Mahabharata Adhyaya 190
Drona ParvaAdhyaya 19071 Versesक्षण-क्षण डोलता हुआ—सहदेव और अर्जुन के कौशल से पाण्डव-पक्ष को बढ़त का आभास, पर कर्ण-द्रोण की दृढ़ता से निर्णायक पल अभी दूर।

Adhyaya 190

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बताता है कि द्रोण-पर्व के इस अध्याय में तीन मोर्चों पर एक साथ घोर संग्राम भड़क उठा—दुःशासन बनाम सहदेव, कर्ण बनाम भीमसेन, और द्रोणाचार्य बनाम अर्जुन; रणभूमि मानो एक ही क्षण में तीन अग्निकुंड बन जाती है। → सहदेव अपनी तीव्र फुर्ती से दुःशासन के सारथी/रथ-व्यवस्था पर निर्णायक प्रहार करता है—ऐसा कि न दुःशासन, न कोई सैनिक उसे रोक पाता। उधर भीम और कर्ण वेग से एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं; गदा-युद्ध में रथ, ध्वजा, कूबर—सब लक्ष्य बनते हैं। तीसरे मोर्चे पर द्रोण दिव्यास्त्रों की वर्षा कर अर्जुन को दबाने का प्रयास करते हैं, और अर्जुन विधिपूर्वक प्रतिअस्त्रों से उन्हें निष्फल करता जाता है। → भीमसेन अपनी गदा से कर्ण के रथ के कूबर को तोड़कर ‘शतधा’ कर देता है—अद्भुत दृश्य; साथ ही द्रोण और अर्जुन के बीच दिव्यास्त्रों का चरम आदान-प्रदान होता है—ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्र, वायव्य, वारुण आदि अस्त्र द्रोण के धनुष से छूटते हैं और धनंजय उन्हें तत्क्षण काट/शांत कर देता है। द्रोण मन-ही-मन अर्जुन की प्रशंसा करते हैं—गुरु-शिष्य का युद्ध अपने शिखर पर पहुँचता है। → सहदेव का त्वरित प्रहार पाण्डव-पक्ष का मनोबल बढ़ाता है; भीम-कर्ण का गदा-संघर्ष निर्णायक चोटों के बावजूद चलता रहता है—कर्ण भीम की गदा उठाकर प्रत्याघात करता है, पर भीम दूसरी गदा से उसे रोक देता है। द्रोण, प्रयत्न करते हुए भी, अर्जुन द्वारा रोके जाने पर प्रसन्न-हास्य सहित उसे प्रत्यवारित करते हैं—युद्ध थमता नहीं, केवल अगले आवेग के लिए साँस लेता है। → तीनों द्वंद्वों में कोई अंतिम निर्णय नहीं—कर्ण-भीम और द्रोण-अर्जुन की टक्कर अगले क्षण और अधिक उग्र होने का संकेत देती है।

Shlokas

Verse 1

शीश >> श््जु भ्निध्ररॉभ्राध्यस अष्टा शीर्त्याधिकशततमोब् ध्याय: दुःशासन और सहदेवका

संजय बोले—तदनन्तर क्रोध से भरा दुःशासन सहदेव पर टूट पड़ा। अपने रथ के तीव्र वेग से वह मानो पृथ्वी को कँपाता हुआ चला।

Verse 2

तस्यापतत एवाशु भल्‍्लेनामित्रकर्शन: । माद्रीपुत्र: शिरो यन्तु: सशिरस्त्राणमच्छिनत्‌,उसके आते ही शत्रुसूदन माद्रीकुमार सहदेवने शीघ्र ही एक भल्ल मारकर दुःशासनके सारथिका मस्तक शिरस्त्राणसहित काट डाला

उसके टूटते ही शत्रुसूदन माद्रीपुत्र सहदेव ने शीघ्र ही भल्ल बाण से उसके सारथी का सिर शिरस्त्राण सहित काट डाला।

Verse 3

नैनं दुःशासन: सूतं नापि कश्चन सैनिक: । कृत्तोत्तमाड़माशुत्वात्‌ सहदेवेन बुद्धवान्‌

सहदेव ने ऐसी फुर्ती से यह कार्य किया कि न दुःशासन और न कोई अन्य सैनिक जान सका कि सारथी का सिर काट दिया गया है।

Verse 4

यदा त्वसंगृहीतत्वात्‌ प्रयान्त्यश्वा यथासुखम्‌ | ततो दुःशासन: सूतं बुबुधे गतचेतसम्‌,जब रास छूट जानेके कारण घोड़े अपनी मौजसे इधर-उधर भागने लगे, तब दुःशासनको यह ज्ञात हुआ कि मेरा सारथि मारा गया

जब रास न पकड़ी होने से घोड़े अपनी इच्छा से इधर-उधर दौड़ने लगे, तब दुःशासन ने जान लिया कि उसका सारथि चेतनाहीन हो गया है।

