
धृतराष्ट्रस्य वनप्रस्थानानुज्ञा | Permission for Dhṛtarāṣṭra’s Forest-Retirement
Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra–Vānaprastha Anujñā (Permission for Forest-Retirement Episode)
Vyāsa addresses Yudhiṣṭhira, arguing that the aged Dhṛtarāṣṭra—especially after the loss of his sons—should not be made to endure prolonged hardship in the city and should be granted leave to pursue forest discipline. He notes Gāndhārī’s capacity to bear grief with steadiness and presents the royal-ascetic trajectory as a precedent: ancient rājarṣis commonly conclude life in the forest. Vaiśaṃpāyana reports Yudhiṣṭhira’s reverential reply: Vyāsa is authoritative, and Dhṛtarāṣṭra is simultaneously father, king, and guru, whose instructions a son should follow by dharma. Vyāsa confirms that Yudhiṣṭhira’s reasoning is correct and instructs him not to obstruct Dhṛtarāṣṭra’s intention, describing death in battle or a regulated death in the forest as compatible endpoints for rājarṣis. He further recalls Dhṛtarāṣṭra’s prior guardianship and ritual generosity during Yudhiṣṭhira’s absence, reinforcing reciprocal obligation. After obtaining consent, Vyāsa departs for the forest; Yudhiṣṭhira then approaches Dhṛtarāṣṭra with deference, citing the concurrence of advisers (including Kṛpa, Vidura, Sañjaya, and Yuyutsu) and requests that the king take provisions before departing for the āśrama.
Chapter Arc: भीष्म के स्वर्गगमन, श्रीकृष्ण के द्वारका-प्रस्थान, और विदुर-संजय के विलग होने के बाद धृतराष्ट्र के चारों ओर शून्य-सा छा जाता है; वह युधिष्ठिर से वनगमन की आज्ञा माँगने का निश्चय करता है। → धृतराष्ट्र गान्धारी सहित अपने पिता (व्यास) की पूर्वानुमति और युधिष्ठिर की सहमति का स्मरण कर सभा-जन, सुहृद्, ब्राह्मण तथा कुरुजांगल की समस्त प्रजा के सामने अपना संकल्प रखता है। नगर-जनपद के चारों वर्ण एकत्र होते हैं; राज्य की स्थिरता, वृद्ध राजा का त्याग, और प्रजा की आशंका—सब एक साथ उभरते हैं। → धृतराष्ट्र सार्वजनिक रूप से घोषणा करता है कि वह गान्धारी के साथ शीघ्र वन को जाएगा—यह ‘न्यास’/उत्तरदायित्व-हस्तांतरण का क्षण है, जहाँ वह युधिष्ठिर की पालक-भूमिका को स्वीकार कर प्रजा के सामने अंतिम बार राज-धर्म की मुहर लगाता है। → युधिष्ठिर धृतराष्ट्र के हित में जो आदेश/उपदेश दिया जाए उसे मानने की प्रतिज्ञा करता है; धृतराष्ट्र को यह संतोष होता है कि युधिष्ठिर के राज्य में प्रजा सुरक्षित है और उसे दुर्योधन के ऐश्वर्य से भी श्रेष्ठ ‘सुख’ (आत्मिक शांति) प्राप्त हो रही है। → वनगमन की तैयारी और विदाई का भाव गहराता है—अगला चरण: धृतराष्ट्र-गान्धारी का वास्तविक प्रस्थान और उसके परिणाम।
Verse 1
