प्राक्रोशन् भैरवं तत्र दृष्टवा कृष्णां सभागताम् । धर्मिष्ठां धर्मपत्नीं च रूपयौवनशालिनीम्,संजय! उसके अभिशापसे मेरे सभी पुत्रोंका आज ही संहार हो जाता, परंतु उसने सब कुछ चुपचाप सह लिया। जिस समय रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली पाण्डवोंकी धर्मपरायणा धर्मपत्नी कृष्णा सभामें लायी गयी, उस समय वहाँ उसे देखकर भरतवंशकी सभी स्त्रियाँ गान्धारीके साथ मिलकर बड़े भयानक स्वरसे विलाप एवं चीत्कार करने लगीं
dhṛtarāṣṭra uvāca | prākrośan bhairavaṁ tatra dṛṣṭvā kṛṣṇāṁ sabhāgatām | dharmiṣṭhāṁ dharmapatnīṁ ca rūpayauvanaśālinīm, saṁjaya |
धृतराष्ट्र ने कहा—संजय! वहाँ धर्मनिष्ठ, धर्मपत्नी, रूप-यौवन से सुशोभित कृष्णा (द्रौपदी) को सभा में लाया हुआ देखकर भरतवंश की सभी स्त्रियाँ गान्धारी के साथ भयानक स्वर में चीत्कार कर उठीं।
धृतराष्ट उवाच