धनेन मत्ता ये ते सम धार्तराष्ट्रान् प्रहासिषु: । ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवा,“कुन्तीके पुत्र दीर्घकालतकके लिये अनन्त दुःखरूप नरकमें गिरा दिये गये। ये सदाके लिये सुखसे वंचित तथा राज्यसे हीन हो गये हैं। जो लोग पहले अपने धनसे उन्मत्त हो धृतराष्ट्रपुत्रोंकी हँसी उड़ाया करते थे, वे ही पाण्डव आज पराजित हो अपने धन-वैभवसे हाथ धोकर वनमें जा रहे हैं
dhanena mattā ye te samā dhārtarāṣṭrān prahāsiṣuḥ | te nirjitā hṛtadhanā vanam eṣyanti pāṇḍavāḥ ||
वैशम्पायन बोले—“जो धन के मद में धृतराष्ट्र के पुत्रों का उपहास करते थे, वे ही पाण्डव आज पराजित होकर, धन-वैभव से वंचित, वन को जा रहे हैं।”
वैशम्पायन उवाच