Adhyaya 78
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 7869 Versesअर्जुन का पराक्रम निर्णायक दिखता है, पर कथा का ‘विजय’ सैन्य से अधिक नैतिक—क्रोध पर विजय—की ओर मुड़ता है।

Adhyaya 78

बभ्रुवाहन-धनंजययोः संग्रामः (Babhruvāhana and Dhanaṃjaya’s engagement at Maṇipūra)

Upa-parva: Maṇipūra-saṃvāda (Babhruvāhana–Arjuna episode) within Āśvamedhika Parva

Vaiśaṃpāyana reports that Babhruvāhana, having heard of his father’s arrival, comes out with formal humility and offerings. Arjuna (Dhanaṃjaya), recalling kṣatra-dharma in the setting of the Aśvamedha horse’s passage, declines to accept a pacific reception and censures the mismatch between martial obligation and conciliatory protocol. Ulūpī, identified as Babhruvāhana’s mother and a nāga-born figure, enters the scene, instructing her son that fighting Arjuna is the correct course and will secure Arjuna’s approval. Babhruvāhana arms himself, mounts his chariot with a prominent banner, and seizes the sacrificial horse through trained retainers, prompting Arjuna’s pleased recognition of proper contest. A fierce father–son battle follows: Babhruvāhana strikes Arjuna, Arjuna counters by disabling the chariot standard and horses, and the fight continues on foot. Babhruvāhana finally pierces Arjuna in a vital region; Arjuna collapses, and Babhruvāhana too falls into shock. Citrāṅgadā, distressed, enters the battlefield and beholds her fallen husband, intensifying the episode’s familial and political stakes.

Chapter Arc: अश्वमेध के अनुष्ठान-परिसर में, अर्जुन के सामने सिंधुदेशीय (सैन्धव) योद्धा फिर से संगठित होकर खड़े हो जाते हैं—मानो पुरानी वैराग्नि राख से उठकर पुनः धधकने लगी हो। → सैन्धव सेना उग्र होकर शरवर्षा करती है; गाण्डीवधारी अर्जुन उनकी पुनर्व्यवस्था पर हँसकर, तीखे व्यंग्य-भरे वचनों से उन्हें ‘मुमूर्षु’ कह चुनौती देता है—और युद्ध का वेग बढ़ता जाता है। → सैन्धव एक साथ अर्जुन पर ‘एक करोड़’ झुकी गाँठवाले बाणों की वर्षा करते हैं; उसी उन्मत्त क्षण में जयद्रथ-वंश की ओर से एक शरणागत स्त्री/परिजन (पुत्र को साथ लिये) गिरते हुए को देखकर अर्जुन के क्रोध-धर्म और करुणा-धर्म का टकराव चरम पर पहुँचता है। → शरणागत पक्ष अर्जुन के चरणों में सिर रखकर ‘शम’ की याचना करता है—‘यह अबोध बालक है, इसके बंधु नष्ट हो चुके’; जयद्रथ के अपराध स्मरण कराते हुए भी बालक पर प्रसाद करने का आग्रह होता है। अर्जुन का रौद्र धीरे-धीरे धर्मयुक्त संयम में ढलता है, और प्रतिशोध की जगह अनुग्रह का मार्ग खुलता है। → अर्जुन के भीतर उठी प्रतिज्ञा-सी कठोरता और शरणागत-रक्षा का धर्म—इनमें अंतिम निर्णय किस ओर झुकेगा, यह अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं) है ० बक। हक २ >> अष्टसप्ततितमो< ध्याय: अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति वैशम्पायन उवाच ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थित: । विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा

वैशम्पायन बोले— तदनन्तर गाण्डीवधारी शूर अर्जुन युद्ध के लिए उपस्थित हुए। वे रण में शत्रुओं के लिए दुर्धर्ष थे और हिमवान् पर्वत के समान अचल होकर शोभायमान हुए।

Verse 2

ततस्ते सैन्धवा योधा: पुनरेव व्यवस्थिता: । व्यमुज्चन्त सुसंरब्धा शरवर्षाणि भारत,भरतनन्दन! तदनन्तर सिन्धुदेशीय योद्धा फिरसे संगठित होकर खड़े हो गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे

तत्पश्चात वे सैन्धव योद्धा फिर से पंक्तिबद्ध हो गए। हे भारत! वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर बाणों की वर्षा करने लगे।

Verse 3

तान्‌ प्रहस्य महाबाहु: पुनरेव व्यवस्थितान्‌ । ततः प्रोवाच कौन्तेयो मुमूर्षून्‌ *लक्षणया गिरा । युध्यध्वं परया शक्‍त्या यतध्वं विजये मम