Verse 5

स हयान्‌ संनिगृह्माजी स्वयं हयविशारद: । युयुधे रथिनां श्रेष्ठो लघु चित्र च सुष्ल च

अश्व-संचालन में निपुण वह रथियों में श्रेष्ठ दुःशासन रणभूमि में स्वयं ही घोड़ों को काबू में करके शीघ्रता से विचित्र और सुचारु ढंग से युद्ध करने लगा।

Verse 6

तदस्यापूजयन्‌ कर्म स्वे परे चापि संयुगे । हतसूतरथेनाजौ व्यचरद्‌ यदभीतवत्‌

उसके इस कर्म की अपने और पराये—दोनों पक्षों ने संग्राम में प्रशंसा की; क्योंकि सारथि के मारे जाने पर भी वह रथ लेकर रण में निर्भय-सा विचरता रहा।

Verse 7

सारथिके मारे जानेपर भी दुःशासन उस रथके द्वारा युद्धभूमिमें निर्भय-सा विचरता रहा; उसके इस कर्मकी अपने और शत्रुपक्षके लोगोंने भी प्रशंसा की ।।

तब सहदेव ने उन घोड़ों पर तीखे बाणों की वर्षा की। बाणों से पीड़ित वे घोड़े शीघ्र ही इधर-उधर भागने लगे।

Verse 8

स रश्मिषु विषक्तत्वादुत्ससर्ज शरासनम्‌ | धनुषा कर्म कुर्वस्तु रश्मींश्ष॒ पुनरुत्सूजत्‌

रास में उलझ जाने के कारण वह धनुष छोड़ देता था; और जब धनुष से काम लेने लगता, तब विवश होकर फिर रास छोड़ देता था।

Verse 9

छिद्रेष्वेतेषु तं बाणैर्माद्रीपुत्रो 5 भ्यवाकिरत्‌ । परीप्संस्त्वत्सुतं कर्णस्तदन्‍्तरमवाप तत्‌

संजय बोले—शत्रु-पक्ष की रक्षा में जहाँ-जहाँ छिद्र मिले, वहाँ माद्रीपुत्र सहदेव ने उसे बाणों की वर्षा से मानो ढक दिया। उसी समय आपके पुत्र की रक्षा के लिए कर्ण उस अंतराल में कूद पड़ा और दोनों के बीच स्थान ले लिया।

Verse 10

वृकोदरस्तत: कर्ण त्रिभिर्भल्लै: समाहित: । आकर्णपूर्णरभ्यघ्नद्‌ बाह्वोरुगसि चानदत्‌

संजय बोले—तब वृकोदर भीम ने लक्ष्य साधकर धनुष को कान तक खींचा और तीन भल्लों से कर्ण की दोनों भुजाओं तथा छाती पर गहरे प्रहार किए। प्रहार करके वह ऊँचे स्वर में गर्जना करने लगा।

Verse 11

स निवृत्तस्तत: कर्ण: संघट्टधित इवोरग: । भीममावारयामास विकिरन्‌ निशितान्‌ शरान्‌,तदनन्तर पैरोंसे कुचले गये सर्पके समान कुपित हो कर्ण लौट पड़ा और तीखे बाणोंकी वर्षा करके भीमको रोकने लगा

संजय बोले—तत्पश्चात् पैरों से कुचले गए सर्प के समान क्रुद्ध होकर कर्ण लौट पड़ा और तीखे बाणों की वर्षा करके भीम को रोकने लगा।

Verse 12

ततो<भूत्‌ तुमुलं युद्ध भीमराधेययोस्तदा । तौ वृषाविव नर्दन्तौ विवृत्तनयनावुभौ

संजय बोले—तब भीम और राधेय कर्ण के बीच घोर संग्राम छिड़ गया। दोनों ही क्रोध से विकृत नेत्रों से एक-दूसरे को देखते हुए, दो साँडों की भाँति गर्जने लगे।

Verse 13

वेगेन महतान्योन्यं संरब्धावभिपेततु: । अभिसंश्शलिष्टयोस्तत्र तयोराहवशौण्डयो:

संजय बोले—महान वेग और उग्र संकल्प से प्रेरित होकर वे दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़े। वहाँ निकट आकर जब वे परस्पर सट गए, तब वे दोनों युद्ध-निपुण वीर घनघोर भिड़ंत में उलझ गए।

Verse 14

गदया भीमसेनस्तु कर्णस्य रथकूबरम्‌

तब भीमसेन ने अपनी गदा से कर्ण के रथ के कूबर (धुरी/ढाँचे के मुख्य भाग) पर प्रहार किया।

Verse 15

ततो भीमस्य राधेयो गदामाविध्य वीर्यवान्‌

तब पराक्रमी राधेय (कर्ण) ने गदा घुमाकर भीम की ओर धावा किया।

Verse 16

ततो भीम: पुनर्गुर्वी चिक्षेपाधिरथेर्गदाम्‌

तब भीम ने फिर से उस महान रथी पर अपनी भारी गदा फेंकी।

Verse 17

तां गदां बहुभि: कर्ण: सुपुड्खै: सुप्रवेजितै: । प्रत्यविध्यत्‌ पुनश्चान्यै: सा भीम॑ पुनराव्रजत्‌

