Adhyaya 120
Shanti ParvaAdhyaya 12021 Verses

Adhyaya 120

मयूरवद्राजधर्मः (Mayūra-vat Rāja-dharma) — The Peacock-Model of Protective Kingship

Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Instruction on Royal Duties) — Mayūra-nīti (Peacock Model of Kingship)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to restate, in expanded form, the established formulation of rājadharma articulated by earlier authorities. Bhīṣma defines the kṣatriya’s highest principle as the protection of all beings (rakṣaṇaṃ sarvabhūtānām) and describes a ruler who can assume multiple ‘forms’ according to circumstance—sharpness, indirectness, restraint, truthfulness, and straightforwardness—while remaining balanced. The king should guard counsel (mantra), cultivate refined speech and śāstra-competence, and remain vigilant at the thresholds of danger. He should seek support from learned and accomplished advisers, maintain readiness of daṇḍa while avoiding negligence, and move with strategic discretion, including careful conduct in sensitive terrains and avoidance of traps. The chapter outlines intelligence and risk management, selective association, and the disciplined handling of adversaries. Fiscal guidance emphasizes timely acquisition, daily incremental gains (bee-and-honey metaphor), protected reserves, and measured expenditure. Bhīṣma lists enabling virtues for wealth and stability—fortitude, skill, self-control, superior judgment, courage, valor, sense of place/time, and non-negligence—warning that even small threats or resources should not be underestimated. The discourse culminates in criteria for appointing ethical, trained, non-greedy officials and affirms that durable public welfare and legitimate happiness arise from policy aligned with dharma rather than from disorderly advantage.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर को राजधर्म का व्यावहारिक मर्म बताते हैं—राज्य का ‘यथार्थ फल’ तभी मिलता है जब राजा गुणवान सेवकों को उनकी योग्यता के अनुरूप स्थान और कार्य देता है। → उपदेश कठोर प्रशासनिक सूक्ष्मताओं में उतरता है: अमात्यों/सेवकों को ‘नास्थाने’ न रखना, वर्ण-स्वभाव-गुण के अनुसार कर्म बाँटना, और ऐसे सहायकों का चयन करना जो कुलीन, शूर, ज्ञानवान, शुचि, दक्ष और अदोषदर्शी हों—क्योंकि गलत नियुक्ति से राज्य-कार्य बिखरता है। → भीष्म निर्णायक रूप से कहते हैं कि स्वामी-कार्य में बाण की तरह छूटकर दौड़ने वाले, राजहित में तत्पर भृत्यों को राजा को सान्त्व/प्रोत्साहन देना चाहिए; साथ ही कोष की निरन्तर रक्षा अनिवार्य है—क्योंकि राजा का मूल कोष है और वही वृद्धि का कारण है। → युधिष्ठिर के लिए नीति-सूत्र समेटे जाते हैं: ज्ञाति-बन्धु, मित्र-सम्बन्धी, और पौर-कार्य/लोकहित की सतत चिंता रखते हुए स्थिर बुद्धि से प्रजापालन करो—यही ‘नैष्ठिकी बुद्धि’ है। → भीष्म संकेत देते हैं कि यदि युधिष्ठिर और अधिक सुनना चाहें तो वे आगे उदाहरण/दृष्टान्त (शुनो निदर्शनं) सहित विस्तार करेंगे।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं।) ऑपन-माजल बछ। अकाल एकोनविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: सेवकोंको उनके योग्य स्थानपर नियुक्त हक: 38 और सत्पुरुषोंका संग्रह करने

भीष्म ने कहा—जो नराधिप गुणयुक्त सेवकों को उनके-उनके योग्य स्थानों पर नियुक्त करके, उन्हें उनके पद के अनुरूप कार्यों में लगाता है, वही राज्य के यथार्थ फल को प्राप्त करता है।

