Adhyaya 55
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 5542 Verses

Adhyaya 55

Uttanka’s Guru-Śuśrūṣā and the Commission to Retrieve the Maṇikuṇḍalas (उत्तङ्क-गुरुशुश्रूषा तथा मणिकुण्डल-आदेशः)

Upa-parva: Uttanka-Upākhyāna (Episode of Uttanka and Gautama)

Janamejaya asks how Uttanka—an intense ascetic—became empowered enough to contemplate cursing Viṣṇu. Vaiśaṃpāyana explains that Uttanka’s potency arises from exceptional tapas and exclusive guru-bhakti under the sage Gautama. Among many disciples, Gautama holds special affection for Uttanka due to his restraint, purity, energetic service, and proper conduct. As time passes, Gautama ages without noticing, while Uttanka remains intent on service. During a wood-gathering task, Uttanka collapses under a heavy load; his matted hair falls, and he laments the long passage of years without being formally released. Gautama acknowledges that, absorbed in affection and service, time elapsed unnoticed; he grants permission to depart and frames dakṣiṇā as the teacher’s satisfaction. He further bestows his daughter as wife upon Uttanka, asserting her suitability to accompany his spiritual radiance. Uttanka nevertheless seeks a concrete service for the guru’s household; Ahalyā (Gautama’s wife), pleased, finally requests the retrieval of the divine earrings (maṇikuṇḍalas) known to belong to Saudāsa’s queen. Uttanka accepts and departs to seek them, while Gautama worries about the dangers associated with that king; Ahalyā expresses confidence that Uttanka will be protected by Gautama’s favor. The chapter closes as Uttanka encounters the king in a deserted forest setting, setting up the next narrative development.

Chapter Arc: शाप-ग्रस्त और तपस्वी उत्तंक का चित्त अब अच्युत के सान्निध्य से शांत होता है; वह स्वीकार करता है कि शाप का आवेग निवृत्त हो गया है और फिर भी एक असाधारण वर माँगने का साहस करता है—भगवान् का ऐश्वर्य-रूप प्रत्यक्ष देखने की इच्छा। → उत्तंक की प्रार्थना के साथ कथा उस रहस्य की ओर मुड़ती है जिसे वह अब तक समझ नहीं पाया था—जल/अमृत के रूप में जो ‘दान’ उसे मिला, वह क्यों अस्वीकार्य और भयावह प्रतीत हुआ। दृश्य में भयानक रूप, बाण-कार्मुक, बद्ध-निस्त्रिंश और अधःस्रोतस का संकेत तनाव बढ़ाता है; साथ ही इन्द्र-सम्बन्धी संवाद (वज्रपाणि पुरंदर) यह बताता है कि देव-व्यवस्था में भी ‘देय’ और ‘अदेय’ का द्वंद्व चलता है। → कृष्ण का उसी मार्ग से शंख-चक्र-गदा धारण कर प्रकट होना और उत्तंक का ऐश्वर्य-रूप देखने का आग्रह—यहीं चरम बिंदु है; साथ ही इन्द्र का कथन कि भार्गव (भृगुवंश) के अमृत-प्रसंग में वह ‘प्रत्याख्यात’ हुआ, यह उद्घाटन करता है कि उत्तंक के अनुभव के पीछे दैवी-नीति और रूप-परिवर्तन का रहस्य है। → जनार्दन उत्तंक को मधुर वाणी से सान्त्वना देते हैं और स्पष्ट करते हैं कि ‘जैसा रूप धारण करके वह जल तुम्हें देना उचित था, उसी रूप से दिया गया; किंतु तुम उसे समझ न सके।’ उत्तंक का चित्त प्रसन्न होता है, शाप-प्रेरित विक्षोभ हटता है, और दैवी अनुग्रह का अर्थ—रूप के पार तत्त्व—उसके सामने रखा जाता है। → उत्तंक की ऐश्वर्य-दर्शन की आकांक्षा बनी रहती है—क्या वह रूप-रहस्य को पूर्णतः जान पाएगा, और क्या दैवी लीला का प्रत्यक्ष दर्शन उसे वैराग्य देगा या और प्रश्न?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें श्रीकृष्णका वचनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५४ ॥। अपर बक। ] अति्ऑशाएड< पञ्चपज्चाशत्तमो& ध्याय: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना उत्तडुक उवाच अभिजानामि जगत: कर्तरिं त्वां जनार्दन । नूनं भवत्प्रसादोडयमिति मे नास्ति संशय:,उत्तंकने कहा--जनार्दन! मैं यह जानता हूँ कि आप सम्पूर्ण जगतके कर्ता हैं। निश्चय ही यह आपकी कृपा है (जो आपने मुझे अध्यात्मतत्त्वका उपदेश दिया), इसमें संशय नहीं है

