Adhyaya 114
Shanti ParvaAdhyaya 11416 Verses

Adhyaya 114

Vetasa-Nīti: The Reed and the Flood (वेतस-नीति)

Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Upa-Parva (राजधर्मानुशासन उपपर्व)

Yudhiṣṭhira asks how a ruler who is “durbala” (comparatively weak) can maintain position against an “ativṛddha” (greatly strengthened) adversary without adequate resources. Bhīṣma introduces an ancient illustrative narrative: Sāgara, lord of rivers, observes that large shade-giving trees are uprooted by the rivers’ force while the reed (vetasa), though slight and riverbank-born, remains. Sāgara asks the rivers why this occurs. Gaṅgā explains that fixed mountains remain in place, but those acting against the natural direction through lack of discernment are displaced; the reed survives because it bends when it sees the oncoming surge and rises again after the force passes, returning to its station. The reed is characterized as knowing time and occasion (kāla-jña, samaya-jña), being governable/pliant (vaśya), and not stubborn (astabdha). Plants that yield to wind and water do not suffer defeat. The teaching is then generalized: one who cannot initially endure the momentum of a greatly strengthened opponent quickly perishes; the prudent person assesses relative strength (sāra/asāra, bala, vīrya) of self and adversary and, when facing excessive power, adopts the “vaitasī vṛtti” (reed-like conduct) as a mark of practical wisdom.

Chapter Arc: युधिष्ठिर राजधर्म के सूक्ष्म प्रश्न पर लौटते हैं—जब शत्रु अत्यन्त शक्तिशाली हो, तब राजा को किस प्रकार आचरण करना चाहिए कि राज्य और प्रजा दोनों बचें? → भीष्म उत्तर को नीति-उपदेश मात्र न रखकर पुरातन दृष्टान्त में बाँधते हैं—सरिताओं और उनके स्वामी समुद्र का संवाद। समुद्र के मन में संशय उठता है: नदियाँ क्यों कभी उग्र होकर तट तोड़ती हैं, और कभी शांत होकर मार्ग बदल लेती हैं? → गंगा ‘वैतसी वृत्ति’ का रहस्य खोलती है—वेतस (बेंत) की भाँति जो झुक जाता है, वह आँधी में भी बचता है; जो वृक्ष अकड़कर खड़ा रहता है, वह उखड़ जाता है। यही नीति राजा पर लागू होती है: अति-बलवान शत्रु के सामने समयानुकूल नम्रता/समझौता ही प्राणरक्षा और पुनरुत्थान का द्वार है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं: जो राजा शत्रु की शक्ति-वृद्धि को समय रहते पहचानकर उसके वेग को सीधे सहने का हठ नहीं करता, वह विनाश से बचता है। जो अपने-पराये के बल, वीर्य और ‘सार-असार’ का विवेक रखकर चलता है, वह पराभव नहीं पाता।

Shlokas

Verse 1

अप-#-रू+ त्रयोदशाधिकशततमो< ध्याय: शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश--सरिताओं और समुद्रका संवाद युधिछिर उवाच राजा राज्यमनुप्राप्य दुर्लभं भरतर्षभ । अमित्रस्यातिवृद्धस्य कथं तिछेदसाधन:

युधिष्ठिर ने कहा—हे भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्लभ राज्य को पाकर भी यदि सेना, कोष आदि साधनों से रहित हो, तो अत्यन्त बढ़े-चढ़े हुए शत्रु के सामने वह कैसे टिक सकता है?

Verse 2

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । सरितां चैव संवादं सागरस्यथ च भारत

भीष्मजी ने कहा—भारत! इस विषय में विद्वान लोग सरिताओं और समुद्र के संवादरूप एक प्राचीन उपाख्यान का उदाहरण देते हैं।

Verse 3

सुरारिनिलय: शश्चृत्सागर: सरिताम्पतिः । पप्रच्छ सरित: सर्वा: संशयं जातमात्मन:,एक समयकी बात है, दैत्योंके निवासस्थान और सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण नदियोंसे अपने मनका एक संदेह पूछा

एक समय दैत्यों का निवासस्थान और सरिताओं का स्वामी, सदा स्थित रहने वाला समुद्र, अपने मन में उत्पन्न संदेह को दूर करने के लिए समस्त नदियों से पूछ बैठा।

Verse 4

सागर उवाच समूलशाखान्‌ पश्यामि निहतान्‌ कायिनो द्रुमान्‌ युष्माभिरिह पूर्णाभिन्नद्यस्तत्र न वेतसम्‌

समुद्र ने कहा—नदियो! मैं देखता हूँ कि जब तुम बाढ़ से लबालब भर जाती हो, तब विशाल वृक्षों को जड़-मूल और शाखाओं सहित उखाड़कर बहा लाती हो; पर उनमें बेंत (वेतस) का एक भी वृक्ष नहीं दिखता।

Verse 5

अकायश्चाल्पसारश्न वेतस: कूलजश्व व: । अवज्ञया वा नानीतः कि च वा तेन व: कृतम्‌

समुद्र ने कहा—वेतस तो मानो शरीरहीन, अत्यन्त पतला और अल्पसार है; वह तो तुम्हारे ही तट पर उगता है। फिर भी तुम उसे यहाँ नहीं लायीं—क्यों? क्या अवज्ञावश तुमने उसे कभी नहीं बहाया, या उसने तुम्हारा कोई उपकार किया है कि तुमने उसे छोड़ दिया?

