Kṛṣṇasya Khāṇḍavaprasthāt Dvārakā-prayāṇaḥ | Krishna’s Departure for Dvārakā
रुक्मदण्डं बृहद्वाहुर्विदुधाव प्रदक्षिणम् । कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे
rukmadaṇḍaṃ bṛhadbāhur vidadhau pradakṣiṇam | kururāja yudhiṣṭhirena aśvānāṃ bāgaḍoraḥ svayaṃ haste gṛhītā | tataḥ mahābāhur arjunaḥ api rathopaviṣṭaḥ suvarṇamaya-daṇḍa-vibhūṣitaiḥ śvetaiḥ cāmaraiḥ vyajanaiś ca dakṣiṇato 'sya upari dolayām āsa |
वैशम्पायन बोले—महाबाहु ने सुवर्णमय दण्ड हाथ में लेकर आदरपूर्वक दाहिनी ओर से प्रदक्षिणा की। कुरुराज युधिष्ठिर ने स्वयं घोड़ों की बागडोर अपने हाथ में ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथ पर चढ़ गया और सुवर्णदण्ड से विभूषित श्वेत चँवर तथा व्यजन लेकर दाहिनी ओर खड़ा होकर उनके ऊपर डुलाने लगा—यह सम्मान और स्वेच्छा-सेवा का चिह्न था।
वैशम्पायन उवाच