ऑपन-मा_ज बछ। अि<-छऋज अष्टमो>< ध्याय: धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना युधिछिर उवाच एवमेतत् करिष्यामि यथा55त्थ पृथिवीपते । भूयश्चैवानुशास्यो5हं भवता पार्थिवर्षभ
युधिष्ठिर बोले—“पृथ्वीनाथ! जैसा आपने कहा है, वैसा ही मैं करूँगा। परन्तु, हे नृपश्रेष्ठ! आप मुझे और भी उपदेश दीजिए।”
Verse 2
भीष्मे स्वर्गमनुप्राप्ते गते च मधुसूदने । विदुरे संजये चैव को<न्यो मां वक्तुमहति
युधिष्ठिर बोले—“जब भीष्म स्वर्ग को प्राप्त हो गए, मधुसूदन (श्रीकृष्ण) प्रस्थान कर गए, और विदुर तथा संजय भी चले गए—तो अब कौन शेष है जो मुझे उपदेश देने योग्य हो? और जैसे पाण्डु मेरे प्रिय अग्रज थे, वैसे ही आप भी हम सबको प्रिय रहे हैं।”
Verse 3
यत् तु मामनुशास्तीह भवानद्य हिते स्थित: । कर्तास्मि तन््महीपाल निर्व॒तो भव पार्थिव
युधिष्ठिर बोले—“हे महीपाल, हे पृथ्वीपते! आज आप मेरे हित में स्थित होकर यहाँ जो कुछ मुझे उपदेश देंगे, मैं उसका पालन करूँगा। हे पार्थिव, आप संतुष्ट रहें; मैंने निष्पाप भाव से आपकी यथोचित सेवा की है।”
Verse 4
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त: स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता । कौन्तेयं समनुज्ञातुमियेष भरतर्षभ
वैशम्पायन बोले—“हे भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर राजर्षि धृतराष्ट्र ने कुन्तीपुत्र से प्रस्थान की अनुमति माँगने की इच्छा की। वह बोलने लगा और उस समय को स्मरण करने लगा जब दुर्योधन ने यह राज्य बिना किसी बाधा के भोगा था।”
Verse 5
पुत्र संशाम्यतां तावन््ममापि बलवान् श्रम: । इत्युक्त्वा प्राविशद् राजा गान्धार्या भवनं तदा
वैशम्पायन बोले—“(धृतराष्ट्र ने कहा) ‘पुत्र! अभी कुछ देर शांत रहो; मुझे बोलने में भी बड़ा परिश्रम होता है।’ ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र उस समय गान्धारी के भवन में प्रवेश कर गया। उस समय भी, जब दुर्योधन ने निर्विघ्न राज्य भोगा था, उस मंदबुद्धि ने तुम लोगों के प्रति कोई अपराध नहीं किया था; परन्तु उस दुर्बुद्धि, राजाओं के अभिमान से भरे दुर्योधन के अपराधों के कारण…”
Verse 6
तमासनगतं देवी गान्धारी धर्मचारिणी । उवाच काले कालज्ञा प्रजापतिसमं पतिम्
जब वे आसन पर विराजमान हुए, तब धर्मपरायणा और समय को जाननेवाली रानी गान्धारी ने प्रजापति-सदृश अपने पति से कहा— “आपके ही आरम्भ किए हुए अन्याय से यह अत्यन्त भयंकर विपत्ति उठी। असंख्य राजा मारे गए; कौरव नष्ट हो गए और पृथ्वी तक विनाश को प्राप्त हुई। बताइए—इस विषय में मेरा किया हुआ उचित था या अनुचित?”
Verse 7
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्रमवासिकपवके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष््रका उपसंवादविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ
धृतराष्ट्र ने कहा— “महाराज! महर्षि व्यास ने स्वयं आपको वन जाने की आज्ञा दे दी है और युधिष्ठिर की भी अनुमति मिल गई है। अब आप कब वन को प्रस्थान करेंगे? मैं वृद्ध हूँ; मेरे पुत्र मारे गए हैं; मैं शोक से व्याकुल हूँ, हे नराधिप!”
