Nakula’s Declaration and the Uñchavṛtti Brāhmaṇa’s Superior Merit (Āśvamedhika Parva, Adhyāya 92)
अगस्त्यो यजमानो5सौ ददात्यन्नं विमत्सर: । न च वर्षति पर्जन्य: कथमन्न॑ भविष्यति
“महर्षियो! सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि हमारे यजमान हैं। वे मत्सररहित होकर सबको अन्न दान करते हैं; परन्तु पर्जन्य वर्षा नहीं कर रहा। तब आगे अन्न कैसे होगा?”
वैशम्पायन उवाच