उत्तंक ने कहा—जनार्दन! मैं आपको समस्त जगत् का कर्ता जानता हूँ। निश्चय ही यह आपकी कृपा है; इसमें मुझे कोई संशय नहीं।

Verse 2

चित्तं च सुप्रसन्न॑ मे त्वद्भावगतमच्युत । विनिवृत्तं च मे शापादिति विद्धि परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले अच्युत! अब मेरा चित्त अत्यन्त प्रसन्न और आपके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण हो गया है; अत: इसे शाप देनेके विचारसे निवृत्त हुआ समझें

उत्तंक ने कहा—शत्रुओं को संताप देने वाले अच्युत! अब मेरा चित्त अत्यन्त प्रसन्न है और आपके प्रति भक्तिभाव से परिपूर्ण हो गया है। अतः जानिए कि मैं आपको शाप देने के विचार से निवृत्त हो गया हूँ।

Verse 3

यदि त्वनुग्रहं कंचित्‌ त्वत्तोडहामि जनार्दन । द्रष्टमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय,जनार्दन! यदि मैं आपसे कुछ भी कृपा प्राप्त करनेका अधिकारी होऊँ तो आप मुझे अपना ईश्वरीय रूप दिखा दीजिये। आपके उस रूपको देखनेकी बड़ी इच्छा है

जनार्दन! यदि मैं आपसे कुछ भी अनुग्रह पाने योग्य हूँ, तो मैं आपका ऐश्वर्यपूर्ण ईश्वरीय रूप देखना चाहता हूँ। कृपा करके वह रूप मुझे दिखाइए।

Verse 4

वैशम्पायन उवाच ततः स तस्मै प्रीतात्मा दर्शयामास तदू वपु: । शाश्व॒तं वैष्णवं धीमान्‌ ददृशे यद्‌ धनंजय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तब परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें अपने उसी सनातन वैष्णव स्वरूपका दर्शन कराया, जिसे युद्धके प्रारम्भमें अर्जुनने देखा था

वैशम्पायन बोले—राजन्! तब प्रसन्नचित्त होकर परम बुद्धिमान् भगवान् ने उन्हें अपना वही सनातन वैष्णव स्वरूप दिखाया, जिसे युद्ध के आरम्भ में धनंजय अर्जुन ने देखा था।

Verse 5

स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम्‌ । सहस्रसूर्यप्रतिमं दीप्तिमत्‌ पावकोपमम्‌,उत्तंक मुनिने उस विश्वरूपका दर्शन किया, जिसका स्वरूप महान्‌ था। जो सहस्रों सूर्योके समान प्रकाशमान तथा बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित था। उससे प्रज्वलित अग्निके समान लपटें निकल रही थीं

उत्तंक ने उस महात्मा के विश्वरूप का दर्शन किया—जो महाबाहु था, सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी था और प्रज्वलित अग्नि के समान दहक रहा था।

Verse 6

सर्वमाकाशमावृत्य तिष्ठन्तं सर्वतोमुखम्‌ । तद्‌ दृष्टवा परम रूपं विष्णोर्वैष्णवमद्भुतम्‌ । विस्मयं च ययौ वित्रस्तं दृष्टवा परमेश्वरम्‌,उसके सब ओर मुख था और वह सम्पूर्ण आकाशको घेरकर खड़ा था। भगवान्‌ विष्णुके उस अद्भुत एवं उत्कृष्ट वैष्णव रूपको देखकर उन परमेश्वरकी ओर दृष्टिपात करके ब्रह्मर्षि उत्तंकको बड़ा विस्मय हुआ

