
उत्पातदर्शनम् — Portents and Kāla among the Vṛṣṇis
Upa-parva: Upapātadarśana (Portents in the Vṛṣṇi-Andhaka Settlement)
Vaiśaṃpāyana reports a sustained cycle of ominous phenomena in the Vṛṣṇi-Andhaka settlement. Kāla is personified as a frightening, bald, dark-hued figure who surveys their houses and vanishes (1–2). Natural and urban disturbances proliferate: severe winds, uncanny animal sounds, increased vermin, persistent inauspicious noises, and abnormal interspecies behavior (3–7). Ethical and social deterioration appears alongside these signs: shameless wrongdoing, hostility toward brāhmaṇas, ancestors, and deities, contempt for teachers (with an explicit exception for Balarāma and Kṛṣṇa), and mutual spousal disparagement (8–9). Cosmic and ritual anomalies follow: fire flares with irregular coloration and direction, the sun appears encircled by headless forms, worms appear in prepared food, and unseen runners are heard during auspicious recitations (10–13). Astral disorder is described as planets striking stars, while donkeys bray around the sounding of Pāñcajanya (14–15). Observing these convergences, Kṛṣṇa identifies a decisive amāvāsyā and interprets it as a time of depletion, recalling earlier foretellings (Gāndhārī’s grief-utterance; Yudhiṣṭhira’s prior observation of omens) and then orders a sea tīrtha-yātrā to be announced to the community (16–22).
Chapter Arc: रात्रि के स्वप्नों में काली स्त्री का पाण्डुर दन्तों सहित हँसना, गृध्रों का गृहों में उतर आना, और राक्षसों का आभूषण-ध्वजा-कवच चुराकर भागना—यादवों के भाग्य पर मृत्यु की मुहर लगा देता है। → द्वारका और प्रभास-तीर्थ के वातावरण में अपशकुन सघन होते जाते हैं; मन अशान्त, वाणी कटु, और मदिरा-उन्माद से यदुवंशी परस्पर अविश्वास में जल उठते हैं। दारुक के देखते-देखते दिव्य रथ और आदित्यवर्ण अश्वों का हर लिया जाना भी संकेत देता है कि देव-रक्षा हट चुकी है। → कृतवर्मा के क्रोध से आरम्भ हुई तकरार (सव्य हस्त से अवज्ञा-भरा संकेत) क्षण में सामूहिक उन्माद बन जाती है; ‘मुसल’ (लोहे की गदा/दण्ड) हाथों में उठते हैं और वृष्णि-आन्धक-भोज-शैनेय एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं। श्रीकृष्ण के सामने ही शैनेय और यदुनन्दन के प्रियजन धराशायी होते हैं; मधुसूदन मुसल सँभालकर खड़े होते हैं, पर कालचक्र के आगे यह रोक भी केवल साक्षी-भाव बन जाती है। → संहार निरवशेष होता जाता है—शार्ङ्गधनुष, चक्र और गदा धारण कर कृष्ण शेष बचे उन्मत्त योद्धाओं का दमन करते हैं, पर यह विजय नहीं, नियति की पूर्णता है। अंततः दारुक और बलराम (बशु) कृष्ण से निवेदन/वृत्तान्त कहते हैं—यादव-कुल का दीप बुझ चुका है। → दारुक और बलराम द्वारा कृष्ण को सुनाई गई बातों के बाद प्रश्न शेष रहता है: अब द्वारका, शेष बचे जन, और स्वयं कृष्ण का आगे का मार्ग क्या होगा?
Verse 1
अकाल तृतीयो<थध्याय: कृतवर्मा आदि समस्त यादवोंका परस्पर संहार वैशम्पायन उवाच काली स्त्री पाण्ड्रैर्दन्तै: प्रविश्य हसती निशि । स्त्रिय: स्वप्नेषु मुष्णन्ती द्वारकां परिधावति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! द्वारकाके लोग रातको स्वप्रोंमें देखते थे कि एक काले रंगकी स्त्री अपने सफेद दाँतोंको दिखा-दिखाकर हँसती हुई आयी है और घरोंमें प्रवेश करके स्त्रियोंका सौभाग्य-चिह्न लूटती हुई सारी द्वारकामें दौड़ लगा रही है
