
मौसलोत्पत्तिः — The Birth of the Musala and the Sages’ Pronouncement
Upa-parva: Mausala-śāpa-prasaṅga (The Episode of the Musala Curse at Dvārakā)
Janamejaya asks how the Andhakas, Vṛṣṇis, and Bhoja mahārathas were destroyed even as Vāsudeva looked on. Vaiśaṃpāyana locates the catastrophe in a curse-triggering incident: in the thirty-sixth year, a great internal dissension arises among the Vṛṣṇis, and—driven by kāla—they strike one another with musalas. Janamejaya then asks by what imprecation the clans met destruction. Vaiśaṃpāyana recounts the arrival of Viśvāmitra, Kaṇva, and Nārada at Dvārakā, whom Sāraṇa and other heroes approach after dressing Sāmba as a woman and posing a taunting question about childbirth. The sages, provoked by deception, declare that Sāmba—Vāsudeva’s descendant—will produce a terrible iron musala destined to destroy the Vṛṣṇi-Andhaka line, sparing only Rāma and Janārdana; they further foretell Balarāma’s departure to the sea and Kṛṣṇa’s death by the hunter Jarā. Kṛṣṇa, understanding the inevitability (kṛtānta), does not seek to reverse it. The next day the musala is born; the king orders it ground to fine powder and cast into the ocean and proclaims a citywide ban on intoxicants with severe penalties, and the populace complies out of fear of royal sanction.
Chapter Arc: द्वारका में अनिष्ट-सूचक उत्पातों की बाढ़—विकराल, विकट, मुण्ड पुरुष का प्रकट होना और वृष्णियों के गृहों में भय का फैलना। → वृष्णि-वीर उस अद्भुत पुरुष पर शतसहस्र बाण बरसाते हैं, पर वह वेधित नहीं होता; नगर-जीवन में विकृति बढ़ती जाती है—चूहे असामान्य रूप से फैलते हैं, रात्रि में सोए जनों के केश-नख कुतरते हैं, पशु-योनि में भी उलट-फेर और अशुभ संकेत दिखते हैं; वृष्णि-समाज पाप को निर्लज्जता से करने लगता है, यज्ञ-श्राद्धादि भी मानो केवल बाह्य-आवरण रह जाते हैं। → उदय-अस्त के समय सूर्य का कबन्धों से घिरा दिखना और पूर्वोक्त दारुण उत्पातों की स्मृति (युधिष्ठिर द्वारा पहले कही गई बात) के साथ कृष्ण का यह निश्चय कि गान्धारी का शाप सत्य होकर रहेगा—और उसी क्षण उनका निर्णायक आदेश: तीर्थयात्रा। → केशव के शासन से राजकीय पुरुष नगर में घोषणा करते हैं—‘समुद्र-तीर्थों की यात्रा करनी है’; भय और अनिष्ट को एक अनुशासनात्मक, नियति-स्वीकृत दिशा दी जाती है। → तीर्थयात्रा का यह आदेश क्या वृष्णि-विनाश को टालने का उपाय है, या उसी विनाश की ओर ले जाने वाला अंतिम पथ?
