Ānṛśaṃsya, Amātya-Guṇa, and Reconciliatory Counsel (आनृशंस्य–अमात्यगुण–संधि-उपदेशः)
यथावत् पूजितो राजन् गृहं गन्तासि मे भृशम् । ततः सम्पूज्य तौ विप्रं विश्वस्तो जग्मतुर्गहान्
yathāvat pūjito rājan gṛhaṃ gantāsi me bhṛśam | tataḥ sampūjya tau vipraṃ viśvasto jagmatur gṛhān |
राजन्! तुम यथावत् सम्मानित होकर निःसंकोच मेरे घर पधारोगे। ऐसा कहकर वे दोनों परस्पर विश्वासयुक्त होकर उस ब्राह्मण की विधिवत् पूजा कर अपने-अपने गृहों को चले गये।
भीष्म उवाच