उनको फिर से डटे देखकर महाबाहु कौन्तेय अर्जुन हँस पड़े। तब मृत्यु की ओर बढ़ते हुए उन सैन्धवों से उन्होंने संकेतार्थ वाणी में कहा—“वीरो! पूरी शक्ति से युद्ध करो; मुझ पर विजय पाने का प्रयत्न करो।”

Verse 4

कुरुध्व॑ सर्वकार्याणि महद्‌ वो भयमागतम्‌ । एष योत्स्यामि सर्वास्तु निवार्य शरवागुराम्‌

तुम अपने सब आवश्यक कार्य शीघ्र पूरे कर लो; तुम पर महान् भय आ पहुँचा है। देखो—तुम्हारे बाणों के जाल को रोककर और भेदकर मैं अब तुम सबके साथ युद्ध करने को उद्यत हूँ।

Verse 5

तिष्ठ ध्वं युद्धमनसो दर्प शमयितास्मि व: । एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद्‌ गाण्डीवभूत्‌ तदा

युद्ध के लिए मन दृढ़ करके डटे रहो; मैं तुम्हारा दर्प शान्त कर दूँगा। इतना कहकर क्रोध से भरे कुरुनन्दन ने गाण्डीव उठा लिया; पर शत्रुओं के सम्मुख खड़े होकर उसे धर्मराज बड़े भाई की सीख स्मरण हो आई—जो क्षत्रिय विजय चाहता हो, वह रण में दब चुके का वध न करे, किन्तु उसे पराजित अवश्य करे। इसे याद कर पुरुषप्रवर अर्जुन धर्म और विजय—दोनों को साधने का उपाय सोचने लगा।

Verse 6

ततो<5थ वचन स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्लस्थ भारत । न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषव:

तब, हे भारत, ज्येष्ठ भ्राता के वचन को स्मरण कर अर्जुन ने मन में कहा—“तात! रण में विजय चाहने वाले क्षत्रियों का वध नहीं करना चाहिए।” उस उपदेश को याद कर वह युद्ध और धर्म—दोनों का संतुलन सोचने लगा।

Verse 7

जेतव्याश्रैति यत्‌ प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना । चिन्तयामास स तदा फाल्गुन: पुरुषर्षभ:

महात्मा धर्मराज ने विजय के विषय में जो नीति कही थी, उसी को फाल्गुन—पुरुषों में श्रेष्ठ—तब मन ही मन विचारने लगा।

Verse 8

इत्युक्तो5हं नरेन्द्रेण न हन्तव्या नूपा इति | कथं तन्न मृषेदं स्याद्‌ धर्मराजवच: शुभम्‌

“राजेन्द्र ने मुझे ऐसा आदेश दिया है कि ‘राजाओं का वध न करना।’ तब धर्मराज का वह मंगल वचन कैसे मिथ्या हो?—यह सोचकर, राजधर्म के ज्ञाता अर्जुन ने युद्धोन्मत्त सैन्धवों से इस प्रकार कहा।

Verse 9

न हन्येरंश्व राजानो राज्ञश्चाज्ञा कृता भवेत्‌ इति संचिन्त्य स तदा फाल्गुन: पुरुषर्षभ:

वैशम्पायन बोले—“राजाओं का वध नहीं करना चाहिए और राजा की आज्ञा का पालन होना चाहिए”—ऐसा विचार करके उस समय पुरुषश्रेष्ठ फाल्गुन (अर्जुन) ने धर्मयुक्त निश्चय के साथ मन में विचार किया।

Verse 10

श्रेयो वदामि युष्माकं॑ न हिंसेयमवस्थितान्‌

वैशम्पायन बोले—“मैं तुम्हारे कल्याण की बात कहता हूँ; जो युद्ध से हटकर खड़े हों, मैं उन्हें नहीं मारूँगा। तुममें से जो योद्धा रण में पराजय मानकर कहे—‘मैं आपका हूँ, आपने मुझे युद्ध में जीत लिया’—वह मेरे सामने खड़ा भी रहे, तो भी मैं उसका वध नहीं करूँगा। यह वचन सुनकर तुम जिसे अपना हित समझो, वही करो।”

Verse 11

यश्न वक्ष्यति संग्रामे तवास्मीति पराजित: । एतच्छुत्वा वचो महां कुरुध्वं हितमात्मन:

वैशम्पायन बोले—“जो पराजित होकर भी रण में ‘मैं आपका हूँ’ नहीं कहेगा, वह मेरा यह महान वचन सुनकर अपने लिए जो हितकर समझे, वही करे।”

Verse 12

ततोडन्यथा कृच्छूगता भविष्यथ मयार्दिता: । एवमुकक्‍्त्वा तु तान्‌ वीरान्‌ युयुधे कुरुपुड्रव:

फिर उसने कहा—“यदि तुमने इसके विपरीत किया, तो मेरे द्वारा पीड़ित होकर संकट में पड़ोगे।” ऐसा कहकर उन वीरों से कुरुश्रेष्ठ ने युद्ध किया।

Verse 13

शतं शतसहस््राणि शराणां नतपर्वणाम्‌

नतपर्व वाले बाणों के सैकड़ों-हज़ारों (वर्षा-से) छूट पड़े।

Verse 14

शरानापतत: क्ररानाशीविषविषोपमान्‌

वैशम्पायन बोले—क्रूर बाण वर्षा की भाँति टूट पड़े, मानो घोर सर्पों के विष के समान।

Verse 15

छित्त्वा तु तानाशु चैव कड़कपत्रानू शिलाशितान्‌

वैशम्पायन बोले—उन कठोर कंकपत्रयुक्त, शिला-धार से तीक्ष्ण किए गए (आयुधों) को उसने शीघ्र ही काट गिराया।

Verse 16

एकैकमेषां समरे बिभेद निशितै: शरै: । सानपर चढ़ाकर तेज किये गये उन कंकपत्रयुक्त बाणोंके तुरन्त ही टुकड़े-टुकड़े करके समरांगणमें अर्जुनने सैन्धव वीरोंमेंसे प्रत्येकको पैने बाण मारकर घायल कर दिया ।।

वैशम्पायन बोले—समर में धनंजय ने उन वीरों में से प्रत्येक को एक-एक करके पैने बाणों से बेध दिया; उनके प्रहार क्षण में चूर हो गए और वे घायल पड़े। फिर उन्होंने प्रासों और शक्तियों से पुनः धनंजय पर धावा बोला।

Verse 17

तेषां किरीटी संकल्पं मोघं चक्रे महाबल:

वैशम्पायन बोले—उनके बीच महाबली किरीटधारी ने उनके संकल्प को निष्फल कर दिया; उनकी योजना व्यर्थ हो गई।

Verse 18

सर्वास्तानन्तराच्छित्त्वा तदा चुक्रोश पाण्डव: । परंतु महाबली किरीटधारी पाण्डुकुमार अर्जुनने उनका सारा मनसूबा व्यर्थ कर दिया। उन्होंने उन सभी प्रासों और शक्तियोंको बीचसे ही काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ।।

वैशम्पायन बोले—पाण्डव ने उन सबको बीच से काट दिया और तब ऊँचे स्वर से गर्जना की; और वैसे ही विजय-लोलुप वे योद्धा उस पर टूट पड़े।

Verse 19

तेषां प्रद्रवतां चापि पुनरेवाभिधावताम्‌

वे भागते हुए भी फिर लौटकर दौड़ पड़े।

Verse 20

ते वध्यमानास्तु तदा पार्थेनामिततेजसा

तब वे अमित तेजस्वी पार्थ (अर्जुन) के द्वारा मारे जाने लगे।

Verse 21

ततस्ते फाल्गुनेनाजी शरै: संनतपर्वभि:

तब रणभूमि में फाल्गुन (अर्जुन) ने झुकी हुई गाँठवाले बाणों से उन पर प्रहार किया।

Verse 22

कृता विसंज्ञा भूयिष्ठा: क्लान्तवाहनसैनिका: । थोड़ी ही देरमें अर्जुनने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा अधिकांश सैन्धव वीरोंको संज्ञाशून्य कर दिया। उनके वाहन और सैनिक भी थकावटसे खिन्न हो रहे थे ।।

अर्जुन ने युद्धस्थल में झुकी हुई गाँठवाले बाणों से अधिकांश सैन्धव वीरों को संज्ञाशून्य कर दिया। उनके वाहन और सैनिक भी थककर खिन्न हो रहे थे। उन सबको अत्यन्त परिग्लान देखकर धृतराष्ट्र के पुत्रों ने स्थिति को समझा।

Verse 23

दुःशला बालमादाय नप्तारं प्रययौ तदा । सुरथस्य सुतं वीर॑ रथेनाथागमत्‌ तदा

तब दुःशला बालक—अपने नाती—को साथ लेकर चल पड़ी। और तभी सुरथ का वीर पुत्र भी रथ पर वहाँ आ पहुँचा।

Verse 24

शान्त्यर्थ सर्वयोधानाम भ्यगच्छत पाण्डवम्‌ । समस्त सैन्धव वीरोंको कष्ट पाते जान धृतराष्ट्रकी पुत्री दःशला अपने बेटे सुरथके वीर बालकको जो उसका पौत्र था, साथ ले रथपर सवार हो रणभूमिमें पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आयी। उसके आनेका उद्देश्य यह था कि सब योद्धा युद्ध छोड़कर शान्त हो जायूँ || २२-२३ $ ।।