सम्पूर्ण आकाश को आच्छादित करके वह सर्वतोमुख होकर स्थित था। विष्णु के उस अद्भुत, परम वैष्णव रूप को देखकर और परमेश्वर का दर्शन करके ब्रह्मर्षि उत्तंक विस्मय से भर उठा; उस सर्वोच्च दर्शन से उसका हृदय काँप उठा।

Verse 7

उत्तड़्क उवाच (नमो नमस्ते सर्वात्मन्‌ नारायण परात्पर । परमात्मन्‌ पद्मनाभ पुण्डरीकाक्ष माधव ।। उत्तंक बोले--सर्वात्मन्‌! परात्पर नारायण! आपको बारंबार नमस्कार है। परमात्मन्‌! पद्मनाभ! पुण्डरीकाक्ष! माधव! आपको नमस्कार है ।। हिरण्यगर्भरूपाय संसारोत्तारणाय च । पुरुषाय पुराणाय चान्तर्यामाय ते नमः ।। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं। आप संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं। आप ही अन्तर्यामी पुराण-पुरुष हैं। आपको नमस्कार है ।। अविद्यातिमिरादित्यं भवव्याधिमहौषधिम्‌ | संसारार्णवपारं त्वां प्रणमामि गतिर्भव ।। आप अविद्यारूपी अन्धकारको मिटानेवाले सूर्य, संसाररूपी रोगके महान्‌ औषध तथा भवसागरसे पार करनेवाले हैं। आपको प्रणाम करता हूँ। आप मेरे आश्रय-दाता हों ।। सर्ववेदैकवेद्याय सर्वदेवमयाय च । वासुदेवाय नित्याय नमो भक्तप्रियाय ते ।। आप सम्पूर्ण वेदोंके एकमात्र वेद्यतत्त्व हैं। सम्पूर्ण देवता आपके ही स्वरूप हैं तथा आप भक्तजनोंको अत्यन्त प्रिय हैं। आप नित्यस्वरूप भगवान्‌ वासुदेवको नमस्कार है ।। दयया दुःखमोहान्मां समुद्धर्तुमिहाहसि । कर्मभिर्बहुभि: पापैर्बद्धं पाहि जनार्दन ।।) जनार्दन! आप स्वयं ही दया करके दुःखजनित मोहसे मेरा उद्धार करें। मैं बहुत-से पाप-कर्माद्वारा बँधा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें ।। विश्वकर्मन्‌ नमस्ते<स्तु विश्वात्मन्‌ विश्वसम्भव । पदभ्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभ:,विश्वकर्मन! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत विश्वात्मन! आपके दोनों पैरोंसे पृथ्वी और सिरसे आकाश व्याप्त है

उत्तंक बोले— “सर्वात्मन्! परात्पर नारायण! आपको बार-बार नमस्कार। परमात्मन्! पद्मनाभ! पुण्डरीकाक्ष! माधव! आपको नमस्कार। हिरण्यगर्भ-रूप! संसार से पार उतारने वाले! पुराण-पुरुष, अन्तर्यामी! आपको नमस्कार। आप अविद्या-रूपी अन्धकार के सूर्य हैं, भव-रोग की महौषधि हैं, और संसार-सागर से पार कराने वाले हैं; हे भव-गति! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप समस्त वेदों के एकमात्र वेद्य तत्त्व हैं, समस्त देवता आपके ही स्वरूप हैं; नित्य वासुदेव, भक्तप्रिय! आपको नमस्कार। जनार्दन! दया करके दुःखजनित मोह से मेरा उद्धार कीजिए; मैं अनेक पाप-कर्मों से बँधा हूँ—मेरी रक्षा कीजिए। हे विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार—हे विश्वात्मन्, विश्वसम्भव! आपके चरणों से पृथ्वी व्याप्त है और आपके शिर से आकाश आच्छादित है।”

Verse 8

द्यावापृथिव्योर्यन्मध्यं जठरेण तवावृतम्‌ । भुजाभ्यामावृताश्चाशास्त्वमिदं सर्वमच्युत,आकाश और पृथ्वीके बीचका जो भाग है, वह आपके उदसरसे व्याप्त हो रहा है। आपकी भुजाओंने सम्पूर्ण दिशाओंको घेर लिया है। अच्युत! यह सारा दृश्य-प्रपंच आप ही हैं

