ततः स रथनीडस्थं स्वरथस्य रथेषया । अगच्छदसिमुद्यम्य शतचन्द्रं च भानुमत्,उस समय उन्होंने तलवार और सौ चन्द्रचिह्"ोंवाली ढाल लेकर अपने रथकी ईषाके मार्गसे रथकी बैठकमें बैठे हुए द्रोणपर आक्रमण किया
tataḥ sa rathanīḍasthaṃ svarathasya ratheṣayā | agacchad asim udyamya śatacandraṃ ca bhānumat ||
तब वे तलवार उठाए और सौ चन्द्रचिह्नों वाली दीप्तिमान ढाल धारण किए, अपने रथ की ईषा के मार्ग से रथनीड में बैठे द्रोण की ओर बढ़े और आक्रमण कर बैठे।
संजय उवाच