युधिष्ठिरकृष्णसंवादः — Yudhiṣṭhira’s Appeal and Kṛṣṇa’s Assurance
Droṇa-parva, Adhyāya 59
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा: । अयज्वानमदाक्षिण्यमश्रि श्रैत्येत्युदाहरत्,वैत्य सृंजय! वे श्रीरामचन्द्रजी धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य चारों बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी यहाँ नहीं रह सके, तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम यज्ञ एवं दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। नारदजीने राजा सूंजयसे यही बात कही
putrāt puṇyataras tubhyaṃ mā putram anutapyathāḥ | ayajvān amadākṣiṇyam aśrīḥ śraity ety udāharat, vaiti sṛñjaya |
नारदजी बोले—“तुम्हारा पुत्र तुमसे अधिक पुण्यात्मा था, इसलिए उसके लिए शोक मत करो। कहा गया है कि जो यज्ञ नहीं करता और दान-दक्षिणा नहीं देता, उसे अमंगल घेर लेता है। हे सृंजय! धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य में अत्यन्त श्रेष्ठ महापुरुष भी यहाँ सदा नहीं रह सके, फिर दूसरों की तो बात ही क्या? इसलिए अपने उस पुत्र के लिए, जो यज्ञ और दान-दक्षिणा से रहित था, शोक में मत डूबो।” इस प्रकार नारदजी ने राजा सृंजय को उपदेश दिया।
नारद उवाच