आकाश और पृथ्वी के बीच का समस्त अन्तराल आपके उदर से व्याप्त है। आपकी भुजाओं ने समस्त दिशाओं को घेर लिया है। अच्युत! यह समूचा दृश्य-प्रपंच आप ही हैं।

Verse 9

संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय्यमुत्तमम्‌ । पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टमिच्छामि शाश्वतम्‌,देव! अब अपने इस उत्तम एवं अविनाशी स्वरूपको फिर समेट लीजिये। मैं आप सनातन पुरुषको पुनः अपने पूर्वरूपमें ही देखना चाहता हूँ

देव! अब अपने इस उत्तम, अविनाशी रूप को फिर समेट लीजिए। मैं आपको—सनातन को—पुनः अपने स्वाभाविक, शाश्वत रूप में देखना चाहता हूँ।

Verse 10

वैशम्पायन उवाच तमुवाच प्रसन्नात्मा गोविन्दो जनमेजय । वरं वृणीष्वेति तदा तमुत्तड़को<ब्रवीदिदम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मुनिकी बात सुनकर सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--“महर्ष!ी आप मुझसे कोई वर माँगिये।' तब उत्तंकने कहा --

वैशम्पायन बोले— “जनमेजय! तब सदा प्रसन्नचित्त गोविन्द ने उससे कहा—‘वर माँगो।’ तब उत्तंक ने यह कहा।”

Verse 11

पर्याप्त एष एवाद्य वरस्त्वत्तो महद्युते । यत्‌ ते रूपमिदं कृष्ण पश्यामि पुरुषोत्तम,“महातेजस्वी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! आपके इस स्वरूपका जो मैं दर्शन कर रहा हूँ, यही मेरे लिये आज आपकी ओरसे बहुत बड़ा वरदान प्राप्त हो गया'

वैशम्पायन बोले— महातेजस्वी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! आज आपकी ओर से मेरे लिए यही वर पर्याप्त है कि मैं आपके इस स्वरूप का दर्शन कर रहा हूँ।

Verse 12

तमब्रवीत्‌ पुनः कृष्णो मा त्वमत्र विचारय । अवश्यमेतत्‌ कर्तव्यममोघं दर्शन॑ मम,यह सुनकर श्रीकृष्णने फिर कहा--'मुने! आप इसमें कोई अन्यथा विचार न करें। आपको अवश्य ही मुझसे वर माँगना चाहिये; क्योंकि मेरा दर्शन अमोघ है”

यह सुनकर श्रीकृष्ण ने फिर कहा— “मुने! इसमें कोई संदेह न करें। यह अवश्य किया जाना चाहिए; मुझसे वर माँगिए, क्योंकि मेरा दर्शन अमोघ है।”

Verse 13

उत्तडुक उवाच अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो | तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरुष्वेतद्धि दुर्लभम्‌,उत्तंक बोले--प्रभो! यदि वर माँगना आप मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य मानते हैं तो मैं यही चाहता हूँ कि मुझे यहाँ यथेष्ट जल प्राप्त हो; क्योंकि इस मरुभूमिमें जल बड़ा ही दुर्लभ है

उत्तंक बोले— “प्रभो! यदि आप इसे मेरे लिए अवश्य कर्तव्य मानते हैं, तो मैं यही चाहता हूँ कि इस मरुभूमि में मुझे यथेष्ट जल मिल जाए; क्योंकि यहाँ जल अत्यन्त दुर्लभ है।”

Verse 14

तत: संहृत्य तत्‌ तेज: प्रोवाचोत्तड़कमी श्वर:ः । एष्टव्ये सति चिन्त्यो5हमित्युक्त्वा द्वारकां ययौ,तब भगवानने अपने उस तेजोमय स्वरूपको समेटकर उत्तंक मुनिसे कहा--'मुने! जब आपको जलकी इच्छा हो, तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा।' ऐसा कहकर वे द्वारका चले गये

तब भगवान् ने अपने उस तेजोमय स्वरूप को समेटकर उत्तंक मुनि से कहा— “मुने! जब आपको जल की इच्छा हो, तब मेरा स्मरण करना।” यह कहकर वे द्वारका चले गए।