Verse 8
धृतराष्ट उवाच गान्धार्यहमनुज्ञात: स्वयं पित्रा महात्मना । युधिष्ठिरस्यानुमते गन्तास्मि नचिराद् वनम्
धृतराष्ट्र ने कहा— “गान्धारी! मेरे महात्मा पिता व्यास ने स्वयं मुझे आज्ञा दे दी है और युधिष्ठिर की भी अनुमति मिल गई है; इसलिए मैं शीघ्र ही वन को जाऊँगा।”
Verse 9
अहं हि तावत् सर्वेषां तेषां दुर्दयूतदेविनाम् पुत्राणां दातुमिच्छामि प्रेतभावानुगं वसु
धृतराष्ट्र ने कहा— “मेरी तो यह इच्छा है कि जुए के दुष्परिणाम से नष्ट हुए उन सब पुत्रों के लिए, प्रेत-भाव के अनुरूप जो धन देना चाहिए, वह दान करूँ। यह जानकर कि हम दोनों वृद्ध माता-पिता पुत्रहीन होकर शोक में डूबे हैं, मैं ये दान करना चाहता हूँ।”
Verse 10
सर्वप्रकृतिसांनिध्यं कारयित्वा स्ववेश्मनि | जानेके पहले मैं चाहता हूँ कि समस्त प्रजाको घरपर बुलाकर अपने मरे हुए उन जुआरी पुत्रोंके उद्देश्य्से उनके पारलौकिक लाभके लिये कुछ धन दान कर दूँ ।।
अपने भवन में समस्त अमात्यों और प्रमुख जनों की उपस्थिति कराकर उसने यह इच्छा प्रकट की— “सबसे पहले मैं सारी प्रजा को अपने घर बुलाकर, जुए के व्यसन से नष्ट हुए अपने मृत पुत्रों के परलोक-कल्याण के लिए कुछ धन दान करना चाहता हूँ।” यह कहकर उसने तब धर्मराज, कुन्तीपुत्र कौरव-राजा युधिष्ठिर के पास संदेश भेजा।
Verse 11
स च तद् वचनातू् सर्व समानिन्ये महीपतिः । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धूृतराष्ट्रने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपना विचार कहला भेजा। राजा युधिष्ठिरने देनेके लिये उनकी आज्ञाके अनुसार वह सब सामग्री जुटा दी (धृतराष्ट्रने उसका यथायोग्य वितरण कर दिया) ।।
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र ने धर्मराज युधिष्ठिर के पास अपना अभिप्राय भिजवाया। युधिष्ठिर ने उनकी आज्ञा के अनुसार दान के लिए आवश्यक समस्त सामग्री जुटा दी और धृतराष्ट्र ने उसे यथायोग्य विधिपूर्वक बाँट दिया।
Verse 12
ततो निष्क्रम्य नृपतिस्तस्मादन्त:पुरात् तदा
तदनन्तर राजा उस अन्तःपुर से बाहर निकला। उसके साथ चार सचिव थे—उसके ही भाई, महान् पराक्रमी—जो लोकपालों के समान तेजस्वी और धर्म तथा अर्थ के तत्त्व को भली-भाँति जानने वाले थे।
Verse 13
समवेतांश्व॒ तान् सर्वान् पौरान् जानपदांस्तथा
वहाँ एकत्र हुए उन समस्त नगरवासियों और जनपदवासियों को देखकर (भीम, अर्जुन तथा यमजों—नकुल-सहदेव—से घिरे हुए) महातेजस्वी महाबाहु युधिष्ठिर आप सबका पालन करेंगे। वे समस्त भूतों और जगत् के स्वामी भगवान् ब्रह्मा की भाँति, बिना पक्षपात के, पूर्वकाल के धर्मात्माओं की रीति से आपकी रक्षा करेंगे।
Verse 14
तानागतानभिप्रेक्ष्य समस्तं च सुहृज्जनम् । ब्राह्मणांश्र महीपाल नानादेशसमागतान्,अवश्यमेव वक्तव्यमिति कृत्वा ब्रवीमि व: । एष न्यासो मया दत्त: सर्वेषां वो युधिष्ठिर:
आए हुए उन सब लोगों—समस्त सुहृद्-जन और नाना देशों से पधारे ब्राह्मणों—को देखकर राजा ने निश्चय किया, “यह बात अवश्य कहनी चाहिए।” तब उसने कहा—“यह न्यास, यह सौंपा हुआ दायित्व, मैंने तुम सब पर—और युधिष्ठिर पर—रखा है।”