Verse 6

तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वासामेव वो मतम्‌ | यथा चेमानि कूलानि हित्वा नायाति वेतस:,इस विषयमें तुम सब लोगोंका विचार मैं सुनना चाहता हूँ, क्या कारण है कि बेंतका वृक्ष तुम्हारे इन तटोंको छोड़कर नहीं आता है?

समुद्र ने कहा—मैं तुम सबका मत सुनना चाहता हूँ कि वह वेतस इन तटों को छोड़कर यहाँ क्यों नहीं आता।

Verse 7

तत्र प्राह नदी गंगा वाक्यमुत्तममर्थवत्‌ | हेतुमद्‌ ग्राहकं चैव सागरं सरिताम्पतिम्‌

तब प्रश्न होने पर गंगा नदी ने सरिताओं के स्वामी समुद्र से उत्तम, अर्थपूर्ण, युक्तियुक्त और मन को ग्रहण करने वाली वाणी कही।

Verse 8

गजड़ोवाच तिष्ठन्त्येते यथास्थानं नगा होकनिकेतना: । ते त्यजन्ति ततः स्थान प्रातिलोम्यान्न वेतस:

सागर बोले—ये वृक्ष अपने-अपने स्थान पर पर्वत-से अडिग खड़े रहते हैं, मानो वही उनका स्थायी निवास हो। हमारे प्रवाह के प्रतिकूल आचरण करने से वे नष्ट होकर अपना स्थान छोड़ देते हैं; पर बेंत ऐसा नहीं है।

Verse 9

वेतसो वेगमायातं दृष्टवा नमति नापरे | सरिद्वेगेडव्यतिक्रान्ते स्थानमासाद्य तिष्ठति

सागर बोले—बेंत नदी के वेग को आते देख झुक जाता है, पर अन्य वृक्ष नहीं झुकते। इसलिए जब सरिता का वेग बीत जाता है, तब वह फिर अपने स्थान को पाकर स्थिर खड़ा हो जाता है।

Verse 10

कालज्ञ: समयज्ञश्न सदा वश्यश्न नोद्धत: | अनुलोमस्तथास्तब्धस्तेन नाभ्येति वेतस:

सागर बोले—बेंत काल और अवसर को पहचानता है, उसी के अनुसार आचरण करता है। वह सदा वश में रहता है, कभी उद्दण्ड नहीं होता; अनुकूल बना रहता है और उसमें अकड़ नहीं आती। इसलिए उसे अपना स्थान छोड़कर यहाँ नहीं आना पड़ता।

Verse 11

मारुतोदकवेगेन ये नमन्त्युन्नमन्ति च । ओषध्य: पादपा गुल्मा न ते यान्ति पराभवम्‌,जो पौधे, वृक्ष या लता-गुल्म हवा और पानीके वेगसे झुक जाते तथा वेग शान्त होनेपर सिर उठाते हैं, उनका कभी पराभव नहीं होता

सागर बोले—जो औषधियाँ, वृक्ष और लता-गुल्म वायु और जल के वेग से झुक जाते हैं और वेग शान्त होने पर फिर उठ खड़े होते हैं, उनका कभी पराभव नहीं होता।

Verse 12

भीष्म उवाच यो हि शत्रोर्विवृद्धस्य प्रभोर्बन्धविनाशने । पूर्व न सहते वेगं क्षिप्रमेव विनश्यति

भीष्मजी बोले—हे युधिष्ठिर! जो राजा बल में बढ़े-चढ़े, बन्धन में डालने और बन्धुओं का विनाश करने में समर्थ शत्रु के प्रथम वेग को सिर झुकाकर सह नहीं लेता, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

Verse 13

सारासारं बल वीर्यमात्मनो द्विषतश्न यः । जानन्‌ विचरति प्राज्ञो न स याति पराभवम्‌

जो बुद्धिमान राजा अपने तथा शत्रु के सार-असार, बल और पराक्रम को जानकर उसी के अनुसार आचरण करता है, वह कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता।

Verse 14

एवमेव यदा विद्वान्‌ मन्यते5तिबलं रिपुम्‌ | संश्रयेद्‌ वैतसीं वृत्तिमेतत्‌ प्रज्ञानलक्षणम्‌

इसी प्रकार जब विद्वान राजा शत्रु को अपने से अत्यन्त बलवान समझे, तब वह बेंत के समान नीति अपनाए—अर्थात् कुछ काल के लिए उसके सामने नतमस्तक होकर झुक जाए। यही प्रज्ञा का लक्षण है।

Verse 112

इस प्रकार श्रीमह्ा भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुशासनपर्वनें ऊँटकी गर्दनकी कथाविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में ‘ऊँट की गर्दन’ नामक आख्यान-विषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

Verse 113

इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सरित्सागरसंवादे त्रयोदशाधिकशततमो< ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में सरिताओं और सागर के संवाद-विषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

Frequently Asked Questions

How a comparatively weak ruler should act when confronted by a greatly strengthened hostile power: resist rigidly and risk collapse, or yield strategically to preserve polity and agency.

Wisdom is expressed as calibrated flexibility: knowing time and circumstance, assessing relative strengths, and adopting non-stubborn conduct that survives force without surrendering long-term purpose.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-instruction is embedded as a prudential criterion—“vaitasī vṛtti” is presented as a recognizable mark (lakṣaṇa) of practical intelligence in governance.