Bhāgīrathī-tīra-śauca, Kurukṣetra-gamana, and Śatayūpa-āśrama-dīkṣā (गङ्गातीरशौच–कुरुक्षेत्रगमन–शतयूपाश्रमदीक्षा)
शत्रवो5पि कुतः पौरा भृत्या वा स्वजनो5पि वा | कच्चिद् यजसि राजेन्द्र श्रद्धावान् पितृदेवता:
धृतराष्ट्र बोले—राजेन्द्र! नगरवासी, स्वजन और सेवक तो क्या, क्या शत्रु भी तुम्हारे व्यवहार से संतुष्ट रहते हैं? और क्या तुम श्रद्धापूर्वक देवताओं तथा पितरों का यजन करते हो?
धृतराष्ट उवाच