वैशम्पायन बोले—हे जनमेजय! द्वारका के लोग रात में स्वप्न देखते थे कि एक काली स्त्री, श्वेत दाँत दिखाकर हँसती हुई, घरों में घुसती है; और स्त्रियों के सौभाग्य-चिह्न छीनती हुई सारी द्वारका में दौड़ती फिरती है।
Verse 2
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें उत्पातदर्शनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ,अग्निहोत्रनिकेतेषु वास्तुमध्येषु वेश्मसु । वृष्ण्यन्धकानखादन्त स्वप्ने गृध्रा भयानका: अग्निहोत्रगृहोंमें जिनके मध्यभागमें वास्तुकी पूजा-प्रतिष्ठा हुई है, ऐसे घरोंमें भयंकर गृध्र आकर वृष्णि और अन्धकवंशके मनुष्योंको पकड़-पकड़कर खा रहे हैं। यह भी स्वप्रमें दिखायी देता था
वैशम्पायन बोले—स्वप्न में यह भी दिखाई देता था कि जिन घरों में अग्निहोत्र का स्थान है और जिनके मध्यभाग में वास्तु-प्रतिष्ठा हुई है, उन घरों में भयानक गृध्र घुसकर वृष्णि और अन्धक वंश के पुरुषों को पकड़-पकड़कर खा रहे हैं।
Verse 3
अलंकाराक्ष छत्रं च ध्वजाक्षु कवचानि च । ह्वियमाणान्यदृश्यन्त रक्षोभि: सुभयानकै:,अत्यन्त भयानक राक्षस उनके आभूषण, छत्र, ध्वजा और कवच चुराकर भागते देखे जाते थे इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि कृतवर्मादीनां परस्परहनने तृतीयो5ध्याय:
अत्यन्त भयानक राक्षस पुकार-ध्वनि के बीच उनके आभूषण, छत्र, ध्वज-दण्ड और कवच छीनकर ले जाते हुए दिखाई देते थे।
Verse 4
तच्चाग्निदत्तं कृष्णस्य वज्ञनाभमयोमयम् । दिवमाचक्रमे चक्र वृष्णीनां पश्यतां तदा,जिसकी नाभिमें वज्धर लगा हुआ था जो सब-का-सब लोहेका ही बना था, वह अग्निदेवका दिया हुआ श्रीविष्णुका चक्र वृष्णिवंशियोंके देखते-देखते दिव्य लोकमें चला गया
तब अग्निदेव का दिया हुआ, वज्र-नाभि से युक्त और सर्वथा लोहे का बना श्रीकृष्ण का वह चक्र वृष्णिवंशियों के देखते-देखते दिव्य लोक को चला गया।
Verse 5
युक्त रथं दिव्यमादित्यवर्ण हया हरन् पश्यतो दारुकस्य । ते सागरस्योपरिष्टादवर्तन् मनोजवाश्नतुरो वाजिमुख्या:,भगवानका जो सूर्यके समान तेजस्वी और जुता हुआ दिव्य रथ था, उसे दारुकके देखते-देखते घोड़े उड़ा ले गये। वे मनके समान वेगशाली चारों श्रेष्ठ घोड़े समुद्रके जलके ऊपर-ऊपरसे ही चले गये
दारुक के देखते-देखते सूर्य-सम तेजस्वी, जुते हुए उस दिव्य रथ को चार श्रेष्ठ घोड़े हर ले गए; वे मन के समान वेगवान घोड़े समुद्र-जल के ऊपर-ऊपर ही चल पड़े।
Verse 6
ताल: सुपर्णश्व महाध्वजौ तौ सुपूजितौ रामजनार्दनाभ्याम् । उच्चैर्जहुरप्सरसो दिवानिशं वाचश्नोचुर्गम्यतां तीर्थयात्रा,बलराम और श्रीकृष्ण जिनकी सदा पूजा करते थे, उन ताल और गरुड़के चिह्नसे युक्त दोनों विशाल ध्वजोंको अप्सराएँ ऊँचे उठा ले गयीं और दिन-रात लोगोंसे यह बात कहने लगीं कि “अब तुमलोग तीर्थ-यात्राके लिये निकलो”
बलराम और जनार्दन (श्रीकृष्ण) द्वारा सदा पूजित, ताल-चिह्न तथा गरुड़ और अश्व-चिह्न से युक्त वे दोनों महान ध्वज अप्सराओं ने ऊँचे उठा लिए; और वे दिन-रात लोगों से कहने लगीं—“अब तुम लोग तीर्थ-यात्रा को जाओ।”
Verse 7
ततो जिगमिषलन्तस्ते वृष्ण्यन्धकमहारथा: । सान्तः:पुरास्तदा तीर्थयात्रामैच्छन् नरर्षभा:,तदनन्तर पुरुषश्रेष्ठ वृष्णि और अन्धक महारथियोंने अपनी स्त्रियोंके साथ उस समय तीर्थयात्रा करनेका विचार किया। अब उनमें द्वारका छोड़कर अन्यत्र जानेकी इच्छा हो गयी थी
तदनन्तर पुरुषश्रेष्ठ वे वृष्णि और अन्धक महारथी अपने अन्तःपुर (स्त्रियों) सहित उस समय तीर्थ-यात्रा करने की इच्छा करने लगे।
Verse 8