वैशम्पायन बोले— सब योद्धाओं की शान्ति के लिए धृतराष्ट्र की पुत्री दुःशला रणभूमि में पाण्डव अर्जुन के पास आई। वह रथ पर सवार थी और अपने पुत्र सुरथ के वीर बालक—अपने ही पौत्र—को साथ लाई। उसका उद्देश्य यह था कि युद्धरत वीर संघर्ष छोड़कर शान्त हो जाएँ। धनञ्जय के निकट पहुँचकर वह करुण स्वर में रो पड़ी।

Verse 25

समुत्सृज्य धनु: पार्थो विधिवद्‌ भगिनीं तदा

तब पार्थ अर्जुन ने विधिपूर्वक अपना धनुष अलग रख दिया और धर्मानुसार मर्यादा के साथ अपनी बहिन के पास गया।

Verse 26

प्राह किं करवाणीति सा च त॑ प्रत्युवाच ह । धनुष त्यागकर कुन्तीकुमारने विधिपूर्वक बहिनका सत्कार किया और पूछा--“बहिन! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ?” तब दुःशलाने उत्तर दिया-- ।।

उसने पूछा—“बहिन, मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ?” तब उसने उत्तर दिया—“हे भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हारी बहिन के पुत्र का शिशु है।”

Verse 27

इत्युक्तस्तस्थ पितरं स पप्रच्छार्जुनस्तथा

ऐसा कहे जाने पर अर्जुन वहीं ठहर गया और फिर उसने अपने पिता से पूछकर आगे का मार्ग जानना चाहा।

Verse 28

पितृशोकाभिसंतप्तो विषादार्तोडस्य वै पिता

उसका पिता पुत्र-शोक से संतप्त और विषाद से पीड़ित होकर शोकाकुल हो उठा।

Verse 29

स पूर्व पितरं श्रुत्वा हतं युद्धे त्वयानघ

वैशम्पायन बोले—“निष्पाप अर्जुन! मेरे पुत्र सुरथ ने पहले ही सुन रखा था कि युद्ध में तुम्हारे हाथों मेरे पिता मारे गए। फिर जब उसके कानों में यह समाचार पहुँचा कि तुम यज्ञ-घोड़े के पीछे-पीछे युद्ध के लिए यहाँ तक आ पहुँचे हो, तब वह पिता-मृत्यु के शोक से व्याकुल होकर अपने प्राण त्याग बैठा।”

Verse 30

त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय हयसारिणम्‌ । पितुश्न मृत्युदुःखातोंडजहात्‌ प्राणान्‌ धनंजय

वैशम्पायन बोले—“धनंजय! यह सुनकर कि तुम यज्ञ-घोड़े के पीछे-पीछे यहाँ युद्ध के लिए आ पहुँचे हो, वह पिता-मृत्यु के दुःख से दग्ध होकर प्राण त्याग बैठा। तुम्हारे आगमन की वार्ता ने पुराने शोक-घाव को फिर हरा कर दिया और निराशा ने उसे घेर लिया।”

Verse 31

प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेडनघ । विषादार्त: पपातोर्व्या ममार च ममात्मज:,“अनघ! “अर्जुन आये” इन शब्दोंके साथ तुम्हारा नाममात्र सुनकर ही मेरा बेटा विषादसे पीड़ित हो पृथ्वीपर गिरा और मर गया

वैशम्पायन बोले—“अनघ! ‘बीभत्सु आ गया’—इतना कहकर तुम्हारा नाममात्र सुनते ही मेरा पुत्र विषाद से पीड़ित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और मर गया।”

Verse 32

त॑ दृष्टवा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो | गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी,'प्रभो! उसको ऐसी अवस्थामें पड़ा हुआ देख उसके पुत्रको साथ ले मैं शरण खोजती हुई आज तुम्हारे पास आयी हूँ

वैशम्पायन बोले—“प्रभो! उसे वहाँ इस अवस्था में गिरा हुआ देखकर, फिर उसके पुत्र को साथ लेकर, मैं शरण की खोज में आज आपके पास आई हूँ।”

Verse 33

इत्युक्त्वा$<र्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा । दीना दीन स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम्‌

वैशम्पायन बोले—“ऐसा कहकर धृतराष्ट्र की पुत्री दुःशला शोक से भरे स्वर में विलाप करने लगी। उसकी दीन दशा देखकर पार्थ भी उदास भाव से मुख नीचे किए खड़े रहे। तब दुःशला ने उनसे फिर कहा—”

Verse 34

स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्रनीयात्मजमेव च । कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरु कुलोद्ह

अपनी बहिन पर दृष्टि करो और बहिन के नाती पर भी कृपा करो। हे धर्मज्ञ, हे कुल-श्रेष्ठ! तुम पर दया करना शोभता है—करुणा दिखाओ।

