Gāndhārī’s Petition for a Vision of the Departed (गान्धार्याः प्रार्थना—दिव्यदर्शनप्रसङ्गः)
हा तात! धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभये । मैं तो समझता हूँ कि अत्यन्त दुर्बल हो जानेके कारण जिनके शरीरमें फैली हुई नस- नाड़ियाँतक स्पष्ट दिखायी देती थीं
युधिष्ठिर बोले—“हा तात! हा धर्मराज!”—ऐसा कहकर महाभय में विलाप करती हुई। मैं समझता हूँ कि अत्यन्त दुर्बल हो जाने से जिनके शरीर में फैली नस-नाड़ियाँ तक स्पष्ट दिखायी देती थीं, वे मेरी माता कुन्ती, जब अग्नि का महान भय उपस्थित हुआ होगा, तब “हा तात! हा धर्मराज!” कहकर कातर पुकार मचाने लगी होंगी।
युधिछिर उवाच