ततो भोज्यं च भक्ष्यं च पेयं चान्धकवृष्णय: । बहु नानाविध॑ चक्कुर्मद्य मांसमनेकश:,तब अन्धकों और वृष्णियोंने नाना प्रकारके भनक्ष्य, भोज्य, पेय, मद्य और भाँति- भाँतिके मांस तैयार कराये
तब अन्धक और वृष्णियों ने नाना प्रकार के भोज्य-भक्ष्य और पेय तैयार कराए; बहुत-सा मद्य और अनेक प्रकार का मांस भी जुटाया।
Verse 9
ततः सैनिकवर्गश्चि निर्ययुर्नगराद् बहि: । यानैरश्वैर्गजैश्वैव श्रीमन्तस्तिग्मतेजस:,इसके बाद सैनिकोंके समुदाय, जो शोभासम्पन्न और प्रचण्ड तेजस्वी थे, रथ, घोड़े और हाथियोंपर सवार होकर नगरसे बाहर निकले
इसके बाद सैनिकों का समुदाय—जो शोभासम्पन्न और प्रचण्ड तेजस्वी था—रथों, घोड़ों और हाथियों पर सवार होकर नगर से बाहर निकला।
Verse 10
ततः प्रभासे न्यवसन् यथोद्दिष्टं यथागृहम् | प्रभूतभक्ष्यपेयास्ते सदारा यादवास्तदा,उस समय स्त्रियोंसहित समस्त यदुवंशी प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर अपने-अपने अनुकूल घरोंमें ठहर गये। उनके साथ खाने-पीनेकी बहुत-सी सामग्री थी
तब समस्त यादव स्त्रियों सहित प्रभास में पहुँचे और जैसा नियत था, वैसे अपने-अपने घरों में ठहर गए। उस समय उनके पास खाने-पीने की बहुत-सी सामग्री थी।
Verse 11
निविष्टांस्तान् निशम्याथ समुद्रान्ते स योगवित् । जगामामन्त्रय तान् वीरानुद्धवो<5र्थविशारद:,परमार्थ ज्ञानमें कुशल और योगवेत्ता उद्धवजीने देखा कि समस्त वीर यदुवंशी समुद्रतटपर डेरा डाले बैठे हैं। तब वे उन सबसे पूछकर--विदा लेकर वहाँसे चल दिये
समुद्रतट पर उन वीरों को डेरा डाले बैठे देख, योगवेत्ता और परमार्थदर्शी उद्धव ने उनसे अनुमति लेकर—उन्हें संबोधित कर—वहाँ से प्रस्थान किया।
Verse 12
त॑ प्रस्थितं महात्मानमभिवाद्य कृताज्जलिम् । जाननू् विनाशं वृष्णीनां नैच्छद् वारयितुं हरि:,महात्मा उद्धव भगवान् श्रीकृष्णको हाथ जोड़कर प्रणाम करके जब वहाँसे प्रस्थित हुए तब श्रीकृष्णने उन्हें वहाँ रोकनेकी इच्छा नहीं की; क्योंकि वे जानते थे कि यहाँ ठहरे हुए वृष्णिवंशियोंका विनाश होनेवाला है
प्रस्थान करते उस महात्मा उद्धव को हाथ जोड़कर प्रणाम करके भी हरि (श्रीकृष्ण) ने उन्हें रोकना नहीं चाहा; क्योंकि वे जानते थे कि वृष्णियों का विनाश निश्चित है।
Verse 13
ततः कालपरीतास्ते वृष्ण्यन्धकमहारथा: । अपश्थयन्नुद्धवं यान्तं तेजसा5<वृत्य रोदसी,कालसे घिरे हुए वृष्णि और अन्धक महारथियोंने देखा कि उद्धव अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके यहाँसे चले जा रहे हैं
तब काल से घिरे हुए वे वृष्णि और अन्धक महारथी उद्धव को वहाँ से जाते हुए देखने लगे—उनका तेज पृथ्वी और आकाश दोनों को व्याप्त कर रहा था।
Verse 14
ब्राह्मणार्थेषु यत् सिद्धमन्नं तेषां महात्मनाम् । तद् वानरेभ्य: प्रददु: सुरागन्धसमन्वितम्,उन महामनस्वी यादवोंके यहाँ ब्राह्मणोंको जिमानेके लिये जो अन्न तैयार किया गया था उसमें मदिरा मिलाकर उसकी गन्धसे युक्त हुए उस भोजनको उन्होंने वानरोंकों बाँट दिया
उन महात्मा यादवों के यहाँ ब्राह्मणों के निमित्त जो अन्न सिद्ध किया गया था, उसे मदिरा की गन्ध से युक्त करके उन्होंने वानरों को बाँट दिया।
Verse 15
ततस्तूर्यशताकीर्ण नटनर्तकसंकुलम् । अवर्तत महापानं प्रभासे तिग्मतेजसाम्,तदनन्तर वहाँ सैकड़ों प्रकारके बाजे बजने लगे। सब ओर नटों और नर्तकोंका नृत्य होने लगा। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें प्रचण्ड तेजस्वी यादवोंका वह महापान आरम्भ हुआ
तदनन्तर वहाँ सैकड़ों बाजे बज उठे और नट-नर्तकों की भीड़ छा गई; इस प्रकार प्रभास में प्रचण्ड तेजस्वी यादवों का महापान आरम्भ हुआ।
Verse 16