Verse 15

ततः कदाचिद्‌ भगवानुत्तड़कस्तोयकाडुक्षया । तृषितः परिचक्राम मरौ सस्मार चाच्युतम्‌,तत्पश्चात्‌ एक दिन उत्तंक मुनिको बड़ी प्यास लगी। वे पानीकी इच्छासे उस मरुभूमिमें चारों ओर घूमने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने भगवान्‌ श्रीकृष्णका स्मरण किया

तत्पश्चात् एक दिन भगवान् उत्तंक मुनि को बड़ी प्यास लगी। वे जल की इच्छा से उस मरुभूमि में इधर-उधर घूमने लगे और घूमते-घूमते उन्होंने अच्युत श्रीकृष्ण का स्मरण किया।

Verse 16

ततो दिग्वाससं धीमान्‌ मातड़ं मलपड्किनम्‌ | अपश्यत मरौ तस्मिन्‌ श्वयूथपरिवारितम्‌,इतनेहीमें उन बुद्धिमान्‌ मुनिको उस मसरुप्रदेशमें कुत्तोंक झुंडसे घिरा हुआ एक नंग- धड़ंग चाण्डाल दिखायी पड़ा, जिसके शरीरमें मैल और कीचड़ जमी हुई थी

तब उस मरुभूमि-प्रदेश में बुद्धिमान् मुनि ने कुत्तों के झुंड से घिरे हुए एक नग्न चाण्डाल (मातङ्ग) को देखा, जिसके शरीर पर मैल और कीचड़ जमी हुई थी।

Verse 17

भीषण बद्धनिस्त्रिंशं बाणकार्मुकधारिणम्‌ | तस्याध: स्रोतसो5पश्यद्‌ वारि भूरि द्विजोत्तम:,वह देखनेमें बड़ा भयंकर था। उसने कमरमें तलवार बाँध रखी थी और हाथोंमें धनुष- बाण धारण किये थे। द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने देखा--उसके नीचे पैरोंके समीप एक छिद्रसे प्रचुर जलकी धारा गिर रही है

वह देखने में अत्यन्त भयंकर था। उसकी कमर में तलवार बँधी थी और हाथों में धनुष-बाण थे। तब द्विजश्रेष्ठ उत्तंक ने देखा कि उसके नीचे, पैरों के पास, एक छिद्र से प्रचुर जलधारा गिर रही है।

Verse 18

स्मरन्नेव च तं प्राह मातज्भरः प्रहसन्निव । एह्ुत्तड़क प्रतीच्छस्व मत्तो वारि भूगूद्वह,मुनिको पहचानते ही वह जोर-जोरसे हँसता हुआ-सा बोला--'भूगकुलतिलक उत्तंक! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो। तुम्हें प्पाससे पीड़ित देखकर मुझे तुमपर बड़ी दया आ रही है।' चाण्डालके ऐसा कहनेपर भी मुनिने उसके जलका अभिनन्दन नहीं किया--उसे लेनेसे इनकार कर दिया

उसे पहचानते ही वह जलवाहक मातङ्ग मानो जोर से हँसता हुआ बोला—“आओ, भृगुकुल-तिलक उत्तंक! मुझसे जल ग्रहण करो।” पर चाण्डाल के ऐसा कहने पर भी मुनि ने उस जल का अभिनन्दन नहीं किया और लेने से इनकार कर दिया।

Verse 19

कृपा हि मे सुमहती त्वां दृष्टवा तृट्‌ समाश्रितम्‌ । इत्युक्तस्तेन स मुनिस्तत्‌ तोयं नाभ्यनन्दत,मुनिको पहचानते ही वह जोर-जोरसे हँसता हुआ-सा बोला--'भूगकुलतिलक उत्तंक! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो। तुम्हें प्पाससे पीड़ित देखकर मुझे तुमपर बड़ी दया आ रही है।' चाण्डालके ऐसा कहनेपर भी मुनिने उसके जलका अभिनन्दन नहीं किया--उसे लेनेसे इनकार कर दिया

उसने कहा—“तुम्हें प्यास से पीड़ित देखकर मेरे हृदय में बड़ी करुणा उठी है।” पर उसके ऐसा कहने पर भी मुनि ने उस जल का अभिनन्दन नहीं किया; उसे स्वीकार नहीं किया।