Verse 15
उवाच मतिमान् राजा धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत: । भूपाल जनमेजय! राजाने देखा कि समस्त पुरवासी और जनपदके लोग वहाँ आ गये हैं। सम्पूर्ण सुहृद-वर्गके लोग भी उपस्थित हैं और नाना देशोंके ब्राह्मण भी पधारे हैं। तब बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उन सबको लक्ष्य करके कहा-- || १३-१४ $ || भवन्त: कुरवश्चैव चिरकालं सहोषिता:
वैशम्पायन बोले—तब बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र ने वहाँ एकत्र हुए नगरवासियों, जनपदवासियों, समस्त सुहृद्जनों तथा नाना देशों से आए ब्राह्मणों को देखकर कहा—“हे कुरुवंशियों! तुम लोग बहुत काल से साथ रहते आए हो। यदि मेरे पुत्रों के द्वारा तुम्हारे प्रति कुछ भी वक्र, असत्य या पीड़ादायक आचरण हुआ हो…”
Verse 16
यदिदानीमहं ब्रूयामस्मिन् काल उपस्थिते
वैशम्पायन बोले— “अब जो समय उपस्थित हुआ है, उसमें मुझे कहना ही होगा। हमारे पूर्वज महाराज शान्तनु ने इस पृथ्वी का यथावत् पालन किया था—इसमें कोई संशय नहीं। उनके बाद भीष्म द्वारा सुरक्षित हमारे तत्त्वज्ञ पिता विचित्रवीर्य ने भी इस भूमण्डल की रक्षा की—इसमें भी संदेह नहीं। यदि मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले किसी अन्य को भी अनुमति देनी उचित हो, तो उसे भी आज्ञा दें। मेरे पुत्रों ने, या मैंने, या मेरे किसी सम्बन्धी ने आप लोगों के प्रति जो अपराध किया हो—उसके लिए मुझे क्षमा करें और जाने की अनुमति दें। क्योंकि आप लोगों ने कभी किसी समय मुझ पर क्रोध नहीं किया।”
Verse 17
अरण्यगमने बुद्धिर्गान्धारीसहितस्य मे,तेषामस्थिरबुद्धीनां लुब्धानां कामचारिणाम्
“गान्धारी के साथ वन को जाने का मेरा निश्चय हुआ—उन लोगों को चंचल-बुद्धि, लोभी और स्वेच्छाचारी देखकर।”
Verse 18
भवन्तो>5प्यनुजानन्तु मा च वो5भूदू विचारणा
“आप लोग भी मुझे जाने की आज्ञा दें; और इस विषय में आपके मन में कोई अन्यथा विचार न उठे। हे निष्पाप जनो! आज मैं गान्धारी के साथ आप सब से क्षमा-याचना करता हूँ।” धृतराष्ट्र के ऐसा कहने पर नगर और जनपद के सब लोग आँसुओं से भर उठे; वे एक-दूसरे का मुख देखने लगे। किसी ने कुछ उत्तर नहीं दिया।
Verse 19
अस्माकं भवतां चैव येयं प्रीतिर्हिं शाश्व॒ती । न च सान्येषु देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम
“हमारा और आपका यह प्रेम-सम्बन्ध शाश्वत है। मेरी समझ में अन्य देशों में राजाओं और प्रजाजनों के बीच ऐसा सम्बन्ध नहीं मिलता। इसलिए आप भी मुझे वन को जाने की आज्ञा दें; और इस विषय में आपके मन में किसी प्रकार का विपरीत विचार न हो।”
Verse 20
शान्तो5स्मि वयसानेन तथा पुत्रविनाकृत: । उपवासकृश श्वास्मि गान्धारीसहितो5नघा:
“हे निष्पाप जन! मैं बुढ़ापे से शिथिल हो गया हूँ और पुत्रों से भी वंचित हो चुका हूँ। उपवास के कारण मैं कृश हो गया हूँ; और गान्धारी के साथ मैं भी दुर्बल हो गया हूँ।”
Verse 21
“सज्जनो! युधिष्ठिरके राज्यमें मुझे बड़ा सुख मिला है। मैं समझता हूँ कि दुर्योधनके राज्यसे भी बढ़कर सुख मुझे प्राप्त हुआ है”