उस गदा को कर्ण ने बहुत-से सुन्दर पंखों वाले, वेग से छोड़े गए बाणों से बार-बार बेध दिया; फिर भी वह गदा लौटकर पुनः भीम की ओर ही आ गई।

Verse 18

तत्पश्चात्‌ उन्होंने अधिरथपुत्र कर्णपर पुनः एक भारी गदा छोड़ी। परंतु कर्णने तेज किये हुए सुन्दर पंखवाले दूसरे-दूसरे बहुत-से बाण मारकर उस गदाको बींध डाला। इससे वह पुनः भीमपर ही लौट आयी ।।

इसके बाद भीम ने अधिरथपुत्र कर्ण पर फिर एक भारी गदा फेंकी। पर कर्ण ने तीव्र वेग वाले, सुन्दर पंखों से युक्त अनेक बाणों से उसे बेध दिया; और उन बाणों के प्रतिघात से वह गदा लौटकर फिर भीम की ओर आ गई। कर्ण के बाणों से आहत होकर वह मानो मंत्र से मारी हुई व्याली-सी झपटती थी; उसके प्रतिनिपात से भीम का विशाल ध्वज काँप उठा।

Verse 19

स कर्ण सायकानष्टौ व्यसृजत्‌ क्रोधमूर्च्छित:

संजय बोले—क्रोध से मूर्च्छित कर्ण ने आठ बाण छोड़ दिए।

Verse 20

तैस्तस्य निशितैस्ती&$णैरभीमसेनो महाबल: । चिच्छेद परवीरघ्न: प्रहसन्निव भारत

संजय बोले—हे भारत! उन तीखे, पैने बाणों से महाबली भीमसेन—शत्रुवीरों का संहारक—मानो हँसते हुए उसके अस्त्र काट गिरा रहा था।

Verse 21

ध्वजं शरासनं चैव शरावापं च भारत । तब क्रोधसे व्याकुल हुए भीमसेनने कर्णको आठ बाण मारे। भारत! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली भीमसेनने हँसते हुए-से उन तेज धारवाले तीखे बाणोंद्वारा कर्णके ध्वज धनुष और तरकसको काट गिराया ।।

संजय बोले—हे भारत! क्रोध से व्याकुल भीमसेन ने तीखे, पैने बाणों से कर्ण का ध्वज, धनुष और तरकस काट गिराया। तब राधापुत्र कर्ण ने सोने की पीठवाला दूसरा दुर्जय धनुष उठा लिया और रथ पर रखे बाणों से शीघ्र ही भीमसेन के रीछ के समान रंगवाले काले घोड़ों तथा दोनों पार्श्वरक्षकों को मार डाला।

Verse 22

ततः पुनस्तु राधेयो हयानस्य रथेषुभि: । ऋक्षवर्णाञ्जघानाशु तथोभौ पार्ष्णिसारथी

संजय बोले—तब राधेय कर्ण ने फिर रथ से छोड़े हुए बाणों द्वारा भीमसेन के रीछ-वर्ण घोड़ों को शीघ्र मार गिराया; और दोनों पार्श्वरक्षकों तथा सारथी को भी तुरंत ही मार डाला।

Verse 23

स विपन्नरथो भीमो नकुलस्याप्लुतो रथम्‌ | हरिर्यथा गिरे: शूड़ं समाक्रामदरिंदम:,इस तरह रथ नष्ट हो जानेसे शत्रुदमन भीमसेन जैसे सिंह पर्वतके शिखरपर चढ़ जाता है, उसी प्रकार उछलकर नकुलके रथपर जा बैठे

संजय बोले—जब उसका रथ नष्ट हो गया, तब शत्रुदमन भीम सिंह की भाँति उछलकर नकुल के रथ पर जा चढ़ा, जैसे सिंह पर्वत-शिखर पर चढ़ जाता है।

Verse 24

तथा द्रोणार्जुनौ चित्रमयुध्येतां महारथौ । आचार्यशिष्यौ राजेन्द्र कृतप्रहरणौ युधि

राजेन्द्र! उसी प्रकार रणभूमि में आचार्य और शिष्य—महारथी द्रोण तथा अर्जुन—परस्पर प्रहार करते हुए अद्भुत रीति से युद्ध कर रहे थे।

Verse 25

लघुसंधानयोगाभ्यां रथयोश्व रणेन च । मोहयन्तौ मनुष्याणां चक्षूंषि च मनांसि च,शीघ्रतापूर्वक बाणोंके संधान और रथोंके योगसे अपने संग्रामद्वारा वे दोनों वीर लोगोंके नेत्रों और मनको भी मोह लेते थे

