वसुदेव–अर्जुन संवादः
Vasudeva–Arjuna Dialogue in the Aftermath of Dvārakā
इसके बाद वज्र आदि वृष्णि और अन्धकवंशके कुमारों तथा स्त्रियोंने महात्मा वसुदेवजीको जलांजलि दी ।। अलुप्तधर्मस्तं धर्म कारयित्वा स फाल्गुन: । जगाम वृष्णयो यत्र विनष्टा भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! अर्जुनने कभी धर्मका लोप नहीं किया था। वह धर्मकृत्य पूर्ण कराकर अर्जुन उस स्थानपर गये जहाँ वृष्णियोंका संहार हुआ था
vaiśampāyana uvāca | tataḥ paraṁ vajrādayo vṛṣṇyandhakavaṁśakāḥ kumārāḥ striyaś ca mahātmane vasudevāya jalāñjaliṁ dadur iti | aluptadharmas taṁ dharmaṁ kārayitvā sa phālgunaḥ | jagāma vṛṣṇayo yatra vinaṣṭā bharatarṣabha ||
इसके बाद वज्र आदि वृष्णि और अन्धक वंश के कुमारों तथा स्त्रियों ने महात्मा वसुदेव को जलांजलि दी। फिर धर्म में अडिग फाल्गुन अर्जुन ने विधिपूर्वक धर्मकृत्य सम्पन्न कराकर, हे भरतश्रेष्ठ, उस स्थान की ओर प्रस्थान किया जहाँ वृष्णियों का विनाश हुआ था।
वैशम्पायन उवाच