Verse 20

चिक्षेप च स तं धीमान्‌ वाग्भिरुग्राभिरच्युतम्‌ । पुनः पुनश्च मातड़ः पिबस्वेति तमब्रवीत्‌,उस समय बुद्धिमान्‌ उत्तंकने अपने कठोर वचनों-द्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्णपर भी आक्षेप किया। उधर चाण्डाल बारंबार आग्रह करने लगा--“महर्षे! जल पी लीजिये”

तब बुद्धिमान् उत्तंक ने उग्र वचनों से अच्युत (श्रीकृष्ण) पर भी आक्षेप किया। उधर मातङ्ग बार-बार उससे कहता रहा—“महर्षे! जल पी लीजिए।”

Verse 21

न चापिबत्‌ स सक्रोध: क्षुभितेनान्तरात्मना । स तथा निश्चयात्‌ तेन प्रत्याख्यातो महात्मना,उत्तंकने उस जलको नहीं पीया। वे अत्यन्त कुपित हो उठे थे। उनके अन्त:करणमें बड़ा क्षोेभ था। उन महात्माने अपने निश्चयपर अटल रहकर चाण्डालको जवाब दे दिया

उत्तंक ने उस जल को नहीं पिया। वे अत्यन्त क्रोध से दग्ध और भीतर से क्षुब्ध थे; तथापि अपने निश्चय पर अटल रहकर उस महात्मा ने उसे दृढ़ उत्तर देकर अस्वीकार कर दिया।

Verse 22

श्वभि: सह महाराज तत्रैवान्तरधीयत । उत्तड़कस्तं तथा दृष्टवा ततो ब्रीडितमानस:

हे राजन्, कुत्तों के साथ वह वहीं उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गया। उसे इस प्रकार विलीन होते देखकर उत्तंक का मन लज्जा से भर गया।

Verse 23

अथ तेनैव मार्गेण शड्खचक्रगदाधर:,सलिल विप्रमुख्येभ्यो मातड्स्रोतसा विभो | तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये। उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा--'पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है!

तदनन्तर, उसी मार्ग से शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् प्रकट हुए—मातृस्रोतस नामक धारा के तट पर, जहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण उपस्थित थे। उन्हें देखकर महामति उत्तंक ने कहा—“पुरुषोत्तम! प्रभो! श्रेष्ठ ब्राह्मणों को चाण्डाल-स्पर्शित ऐसा अपवित्र जल देना आपको उचित नहीं।”

Verse 24

आजगाम महाबुद्धिरुत्तड़कश्नैनमब्रवीत्‌ । न युक्त तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम

तब महाबुद्धिमान उत्तंक ने आकर उनसे कहा—“पुरुषसत्तम! आपके द्वारा ऐसा दान देना उचित नहीं।”

Verse 25

इत्युक्तवचन त॑ तु महाबुद्धिर्जनार्दन:

यह वचन सुनकर महाबुद्धिमान जनार्दन ने (उत्तर देने के लिए) उसे ग्रहण किया।

Verse 26

यादृशेनेह रूपेण योग्यं दातुं धृतेन वै

उत्तंक ने कहा—“यहाँ जिस रूप में देना उचित हो, उसी रूप में दृढ़ निश्चय के साथ वह दान अवश्य दिया जाना चाहिए।”

Verse 27

मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्पाणि: पुरंदर:,'भुगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि “मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।” परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तड़कको तो अमृत ही देना है

उत्तडुक ने कहा—“तुम्हारे लिए मैं वज्रधारी पुरंदर इन्द्र के पास गया और बोला—‘भृगुनन्दन! उत्तंक मुनि को जल के रूप में अमृत प्रदान कीजिए।’ मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्र बार-बार मुझसे कहने लगे—‘मनुष्य अमर नहीं हो सकता; इसलिए अमृत मत दो, कोई दूसरा वर दे दो।’ पर मैंने शचीपति इन्द्र से दृढ़ता से कहा—‘उत्तंक को तो अमृत ही देना होगा।’”

Verse 28

उत्तड़कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभु: । स मामुवाच देदवेन्द्रो न मर्त्योमर्त्यतां ब्रजेत्‌,'भुगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि “मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।” परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तड़कको तो अमृत ही देना है