Verse 2

भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इस प्रकार जो राजा गुणवान्‌ भृत्योंको अपने-अपने स्थानपर रखते हुए कार्योमें लगाता है, वह राज्यके यथार्थ फलका भागी होता है ।।

भीष्म ने कहा—युधिष्ठिर! जो राजा स्वयं गुणवान् होकर गुणयुक्त भृत्यों को उनके-उनके स्थान पर रखकर, उन्हें उनके योग्य कार्यों में लगाता है, वही राज्य के यथार्थ फल का भागी होता है। और किसी को उसके अपने स्थान से बढ़ाकर सत्कार के योग्य नहीं मानना चाहिए; क्योंकि जो अपने स्थान का अतिक्रमण करता है, वह अविश्वसनीय हो जाता है और सम्मान के योग्य नहीं रहता। प्राचीन इतिहास से यह सिद्ध है—यदि कुत्ता अपने स्थान को छोड़कर ऊँचा चढ़ा दिया जाए, तो वह प्रमाद करने लगता है; इसलिए कुत्ते को उसकी जगह से उठाकर ऊँचे कभी न बिठावे। इसी प्रकार हीन कुल का मनुष्य भी यदि अपनी योग्यता और मर्यादा से ऊपर पद पा जाए, तो प्रायः अहंकारवश उच्छृंखल हो उठता है।

Verse 3

स्वजातिगुणसम्पन्ना: स्वेषु कर्मसु संस्थिता: । प्रकर्तव्या ह्ामात्यास्तु नास्थाने प्रक्रिया क्षमा

जो अपनी जाति-वर्ण के गुणों से सम्पन्न हों और अपने-अपने विहित कर्मों में दृढ़ हों, उन्हें ही मन्त्री नियुक्त करना चाहिए; पर किसी को उसकी योग्यता और मर्यादा से बाहर के कार्य में लगाना शासन में क्षम्य नहीं है।

Verse 4

अनुरूपाणि कर्माणि भृत्येभ्यो य: प्रयच्छति । स भृत्यगुणसम्पन्नो राजा फलमुपाश्रुते,जो राजा अपने सेवकोंको उनकी योग्यताके अनुरूप कार्य सौंपता है, वह भृत्यके गुणोंसे सम्पन्न हो उत्तम फलका भागी होता है

जो राजा अपने सेवकों को उनकी योग्यता और मर्यादा के अनुरूप कार्य सौंपता है, वह भृत्य-गुणों से सम्पन्न होकर उत्तम फल प्राप्त करता है।

Verse 5

शरभ: शरभस्थाने सिंह: सिंह इवोर्जित: । व्याप्रो व्याप्र इव स्थाप्यो द्वीपी द्वीपी यथा तथा

शरभ को शरभ के स्थान पर, बलवान सिंह को सिंह के स्थान पर, बाघ को बाघ के स्थान पर और चीते को चीते के स्थान पर ही स्थापित करना चाहिए; उसी प्रकार प्रत्येक को उसके स्वभाव और उचित क्षेत्र के अनुसार नियुक्त करना चाहिए।

Verse 6

कर्मस्विहानुरूपेषु न्‍्यस्या भृत्या यथाविधि । प्रतिलोम॑ न भृत्यास्ते स्थाप्या: कर्मफलैषिणा

यहाँ सेवकों को विधि के अनुसार उन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए जो उनके अनुरूप हों। जो कर्मफल चाहता हो, उसे सेवकों को प्रतिलोम—अर्थात् अनुचित—पदों में नहीं रखना चाहिए।

Verse 7

सब सेवकोंको उनके योग्य कार्यमें ही लगाना चाहिये। कर्मफलकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह अपने सेवकोंको ऐसे कार्योंमें न नियुक्त करे, जो उनकी योग्यता और मर्यादाके प्रतिकूल पड़ते हों ।।