Verse 35

विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम्‌ । अभिमन्योर्यथा जात: परिक्षित्‌ परवीरहा

कुरुराज और उस मंदबुद्धि जयद्रथ को भुलाकर, अभिमन्यु से परीक्षित उत्पन्न हुआ—जो आगे चलकर शत्रु-वीरों का संहारक बना।

Verse 36

तमादाय नरव्याप्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम्‌

हे नर-व्याघ्र! उसे साथ लेकर मैं अब तुम्हारे समीप उपस्थित हुआ हूँ।

Verse 37

आगतोड<यं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रक:

हे महाबाहो! उस मंदबुद्धि पुरुष का पुत्र यहाँ आ पहुँचा है।

Verse 38

एष प्रसाद्य शिरसा प्रशमार्थमरिंदम

हे अरिंदम! यह सिर झुकाकर प्रसन्नता प्राप्त करना चाहता है, ताकि शान्ति हो और क्रोध शमे।

Verse 39

बालस्य हतबन्धोश्ष पार्थ किंचिदजानत:

वैशम्पायन बोले— “हे पार्थ! यह बालक, जिसके बन्धु और रक्षक मारे जा चुके थे, अज्ञानवश केवल थोड़ा-सा समझकर ही आचरण कर रहा था।”

Verse 40

तमनार्य नृशंसं च विस्मृत्यास्य पितामहम्‌

अपने पितामह को भूलकर उसने उसे अनार्य और नृशंस समझ लिया—यह स्मृतिभ्रंश और आदर-भंग का ऐसा दोष था जो सदाचार से पतन का सूचक है।

Verse 41

एवं ब्रुवत्यां करुणं दुःशलायां धनंजय:,जब दु:शला इस प्रकार करुणायुक्त वचन कहने लगी, तब अर्जुन राजा धृतराष्ट्र और गान्धारी देवीको याद करके दुःख और शोकसे पीड़ित हो क्षत्रिय-धर्मकी निन्‍दा करने लगे --

वैशम्पायन बोले— दुःशला जब इस प्रकार करुणा और शोक से भरे वचन कहने लगी, तब धनंजय अर्जुन ने राजा धृतराष्ट्र और देवी गान्धारी को स्मरण किया; वे दुःख-विषाद से भर उठे और उस क्षत्रिय-धर्म की निन्दा करने लगे जिसने इतना संताप उत्पन्न किया था।

Verse 42

संस्मृत्य देवीं गान्धारीं धृतराष्ट्र च पार्थिवम्‌ । उवाच दुःखशोकार्तत क्षत्रधर्म व्यगर्हयत्‌

देवी गान्धारी और राजा धृतराष्ट्र को स्मरण करके, दुःख और शोक से पीड़ित अर्जुन ने क्षत्रिय-धर्म की निन्दा की।

Verse 43

यस्कृते बान्धवा: सर्वे मया नीता यमक्षयम्‌ | इत्युक्त्वा बहु सान्त्वादिप्रसादमकरोज्जय:

वैशम्पायन बोले— “धिक्कार है उस क्षत्रिय-धर्म को, जिसके लिये मैंने अपने सब बान्धवों को यमलोक पहुँचा दिया!” ऐसा कहकर जय (अर्जुन) ने दुःशला को बहुत सान्त्वना दी और उस पर कृपाप्रसाद किया; फिर प्रसन्न होकर उसे गले लगाया और घर की ओर विदा किया।

Verse 44

परिष्वज्य च तां प्रीतो विससर्ज गृहान्‌ प्रति

वैशम्पायन बोले—हृदय से प्रसन्न होकर अर्जुन ने उसे गले लगाया और फिर उसे उसके घर की ओर विदा कर दिया। “उस क्षात्र-धर्म को धिक्कार है, जिसके लिए मैंने अपने सारे बान्धवों को यमलोक पहुँचा दिया,” ऐसा कहकर उसने दुःशला को बहुत सान्त्वना दी और अपने करुणा-प्रसाद का परिचय दिया; फिर प्रसन्नतापूर्वक आलिंगन करके उसे घर भेज दिया।

Verse 45

दुःशला चापि तान्‌ योधान्‌ निवार्य महतो रणात्‌ | सम्पूज्य पार्थ प्रययौ गृहानेव शुभानना

वैशम्पायन बोले—दुःशला ने भी उस महान् रण से अपने योद्धाओं को रोककर, पार्थ (अर्जुन) का सत्कार किया और शुभ मुखवाली वह अपने घर ही लौट गई।

Verse 46

एवं निर्जित्य तान्‌ वीरान्‌ सैन्धवान्‌ स धनंजय: । अन्वधावत धावन्तं हयं कामविचारिणम्‌