शीघ्रता से बाणों का संधान, रथों का सुयोग और अपने युद्ध-प्रकार से वे दोनों वीर मनुष्यों के नेत्रों और मनों को भी मोहित कर देते थे।

Verse 26

उपारमन्त ते सर्वे योधा भरतसत्तम । अदृष्टपूर्व पश्यन्तस्तद्‌ युद्ध गुरुशिष्ययो:,भरतश्रेष्ठ! गुरु और शिष्यके उस अपूर्व युद्धको देखते हुए सब योद्धा संग्रामसे विरत हो गये

भरतश्रेष्ठ! गुरु और शिष्य के उस अपूर्व युद्ध को देखते हुए वे सब योद्धा संग्राम से विरत हो गए।

Verse 27

विचित्रान्‌ पृतनामध्ये रथमार्गनुदीर्य तौ । अन्योन्यमपसव्यं च कर्तु वीरौ तदेषतु:,वे दोनों वीर सेनाके बीचमें रथके विचित्र पैंतरे प्रकट करते हुए उस समय एक-दूसरेको दायें कर देनेकी चेष्टा करने लगे

सेना के बीच रथ के विचित्र पैंतरे दिखाते हुए वे दोनों वीर उस समय एक-दूसरे को दाएँ कर देने की चेष्टा करने लगे।

Verse 28

पराक्रमं तयोयोधा ददृशुस्ते सुविस्मिता: । तयो: समभवद्‌ युद्ध द्रोणपाण्डवयोर्महत्‌

वे योद्धा अत्यन्त विस्मित होकर उन दोनों का पराक्रम देखने लगे। तब द्रोण और पाण्डवों के बीच महान युद्ध छिड़ गया।

Verse 29

यद्‌ यच्चकार द्रोणस्तु कुन्तीपुत्रजिगीषया

संजय बोले—द्रोण ने जो-जो कर्म किए, वे सब कुन्तीपुत्रों को रण में जीतने की अभिलाषा से ही किए।

Verse 30

यदा द्रोणो न शक्नोति पाण्डवं सम विशेषितुम्‌

संजय बोले—“जब द्रोण पाण्डव को दबाकर उस पर निर्णायक बढ़त पाने में समर्थ नहीं रह जाता…”

Verse 31

ऐन्द्रं पाशुपतं त्वाष्ट्र वायव्यमथ वारुणम्‌

संजय बोले—“तब उसने ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्र तथा फिर वायव्य और वारुण—इन दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया।”

Verse 32

अस्त्राण्यस्त्रैर्यदा तस्य विधिवद्धन्ति पाण्डव:

संजय बोले—“जब पाण्डव विधिपूर्वक उसके अस्त्रों का अपने अस्त्रों से प्रतिकार करते हैं…”

Verse 33

यद्‌ यदस्त्रं स पार्थाय प्रयुड्धक्ते वेजिगीषया

संजय बोले—“वह पार्थ के विरुद्ध जो-जो अस्त्र चलाता, वह सब युद्ध में विजय पाने की अभिलाषा से ही चलाता।”

Verse 34

तस्य तस्य विघाताय तत्‌ तद्धि कुरुतेडर्जुन: । परंतु विजयकी इच्छासे वे पार्थपर जिस-जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस-उसके विनाशके लिये अर्जुन वैसे ही अस्त्रोंका प्रयोग करते थे ।।

संजय बोले—उन-उन आघातों के विनाश के लिए अर्जुन वैसा-वैसा ही उपाय करता था। जब-जब विधिपूर्वक दिव्य अस्त्र छोड़े जाते, तब-तब विजय की अभिलाषा से पार्थ समान अस्त्रों से उनका प्रतिकार कर, उठते ही उन्हें नष्ट कर देता।

Verse 35

मेने चात्मानमधिकं पृथिव्यामधि भारत

संजय बोले—हे भारत! वह अपने को पृथ्वी पर सबसे अधिक श्रेष्ठ मानता था।

Verse 36

वार्यमाणस्तु पार्थेन तथा मध्ये महात्मनाम्‌

संजय बोले—पार्थ द्वारा रोके जाने पर भी वह वहीं महात्मा वीरों के बीचों-बीच बना रहा।

Verse 37

ततोडन्तरिक्षे देवाश्न गन्धर्वाश्ष सहस्रश:

तब आकाश में देवता और गन्धर्व सहस्रों की संख्या में प्रकट हुए।

Verse 38

तदप्सरोभिराकीर्ण यक्षगन्धर्वसंकुलम्‌

वह स्थान अप्सराओं से भरा और यक्षों तथा गन्धर्वों से घिरा हुआ दिखाई देने लगा।

Verse 39

तत्र स्मान्तर्हिता वाचो व्यचरन्त पुन: पुन:

वहाँ बार-बार, दृष्टि से ओझल हुई-सी वाणियाँ इधर-उधर विचरती रहीं; बीच-बीच में गूँज उठतीं, मानो अदृश्य उपस्थितियों का संकेत देती हुईं और रणभूमि में व्याप्त अस्थिर अनिश्चय को और भी भयावह बनाती हुईं।