उत्तडुक ने कहा—“हे प्रभो! उत्तडुक को जल के रूप में अमृत दीजिए।” पर देवेन्द्र ने मुझसे बार-बार कहा—“मर्त्य मनुष्य मर्त्यत्व से परे नहीं जा सकता।” इसलिए वे अमृत के स्थान पर कोई दूसरा वर देने को कहते रहे; किंतु मैंने दृढ़ता से कहा—“उत्तडुक को अमृत ही दिया जाए।”

Verse 29

अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद्‌ भुगुनन्दन । अमृतं देयमित्येव मयोक्त: स शचीपति:,'भुगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि “मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।” परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तड़कको तो अमृत ही देना है

“भृगुनन्दन! वह मुझसे बार-बार कहता रहा—‘इसे कोई दूसरा वर दे दो।’ पर मैंने कहा—‘अमृत ही दिया जाए।’ इस प्रकार मैंने शचीपति इन्द्र पर आग्रह किया।”

Verse 30

स मां प्रसाद्य देवेन्द्र: पुनरेवेदमब्रवीत्‌ । यदि देयमवश्यं वै मातड्रो5हं महामते,“तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले--'सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा"

मुझे प्रसन्न करके देवराज इन्द्र ने फिर कहा—“हे महामते! यदि यह अमृत अवश्य ही देना है, तो मैं चाण्डाल का रूप धारण करके तुम्हें (या उसे) अमृत प्रदान करूँगा।”

Verse 31

भूत्वामृतं प्रदास्थामि भार्गवाय महात्मने । यद्येवं प्रतिगृह्नाति भार्गवो5मृतमद्य वै,“तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले--'सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा"

उत्तंक ने कहा—“मैं स्वयं अमृत का रूप धारण करके उस महात्मा भार्गव को अमृत दूँगा। यदि आज इस प्रकार भार्गव अमृत स्वीकार कर लें, तो वर और मेल-मिलाप सिद्ध हो जाएगा; पर यदि वे अस्वीकार करें, तो अमरत्व का दान नहीं दिया जाएगा।”

Verse 32

प्रदातुमेष गच्छामि भार्गवस्यामृतं विभो । प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन दास्यामि न कथंचन,“तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले--'सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा"

“हे विभो! मैं भार्गव को अमृत देने जा रहा हूँ। पर यदि वे उसे ठुकरा दें, तो मैं किसी भी प्रकार उन्हें अमृत नहीं दूँगा।”

Verse 33

स तथा समयं कृत्वा तेन रूपेण वासव: । उपस्थितस्त्वया चापि प्रत्याख्यातो5मृतं ददत्‌,“इस तरहकी शर्त करके साक्षात्‌ इन्द्र चाण्डालके रूपमें यहाँ उपस्थित हुए थे और आपको अमृत दे रहे थे; परंतु आपने उन्हें ठुकरा दिया

“इस प्रकार शर्त बाँधकर वासव (इन्द्र) उसी रूप में यहाँ आए। वे तुम्हें अमृत दे रहे थे, पर तुमने उसे ठुकरा दिया।”

Verse 34

चाण्डालरूपी भगवान्‌ सुमहांस्ते व्यतिक्रम: । यत्‌ तु शक्‍्यं मया कर्तु भूय एव तवेप्सितम्‌,“आपने चाण्डालरूपधारी भगवान्‌ इन्द्रको ठुकराया है, यह आपका महान्‌ अपराध है। अच्छा, आपकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मैं पुन: जो कुछ कर सकता हूँ, करूँगा

उत्तंक ने कहा—“चाण्डाल का रूप धारण करने वाले भगवान् इन्द्र को ठुकराना तुम्हारा अत्यन्त भारी अपराध है। फिर भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने के लिए जो कुछ मेरे वश में होगा, मैं पुनः करूँगा।”

Verse 35

तोयेप्सां तव दुर्धर्षा करिष्ये सफलामहम्‌ । येष्वह:सु च ते ब्रह्मन्‌ सलिलेप्सा भविष्यति

उत्तंक ने कहा—“हे ब्राह्मण! जल के लिए तुम्हारी दुर्धर्ष अभिलाषा मैं सफल कर दूँगा। जिन-जिन दिनों तुम्हें जल की इच्छा होगी, उन्हीं दिनों तुम्हें जल के बीच रहते हुए भी वही प्यास उठेगी।”

Verse 36

तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णा: पयोधरा: । रसवच्च प्रदास्यन्ति तोयं ते भूगुनन्दन