कृष्णस्य संनिधौ राम: सहित: कृतवर्मणा । अपिबद् युयुधानश्न गदो बभ्रुस्तथैव च,श्रीकृष्णके पास ही कृतवर्मासहित बलराम, सात्यकि, गद और बश्रु पीने लगे
श्रीकृष्ण के सन्निधि में ही कृतवर्मा के साथ बलराम पीने लगे; और युयुधान (सात्यकि), गद तथा बभ्रु भी वैसे ही पीने लगे।
Verse 17
ततः परिषदो मध्ये युयुधानो मदोत्कट: । अब्रवीत् कृतवर्माणमवहास्यावमन्य च,पीते-पीते सात्यकि मदसे उन्मत्त हो उठे और यादवोंकी उस सभामें कृतवर्माका उपहास तथा अपमान करते हुए इस प्रकार बोले--
तब सभा के बीच मद से उन्मत्त युयुधान (सात्यकि) ने कृतवर्मा का उपहास और तिरस्कार करते हुए उससे कहा।
Verse 18
कः क्षत्रियो5हन्यमान: सुप्तान् हन्यान्मृतानिव । तन्न मृष्यन्ति हार्दिक्य यादवा यत् त्वया कृतम्
वैशम्पायन बोले— “हार्दिक्य! आक्रमण होने पर भी कौन-सा क्षत्रिय सोए हुए पुरुषों को, मानो वे मरे हों, मार डाले? तूने जो किया है, उसे यादव सहन नहीं करेंगे।”
Verse 19
हार्दिक्य! तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा क्षत्रिय होगा जो अपने ऊपर आघात न होते हुए भी रातमें मुर्दोके समान अचेत पड़े हुए मनुष्योंकी हत्या करेगा। तूने जो अन्याय किया है उसे यदुवंशी कभी क्षमा नहीं करेंगे” ।। इत्युक्ते युयुधानेन पूजयामास तद्वच: । प्रद्युम्नो रथिनां श्रेष्ठो हार्दिक्यमवमन्य च,सात्यकिके ऐसा कहनेपर रथियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नने कृतवर्माका तिरस्कार करके सात्यकिके उपर्युक्त वचनकी प्रशंसा एवं अनुमोदन किया
वैशम्पायन बोले— “हार्दिक्य (कृतवर्मा)! तेरे सिवा और कौन-सा क्षत्रिय होगा जो स्वयं पर आघात न होने पर भी रात में मुर्दों के समान अचेत पड़े मनुष्यों का वध करे? तूने जो अन्याय किया है, उसे यादव कभी क्षमा नहीं करेंगे।” युयुधान (सात्यकि) के ऐसा कहने पर रथियों में श्रेष्ठ प्रद्युम्न ने उन वचनों की प्रशंसा की और हार्दिक्य का तिरस्कार किया।
Verse 20
ततः परमसंक्रुद्ध: कृतवर्मा तमब्रवीत् । निर्दिशन्निव सावज्ञं तदा सव्येन पाणिना,यह सुनकर कृतवर्मा अत्यन्त कुपित हो उठा और बायें हाथसे अंगुलिका इशारा करके सात्यकिका अपमान करता हुआ बोला--
तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर कृतवर्मा ने उसे कहा। वह बाएँ हाथ से उँगली का संकेत करता हुआ, मानो उसे अलग से दिखा रहा हो, तिरस्कार-भाव से बोला।
Verse 21
भूरिश्रवाश्छिन्नबाहुर्युद्धे प्रायगतस्त्वया । वधेन सुनृशंसेन कथं वीरेण पातित:,“अरे! युद्धमें भूरिश्रवाकी बाँह कट गयी थी और वे मरणान्त उपवासका निश्चय करके पृथ्वीपर बैठ गये थे, उस अवस्थामें तूने वीर कहलाकर भी उनकी क्रूरतापूर्ण हत्या क्यों की?”
“युद्ध में भूरिश्रवा की बाँह कट गई थी और उन्होंने प्रायोपवेश का निश्चय करके पृथ्वी पर बैठ गए थे। फिर तूने—वीर कहलाकर भी—उनका इतना क्रूर वध कैसे किया?”
Verse 22
इति तस्य वच: श्रुत्वा केशव: परवीरहा । तिर्यक्सरोषया दृष्ट्या वीक्षांचक्रे स मन्युमान्,कृतवर्माकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको क्रोध आ गया। उन्होंने रोषपूर्ण टेढ़ी दृष्टिसि उसकी ओर देखा
वैशम्पायन बोले— कृतवर्मा की यह बात सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले केशव क्रोध से भर उठे। रोष से तिरछी दृष्टि डालकर, मन में क्षोभ लिए, उन्होंने उसकी ओर देखा।
Verse 23
मणि: स्यमन्तकश्नैव यः: स सत्राजितो5भवत् । तां कथां श्रावयामास सात्यकिर्मधुसूदनम्,उस समय सात्यकिने मधुसूदनको सत्राजितके पास जो स्यमन्तकमणि थी उसकी कथा कह सुनायी (अर्थात् यह बताया कि कृतवमने ही मणिके लोभसे सत्राजितका वध करवाया था)
