ट्रपदसुतवरिष्ठा: पठ्च शैनेयषष्ठा द्रुपददुहितृपुत्रा: प्च चामित्रसाहा: । द्विरदरथनराश्चान् सूदयन्तस्त्वदीयान् भुजगपतिनिकाशैर्मार्गणैरात्तशस्त्रा:,संजय कहते हैं--महाराज! वृषसेनने नकुलके धनुष और तलवारको काट दिया है, वे रथहीन हो गये हैं, शत्रुके बाणोंसे पीड़ित हैं तथा कर्णके पुत्रने अपने अस्त्रोंद्वारा उन्हें पराजित कर दिया है, यह जानकर श्रेष्ठ पुरुष भीमसेनके आदेशसे हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ ट्रुपदके पाँच श्रेष्ठ पुत्र, छठे सात्यकि तथा द्रौपदीके पाँच पुत्र--ये ग्यारह वीर आपके पक्षके हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंका अपने सर्पतुल्य बाणोंद्वारा संहार करते हुए रथोंद्वारा वहाँ शीघ्रतापूर्वक आ पहुँचे। उस समय उनके रथकी पताकाएँ वायुके वेगसे फहरा रही थीं। उनके घोड़े उछलते हुए आ रहे थे और वे सब-के- सब जोर-जोरसे गर्जना कर रहे थे
drupadasutavariṣṭhāḥ pañca śaineyaṣaṣṭhā drupadaduhitṛputrāḥ pañca cāmitrasāhāḥ | dviradarathanarāś cān sūdayantas tvadīyān bhujagapatinikāśair mārgaṇair āttaśastrāḥ ||
संजय बोले—महाराज! द्रुपद के पाँच श्रेष्ठ पुत्र, छठे शैनेय (सात्यकि) और द्रौपदी के पाँच पुत्र—ये सब शूरवीर, हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिये, रथों पर चढ़कर शीघ्र आ पहुँचे। वे नागराज के समान विषधर बाणों से आपके गज, अश्व, रथ और पैदल सैनिकों का संहार करते चले आ रहे थे। उनकी पताकाएँ वायु के वेग से फहरा रही थीं, घोड़े उछलते हुए बढ़ रहे थे और वे सब ऊँचे स्वर से गर्जना कर रहे थे।
संजय उवाच