Verse 40

विसृज्यमानेष्वस्त्रेषु ज्वालयत्सु दिशो दश

संजय बोले: जब अस्त्र छोड़े जा रहे थे और वे प्रज्वलित होकर दौड़ रहे थे, तब मानो दसों दिशाएँ दहक उठीं—यह युद्ध की भयानक तीव्रता और उस नैतिक संकट का संकेत था जो तब जन्म लेता है जब क्रोध और शस्त्र-बल निरंकुश होकर छूट पड़ते हैं।

Verse 41

अब्रुव॑ंस्तत्र सिद्धाश्षन ऋषयश्न समागता: । जब दिव्यास्त्रोंके प्रयोग होने लगे और उनके तेजसे दसों दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं

संजय बोले: जब दिव्यास्त्रों का प्रयोग होने लगा और उनके तेज से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, तब आकाश में एकत्र हुए सिद्ध और ऋषि आपस में कहने लगे—“यह युद्ध न मनुष्यों का है, न असुरों का, न राक्षसों का; न देवों का, न गन्धर्वों का। निश्चय ही यह परम, ध्रुव ब्राह्म युद्ध है। ऐसा विचित्र और आश्चर्यजनक संग्राम न हमने कभी देखा है, न सुना है।”

Verse 42

नदैवं न च गान्धर्व ब्राह्मां ध्रुवमिदं परम्‌ विचित्रमिदमाश्चर्य न नो दृष्टं न च श्रुतम्‌

“यह युद्ध न देवों का है, न गन्धर्वों का; निश्चय ही यह परम और ध्रुव ब्राह्म युद्ध है। ऐसा विचित्र और आश्चर्यजनक संग्राम न हमने कभी देखा है, न सुना है।”

Verse 43

अति पाण्डवमाचार्यो द्रोणं चाप्पति पाण्डव: । नानयोरन्तरं शक्‍्यं द्रष्टमन्येन केनचित्‌

संजय बोले: आचार्य द्रोण मानो पाण्डवों के ही पक्ष में हो गए थे, और पाण्डव वीर द्रोण पर अत्यन्त दबाव डाल रहा था। उन दोनों के बीच कोई अन्तर, कोई अवकाश, किसी अन्य से देख पाना सम्भव न था—इतने निकट और समतुल्य वे उस संग्राम में भिड़े थे।

Verse 44

“आचार्य द्रोण पाण्डुपुत्र अर्जुनसे बढ़कर हैं और पाण्डुपुत्र अर्जुन भी आचार्य द्रोणसे बढ़कर हैं। इन दोनोंमें कितना अन्तर है, इसे दूसरा कोई नहीं देख सकता ।।

संजय बोले—आचार्य द्रोण पाण्डुपुत्र अर्जुन से बढ़कर हैं, और पाण्डुपुत्र अर्जुन भी आचार्य द्रोण से बढ़कर है। इन दोनों में कितना अन्तर है, इसे दूसरा कोई यथार्थ नहीं देख सकता। यदि भगवान रुद्र (शंकर) अपने को दो रूपों में विभक्त करके स्वयं ही अपने साथ युद्ध करें, तो उसी युद्ध से इनकी उपमा दी जा सकती है; अन्यत्र इन दोनों की समता कहीं नहीं।

Verse 45

ज्ञानमेकस्थमाचार्य ज्ञानं योगश्न पाण्डवे | शौर्यमेकस्थमाचार्ये बलं शौर्य च पाण्डवे

संजय बोले—आचार्य द्रोण में सारा ज्ञान एकत्र संचित है; परंतु पाण्डुपुत्र अर्जुन में ज्ञान के साथ-साथ योग भी है। इसी प्रकार आचार्य द्रोण में सारा शौर्य एक स्थान पर आ गया है; परंतु पाण्डुनन्दन अर्जुन में शौर्य के साथ बल भी है।

Verse 46

नेमौ शक्‍्यौ महेष्वासौ युद्धे क्षपयितुं परै: । इच्छमानौ पुनरिमौ हन्येतां सामरं जगत्‌

संजय बोले—ये दोनों महाधनुर्धर वीर युद्ध में दूसरे किसी योद्धा के द्वारा मारे नहीं जा सकते। परंतु यदि ये दोनों चाहें, तो देवताओं सहित सम्पूर्ण जगत् का विनाश कर सकते हैं।

Verse 47

इत्यब्रुवन्‌ महाराज दृष्टवा तौ पुरुषर्षभौ । अन्तर्हितानि भूतानि प्रकाशानि च सर्वश:

संजय बोले—महाराज! उन दोनों पुरुषप्रवर वीरों को देखकर, आकाश में छिपे हुए तथा प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले प्राणी भी सब ओर यही बातें कह रहे थे।

Verse 48

ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्र प्रादुश्चक्रे महामति: । संतापयन्‌ रणे पार्थ भूतान्यन्तर्हितानि च