वैशम्पायन बोले— “सज्जनो! युधिष्ठिर के राज्य में मुझे बड़ा सुख मिला है। मैं मानता हूँ कि दुर्योधन के राज्य में जो सुख मिलता, उससे भी बढ़कर सुख मुझे प्राप्त हुआ है।”
Verse 22
मम चान्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य का गति: । ऋते वन॑ महाभागास्तन्मानुज्ञातुमरहथ
“और मुझ अन्धे, वृद्ध, पुत्र-शोक से पीड़ित के लिए अब कौन-सी गति रह गई है? हे महाभागो! वन में जाने के सिवा कुछ नहीं; अतः मुझे उसकी आज्ञा देने योग्य आप ही हैं।”
Verse 23
“एक तो मैं जन्मका अन्धा हूँ, दूसरे बूढ़ा हो गया हूँ, तीसरे मेरे सभी पुत्र मारे गये हैं। महाभाग प्रजाजन! अब आप ही बतायें, वनमें जानेके सिवा मेरे लिये दूसरी कौन-सी गति है? इसलिये अब आपलोग मुझे जानेकी आज्ञा दें” ।।
वैशम्पायन बोले— “एक तो मैं जन्म से अन्धा हूँ, दूसरे बूढ़ा हो गया हूँ, तीसरे मेरे सब पुत्र मारे गए हैं। महाभाग प्रजाजनो! आप ही बताइए—वन में जाने के सिवा मेरे लिए दूसरी कौन-सी गति है? इसलिए मुझे जाने की आज्ञा दीजिए।” यह वचन सुनकर कुरुजांगल के सब लोग, आँसुओं से भरी वाणी के साथ, फूट-फूटकर रो पड़े। भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्र की बात सुनते ही वहाँ उपस्थित सबके नेत्रों से अश्रुधाराएँ बह चलीं और वे असह्य शोक में बिलख उठे।
Verse 24
तानविन्रुवतः किंचित् सर्वान् शोकपरायणान् | पुनरेव महातेजा धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्,उन सबको शोकमग्न होकर कुछ भी उत्तर न देते देख महातेजस्वी धुृतराष्ट्रने पुनः बोलना आरम्भ किया
उन सबको शोक में डूबा हुआ और कुछ भी उत्तर न देते देख, महातेजस्वी धृतराष्ट्र ने फिर से कहना आरम्भ किया।
Verse 26
स चापि पालयामास यथावत् तच्च वेत्थ ह । उनके बाद मेरे भाई पाण्डुने इस राज्यका यथावत्रूपसे पालन किया। इसे आप सब लोग जानते हैं। अपने प्रजापालनरूपी गुणके कारण ही वे आपलोगोंके परम प्रिय हो गये थे
वैशम्पायन बोले— “उनके बाद मेरे भाई पाण्डु ने भी इस राज्य का यथावत् पालन किया—यह आप सब भली-भाँति जानते हैं। प्रजापालन के धर्मरूप गुण के कारण वे आप सबको अत्यन्त प्रिय हो गए थे।”
Verse 33
असम्यग् वा महाभागास्तत् क्षन्तव्यमतन्द्रितैः । निष्पाप महाभागगण! पाण्डुके बाद मैंने भी आपलोगोंकी भली या बुरी सेवा की है, उसमें जो भूल हुई हो, उसके लिये आप आलस्यरहित प्रजाजन मुझे क्षमा करें
हे महाभागो! यदि मुझसे कुछ भी अनुचित हो गया हो तो आप सजग और आलस्यरहित जन उसे क्षमा करें। हे निष्पाप महापुरुषों के गण! पाण्डु के कारण मैंने आपकी जैसी भी—भली या बुरी—सेवा की, उसमें यदि कोई भूल रह गई हो, तो हे परिश्रमी प्रजाजनो, मुझे क्षमा करें।
Verse 63
तद् वो हृदि न कर्तव्यं मया बद्धोडयमञ्जलि: । उस अवसरपर मुझसे भला या बुरा जो कुछ भी कृत्य हो गया, उसे आपलोग अपने मनमें न लावें। इसके लिये मैं आपलोगोंसे हाथ जोड़कर क्षमा-प्रार्थना करता हूँ
इसे आप अपने हृदय में न रखें; मैं हाथ जोड़कर आपके सामने खड़ा हूँ। उस अवसर पर मुझसे भला या बुरा जो कुछ भी हो गया, उसे आप मन में न लाएँ। इसी कारण मैं जोड़ें हुए हाथों से आपसे क्षमा-याचना करता हूँ।