Verse 1
#स्जम (2) असजमनसा द्वितीयो&्ध्याय: द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आदेश देना वैशम्पायन उवाच एवं प्रयतमानानां वृष्णीनामन्धकैः सह । कालो गृहाणि सर्वेषां परिचक्राम नित्यश:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंशके लोग अपने ऊपर आनेवाले संकटका निवारण करनेके लिये भाँति-भाँतिके प्रयत्न कर रहे थे और उधर काल प्रतिदिन सबके घरोंमें चक्कर लगाया करता था
वैशम्पायन बोले—हे राजन्! इस प्रकार वृष्णि लोग अन्धकों सहित आने वाले संकट को टालने के लिए अनेक प्रकार से प्रयत्न कर रहे थे, और उधर काल प्रतिदिन सबके घरों में चक्कर लगाता फिरता था।
Verse 2
करालो विकटो मुण्ड: पुरुष: कृष्णपिड्रल: । गृहाण्यावेक्ष्य वृष्णीनां नादृश्यत क्वचित् क्वचित्,उसका स्वरूप विकराल और वेश विकट था। उसके शरीरका रंग काला और पीला था। वह मूँड़ मुड़ाये हुए पुरुषके रूपमें वृष्णिवंशियोंके घरोंमें प्रवेश करके सबको देखता और कभी-कभी अदृश्य हो जाता था इति श्रीमहा भारते मौसलपर्वणि उत्पातदर्शने द्वितीयो$ध्याय:
वैशम्पायन बोले— उसका स्वरूप विकराल और वेश विकट था। मुंडा हुआ सिर, देह का रंग काला-पीला; वह वृष्णिवंशियों के घरों में घुसकर सबको घूरता और फिर कभी-कभी अदृश्य हो जाता था।
Verse 3
तमघध्नन्त महेष्वासा: शरै: शतसहस््रश: । न चाशक्यत वेद्धुं स सर्वभूतात्ययस्तदा
वैशम्पायन बोले— महाधनुर्धर वीरों ने उस पर बार-बार लाखों बाण चलाए; पर उस समय उसे बेधा नहीं जा सका, क्योंकि वह मानो समस्त प्राणियों का ‘अत्यय’—अपरिहार्य विनाश—स्वरूप बन गया था।
Verse 4
उसे देखनेपर बड़े-बड़े धनुर्धर वीर उसके ऊपर लाखों बाणोंका प्रहार करते थे; परंतु सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाले उस कालको वे वेध नहीं पाते थे ।। उत्पेदिरे महावाता दारुणाश्ष् दिने दिने | वृष्ण्यन्धकविनाशाय बहवो लोमहर्षणा:,अब प्रतिदिन अनेक बार भयंकर आँधी उठने लगी, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उससे वृष्णियों और अन्धकोंके विनाशकी सूचना मिल रही थी
वैशम्पायन बोले— दिन-प्रतिदिन भयंकर, रोंगटे खड़े कर देनेवाली प्रचण्ड आँधियाँ बार-बार उठने लगीं; वे वृष्णियों और अन्धकों के विनाश का सूचक अपशकुन थीं।
Verse 5
विवृद्धमूषिका रथ्या विभिन्नमणिकास्तथा । केशा नखाश्न सुप्तानामद्यन्ते मूषिकैनिशि,चूहे इतने बढ़ गये थे कि वे सड़कोंपर छाये रहते थे। मिट्टीके बरतनोंमें छेद कर देते थे तथा रातमें सोये हुए मनुष्योंके केश और नख कुतरकर खा जाया करते थे
वैशम्पायन बोले— चूहे बहुत बढ़ गए थे; वे गलियों-सड़कों पर छा जाते थे, मिट्टी के बरतनों में छेद कर देते थे; और रात में सोए हुए मनुष्यों के केश और नख तक कुतरकर खा जाते थे।
Verse 6
चीचीकूचीति वाशन्ति सारिका वृष्णिवेश्मसु । नोपशाम्यति शब्दक्ष स दिवारात्रमेव हि,वृष्णिवंशियोंके घरोंमें मैनाएँ दिन-रात चें-चें किया करती थीं। उनकी आवाज कभी एक क्षणके लिये भी बंद नहीं होती थी
वैशम्पायन बोले— वृष्णिवंशियों के घरों में मैना पक्षी “चीचीकूची” कहकर दिन-रात चिल्लाती रहती थीं। वह कठोर शब्द एक क्षण के लिए भी शांत नहीं होता था।