वैशम्पायन बोले— वह मणि, अर्थात् स्यमन्तक, सत्राजित की ही थी। तब सात्यकि ने मधुसूदन (श्रीकृष्ण) को वह समूचा वृत्तान्त सुनाया और बताया कि मणि के लोभ से कृतवर्मा ने सत्राजित का वध करवाया।
Verse 24
तच्छुत्वा केशवस्याड्कमगमद् रुदती तदा । सत्यभामा प्रकुपिता कोपयन्ती जनार्दनम्,यह सुनकर सत्यभामाके क्रोधकी सीमा न रही। वह श्रीकृष्णका क्रोध बढ़ाती और रोती हुई उनके अड्कमें चली गयी
यह सुनकर सत्यभामा रोती हुई तत्काल केशव की गोद में जा बैठी। उसका क्रोध सीमा से परे था; वह शोक से व्याकुल होकर जनार्दन के क्रोध को भी भड़काने लगी।
Verse 25
तत उत्थाय सक्रोध: सात्यकिर्वाक्यमब्रवीत् | पज्चानां द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्मशिखण्डिनो:,तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकि उठे और इस प्रकार बोले--'सुमध्यमे! यह देखो, मैं द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंके, धृष्टद्यम्मके और शिखण्डीके मार्गपर चलता हूँ, अर्थात् उनके मारनेका बदला लेता हूँ और सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि जिस पापी दुरात्मा कृतवमनि द्रोणपुत्रका सहायक बनकर रातमें सोते समय उन वीरोंका वध किया था आज उसकी भी आयु और यशका अन्त हो गया”
तब सात्यकि क्रोध से उठ खड़े हुए और बोले— ‘सुमध्यमे! देखो, मैं द्रौपदी के पाँचों पुत्रों, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी के मार्ग पर चलता हूँ— अर्थात् उनके वध का प्रतिशोध लेता हूँ। सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि जिस दुरात्मा पापी ने द्रोणपुत्र का सहायक बनकर रात में सोते हुए उन वीरों का वध किया था, आज उसी की आयु और यश का अन्त हो गया।’
Verse 26
एष गच्छामि पदवीं सत्येन च तथा शपे । सौप्तिके ये च निहता: सुप्ता येन दुरात्मना,तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकि उठे और इस प्रकार बोले--'सुमध्यमे! यह देखो, मैं द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंके, धृष्टद्यम्मके और शिखण्डीके मार्गपर चलता हूँ, अर्थात् उनके मारनेका बदला लेता हूँ और सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि जिस पापी दुरात्मा कृतवमनि द्रोणपुत्रका सहायक बनकर रातमें सोते समय उन वीरोंका वध किया था आज उसकी भी आयु और यशका अन्त हो गया”
‘मैं उसी पथ पर चलता हूँ; सत्य की शपथ करके कहता हूँ— सौप्तिक कर्म में जो मारे गये, जिन्हें उस दुरात्मा ने सोते हुए काट डाला।’
Verse 27
द्रोणपुत्रसहायेन पापेन कृतवर्मणा । समाप्तमायुरस्याद्य यशश्वैव सुमध्यमे,तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकि उठे और इस प्रकार बोले--'सुमध्यमे! यह देखो, मैं द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंके, धृष्टद्यम्मके और शिखण्डीके मार्गपर चलता हूँ, अर्थात् उनके मारनेका बदला लेता हूँ और सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि जिस पापी दुरात्मा कृतवमनि द्रोणपुत्रका सहायक बनकर रातमें सोते समय उन वीरोंका वध किया था आज उसकी भी आयु और यशका अन्त हो गया”
‘सुमध्यमे! द्रोणपुत्र का सहायक वह पापी कृतवर्मा— आज उसकी आयु और उसका यश, दोनों समाप्त हो गये।’
Verse 28
इत्येवमुक्त्वा खड्गेन केशवस्य समीपत: । अभिद्रुत्य शिर: क्रुद्धश्चिच्छेद कृतवर्मण:,ऐसा कहकर कुपित हुए सात्यकिने श्रीकृष्णके पाससे दौड़कर तलवारसे कृतवर्माका सिर काट लिया
यह कहकर क्रोध से भरे सात्यकि केशव के पास से झपटे और तलवार से कृतवर्मा का सिर काट डाला।
Verse 29