Verse 73
पूर्वराज्ञां च पुत्रो5यमिति कृत्वानुजानथ । “यह राजा धृतराष्ट्र बूढ़ा है। इसके पुत्र मारे गये हैं; अतः यह दुःखमें डूबा हुआ है और यह अपने प्राचीन राजाओंका वंशज है'--ऐसा समझकर आपलोग मेरे अपराधोंको क्षमा करते हुए मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें
‘यह प्राचीन राजाओं के वंश का पुत्र है’—ऐसा समझकर आप आज्ञा दें। यह राजा धृतराष्ट्र वृद्ध है; इसके पुत्र मारे गए हैं; इसलिए यह शोक में डूबा है और यह पूर्व राजवंश का है—ऐसा जानकर मेरे अपराधों को क्षमा करते हुए मुझे वन जाने की अनुमति दें।
Verse 83
गान्धारी पुत्रशोकार्ता युष्मान् याचति वै मया । यह बेचारी वृद्धा तपस्विनी गान्धारी, जिसके सभी पुत्र मारे गये हैं तथा जो पुत्रशोकसे व्याकुल रहती है, मेरे साथ आपलोगोंसे क्षमा-याचना करती है
पुत्रशोक से पीड़ित गान्धारी आप सबसे—मेरे माध्यम से—याचना करती है। वह बेचारी वृद्धा तपस्विनी गान्धारी, जिसके सब पुत्र मारे गए हैं और जो पुत्र-वियोग के शोक से व्याकुल रहती है, मेरे साथ आपसे क्षमा-प्रार्थना करती है।
Verse 93
अनुजानीत भद्ठं वो त्रजाव शरणं च व: । इन दोनों बूढ़ोंको पुत्रोंके मारे जानेसे दुखी जानकर आपलोग वनमें जानेकी आज्ञा दें। आपका कल्याण हो। हम दोनों आपकी शरणमें आये हैं
आपका कल्याण हो; हमें आज्ञा दें, हम आपकी शरण में हैं। इन दोनों बूढ़ों को पुत्र-वध के दुःख से पीड़ित जानकर आप उन्हें वन जाने की अनुमति दें। आपका मंगल हो; हम दोनों आपकी रक्षा में आए हैं।
Verse 106
सर्वेर्भवद्धिद्रष्टव्य: समेषु विषमेषु च । ये कुरुकुलरत्न कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर आपलोगोंके पालक हैं। अच्छे और बुरे सभी समयोंमें आप सब लोग इनपर कृपादृष्टि रखें
वैशम्पायन बोले— आप सब लोग अनुकूल और प्रतिकूल—दोनों ही समयों में इन पर दृष्टि रखिए। कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर, कुरुकुल के रत्न, आप सबके पालक हैं। इसलिए सुख-दुःख के हर काल में आप सब इन पर कृपादृष्टि और सहारा बनाए रखें।
Verse 116
क्षत्रियाश्वैव वैश्याश्व शूद्राश्ैव समाययु: । उधर राजाका संदेश पाकर कुरुजांगलदेशके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाूद्र वहाँ आये। उन सबके हृदयमें बड़ी प्रसन्नता थी
वैशम्पायन बोले— क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी एकत्र हो गए। राजा का संदेश पाकर कुरुजांगल देश के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वहाँ आए; उन सबके हृदय में बड़ी प्रसन्नता थी।
Verse 146
भवन्तो5स्य च वीरस्य न्यासभूता: कृता मया । मुझे ये बातें अवश्य कहनी चाहिये
वैशम्पायन बोले— मैंने आप सबको इस वीर राजा का न्यासी (धरोहर-रक्षक) नियुक्त किया है। ‘ये बातें अवश्य कहनी चाहिए’ ऐसा निश्चय करके मैं कहता हूँ: मैं राजा युधिष्ठिर को धरोहर के रूप में आप सबके हाथ सौंपता हूँ, और आप सबको भी इस पराक्रमी नरेश के हाथ में धरोहर की भाँति देता हूँ—ताकि परस्पर रक्षा, उत्तरदायित्व और धर्मयुक्त परामर्श बना रहे।
