कर्णवधप्रसङ्गः / The Context of Karṇa’s Fall
Krishna’s Dharmic Recollection and the Decisive Astra
षट्साहस्रा भारत राजपूुत्रा: स्वर्गाय लोकाय रणे निमग्ना: । कर्ण न चेदद्य निहन्मि राजन् सबान्धवं युध्यमानं प्रसहु
ṣaṭsāhasrā bhārata rājaputrāḥ svargāya lokāya raṇe nimagnāḥ | karṇa na ced adya nihanymi rājan sabāndhavaṁ yudhyamānaṁ prasahya
हे भरतवंशी राजकुमार! स्वर्ग और परलोक के लिए छः हजार राजपुत्र इस रण में डूब चुके हैं। इसलिए, हे राजन्, यदि आज मैं युद्ध करते हुए कर्ण को—उसके बन्धु-बान्धवों सहित—बलपूर्वक न मारूँ, तो यह संहार व्यर्थ होगा और मेरा क्षात्रधर्म अधूरा रह जाएगा।
अजुन उवाच