इस प्रकार सैन्धव वीरों को परास्त करके धनञ्जय अर्जुन, इच्छानुसार विचरने और दौड़ने वाले उस घोड़े के पीछे-पीछे स्वयं भी दौड़ने लगे।

Verse 47

ततो मृगमिवाकाशे यथा देव: पिनाकधृक्‌ । ससार त॑ं तथा वीरो विधिवद्‌ यज्ञियं हयम्‌

तब जैसे पिनाकधारी देव (महादेव) आकाश में मृग के पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार वीर अर्जुन ने विधिपूर्वक उस यज्ञीय घोड़े का अनुसरण किया।

Verse 48

सच वाजी यशथेष्टेन तांस्तान्‌ देशान्‌ यथाक्रमम्‌ । विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन्‌,वह अश्व यथेष्टगतिसे क्रमश: सभी देशोंमें घूमता और अर्जुनके पराक्रमका विस्तार करता हुआ इच्छानुसार विचरने लगा

और वह अश्व यथेष्ट गति से क्रमशः उन-उन देशों में घूमता हुआ, इच्छानुसार विचरते हुए, पार्थ (अर्जुन) के कर्म-पराक्रम का विस्तार करता रहा।

Verse 49

क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन्‌ पुरुषर्षभ । मणिपूरपतेद्देशमुपायात्‌ सहपाण्डव:,पुरुषप्रवर जनमेजय! इस प्रकार क्रमश: विचरण करता हुआ वह अश्व अर्जुनसहित मणिपुर-नरेशके राज्यमें जा पहुँचा

वैशम्पायन बोले—हे पुरुषश्रेष्ठ जनमेजय! पुरुषर्षभ! इस प्रकार क्रमशः विचरता हुआ वह अश्व पाण्डव अर्जुन के साथ मणिपुर-नरेश के देश में जा पहुँचा।

Verse 77

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वनें सैन्धवोंके साथ अर्जुनका युद्धविषयक सतदह्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिकपर्व के अन्तर्गत अनुगीतापर्व में सैन्धवों के साथ अर्जुन के युद्ध-विषयक सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 78

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये अष्टसप्ततितमो< ध्याय:

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये अष्टसप्ततितमोऽध्यायः।

Verse 96

प्रोवाच वाक्‍्यं धर्मज्ञ: सैन्धवान्‌ युद्धदुर्मदान्‌ । “अहो! महाराजने कहा था कि क्षत्रियोंका वध न करना। धर्मराजका वह मंगलमय वचन कैसे मिथ्या न हो। राजालोग मारे न जायँ और राजा युधिष्ठिरकी आज्ञाका पालन हो जाय

वैशम्पायन बोले—धर्मज्ञ अर्जुन ने युद्ध के मद से उन्मत्त सैन्धवों से कहा—“अहो! महाराज ने कहा है कि क्षत्रियों का वध न किया जाए। धर्मराज का वह मंगलमय वचन कैसे मिथ्या हो? राजालोग मारे न जाएँ और राजा युधिष्ठिर की आज्ञा का पालन भी हो जाए—इसके लिए क्या करना चाहिए?” ऐसा विचार कर धर्म के ज्ञाता पुरुषप्रवर अर्जुन ने रणोन्मत्त सैन्धवों से इस प्रकार कहा।

Verse 123

अर्जुनो$तीव संक्रुद्धः संक्रुद्धर्विजिगीषुभि: । “यदि मेरे कथनके विपरीत तुमलोग युद्धके लिये उद्यत हुए तो मुझसे पीड़ित होकर भारी संकटमें पड़ जाओगे।” उन वीरोंसे ऐसा कहकर कुरुकुलतिलक अर्जुन अत्यन्त कुपित हो क्रोधमें भरे हुए विजयाभिलाषी सैन्धवोंके साथ युद्ध करने लगे

वैशम्पायन बोले—अर्जुन अत्यन्त क्रुद्ध हो, क्रोध में भरे हुए विजयाभिलाषी सैन्धवों से बोले—“यदि तुम मेरे कथन के विपरीत युद्ध के लिए उद्यत हुए, तो मुझसे पीड़ित होकर भारी संकट में पड़ जाओगे।” उन वीरों से ऐसा कहकर कुरुकुल-तिलक अर्जुन अत्यन्त कुपित हो विजयाभिलाषी सैन्धवों के साथ युद्ध करने लगे।

Verse 133

मुमुचु: सैन्धवा राजंस्तदा गाण्डीवधन्वनि । राजन्‌! उस समय सैन्धवोंने गाण्डीवधारी अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक करोड़ बाणोंका प्रहार किया

