Book 10, Adhyāya 12: Aśvatthāmā’s Request for the Cakra and the Brahmaśiras Context
तेनापि सुह्दा ब्रह्मन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । नोक्तपूर्वमिदं वाक््यं यत् त्वं मामभिभाषसे
tenāpi suhṛdā brahman pārthenākliṣṭakarmaṇā | noktapūrvam idaṃ vākyaṃ yat tvaṃ mām abhibhāṣase ||
हे ब्राह्मण! उस प्रिय सुहृद् पार्थ ने भी—जिसके कर्म मलिनता से रहित थे—ऐसा वचन पहले कभी नहीं कहा, जैसा तुम आज मुझसे कह रहे हो।
वैशम्पायन उवाच