Verse 7
अन्वकुर्वन्नुलूकानां सारसा विरुतं तथा । अजा: शिवानां विरुतमन्वकुर्वत भारत,भारत! सारस उल्लुओंकी और बकरे गीदड़ोंकी बोलीकी नकल करने लगे
वैशम्पायन बोले— हे भारत, भारत! सारस उल्लुओं की बोली की नकल करने लगे और बकरियाँ गीदड़ों की आवाज़ की नकल करने लगीं।
Verse 8
पाण्डुरा रक्तपादाश्न विहगा: कालचोदिता: । वृष्ण्यन्धकानां गेहेषु कपोता व्यचरंस्तदा,कालकी प्रेरणासे वृष्णियों और अन्धकोंके घरोंमें सफेद पंख और लाल पैरोंवाले कबूतर घूमने लगे
वैशम्पायन बोले— काल की प्रेरणा से सफेद पंखों और लाल पैरों वाले पक्षी—कबूतर—उस समय वृष्णियों और अन्धकों के घरों में घूमने लगे।
Verse 9
इस प्रकार श्रीमह्याभारत मौसलपर्वमें मुसलकी उत्पत्तिविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ,व्यजायन्त खरा गोषु करभा<श्वतरीषु च । शुनीष्वपि बिडालाश्न मूषिका नकुलीषु च गौओंके पेटसे गदहे, खच्चरियोंसे हाथी, कुतियोंसे बिलाव और नेवलियोंके गर्भसे चूहे पैदा होने लगे
वैशम्पायन बोले— उन दिनों अपशकुन के रूप में जन्म का क्रम उलट गया—गायों से गधे, खच्चरियों से हाथी, कुतियों से बिलाव और नेवलियों से चूहे पैदा होने लगे।
Verse 10
नापत्रपन्त पापानि कुर्वन्तो वृष्णयस्तदा । प्राद्धिषन् ब्राह्मणांश्वापि पितृन् देवांस्तथैव च,उन दिनों वृष्णिवंशी खुल्लमखुल्ला पाप करते और उसके लिये लज्जित नहीं होते थे। वे ब्राह्मणों, देवताओं और पितरोंसे भी द्वेष रखने लगे
वैशम्पायन बोले— उन दिनों वृष्णि लोग खुलेआम पाप करते और लज्जित नहीं होते थे। वे ब्राह्मणों से, और वैसे ही पितरों तथा देवताओं से भी द्वेष करने लगे।
Verse 11
गुरूंश्चाप्पवमन्यन्ते न तु रामजनार्दनौ । पत्न्य: पतीनुच्चरन्त पत्नीक्ष पतयस्तथा,इतना ही नहीं, वे गुरुजनोंका भी अपमान करते थे। केवल बलराम और श्रीकृष्णका ही तिरस्कार नहीं करते थे। पत्नियाँ पतियोंको और पति अपनी पत्नियोंको धोखा देने लगे
वैशम्पायन बोले— वे गुरुजनों का भी अपमान करने लगे; पर बलराम और जनार्दन का तिरस्कार नहीं करते थे। फिर घर-घर में धर्म डगमगाया—पत्नी पति को और पति पत्नी को धोखा देने लगे।
Verse 12
विभावसु: प्रज्वलितो वाम॑ विपरिवर्तते । नीललोहितमज्जिष्ठा विसृजन्नर्चिष: पृथक्,अग्निदेव प्रजजलित होकर अपनी लपटोंको वामावर्त घुमाते थे। उनसे कभी नीले रंगकी, कभी रक्तवर्णी और कभी मजीठके रंगकी पृथक्-पृथक् लपटें निकलती थीं
वैशम्पायन बोले—प्रज्वलित अग्निदेव (विभावसु) वामावर्त घूमने लगे। उनसे अलग-अलग लपटें निकलती थीं—कभी नीली, कभी रक्तवर्णी और कभी मजीठ-सी गाढ़ी लाल। यह अशुभ वामगति और अस्वाभाविक वर्ण-भेद धर्म-लोकव्यवस्था के विचलन का सूचक था, जो मंगलकर्म नहीं, अनिष्ट की सूचना देता था।
Verse 13
उदयास्तमने नित्यं पुर्या तस्यां दिवाकर: । व्यदृश्यतासकृत् पुम्भि: कबन्धै: परिवारित:,उस नगरीमें रहनेवाले लोगोंको उदय और अस्तके समय सूर्यदेव प्रतिदिन बारंबार कबन्धोंसे घिरे दिखायी देते थे