वैशम्पायन बोले—राजन्! उस समय सैन्धवों ने गाण्डीवधारी अर्जुन पर झुकी हुई गाँठवाले भल्लों सहित असंख्य बाणों की वर्षा कर दी।

Verse 143

चिच्छेद निशितैर्बाणैरन्तरा स धनंजय: । विषधर सर्पोके समान उन कठोर बाणोंको अपनी ओर आते देख अर्जुनने तीखे सायकोंद्वारा उन सबको बीचसे काट डाला

वैशम्पायन बोले—विषधर सर्पों के समान वे कठोर बाण अपनी ओर आते देख धनञ्जय अर्जुन ने तीखे सायकों से उन सबको बीच में ही काट डाला।

Verse 163

जयद्रथं हतं स्मृत्वा चिक्षिपु: सैन्धवा नृपा: । तदनन्तर जयद्रथ-वधका स्मरण करके सैन्धवोंने अर्जुनपर पुनः बहुत-से प्रासों और शक्तियोंका प्रहार किया

वैशम्पायन बोले—जयद्रथ-वध का स्मरण करके सैन्धव नरेशों ने अर्जुन पर फिर बहुत-से प्रास और शक्तियाँ फेंकीं।

Verse 183

शिरांसि पातयामास भल्लै: संनतपर्वभि: । साथ ही विजयकी अभिलाषा लेकर आक्रमण करनेवाले उन सैन्धव योद्धाओंके मस्तकोंको वे झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगे

वैशम्पायन बोले—फिर वे झुकी हुई गाँठवाले तीखे भल्लों से विजय की अभिलाषा लेकर धावा करनेवाले सैन्धव योद्धाओं के मस्तक काट-काटकर गिराने लगे।

Verse 196

निवर्ततां च शब्दो5भूत्‌ पूर्णस्येव महोदधे: । उनमेंसे कुछ लोग भागने लगे

वैशम्पायन बोले—उनमें से कुछ भागने लगे, कुछ फिर धावा करने लगे और कुछ युद्ध से हटने लगे। ‘निवर्तो, निवर्तो’ ऐसा शब्द उठा; उनका कोलाहल जल से भरे महासागर की गम्भीर गर्जना के समान था।

Verse 203

यथाप्राणं यथोत्साहं योधयामासुररजुनम्‌ | अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा मारे जानेपर भी सैन्धव योद्धा बल और उत्साहपूर्वक उनके साथ जूझते ही रहे

वैशम्पायन बोले—वे योद्धा प्राण-भर की शक्ति और अक्षय उत्साह के साथ अर्जुन से युद्ध करने लगे। अमित तेजस्वी अर्जुन के हाथों कटते जाने पर भी सैन्धव वीर बल और साहस से टिके रहे और उससे जूझते ही रहे।

Verse 246

धनंजयोउपि तां दृष्टवा धनुर्विससजे प्रभु: । वह अर्जुनके पास आकर आर्तस्वरसे फूट-फ़ूटकर रोने लगी। शक्तिशाली अर्जुनने भी उसे सामने देख अपना धनुष नीचे डाल दिया

वैशम्पायन बोले—उसे सामने देखकर प्रभु धनंजय (अर्जुन) ने भी अपना धनुष हाथ से छोड़ दिया। वह अर्जुन के पास आकर आर्त स्वर में फूट-फूटकर रोने लगी; और शक्तिशाली अर्जुन ने भी उसे सामने देख अपना धनुष नीचे डाल दिया।

Verse 263

अभिवादयते पार्थ तं पश्य पुरुषर्षभ । 'भैया! भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हारे भानजे सुरथका औरस पुत्र है। पुरुषप्रवर पार्थ! इसकी ओर देखो, यह तुम्हें प्रणाम करता है”

वैशम्पायन बोले—हे पार्थ, हे पुरुषर्षभ, उसे देखो; वह तुम्हें प्रणाम कर रहा है। “भैया, भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हारे भानजे सुरथ का औरस पुत्र है। पुरुषप्रवर पार्थ! इसकी ओर देखो, यह तुम्हें आदरपूर्वक प्रणाम करता है।”

Verse 276

क्वासाविति ततो राजन्‌ दुःशला वाक्यमत्रवीत्‌ । राजन! दुःशलाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उस बालकके पिताके विषयमें जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा--“बहिन! सुरथ कहाँ है?' तब दुःशला बोली--

वैशम्पायन बोले—तब, हे राजन्, दुःशला ने ये वचन कहे। दुःशला के ऐसा कहने पर अर्जुन ने बालक के पिता के विषय में जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा—“बहिन, सुरथ कहाँ है?” तब दुःशला बोली—

Verse 286

पज्चत्वमगमद्‌ वीरो यथा तन्मे निशामय । 'भैया! इस बालकका पिता वीर सुरथ पितृशोकसे संतप्त और विषादसे पीड़ित हो जिस प्रकार मृत्युको प्राप्त हुआ है, वह मुझसे सुनो

