हनिष्यामो्र्जुनं संख्ये द्विधा कृत्वाद्य भारतीम् । (तिष्ठ स त्वं महाबाहो नित्यं शिष्य: प्रियस्तव ।।) “आज मैं, दुःशासन, कर्ण और मेरे मामा शकुनि कौरव-सेनाको दो भागोंमें बाँटकर युद्धमें अर्जुनको मार डालेंगे। महाबाहो! आप चुपचाप खड़े रहिये, क्योंकि अर्जुन सदासे ही आपके प्रिय शिष्य हैं'
sañjaya uvāca | haniṣyāmo 'rjunaṃ saṅkhye dvidhā kṛtvādya bhāratīm | (tiṣṭha sa tvaṃ mahābāho nityaṃ śiṣyaḥ priyastava ||)
संजय बोले—आज हम दुःशासन, कर्ण और मेरे मामा शकुनि कौरव-सेना को दो भागों में बाँटकर रण में अर्जुन को मार डालेंगे। महाबाहो! आप चुपचाप खड़े रहिए, क्योंकि अर्जुन सदा से ही आपके प्रिय शिष्य हैं।
संजय उवाच