संजय बोले—तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् द्रोणाचार्य ने रणभूमि में अर्जुन को तथा आकाशवर्ती अदृश्य प्राणियों को संताप देते हुए ब्रह्मास्त्र प्रकट किया।

Verse 49

ततश्नचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा । ववौ च विषमो वायु: सागराश्षापि चुक्षुभु:,फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित धरती डोलने लगी, आँधी उठ गयी और समुद्रोंमें ज्वार आ गया

तब पर्वतों, वनों और वृक्षों सहित पृथ्वी डोल उठी। विषम प्रचण्ड वायु बहने लगी और समुद्र भी क्षुब्ध हो उठे।

Verse 50

ततस्त्रासो महानासीत्‌ कुरुपाण्डवसेनयो: । सर्वेषां चैव भूतानामुद्यते<स्त्रे महात्मना

महामना द्रोण के द्वारा अस्त्र उठाए जाते ही कौरव और पाण्डव सेनाओं में, तथा समस्त प्राणियों में, महान आतंक छा गया।

Verse 51

ततः पार्थोउप्यसम्भ्रान्तस्तदस्त्रं प्रतिजध्निवान्‌ । ब्रह्मास्त्रेणैेव राजेन्द्र ततः सर्वमशीशमत्‌

राजेन्द्र! तब पार्थ अर्जुन ने भी बिना घबराए ब्रह्मास्त्र से ही उस अस्त्र का प्रतिघात किया; फिर सारा उपद्रव शान्त हो गया।

Verse 52

यदा न गम्यते पारं तयोरन्यतरस्य वा । ततः संकुलयुद्धेन तद्‌ युद्ध व्याकुलीकृतम्‌,जब द्रोणाचार्य और अर्जुनमेंसे कोई भी किसीको परास्त न कर सका, तब सामूहिक युद्धके द्वारा उस संग्रामको व्यापक बना दिया गया

जब द्रोणाचार्य और अर्जुन में से कोई भी दूसरे को परास्त कर पार न पा सका, तब संकुल (सामूहिक) युद्ध से वह संग्राम व्याकुल और व्यापक हो गया।

Verse 53

नाज्ञायत ततः किंचित्‌ पुनरेव विशाम्पते । प्रवृत्ते तुमुले युद्धे द्रोणपाण्डवरयोर्मुथे,प्रजानाथ! रणभूमिमें द्रोणाचार्य और अर्जुनमें घमासान युद्ध छिड़ जानेपर फिर किसीको कुछ सूझ नहीं रहा था

प्रजानाथ! रणभूमि में द्रोणाचार्य और पाण्डव अर्जुन का घोर युद्ध छिड़ जाने पर फिर किसी को कुछ भी स्पष्ट ज्ञात न हो सका।

Verse 54

(द्रोणो मुक्त्वा रणे पार्थ पज्चालानन्वधावत । अर्जुनो5पि रणे द्रोणं त्यक्त्वा प्राद्रावयत्‌ कुरून्‌ ।।

संजय बोले—रणभूमि में द्रोणाचार्य ने पार्थ (अर्जुन) को छोड़कर पाञ्चालों पर धावा किया; और अर्जुन ने भी द्रोण से मुठभेड़ छोड़कर वेग से कौरव-सेना को पीछे ढकेलना आरम्भ किया। तब, महाराज, उस महासंग्राम में उन दोनों ने बाण-वृष्टि से सब कुछ मानो छाया से ढक दिया; युद्ध का तुमुल कोलाहल समस्त जगत् के लिए भयावह प्रतीत होने लगा। आकाश बाणों के जाल से ऐसा भर गया जैसे मेघों की घटा छा गई हो, कि उस समय कोई भी आकाशचारी प्राणी वहाँ से निकल न सका।

Verse 136

विच्छिन्नशरपातत्वाद्‌ गदायुद्धमवर्तत । फिर दोनों परस्पर अत्यन्त कुपित हो बड़े वेगसे टूट पड़े। उन युद्धकुशल योद्धाओंके परस्पर अत्यन्त निकट आ जानेके कारण उनके बाण चलानेका क्रम टूट गया; इसलिये उनमें गदायुद्ध आरम्भ हो गया

संजय बोले—बाणों का आदान-प्रदान टूट जाने से युद्ध गदा-युद्ध में बदल गया। वे दोनों क्रोध से भरकर बड़े वेग से एक-दूसरे पर टूट पड़े; अत्यन्त निकट आ जाने के कारण बाण चलाने का क्रम भंग हो गया, इसलिए गदाओं से निकट-युद्ध आरम्भ हो गया।

Verse 146

बिभेद शतधा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत्‌ | राजन! भीमसेनने अपनी गदासे कर्णके रथका कूबर तोड़कर उसके सौ टुकड़े कर दिये, वह अद्भुत-सा कार्य हुआ

संजय बोले—राजन्! भीमसेन ने अपनी गदा से कर्ण के रथ का कूबर तोड़कर उसे सौ टुकड़ों में चूर कर दिया; वह कार्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ।

