पाण्डवानां वनप्रस्थानवर्णनम् / The Pāṇḍavas’ Departure for the Forest
Vidura’s Report and Portents
वैशम्पायन उवाच ततो राज्ञो धृतराष्ट्रस्य गेहे गोमायुरुच्चैव्याहरदग्निहोत्रे । त॑ रासभा: प्रत्यभाषन्त राजन् समन्तत: पक्षिणश्नैव रौद्रा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्रकी अग्निशालाके भीतर एक गीदड़ आकर जोर-जोरसे हुँआ-हुँआ करने लगा। उस शब्दको लक्ष्य करके सब ओर गदहे रेंकने लगे तथा गृधप्र आदि भयंकर पक्षी भी चारों ओर अशुभसूचक कोलाहल करने लगे
vaiśampāyana uvāca | tato rājño dhṛtarāṣṭrasya gehe gomāyur uccair vyāharad agnihotre | taṁ rāsabhāḥ pratyabhāṣanta rājan samantataḥ pakṣiṇaś caiva raudrāḥ |
वैशम्पायन ने कहा—हे राजन् जनमेजय, तब धृतराष्ट्र के भवन में, अग्निहोत्र-स्थान के भीतर, एक गीदड़ ऊँचे स्वर से हुआँ-हुआँ करने लगा। उस ध्वनि को निमित्त मानकर चारों ओर गदहे रेंकने लगे और भयंकर पक्षी भी सर्वत्र अशुभ कोलाहल करने लगे।
वैशम्पायन उवाच