वैशम्पायन बोले—“वह वीर पञ्चत्व को कैसे प्राप्त हुआ, वह मुझसे सुनो। भैया! इस बालक का पिता वीर सुरथ पितृशोक से संतप्त और विषाद से पीड़ित होकर जिस प्रकार मृत्यु को प्राप्त हुआ है, वह मुझसे सुनो।”

Verse 353

तथायं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुज: । “मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथको भूलकर हमें अपनाओ। जैसे अभिमन्युसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परीक्षितका जन्म हुआ है

वैशम्पायन बोले—“इस प्रकार सुरथ से मेरा यह महाबाहु पौत्र उत्पन्न हुआ है। मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथ को भूलकर हमें अपनाओ। जैसे अभिमन्यु से शत्रुवीरों का संहार करने वाले परीक्षित का जन्म हुआ, वैसे ही सुरथ से यह मेरा महाबाहु पौत्र पैदा हुआ है।”

Verse 366

शमार्थ सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम । 'पुरुषसिंह! मैं इसीको लेकर समस्त योद्धाओंको शान्त करनेके लिये आज तुम्हारे पास आयी हूँ। तुम मेरी यह बात सुनो

वैशम्पायन बोले—“समस्त योद्धाओं को शान्त करने के लिये मेरी यह बात सुनो। पुरुषसिंह! इसीको लेकर मैं आज तुम्हारे पास आयी हूँ; तुम मेरी यह बात सुनो।”

Verse 376

प्रसादमस्य बालस्य तस्मात्‌ त्वं कर्तुमहसि । “महाबाहो! यह उस मन्दबुद्धि जयद्रथका पौत्र तुम्हारी शरणमें आया है। अत: इस बालकपर तुम्हें कृपा करनी चाहिये

वैशम्पायन बोले—“अतः इस बालक पर तुम्हें कृपा करनी चाहिये। महाबाहो! यह मन्दबुद्धि जयद्रथ का पौत्र तुम्हारी शरण में आया है; इसलिए इस बालक पर अनुग्रह करो।”

Verse 383

याचते त्वां महाबाहो शमं गच्छ धनंजय । “शत्रुदमन महाबाहु धनंजय! यह तुम्हारे चरणोंमें सिर रखकर तुम्हें प्रसन्न करके तुमसे शान्तिके लिये याचना करता है। अब तुम शान्त हो जाओ

वैशम्पायन बोले—“महाबाहो धनंजय! यह तुमसे शान्ति की याचना करता है; तुम शान्त हो जाओ। शत्रुदमन महाबाहु धनंजय! यह तुम्हारे चरणों में सिर रखकर तुम्हें प्रसन्न करके शान्ति के लिये प्रार्थना करता है; अब तुम शान्त हो जाओ।”

Verse 396

प्रसाद कुरु धर्मज्ञ मा मन्युवशमन्वगा: । “यह अबोध बालक है, कुछ नहीं जानता है। इसके भाई-बन्धु नष्ट हो चुके हैं। अतः धर्मज्ञ अर्जुन! तुम इसके ऊपर कृपा करो। क्रोधके वशीभूत न होओ

वैशम्पायन बोले—“धर्मज्ञ! कृपा करो, क्रोध के वश में मत होओ। यह अबोध बालक है, कुछ नहीं जानता। इसके भाई-बन्धु नष्ट हो चुके हैं। अतः धर्मज्ञ अर्जुन! इस पर दया करो; क्रोध के अधीन मत जाओ।”

Verse 403

आगस्कारिणमत्यर्थ प्रसाद कर्तुमहसि । “इस बालकका पितामह (जयद्रथ) अनार्य, नृशंस और तुम्हारा अपराधी था। उसको भूल जाओ और इस बालकपर कृपा करो”

वैशम्पायन बोले—तुम्हें अपराध करने वाले पर भी अत्यन्त अनुग्रह करना चाहिए। इस बालक का पितामह (जयद्रथ) अनार्य, नृशंस और तुम्हारा अपराधी था। उसे भूल जाओ और इस बालक पर दया करो।

Frequently Asked Questions

Whether a regional king should prioritize diplomatic deference and hospitality or fulfill the public expectations of kṣatriya duty by contesting the passage of the Aśvamedha horse representing imperial authority.

Dharma is context-sensitive: social civility (sāmna, arghya) is not always treated as sufficient when one’s role requires demonstrable protective capacity and lawful contest under rāja- and kṣātra norms.

No explicit phalaśruti appears in the supplied passage; the chapter functions as narrative-ethical illustration within the Aśvamedhika framework rather than as a self-contained merit proclamation.