Verse 186

पपात सारथिभश्चास्य मुमोह च गदाहतः । कर्णके बाणोंसे आहत हो वह गदा मन्त्रसे मारी गयी सर्पिणीके समान लौटकर भीमसेनके ही रथपर गिरी। उसके गिरनेसे भीमसेनकी विशाल ध्वजा धराशायी हो गयी और उस गदाकी चोट खाकर उनका सारथि भी मूर्च्छित हो गया

संजय बोले—गदा की चोट से भीमसेन का सारथि गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। वह गदा कर्ण के बाणों से आहत होकर, मन्त्रबल से प्रेरित लौटती हुई मानो सर्पिणी की भाँति, भीमसेन के ही रथ पर आ गिरी। उसके गिरते ही भीम की विशाल ध्वजा धराशायी हो गई और उस आघात से सारथि भी बेहोश हो गया।

Verse 187

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें नकुलका युद्धाविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के द्रोणपर्व के अन्तर्गत द्रोणवधपर्व में नकुल के युद्ध-विषयक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 188

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टाशीत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें घमासान युद्धविषयक एक सौ अद्वासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के द्रोणपर्व के अंतर्गत द्रोणवधपर्व में संकुल (घमासान) युद्ध-विषयक एक सौ अट्ठासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 283

आमिषार्थ महाराज गगने श्येनयोरिव । उन द्रोणाचार्य और पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको वे सब सैनिक अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। महाराज! जैसे मांसके टुकड़ेके लिये आकाशमें दो बाज लड़ रहे हों

संजय बोले—महाराज! द्रोणाचार्य और पाण्डुपुत्र अर्जुन के पराक्रम को वे सब सैनिक अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। महाराज! जैसे मांस के टुकड़े के लिये आकाश में दो बाज लड़ते हों, उसी प्रकार राज्य के लिये उन दोनों गुरु-शिष्यों में भयंकर युद्ध हो रहा था।

Verse 296

तत्‌ तत्‌ प्रतिजघानाशु प्रहसंस्तस्य पाण्डव: । द्रोणाचार्य कुन्तीपुत्र अर्जुनको जीतनेकी इच्छासे जिस-जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस-उसको पाए्जुपुत्र अर्जुन हँसते हुए तत्काल काट देते थे

संजय बोले—हँसते हुए उस पाण्डव ने उसके प्रत्येक प्रहार को शीघ्र ही प्रत्याघात से काट दिया। द्रोणाचार्य कुन्तीपुत्र अर्जुन को जीतने की इच्छा से जिस-जिस अस्त्र का प्रयोग करते, पाण्डुपुत्र अर्जुन हँसते हुए तत्काल उसे नष्ट कर देता था।

Verse 306

ततः प्रादुश्चकारास्त्रमस्त्रमार्गविशारद: । जब द्रोणाचार्य पाण्डुपुत्र अर्जुनकी अपेक्षा अपनी विशेषता न सिद्ध कर सके, तब अस्त्रमार्गोके ज्ञाता गुरुदेवने दिव्यास्त्रोंकोी प्रकट किया

संजय बोले—तब अस्त्रमार्ग के ज्ञाता द्रोणाचार्य ने एक दिव्यास्त्र प्रकट किया। जब द्रोणाचार्य पाण्डुपुत्र अर्जुन की अपेक्षा अपनी विशेषता सिद्ध न कर सके, तब गुरुदेव ने दिव्य अस्त्रों का आश्रय लिया।

Verse 323

ततो<अस्त्रै: परमैर्दिव्यैद्रोण: पार्थमवाकिरत्‌ । जब पाण्डुकुमार अर्जुन आचार्यके सभी अस्त्रोंको अपने अस्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक नष्ट करने लगे, तब द्रोणने परम दिव्य अस्त्रोंद्वारा अर्जुनको ढक दिया

संजय बोले—तब द्रोण ने परम दिव्य अस्त्रों से पार्थ अर्जुन पर वर्षा कर दी। जब पाण्डुकुमार अर्जुन आचार्य के सभी अस्त्रों को अपने अस्त्रों द्वारा विधिपूर्वक नष्ट करने लगे, तब द्रोण ने उच्चतर दिव्यास्त्रों से अर्जुन को ढक दिया।

Verse 353

तेन शिष्येण सर्वेभ्य: शस्त्रविद्भ्य: परंतप: । भारत! शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य उस शिष्यके द्वारा अपने-आपको भूमण्डलके सभी शस्त्रवेत्ताओंसे श्रेष्ठ मानने लगे

हे भारत! उस शिष्य के कारण शत्रुओं को संताप देने वाले द्रोणाचार्य अपने-आपको समस्त भूमण्डल के सभी शस्त्र-वेत्ताओं से श्रेष्ठ मानने लगे।