तब मरुभूमि में भी जल से परिपूर्ण मेघ उमड़ आएँगे और हे भूगुनन्दन! वे तुम्हें रसयुक्त, मधुर जल प्रदान करेंगे।

Verse 37

उत्तड़कमेघा इत्युक्ता: ख्यातिं यास्यन्ति चापि ते । “ब्रह्म! आपकी तीव्र पिपासाको मैं अवश्य सफल करूँगा। जिन दिनों आपको जल पीनेकी इच्छा होगी, उन्हीं दिनों मरुप्रदेशमें जलसे भरे हुए मेघ प्रकट होंगे। भूगुनन्दन! वे आपको सरस जल प्रदान करेंगे और इस पृथ्वीपर उत्तंक मेघके नामसे विख्यात होंगे” ।। इत्युक्त: प्रीतिमान्‌ विप्र: कृष्णेन स बभूव ह । अद्याप्युत्तड़कमेघाश्व मरौ वर्षन्ति भारत,भारत! भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर विप्रवर उत्तंक मुनि बड़े प्रसन्न हुए। इस समय भी मरुभूमिमें उत्तंक मेघ प्रकट होकर जलकी वर्षा करते हैं

वे ‘उत्तंक-मेघ’ कहे जाकर प्रसिद्ध होंगे। श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर वह विप्र अत्यन्त प्रसन्न हुआ। हे भारत! आज भी मरुभूमि में वे ‘उत्तंक-मेघ’ वर्षा करते हैं।

Verse 55

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तड़कोपाख्याने पञ्चपज्चाशत्तमो<ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिक पर्व के अनुगीता-पर्व में उत्तंक-उपाख्यान का पचपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 223

मेने प्रलब्धमात्मानं कृष्णेनामित्रघातिना । महाराज! मुनिके इनकार करते ही कुत्तोंसहित वह चाण्डाल वहीं अन्तर्धान हो गया। यह देख उत्तंक मन-ही-मन बहुत लज्जित हुए और सोचने लगे कि “शत्रुघाती श्रीकृष्णने मुझे ठग लिया'

मैंने समझा कि शत्रुघाती श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया है। मुनि के इनकार करते ही वह चाण्डाल कुत्तों सहित वहीं अन्तर्धान हो गया। यह देखकर उत्तंक मन-ही-मन लज्जित होकर सोचने लगे।

Verse 246

सलिल विप्रमुख्येभ्यो मातड्स्रोतसा विभो | तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये। उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा--'पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है!

मातंग-स्रोत से (अपवित्र माना जाने वाला) जल श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दिया गया। तत्पश्चात शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी मार्ग से प्रकट हुए। उन्हें देखकर महामति उत्तंक बोले—‘पुरुषोत्तम! प्रभो! श्रेष्ठ ब्राह्मणों को चाण्डाल-स्पृष्ट ऐसा अपवित्र जल देना उचित नहीं।’

Verse 256

उत्तड़कं श्लक्षणया वाचा सान्त्वयन्निदमब्रवीत्‌ | उत्तंकके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान्‌ जनार्दनने उन्हें मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए कहा--

उत्तंक के ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान जनार्दन ने उन्हें मधुर और शिष्ट वाणी से सान्त्वना देते हुए उत्तर दिया—

Verse 263

तादृशं खलु ते दत्तं यच्च त्वं नावबुध्यथा: । “महर्षे! वहाँ जैसा रूप धारण करके वह जल आपके लिये देना उचित था, उसी रूपसे दिया गया; किंतु आप उसे समझ न सके

निश्चय ही तुम्हें वही वस्तु उसी रूप में दी गई थी, जैसा तुम्हारे लिए उचित था; पर तुम उसे पहचान न सके।

Frequently Asked Questions

Uttanka faces the tension between accepting the guru’s declared satisfaction as sufficient dakṣiṇā and insisting on a further concrete act of service, risking harm while attempting to perfect his obligation.

Discipline and devotion generate moral authority, but righteous action also requires discernment about duties, permissions, and the real-world consequences of undertaking tasks that cross into dangerous social domains.

No formal phalaśruti appears here; the chapter’s meta-function is etiological—explaining the roots of Uttanka’s tapas-based potency and setting causal conditions for later ethical confrontation.