वैशम्पायन बोले—उस नगरी में प्रतिदिन उदय और अस्त के समय लोगों को सूर्यदेव बार-बार ऐसे दिखायी देते थे मानो कबन्धों (शीर्षहीन धड़ों) से घिरे हों। यह घोर अनिष्ट का सूचक था, जो विनाश और व्यवस्था-भंग का संकेत देता था।
Verse 14
महानसेषु सिद्धेषु संस्कृतेइतीव भारत । आहार्यमाणे कृमयो व्यदृश्यन्त सहस्रश:,अच्छी तरह छौंक-बघारकर जो रसोइयाँ तैयार की जाती थीं, उन्हें परोसकर जब लोग भोजनके लिये बैठते थे तब उनमें हजारों कीड़े दिखायी देने लगते थे
वैशम्पायन बोले—हे भारत! रसोइयों में भली-भाँति सिद्ध और संस्कृत किए गए व्यंजन भी, जब परोसकर भोजन के लिए लाए जाते, तभी उनमें सहस्रों कीड़े दिखायी देने लगते थे। जो अन्न जीवन का आधार है, वही घृणित और अभक्ष्य बन जाता—यह यदुवंश के लोक में छा रहे धर्म-वैपरीत्य का संकेत था।
Verse 15
पुण्याहे वाच्यमाने तु जपत्सु च महात्मसु | अभिधावन्त: श्रूयन्ते न चादृश्यत कश्नन,जब पुण्याहवाचन किया जाता और महात्मा पुरुष जप करने लगते थे, उस समय कुछ लोगोंके दौड़नेकी आवाज सुनायी देती थी; परंतु कोई दिखायी नहीं देता था
वैशम्पायन बोले—जब पुण्याहवाचन किया जाता और महात्मा पुरुष जप में प्रवृत्त होते, तब दौड़ते हुए लोगों की-सी ध्वनि सुनायी देती; पर कोई भी कहीं दिखायी नहीं देता था। यह पवित्र कर्म में अदृश्य विघ्न का प्रवेश था—आसन्न अनर्थ का अशुभ संकेत।
Verse 16
परस्परं च नक्षत्र हन्यमानं पुन: पुनः | ग्रहैरपश्यन् सर्वे ते नात्मनस्तु कथंचन,सब लोग बारंबार यह देखते थे कि नक्षत्र आपसमें तथा ग्रहोंके साथ भी टकरा जाते हैं, परन्तु कोई भी किसी तरह अपने नक्षत्रको नहीं देख पाता था
वैशम्पायन बोले—वे सब बार-बार देखते थे कि नक्षत्र परस्पर तथा ग्रहों से भी टकरा रहे हैं; पर कोई भी किसी प्रकार अपना नक्षत्र नहीं देख पाता था। यह आकाश में परस्पर-विरोधी विक्षोभ था, जो मनुष्यों में विवेक और आत्मबोध के लोप का प्रतिबिम्ब बनकर, अनिवार्य विनाश का पूर्वसूचक हुआ।
Verse 17
नदन्तं पाउ्चजन्यं च वृष्ण्यन्धकनिवेशने । समन्तात् पर्यवाशन्त रासभा दारुणस्वरा:,जब भगवान् श्रीकृष्णका पाज्चजन्य शंख बजता था, तब वृष्णियों और अन्धकोंके घरके आस-पास चारों ओर भयंकर स्वरवाले गदहे रेंकने लगते थे
वैशम्पायन बोले— वृष्णियों और अन्धकों की बस्ती में जब-जब पाञ्चजन्य शंख बजता, तब चारों ओर भयंकर स्वर वाले गधे रेंकने लगते थे।
Verse 18
एवं पश्यन् हृषीकेश: सम्प्राप्तं कालपर्ययम् । त्रयोदश्याममावास्यां तान् दृष्ट्वा प्राब्रवीदिदम्,इस तरह कालका उलट-फेर प्राप्त हुआ देख और त्रयोदशी तिथिको अमावास्याका संयोग जान भगवान् श्रीकृष्णने सब लोगोंसे कहा--
इस प्रकार काल का उलट-फेर आया हुआ देखकर हृषीकेश ने त्रयोदशी तिथि और अमावस्या के संयोग को जानकर, सबको देखकर यह कहा।
Verse 19
चतुर्दशी पञ्चदशी कृतेयं राहुणा पुनः । प्राप्ते वै भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षयाय न:,“वीरो! इस समय राहुने फिर चतुर्दशीको ही अमावास्या बना दिया है। महाभारतयुद्धके समय जैसा योग था वैसा ही आज भी है। यह सब हमलोगोंके विनाशका सूचक है!