Verse 366

यतमानोडर्जुनं प्रीत्या प्रत्यवारयदुत्स्मयन्‌ । महामनस्वी वीरोंके बीचमें अर्जुनके द्वारा इस प्रकार रोके जाते हुए द्रोणाचार्य प्रयत्न करके प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए स्वयं भी अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोकने लगे

प्रेमपूर्वक प्रयत्न करते हुए और मुसकराते हुए द्रोणाचार्य ने अर्जुन की बढ़त रोक दी। वीरों के बीच अर्जुन द्वारा इस प्रकार रोके जाने पर भी महात्मा द्रोणाचार्य प्रयत्न करके, शांत प्रसन्नता से मुसकराते हुए, स्वयं भी अर्जुन को आगे बढ़ने से रोकने लगे।

Verse 373

ऋषय: सिद्धसंघाश्च व्यतिष्ठन्त दिदृक्षया । तदनन्तर वह युद्ध देखनेकी इच्छासे आकाशमें बहुत-से देवता, सहस्रों गन्धर्व, ऋषि और सिद्धसमुदाय खड़े हो गये

ऋषि और सिद्धों के समुदाय देखने की इच्छा से खड़े हो गए। इसके बाद युद्ध देखने की अभिलाषा से आकाश में बहुत-से देवता, सहस्रों गन्धर्व, ऋषि और सिद्धसमुदाय अपने-अपने स्थानों पर स्थित हो गए।

Verse 383

श्रीमदाकाशमभवद्‌ भूयो मेघाकुलं यथा । अप्सराओं, यक्षों और गन्धर्वोंसे भरा हुआ आकाश ऐसी विशिष्ट शोभा पा रहा था, मानो उसमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो

आकाश फिर से श्रीमान् हो उठा, मानो मेघों की घटा से घिर गया हो। अप्सराओं, यक्षों और गन्धर्वों से भरा हुआ आकाश ऐसी विशिष्ट शोभा पा रहा था, जैसे उसमें बादलों का घना समूह उमड़ आया हो।

Verse 393

द्रोणपार्थस्तवोपेता व्यश्रूयन्त नराधिप । नरेश्वर! वहाँ द्रोणाचार्य और अर्जुनकी स्तुतिसे युक्त अदृश्य व्यक्तियोंके मुखोंसे निकली हुई बातें बारंबार सुनायी देने लगीं

हे नराधिप! वहाँ द्रोणाचार्य और अर्जुन की स्तुति से युक्त वचन अदृश्य व्यक्तियों के मुखों से निकले हुए बार-बार सुनाई देने लगे।

Verse 1536

अवासूजदू रथे तां तु बिभेद गदया गदाम्‌ | फिर पराक्रमी राधापुत्र कर्णने भीमकी ही गदा उठा ली और उसे घुमाकर उन्हींके रथपर फेंका; किंतु भीमने दूसरी गदासे उस गदाको तोड़ डाला

संजय बोले—रणभूमि में अडिग खड़े भीम ने अपनी गदा से उस गदा पर प्रहार करके उसे चूर-चूर कर दिया। इस भयंकर शस्त्र-संघर्ष में बल का सामना बल से ही हुआ और वीर का उग्र आक्रमण समयोचित, समान प्रतिघात से रुक गया—मानो युद्ध में पराक्रम और सतर्कता ही क्षण का निर्णय करते हों।

Verse 3136

मुक्त मुक्त द्रोणचापात्‌ तज्जघान धनंजय: । द्रोणाचार्यके धनुषसे क्रमश: छूटे हुए ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्, वायव्य तथा वारुण नामक अस्त्रको अर्जुनने तत्काल शान्त कर दिया

संजय बोले—द्रोण के धनुष से बार-बार छूटे हुए अस्त्रों को धनंजय (अर्जुन) ने प्रतिहत करके रोक दिया। द्रोणाचार्य के धनुष से क्रमशः निकले ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्र, वायव्य और वारुण—इन दिव्यास्त्रों को उसने तत्काल शांत कर दिया। यह प्रसंग शक्ति पर अनुशासन का बोध कराता है—कि अत्यन्त प्रबल बल का भी सामना संयम, सूक्ष्मता और दृढ़ संकल्प से किया जाता है, ताकि रणभूमि में अनियंत्रित विनाश न फैले।

Verse 3436

अर्जुनेनार्जुनं द्रोणो मनसैवाभ्यपूजयत्‌ । जब अर्जुनके द्वारा उनके विधिपूर्वक चलाये हुए दिव्यास्त्र भी प्रतिहत होने लगे, तब द्रोणने अर्जुनकी मन-ही-मन सराहना की

संजय बोले—द्रोण ने मन-ही-मन अर्जुन का सम्मान किया। क्योंकि जब अर्जुन द्वारा विधिपूर्वक, मंत्रपूर्वक चलाए गए दिव्यास्त्र भी प्रतिहत होकर शांत होने लगे, तब द्रोण ने उसके असाधारण कौशल और संयम को पहचानकर हृदय में ही उसकी प्रशंसा की।

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