Nīti-upadeśa to a Rājaputra: Self-restraint, Alliances, and Rival-Management (नीतिउपदेशः)
असंशयं दैवपर: क्षिप्रमेव विनश्यति । याजयैनं विश्वजिता सर्वस्वेन वियुज्य तम्
इसमें संदेह नहीं कि दैव से आहत मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यदि हो सके तो शत्रु को ‘विश्वजित्’ नामक यज्ञ में प्रवृत्त कराओ और उससे दक्षिणा के रूप में सर्वस्व दान कराकर उसे सर्वस्वहीन, निर्धन बना दो।
भीष्म उवाच