तथान्यानपि निध्नन्तं युयुधानं समन्ततः । अभ्यधावद्धृषीकेशो विनिवारयितुं तदा,फिर वे दूसरे-दूसरे लोगोंका भी सब ओर घूमकर वध करने लगे। यह देख भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें रोकनेके लिये दौड़े
तब युयुधान (सात्यकि) चारों ओर घूम-घूमकर दूसरों को भी मारने लगे; यह देखकर उन्हें रोकने के लिए उसी समय हृषीकेश (श्रीकृष्ण) दौड़े।
Verse 30
एकीभूतास्तत: सर्वे कालपर्यायचोदिता: । भोजान्धका महाराज शैनेयं पर्यवारयन्,महाराज! इतनेहीमें कालकी प्रेरणासे भोज और अन्धकवंशके समस्त वीरोंने एकमत होकर सात्यकिको चारों ओरसे घेर लिया
महाराज! तभी काल के फेर से प्रेरित होकर भोज और अन्धक कुल के सब वीर एकमत हो गए और उन्होंने शैनेय (सात्यकि) को चारों ओर से घेर लिया।
Verse 31
तान् दृष्टवा पततस्तूर्णमभिक्रुद्धान् जनार्दन: । न चुक्रोध महातेजा जानन् कालस्य पर्ययम्,उन्हें कुपित होकर तुरंत धावा करते देख महातेजस्वी श्रीकृष्ण कालके उलट-फेरको जाननेके कारण कुपित नहीं हुए
उन्हें क्रोध से भरे हुए शीघ्र धावा करते देखकर भी महातेजस्वी जनार्दन (श्रीकृष्ण) क्रोधित नहीं हुए, क्योंकि वे काल के फेर को जानते थे।
Verse 32
ते तु पानमदाविष्टाश्नोदिता: कालधर्मणा । युयुधानमथाभ्यधघ्नन्नुच्छिष्टिर्भाजनैस्तदा,वे सब-के-सब मदिरापानजनित मदके आवेशसे उन्मत्त हो उठे थे। इधर कालधर्मा मृत्यु भी उन्हें प्रेरित कर रहा था। इसलिये वे जूठे बरतनोंसे सात्यकिपर आघात करने लगे
पर वे सब मदिरापान के मद से उन्मत्त थे और कालधर्मा (मृत्यु) से प्रेरित हो रहे थे; इसलिए वे तब जूठे बरतनों से युयुधान (सात्यकि) पर प्रहार करने लगे।
Verse 33
हन्यमाने तु शैनेये क्रुद्धो रुक्मिणिनन्दन: । तदनन्तरमागच्छन्मोक्षयिष्यन् शिने: सुतम्,जब सात्यकि इस प्रकार मारे जाने लगे तब क्रोधमें भरे हुए रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उन्हें संकटसे बचानेके लिये स्वयं उनके और आक्रमणकारियोंके बीचमें कूद पड़े
जब शैनेय सात्यकि इस प्रकार मारे जाने लगे, तब क्रोध से भरे रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उन्हें संकट से बचाने के लिए स्वयं उनके और आक्रमणकारियों के बीच कूद पड़े।
Verse 34
स भोजै: सह संयुक्त: सात्यकिश्नान्धकै:ः सह । व्यायच्छमानौ तौ वीरौ बाहुद्रविणशालिनौ,प्रद्यम्न भोजोंसे भिड़ गये और सात्यकि अन्धकोंके साथ जूझने लगे। अपनी भुजाओंके बलसे सुशोभित होनेवाले वे दोनों वीर बड़े परिश्रमके साथ विरोधियोंका सामना करते रहे
प्रद्युम्न भोजों से भिड़ गए और सात्यकि अन्धकों के साथ जूझने लगे। अपनी भुजाओं के बल से सुशोभित वे दोनों वीर बड़े परिश्रम से विरोधियों का सामना करते रहे।
Verse 35
बहुत्वान्निहतौ तत्र उभौ कृष्णस्य पश्यत: । हतं॑ दृष्टवा च शैनेयं पुत्रं च यदुनन्दन:
वहाँ घोर संहार के बीच, कृष्ण के देखते-देखते वे दोनों मारे गए। और यदुनन्दन ने शैनेय को तथा अपने पुत्र को मृत देखकर विपत्ति का पूरा भार हृदय पर अनुभव किया।
Verse 36
तदभून्मुसलं घोरं वज़कल्पमयोमयम्
तब एक भयंकर मुसल प्रकट हुआ—लोहे का बना, और विनाश-शक्ति में वज्र के समान।
Verse 37
ततो<न्धकाश्न भोजाश्च शैनेया वृष्णयस्तथा
तब अन्धक, भोज, शैनेय तथा वृष्णि—वे सब (यादव-कुल) आगे बढ़ आए।
Verse 38
यस्तेषामेरकां कश्चिज्जग्राह कुपितो नूप
वैशम्पायन बोले—तभी उन में से एक क्रोध से भर उठा और उसने एरका-नल को उठा लिया। देखने में यह छोटा-सा काम था, पर वही आगे के अधर्म का बीज बना और संयम के टूटने की चिंगारी।
Verse 39
तृणं च मुसलीभूतमपि तत्र व्यदृश्यत
और वहाँ तृण तक मूसल बनकर दिखाई देने लगा—मानो विधि ने ही निरापद वस्तुओं को विनाश के साधन में बदल दिया हो।
