Bhagadatta’s Advance, the Saṃśaptaka Challenge, and Arjuna’s Counterstrike (द्रोणपर्व, अध्याय २६)
क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वायसानामिव स्वन: । बभूव पाण्डवेयानां भृशं विद्रवतां स्वन:,जैसे बाज पक्षीके चंगुलमें फँसे हुए अथवा उसके आक्रमणसे त्रस्त हुए कौओंमें शीघ्र ही काँव-काँवका कोलाहल होने लगता है, उसी प्रकार भागते हुए पाण्डव योद्धाओंका आर्तनाद जोर-जोरसे सुनायी दे रहा था
kṣipraṁ śyenābhipannānāṁ vāyasānām iva svanaḥ | babhūva pāṇḍaveyānāṁ bhṛśaṁ vidravatāṁ svanaḥ ||
जैसे बाज के वेग से झपट पड़ने पर या उसके चंगुल में फँसते ही कौओं में तुरंत काँव-काँव का कोलाहल उठता है, वैसे ही अव्यवस्था में भागते पाण्डव-योद्धाओं की करुण चीत्कारें अत्यन्त प्रबल होकर गूँज उठीं।
संजय उवाच