जो राजा प्रमाण और मर्यादा का उल्लंघन करके, बुद्धिहीन होकर, अपने भृत्यों को प्रतिकूल कार्यों में लगाता है, वह प्रजा को प्रसन्न नहीं रख सकता।

Verse 8

न बालिशा न च क्षुद्रा नाप्राज्ञा नाजितेन्द्रिया: । नाकुलीना नरा: सर्वे स्थाप्या गुणणणैषिणा

Verse 9

साधव: कुलजा: शूरा ज्ञानवन्तो5नसूयका: । अक्षद्रा: शुचयो दक्षा:स्युर्नरा: पारिपाश्वका:

Bhishma said: “Let the king appoint as his close attendants those men who are virtuous, well-born, and valiant; who possess discernment and are free from envy; who are not given to gambling, are pure in conduct, and are efficient in action. Such men, standing near the ruler, safeguard the realm by their character as much as by their competence.”

Verse 10

न्यग्भूतास्तत्परा: शान्ताश्वौक्षा: प्रकृतिजै: शुभा: । स्वस्थानानपक्ुष्टा ये ते स्यू राज्ञां बहिश्वचरा:

Bhīṣma said: Those who are humble, devoted to their duty, calm in temperament, discerning and capable, endowed with innate auspicious qualities, and free from blame in their own appointed posts—such persons alone are fit to serve kings as external attendants and agents. The ethical point is that royal service, especially in outward-facing roles, must rest on self-discipline, competence, and unimpeachable conduct rather than mere proximity to power.

Verse 11

सिंहस्य सतत पाश्वे सिंह एवानुगो भवेत्‌ | असिंह: सिंहसहित: सिंहवललभते फलम्‌,सिंहके पास सदा सिंह ही सेवक रहे। यदि सिंहके साथ सिंहसे भिन्न प्राणी रहने लगता है तो वह सिंहके तुल्य ही फल भोगने लगता है

Bhishma said: “By a lion’s side, the attendant should be a lion alone. But if one who is not a lion remains in the company of a lion, he too comes to enjoy results as though he were a lion.” In ethical context, the verse underscores the power of association: proximity to the noble and capable can elevate one’s standing and outcomes, while roles and rewards often follow the stature of the company one keeps.

Verse 12

यस्तु सिंह: श्वभि: कीर्ण: सिंहकर्मफले रत: । नस सिंहफल भोक्तुं शक्त: श्वभिरुपासित:

Bhishma said: Even if a lion, surrounded by dogs, remains devoted to lion-like deeds and their proper rewards, he cannot truly enjoy the lion’s share—because, being attended and hemmed in by dogs, his rightful fruit is obstructed and diminished. The teaching is that noble effort and intention are not enough if one’s company and support-system are base or hostile; association can prevent the fitting fruition of one’s dharma.

Verse 13

एवमेतन्मजनुष्येन्द्र शूरैः प्राज्जैर्बहुशुतैः । कुलीनै: सह शक्‍्येत कृत्स्ना जेतुं वसुन्धरा

भीष्म बोले—मनुष्येन्द्र! यही सत्य है। शूर, प्राज्ञ, बहुश्रुत और कुलीन पुरुषों के साथ संगति रखकर ही, नरेन्द्र, समस्त पृथ्वी को जीता जा सकता है। एकाकी प्रयत्न से राज्य नहीं मिलता; सद्गुण, सामर्थ्य और विनीत परामर्श के संयोग से ही विजय होती है।

Verse 14

नाविद्यो नानजुः पाश्चे नाप्राज्ञो नामहाधन: । संग्राह्मो वसुधापालै भुत्यो भृत्यवतां वर

भीष्म बोले—भृत्यवानों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर! पृथ्वी का पालन करने वाले राजाओं को ऐसा सेवक अपने पास नहीं रखना चाहिए जो विद्याहीन, सरलता से रहित, मूर्ख या अत्यन्त दरिद्र हो। ऐसा व्यक्ति उत्तरदायित्व के योग्य नहीं रहता और राज्य-व्यवस्था को हानि पहुँचा सकता है।