वैशम्पायन बोले— “वीरो! राहु ने फिर चतुर्दशी और पञ्चदशी को एक ही अमावस्या-रात्रि बना दिया है। जैसा योग महाभारत-युद्ध के समय था, वैसा ही आज भी है। यह हमारे विनाश का सूचक है।”
Verse 20
विमृशन्नेव काल॑ तं॑ परिचिन्त्य जनार्दन: । मेने प्राप्त स षट्त्रिंशं वर्ष वै केशिसूदन:,इस प्रकार समयका विचार करते हुए केशिहन्ता श्रीकृष्णने जब उसका विशेष चिन्तन किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि महाभारतयुद्धके बाद यह छत्तीसवाँ वर्ष आ पहुँचा
वैशम्पायन बोले— इस प्रकार उस समय पर विचार करते हुए और उसे भली-भाँति मन में रखकर जनार्दन, केशिहन्ता श्रीकृष्ण ने जाना कि महाभारत-युद्ध के बाद यह छत्तीसवाँ वर्ष आ पहुँचा है।
Verse 21
पुत्रशोकाभिसंतप्ता गान्धारी हतबान्धवा | यदनुव्याजहारार्ता तदिदं समुपागमत्,वे बोले--“बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेपर पुत्रशोकसे संतप्त हुई गान्धारी देवीने अत्यन्त व्यथित होकर हमारे कुलके लिये जो शाप दिया था उसके सफल होनेका यह समय आ गया है
वैशम्पायन बोले— पुत्र-शोक से संतप्त और बन्धु-बान्धवों से वंचित गान्धारी ने जो शाप अत्यन्त आर्त होकर हमारे कुल के लिए दिया था, उसके फलित होने का यही समय आ पहुँचा है।
Verse 22
इदं च तदनुप्राप्तमब्रवीद् यद् युधिष्ठिर: । पुरा व्यूढेष्वनीकेषु दृष्टवोत्पातान् सुदारुणान्,'पूर्वकालमें कौरव-पाण्डवोंकी सेनाएँ जब व्यूहबद्ध होकर आमने-सामने खड़ी हुईं, उस समय भयानक उत्पातोंको देखकर युधिष्ठिरने जो कुछ कहा था, वैसा ही लक्षण इस समय भी उपस्थित है”
वैशम्पायन बोले—यह वही स्थिति फिर उपस्थित हो गई है, जैसी युधिष्ठिर ने बहुत पहले कही थी, जब कौरव और पाण्डव की सेनाएँ व्यूहबद्ध होकर आमने-सामने खड़ी थीं और उन्होंने अत्यन्त भयानक उत्पात देखे थे।
Verse 23
इत्युक्त्वा वासुदेवस्तु चिकीर्ष: सत्यमेव तत् । आज्ञापयामास तदा तीर्थयात्रामरिंदम:,ऐसा कहकर शत्रुदमन भगवान् श्रीकृष्णने गान्धारीके उस कथनको सत्य करनेकी इच्छासे यदुवंशियोंको उस समय तीर्थयात्राके लिये आज्ञा दी
वैशम्पायन बोले—ऐसा कहकर शत्रुदमन वासुदेव श्रीकृष्ण ने उस वचन को सत्य करने की इच्छा से उसी समय तीर्थयात्रा का आदेश दिया।
Verse 24
अघोषयन्त पुरुषास्तत्र केशवशासनात् । तीर्थयात्रा समुद्रे व: कार्येति पुरुषर्षभा:,भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे राजकीय पुरुषोंने उस पुरीमें यह घोषणा कर दी कि 'पुरुषप्रवर यादवो! तुम्हें समुद्रमें ही तीर्थयात्राके लिये चलना चाहिये। अर्थात् सबको प्रभासक्षेत्रमें उपस्थित होना चाहिये”
वैशम्पायन बोले—केशव की आज्ञा से वहाँ राजपुरुषों ने घोषणा कर दी—“पुरुषश्रेष्ठ यादवो! तुम्हें समुद्र-तट के तीर्थ की यात्रा करनी है; उसी के लिए प्रस्थान करो।”
The dilemma centers on whether elite humor and dominance-display can override norms of reverence: the Vṛṣṇis’ staged deception of visiting ṛṣis tests the boundary between social play and ethical transgression, and the text treats the violation as consequential.
The chapter teaches that collective outcomes emerge from both immediate misconduct and long causal accumulation; once a destructive trajectory is matured (kāla/kṛtānta), even capable agents may be limited to witnessing and preparing rather than reversing it.
No explicit phalaśruti appears in these verses; the meta-commentary is implicit in the framing—Janamejaya’s inquiry and Vaiśaṃpāyana’s causal narration—positioning the episode as a didactic case study in dharma, governance, and karmic consequence.