Verse 40
अविध्यान् विध्यते राजन प्रक्षिपन्ति सम यत् तृणम्
वैशम्पायन बोले—हे राजन्, अज्ञानवश वे वहाँ प्रहार करते हैं जहाँ प्रहार नहीं करना चाहिए; उन्माद में वे साधारण तृण को भी शस्त्र समझकर फेंकते हैं।
Verse 41
तद् वज्रभूतं मुसलं व्यदृश्यत तदा दृढम् | राजन्! वे जिस किसी भी तृणका प्रहार करते वह अभेद्य वस्तुका भी भेदन कर डालता था और व्रजमय मूसलके समान सुदृढ़ दिखायी देता था || ४० $ || अवधीत् पितरं पुत्र: पिता पुत्रं च भारत,भरतनन्दन! उस मूसलसे पिताने पुत्रको और पुत्रने पिताको मार डाला। जैसे पतिंगे अतामें कूद पड़ते हैं, उसी प्रकार कुकुर और अन्धकवंशके लोग परस्पर जूझते हुए एक दूसरेपर मतवाले होकर टूटते थे
वैशम्पायन बोले—तब वह मूसल वज्र के समान कठोर और अडिग दिखाई देने लगा। हे राजन्, जिसके हाथ में केवल तृण भी होता, उसके प्रहार से भी वह अभेद्य वस्तु भेद दी जाती; वह वज्रमय मूसल की भाँति अत्यन्त सुदृढ़ प्रतीत होता था। उसी उन्माद में, हे भारत, पुत्र ने पिता को और पिता ने पुत्र को मार डाला। जैसे पतंगे अग्नि में कूद पड़ते हैं, वैसे ही कुकुर और अन्धक वंश के लोग क्रोध से मतवाले होकर परस्पर भिड़ गए।
Verse 42
मत्ता: परिपतन्ति सम योधयन्त: परस्परम् | पतड्जा इव चाग्नौ ते निपेतु: कुकुरान्धका:,भरतनन्दन! उस मूसलसे पिताने पुत्रको और पुत्रने पिताको मार डाला। जैसे पतिंगे अतामें कूद पड़ते हैं, उसी प्रकार कुकुर और अन्धकवंशके लोग परस्पर जूझते हुए एक दूसरेपर मतवाले होकर टूटते थे
वैशम्पायन बोले—वे मतवाले होकर परस्पर युद्ध करते हुए एक-दूसरे पर टूट पड़ते थे; जैसे पतंगे अग्नि में गिर पड़ते हैं, वैसे कुकुर और अन्धक लोग गिरते-पड़ते भिड़ रहे थे। उसी मूसल से पिता पुत्रों को और पुत्र पिताओं को मार डालते थे।
Verse 43
नासीत् पलाय-ने बुद्धिर्वध्यमानस्य कस्यचित् । तत्रापश्यन्महाबाहुर्जानन् कालस्य पर्ययम्
उस संहार में किसी भी वध्यमान पुरुष को पलायन की सुधि न रही। वहाँ महाबाहु ने, काल के पर्याय—समय-चक्र के अनिवार्य उलटफेर—को जानकर, सब कुछ देखा।
Verse 44
साम्बं च निहतं दृष्टवा चारुदेष्णं च माधव:
साम्ब को मरा हुआ और चारुदेष्णा को भी गिरे हुए देखकर माधव ने अपने ही कुल का विनाश देखा—यह जानकर कि जब धर्म का उल्लंघन हो और संयम टूट जाए, तब भाग्य का परिपाक महान से महान भी नहीं टाल सकता।
Verse 45
प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च ततश्लुक्रोध भारत | भारत! श्रीकृष्ण जब अपने पुत्र साम्ब, चारुदेष्ण और प्रद्युम्मको तथा पोते अनिरुद्धको भी मारा गया देखा तब उनकी क्रोधाग्नि प्रजजलित हो उठी ।। ४४ $ ।। गदं वीक्ष्य शयानं च भृशं॑ कोपसमन्वित:
हे भारत, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को भी मरा हुआ देखकर, और गदा को वहाँ पड़ा देख, वे अत्यन्त कोप से भर उठे; उस कुल-क्षय के धूसर अवशेषों में उनका क्रोध न्याय-दण्ड नहीं, बल्कि बन्धुत्व और संयम के ढह जाने पर उठी मानवीय वेदना था।
Verse 46
तन्निघ्नन्तं महातेजा बभ्रु: परपुरञ्जय:
उसी को मारते हुए महातेजस्वी बभ्रु—परपुरञ्जय—दिखाई पड़ा; यह पंक्ति बताती है कि हिंसा की धारा कैसी अन्धी गति से बहती है, जहाँ विजय-कीर्ति वाला वीर भी वध के कर्म में ही अंकित हो जाता है।
Verse 47
भगवन् निहताः सर्वे त्वया भूयिष्ठशो नरा: । रामस्य पदमन्विच्छ तत्र गच्छाम यत्र सः,'भगवन्! अब सबका विनाश हो गया। इनमेंसे अधिकांश तो आपके हाथों मारे गये हैं। अब बलरामजीका पता लगाइये। अब हम तीनों उधर ही चलें, जिधर बलरामजी गये हैं!
