Kṛṣṇasya Khāṇḍavaprasthāt Dvārakā-prayāṇaḥ | Krishna’s Departure for Dvārakā
अन्वीयमान: शुशुभे शिष्यैरिव गुरु: प्रियै: इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान् भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शाड््गधनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्ययमणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीजघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों
anvīyamānaḥ śuśubhe śiṣyair iva guruḥ priyaiḥ
वैशम्पायन बोले—पीछे-पीछे चलते जनों से घिरे केशव ऐसे शोभित हो रहे थे, मानो प्रिय शिष्यों से अनुगत गुरु हों। उस यात्रा में बलवान भीमसेन, नकुल और सहदेव सहित, ऋत्विजों और पुरवासियों से घिरा हुआ श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे चला। वे वेग से आगे बढ़े और शाड्गधनुष धारण करने वाले जनार्दन के ऊपर दिव्य मालाओं से सुशोभित, सौ तिल्लियों से युक्त, स्वर्णविभूषित छत्र तान दिया; उस छत्र में वैदूर्यमणि का दण्ड लगा था। नकुल और सहदेव भी शीघ्र रथ पर चढ़कर श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दन की सेवा करने लगे। तब अपने समस्त फुफेरे भाइयों से संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो प्रिय शिष्यों के साथ गुरु यात्रा कर रहे हों।
वैशम्पायन उवाच
Honor and authority are shown through humble service to the truly worthy. The imagery of a guru surrounded by loving disciples presents an ethical model of leadership: greatness attracts voluntary reverence, not coerced submission.
Kṛṣṇa proceeds in a public procession, followed by Bhīma with Nakula and Sahadeva, along with priests and townspeople. They render royal honors—holding a jeweled parasol over him and fanning him with chowries—so that Kṛṣṇa appears like a revered teacher accompanied by devoted students.