श्रद्धा च गुरुशुश्रूषा यमयो: पुरुषाग्रययो: । अजाततगशत्रो भद्र|ं ते खाण्डवप्रस्थमाविश । भ्रातृभिस्ते<स्तु सौश्षात्रं धर्मे ते धीयतां मन:,तुममें धर्म है, अर्जुनमें धैर्य है, भीमसेनमें पराक्रम है और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेवमें श्रद्धा एवं विशुद्ध गुरुसेवाका भाव है। अजातशत्रो! तुम्हारा भला हो। अब तुम खाण्डवप्रस्थको जाओ । दुर्योधन आदि बन्धुओंके प्रति तुम्हें अच्छे भाईका-सा स्नेहभाव रहे और तुम्हारा मन सदा धर्ममें लगा रहे
śraddhā ca guruśuśrūṣā yamayoḥ puruṣāgrayayoḥ | ajātaśatro bhadraṁ te khāṇḍavaprastham āviśa | bhrātṛbhis te ’stu sauhārdaṁ dharme te dhīyatāṁ manaḥ ||
युधिष्ठिर बोले: उन पुरुषश्रेष्ठ यमजों (नकुल-सहदेव) में श्रद्धा है और गुरु-सेवा की शुद्ध वृत्ति है। अजातशत्रो, तुम्हारा कल्याण हो—अब तुम खाण्डवप्रस्थ में प्रवेश करो। दुर्योधन आदि भ्रातृबन्धुओं के प्रति तुम्हारे भीतर सच्चा सौहार्द रहे, और तुम्हारा मन सदा धर्म में स्थित रहे।
युधिछिर उवाच