“भगवन्, सब मारे गए; इनमें अधिकांश नर तो आपके ही हाथों निहत हुए हैं। अब बलरामजी का पता लगाइए; आइए, हम तीनों वहीं चलें—जिधर वे गए हैं।”
Verse 353
एरकानां ततो मुष्टिं कोपाज्जग्राह केशव: । परंतु विपक्षियोंकी संख्या बहुत अधिक थी; इसलिये वे दोनों श्रीकृष्णके देखते-देखते उनके हाथसे मार डाले गये। सात्यकि तथा अपने पुत्रको मारा गया देख यदुनन्दन श्रीकृष्णने कुपित होकर एक मुट्ठी एएका उखाड़ ली
वैशम्पायन बोले—तब क्रोध से भरकर केशव ने एरका घास की एक मुट्ठी उखाड़ ली। परन्तु विपक्षियों की संख्या बहुत अधिक थी; इसलिए वे दोनों श्रीकृष्ण के देखते-देखते उनके हाथों से मार डाले गए। सात्यकि और अपने पुत्र को मरा हुआ देखकर यदुनन्दन श्रीकृष्ण क्रुद्ध हो उठे और एरका की एक मुट्ठी उखाड़ ली।
Verse 366
जघान कृष्णस्तांस्तेन ये ये प्रमुखतो 5 भवन् । उनके हाथमें आते ही वह घास वज्रके समान भयंकर लोहेका मूसल बन गयी। फिर तो जो-जो सामने आये उन सबको श्रीकृष्णने उसीसे मार गिराया
वैशम्पायन बोले—उसी शस्त्र से श्रीकृष्ण ने जो-जो सामने आया, उसे मार गिराया। उनके हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान कठोर, भयंकर लोहे का मूसल बन गई; और जो भी आगे बढ़कर आया, वह उसी से श्रीकृष्ण द्वारा ढेर कर दिया गया।
Verse 376
जघ्नुरन्योन्यमाक्रन्दे मुसलै: कालचोदिता: । उस समय कालसे प्रेरित हुए अन्धक, भोज, शिनि और वृष्णिवंशके लोगोंने उस भीषण मारकाटमें उन्हीं मूसलोंसे एक-दूसरेको मारना आरम्भ किया
वैशम्पायन बोले—काल से प्रेरित होकर वे मूसलों से, आर्तनाद के बीच, एक-दूसरे को मारने लगे। उस समय अन्धक, भोज, शिनि और वृष्णिवंश के लोग उस भीषण संहार में उन्हीं मूसलों से परस्पर वध करने में प्रवृत्त हो गए।
Verse 383
वज्जभूतेव सा राजन्नदृश्यत तदा विभो । नरेश्वर! उनमेंसे जो कोई भी क्रोधमें आकर एरका नामक घास लेता, उसीके हाथमें वह वज्रके समान दिखायी देने लगती थी
वैशम्पायन बोले—राजन्! उस समय वह वज्र के समान ही प्रतीत होने लगी। नरेश्वर! उनमें से जो कोई भी क्रोध में आकर एरका नामक घास उठाता, उसके हाथ में वही घास वज्र के समान दिखाई देने लगती थी।
Verse 393
ब्रह्मदण्डकृतं सर्वमिति तद् विद्धि पार्थिव । पृथ्वीनाथ! एक साधारण तिनका भी मूसल होकर दिखायी देता था; यह सब ब्राह्मणोंके शापका ही प्रभाव समझो
वैशम्पायन बोले—पार्थिव! यह निश्चय जानो कि यह सब ब्रह्मदण्ड का किया हुआ है। पृथ्वीनाथ! एक साधारण तिनका भी मूसल होकर दिखाई देता था; यह सब ब्राह्मणों के शाप का ही प्रभाव समझो।
Verse 433
मुसलं समवष्ट भ्य तस्थौ स मधुसूदन: । वहाँ मारे जानेवाले किसी योद्धाके मनमें वहाँसे भाग जानेका विचार नहीं होता था। कालचक्रके इस परिवर्तनको जानते हुए महाबाहु मधुसूदन वहाँ चुपचाप सब कुछ देखते रहे और मूसलका सहारा लेकर खड़े रहे
मधुसूदन श्रीकृष्ण मूसल का सहारा लेकर दृढ़ खड़े रहे। उस स्थान पर जिनका वध निश्चित था, उनके मन में वहाँ से भाग जाने का विचार भी नहीं उठता था। कालचक्र के इस परिवर्तन को जानकर महाबाहु मधुसूदन मौन रहकर सब कुछ देखते रहे।
Verse 456
स नि:शेषं तदा चक्रे शार्चक्रगदाधर: । अपने छोटे भाई गदको रणशय्यापर पड़ा देख वे अत्यन्त रोषसे आगबबूला हो उठे; फिर तो शार्ज्रधनुष, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीकृष्णने उस समय शेष बचे हुए समस्त यादवोंका संहार कर डाला
तब शार्ङ्गधनुष, चक्र और गदा धारण करने वाले श्रीकृष्ण ने शेष बचे हुए सब यादवों का निःशेष संहार कर दिया। अपने छोटे भाई गद को रणशय्या पर पड़ा देखकर वे अत्यन्त रोष से दहक उठे; और उसी क्षण उन्होंने सबका अंत कर दिया।
Verse 4636
दारुकश्लैव दाशार्हमूचतुर्यन्निबोध तत् । शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले महातेजस्वी बश्ु और दारुकने उस समय यादवोंका संहार करते हुए श्रीकृष्णसे जो कुछ कहा, उसे सुनो
उस समय दारुक और बभ्रु ने दाशार्ह श्रीकृष्ण से कहा—वह सुनो। शत्रुओं की नगरियों पर भी विजय पाने योग्य महातेजस्वी बभ्रु और दारुक, जब श्रीकृष्ण यादवों का संहार कर रहे थे, तब उनसे जो बोले, उसे सुनो।
The dilemma is collective: whether a community experiencing ethical erosion (disrespect, hostility toward sacred and social authorities, domestic discord) can avert decline through action, or whether their condition has already aligned with an irreversible kāla-paryaya.
The text links external disorder to internal discipline: omens are narrative indicators that social restraint and reverence are failing, and that prosperity without ethical governance becomes unstable under the pressure of time and accumulated consequence.
No explicit phalaśruti is stated here; instead, the meta-commentary is structural—Kṛṣṇa’s recognition of calendrical and cosmic signs functions as interpretive framing that this episode is a threshold leading into the community’s impending dissolution.