विप्रर्षि्निसिश: समपद्यत,राजन्! वे उससे एक सुवर्णमय कलश और वल्कल माँग रहे थे। आपके पुत्रने अवहेलना करके भी महर्षिकी वह इच्छा पूरी नहीं की; इससे वे विप्र ऋषि अत्यन्त खिन्न और निराश हो गये थे
भीष्म बोले—राजन्! आपके पुत्र ने पहले कभी मूढ़ बुद्धि का आश्रय लेकर, अपने ही दुर्भाग्य के कारण, एक पूजनीय महर्षि का अपमान कर दिया था। वे महर्षि एक सुवर्णमय कलश और वल्कल-वस्त्र माँग रहे थे; पर आपके पुत्र ने अवहेलना करते हुए भी उनकी इच्छा पूरी न की। इससे वह ब्राह्मण-ऋषि अत्यन्त खिन्न होकर रात्रि में निराशापूर्ण संकल्प पर उतर आया।
Verse 23
एवमुक्तो5$भिवाद्याथ तमृषिं लोकपूजितम् | श्रान्तो5वसीदद् धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम,(ऋषभ कहते हैं--) नरश्रेष्ठ] उनके ऐसा कहनेपर उन लोकपूजित महर्षिको प्रणाम करके धर्मात्मा राजा वीरघ्युम्न तुम्हारे ही समान थककर शिथिल हो गये
ऐसा कहे जाने पर उसने लोकपूजित उस ऋषि को प्रणाम किया। फिर वह धर्मात्मा पुरुष थककर वहीं शिथिल हो बैठा—जैसे, नरश्रेष्ठ, तुम इस समय हो।
Verse 24
अर्घ्य तत: समानीय पाद्यं चैव महानृषि: । आरण्येनैव विधिना राज्ञे सर्व न्यवेदयत्,तत्पश्चात् उन महर्षिने तपोवनमें प्रचलित शिष्टाचारकी विधिसे राजाको पाद्य और अर्घ्य आदि सब वस्तुएँ अर्पित की
तत्पश्चात् उस महान् ऋषि ने अर्घ्य और पाद्य आदि मँगाकर, वन-आश्रम की मर्यादा के अनुसार, राजा को वे सब अर्पित किये।
Verse 25
ततस्ते मुनय:ः सर्वे परिवार्य नरर्षभम् । उपाविशन् नरव्यात्र सप्तर्षय इव ध्रुवम्,पुरुषसिंह! तब वे सभी मुनि नरश्रेष्ठ वीरद्मयुम्मको सब ओरसे घेरकर उनके पास बैठ गये, मानो सप्तर्षि ध्रुवको चारों ओरसे घेरकर शोभा पा रहे हों
तब वे सभी मुनि नरश्रेष्ठ को चारों ओर से घेरकर उनके समीप बैठ गए। हे पुरुषसिंह! वे ध्रुव तारे के चारों ओर स्थित सप्तर्षियों के समान शोभायमान प्रतीत हुए।
Verse 26
अपृच्छंश्वैव तं तत्र राजानमपराजितम् । प्रयोजनमिदं सर्वमाश्रमस्य निवेशने,उन सबने वहाँ उन अपराजित नरेशसे उस आश्रमपर पधारनेका सारा प्रयोजन पूछा
वहाँ उन सबने उस अपराजित नरेश से आश्रम में पधारने और वहाँ निवास स्थापित करने के समस्त प्रयोजन के विषय में पूछा—उसके धर्मार्थ अभिप्राय को जानने के लिए।
Verse 46
रेमाते यत्र तौ नित्यं नरनारायणावृषी । उस वैहायस कुण्डमें स्नान करके मैंने विधिपर्वूक देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद उस आश्रममें प्रवेश किया, जहाँ मुनिवर नर और नारायण नित्य सानन्द निवास करते हैं
जहाँ नर और नारायण—वे दोनों ऋषि—नित्य आनन्दपूर्वक रमण करते हैं, वहाँ मैंने वैहायस कुण्ड में स्नान किया और विधिपूर्वक देवताओं तथा पितरों का तर्पण किया। तत्पश्चात् मैं उस आश्रम में प्रविष्ट हुआ, जहाँ वे मुनिवर नर-नारायण सदा प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं।
Verse 126
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनिशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में ऋषभगीता-विषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 127
इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु सप्तविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व में राजधर्मानुशासनपर्व के अन्तर्गत ऋषभगीता का एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त।
How a ruler should act when state capacity collapses—treasury exhausted, allies absent, enemies pressing—without abandoning dharma, and whether necessity can justify extraordinary fiscal and punitive measures.
That kośa is a prerequisite for bala and for protection; therefore, regenerating resources in a timely, purpose-limited manner is treated as essential to sustaining the polity and enabling dharma in public life.
No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-commentary is functional—emphasizing that dharma is subtle, learned through śāstra and practice, and must be applied with contextual discernment (buddhi) in crisis.