Verse 153
परस्परस्य सुह्दद: परस्परहिते रता: । 'सज्जनो! आप और कौरव चिरकालसे एक साथ रहते आये हैं। आप दोनों एक- दूसरेके सुहृद् हैं और दोनों सदा एक-दूसरेके हितमें तत्पर रहते हैं
वैशम्पायन बोले— वे परस्पर सुहृद् हैं और एक-दूसरे के हित में रत रहते हैं। ‘सज्जनो! आप और कौरव चिरकाल से साथ रहते आए हैं; आप दोनों एक-दूसरे के मित्र हैं और दोनों सदा एक-दूसरे के कल्याण में तत्पर रहते हैं।’
Verse 166
तथा भवद्धधिः कर्तव्यमविचार्य वचो मम । “इस समय मैं आपलोगोंसे वर्तमान अवसरपर जो कुछ कहूँ
वैशम्पायन बोले— आप लोग ऐसा ही करें; मेरी बात को बिना संदेह और बिना विचार-विलंब के स्वीकार करें—यही मेरी प्रार्थना है। आप लोगों ने कभी मुझ पर रोष प्रकट नहीं किया; आप अत्यन्त गुरुभक्त हैं। इसलिए मैं आपके सामने हाथ जोड़कर आपको प्रणाम करता हूँ।
Verse 173
व्यासस्यानुमते राज्ञस्तथा कुन्तीसुतस्य मे | “मैंने गान्धारीके साथ वनमें जानेका निश्चय किया है; इसके लिये मुझे महर्षि व्यास तथा कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है
वैशम्पायन बोले—महर्षि व्यास की अनुमति तथा कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर की सम्मति से मैंने गान्धारी के साथ वन जाने का निश्चय कर लिया है।
Verse 231
युधिष्ठिरगते राज्ये प्राप्तश्चास्मि सुखं महत् । मन्ये दुर्योधनैश्वर्याद् विशिष्टमिति सत्तमा:
वैशम्पायन बोले—युधिष्ठिर के राज्य प्राप्त कर लेने पर मुझे भी महान् सुख मिला है। हे सत्पुरुष! मैं इसे दुर्योधन के पूर्व ऐश्वर्य से भी श्रेष्ठ मानता हूँ।
Verse 1236
ददृशे त॑ जन सर्व सर्वाश्व प्रकृतीस्तथा । तदनन्तर महाराज धुृतराष्ट्र अन्तःपुरसे बाहर निकले और वहाँ नगर तथा जनपदकी समस्त प्रजाके उपस्थित होनेका समाचार सुना
वैशम्पायन बोले—वहाँ समस्त जनसमुदाय तथा राज्य की विविध व्यवस्थाएँ और साधन भी उपस्थित दिखाई दिए। इसके बाद, हे महाराज! धृतराष्ट्र अन्तःपुर से बाहर निकले और उन्होंने यह समाचार सुना कि नगर और जनपद की सारी प्रजा एकत्र हो गई है।
Whether Yudhiṣṭhira should prioritize retaining the elder king within the polity for symbolic stability or honor Dhṛtarāṣṭhira’s dharmically appropriate wish to renounce, thereby balancing rājadharma with pitṛ-dharma and āśrama-dharma.
Legitimate authority includes knowing when to release control: enabling a lawful life-stage transition (to vānaprastha) is itself dharma, and grief and responsibility can be ethically redirected into disciplined restraint rather than prolonged political entanglement.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary operates through normative assertion—Vyāsa frames forest-retirement as the “higher dharma” for rājarṣis and presents non-obstruction as the interpretive key for aligning personal duty with the epic’s broader renunciatory trajectory.