Verse 15

बाणवद्धिसृता यान्ति स्वामिकार्यपरा नरा: । ये भृत्या: पार्थिवहितास्तेषां सान्त्वं प्रयोजयेत्‌

भीष्म बोले—जो मनुष्य स्वामी के कार्य में तत्पर रहते हैं, वे धनुष से छूटे बाण की भाँति लक्ष्य-सिद्धि के लिए आगे बढ़ते हैं। जो सेवक राजा के हित-साधन में लगे हों, राजा उन्हें मधुर और सान्त्वनापूर्ण वचनों से निरन्तर प्रोत्साहित करता रहे, जिससे उनका उत्साह और निष्ठा दृढ़ रहे।

Verse 16

कोशक्न सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभि: । कोशमूला हि राजान: कोशो वृद्धिकरो भवेत्‌

भीष्म बोले—राजाओं को पूरा प्रयत्न करके निरन्तर अपने कोष की रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि राजा का मूल कोष ही है, और कोष ही उसकी उन्नति का कारण बनता है।

Verse 17

कोष्ठागारं च ते नित्य॑ं स्फीतैर्धान्यि:सुसंवृतम्‌ । सदास्तु सत्सु संन्यस्तं धनधान्यपरो भव

भीष्म बोले—युधिष्ठिर! तुम्हारा अन्न-भण्डार सदा पुष्टिकारक धान्यों से भरा और भली-भाँति सुरक्षित रहे। उसकी रक्षा का भार श्रेष्ठ पुरुषों को सौंपो। तुम सदा धन-धान्य की वृद्धि में तत्पर रहो।

Verse 18

नित्ययुक्ताश्न ते भृत्या भवन्तु रणकोविदा: । वाजिनां च प्रयोगेषु वैशारद्यमिहेष्यते

तुम्हारे सभी सेवक सदा संयमी, कर्तव्यनिष्ठ और युद्ध-कला में निपुण हों। घोड़ों के प्रयोग, सवारी और हाँकने में भी उन्हें विशेष दक्षता प्राप्त हो—यही यहाँ अपेक्षित है।

Verse 19

ज्ञातिबन्धुजनावेक्षी मित्रसम्बन्धिसंवृत: । पौरकार्यहितान्वेषी भव कौरवनन्दन

कौरवनन्दन! तुम अपने कुटुम्बी-बन्धुजनों का ध्यान रखने वाले बनो, मित्रों और सम्बन्धियों से घिरे रहो, तथा नगरवासियों के कार्य और हित की सिद्धि के उपाय सदा खोजते रहो।

Verse 20

एषा ते नैछ्िकी बुद्धि: प्रजास्वभिहिता मया । शुनो निदर्शनं तात कि भूय: श्रोतुमिच्छसि

तात! प्रजापालन के विषय में यह स्थिर, नैष्ठिक बुद्धि मैंने तुम्हें समझाई है और कुत्ते का दृष्टान्त भी प्रस्तुत किया है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

Verse 119

इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्रवर्षिसंवादे एकोनविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के राजधर्मानुशासनपर्व में श्रवर्षि-संवाद के अंतर्गत एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

That the kṣatriya’s highest obligation is universal protection (rakṣaṇaṃ sarvabhūtānām), making governance primarily a duty of safeguarding life, order, and welfare rather than a pursuit of personal gain.

The peacock functions as a model of adaptive presentation and strategic discretion: a ruler may adopt multiple outward modes (severity, gentleness, directness, indirectness) to secure public good while maintaining inner balance and disciplined restraint.

Yes. The chapter asserts that policy aligned with dharma yields stable welfare and ‘puṇya-phala’ (meritorious benefit) for the ruler, whereas pleasures arising from disorderly or unethical means lack durable security and do not culminate in the highest public good.