कुन्तीनिवर्तनप्रयत्नः तथा वननिवासप्रारम्भः
Attempt to Dissuade Kuntī; Commencement of Forest Residence
वैशम्पायन उवाच एवं स राजा कुरुवृद्धवर्य: समागततस्तैर्नरदेवपुत्रै: । पप्रच्छ सर्व कुशलं तदानीं गतेषु सर्वेष्वथ तापसेषु
vaiśampāyana uvāca |
evaṁ sa rājā kuruvṛddhavaryaḥ samāgatastair naradevaputraiḥ |
papraccha sarva-kuśalaṁ tadānīṁ gateṣu sarveṣv atha tāpaseṣu ||
वैशम्पायन बोले—इस प्रकार संजय के मुख से सबका परिचय सुनकर, जब सब तपस्वी अपनी-अपनी कुटियों को चले गये, तब कुरुवंश के वृद्धों में श्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्र उन नरदेवकुमारों से मिलकर उसी समय सबका कुशल-मंगल पूछने लगे।
वैशम्पायन उवाच