
कुन्त्याः वनगमननिश्चयः — Kuntī’s Resolve to Depart for the Forest
Upa-parva: Āśramavāsa (Forest-Retirement) Episode
Vaiśaṃpāyana records the city’s commotion as Dhṛtarāṣṭra exits Hastināpura through the Vardhamāna gate, dispersing the crowd repeatedly. Vidura, Sañjaya, and Gāvalgaṇi are prepared to accompany the forest journey. Dhṛtarāṣṭra redirects Kṛpa and Yuyutsu back under Yudhiṣṭhira’s charge, signaling an orderly handover. Yudhiṣṭhira urges Kuntī to return to the city with the royal women, arguing that the king is resolved for austerity, while she should remain for the kingdom’s stability. Kuntī, tearful, addresses Sahadeva with admonitions: avoid negligence, remember Karṇa’s valor and her own culpable error in not acknowledging him, and compensate through exemplary giving. She instructs continued unity among brothers and care for Draupadī, then declares she will serve her parents-in-law in the forest alongside Gāndhārī, adopting ascetic hardship. Yudhiṣṭhira, overwhelmed, refuses consent and appeals to her past encouragement and counsel; Bhīma likewise protests, questioning the rationale after the sons’ hard-won sovereignty. Kuntī remains firm, and despite repeated pleas—including Draupadī’s lament—she proceeds toward the forest, repeatedly looking back at her weeping sons.
Chapter Arc: हस्तिनापुर में एक प्रेम-भरा, पर भीतर से करुण, कोलाहल उठता है—“योगो योगः… युज्यतां युज्यताम्”—मानो समूचा नगर किसी अंतिम दर्शन-यात्रा के लिए स्वयं को बाँध रहा हो। → युधिष्ठिर ब्राह्मणों से घिरे, सूत-मागध-वन्दियों की स्तुतियों के बीच प्रस्थान करते हैं। नगर-जनपद के लोग विविध वाहनों—पालकियाँ, वेगवान अश्व, स्वर्णरथ—से धृतराष्ट्र को देखने की उत्कंठा में साथ हो लेते हैं। द्रौपदी-प्रमुख स्त्री-समूह भी शिबिकाओं में, रक्षिकाओं के संरक्षण में, अपार धन-वस्तु का त्याग/वितरण करते हुए चलता है। यात्रा नदी-तटों और सरोवरों पर क्रमशः पड़ाव डालती है; हर पड़ाव में उत्साह के नीचे एक अनकहा भय है—क्या यह मिलन शांति देगा या पुराने घाव फिर खोल देगा? → दूर से ही राजर्षि शतयूप के आश्रम और धृतराष्ट्र के निवास-आश्रम का दर्शन होता है। यह दृश्य ही चरम है—राजमहल की राजनीति से दूर, वन के मौन में बैठा वह वृद्ध राजा, जिसके कारण और जिसके साथ इतने जीवन उलझे रहे। → समस्त जन प्रसन्नता और महानाद के साथ वन में प्रवेश करते हैं; यात्रा का बाह्य उद्देश्य—धृतराष्ट्र का दर्शन—साकार होता है, और कथा का स्वर नगर से वन की ओर स्थिर हो जाता है। → वन-प्रवेश के साथ ही अगला प्रश्न हवा में लटकता है—धृतराष्ट्र से भेंट में कौन-सा सत्य बोला जाएगा: क्षमा का, पश्चात्ताप का, या अधूरे न्याय का?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्या भारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिरकी वनको यात्राविषयक बाईसवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/ २२ ॥। ऑपन-- माल बछ। ्::अ त्रयोविशो<् ध्याय: सेनासहित पाण्डवोंकी यात्रा और उनका कुरुक्षेत्रमें पहुँचना वैशम्पायन उवाच आज्ञापयामास ततः सेनां भरतसत्तम: | अर्जुनप्रमुखैर्गुप्तां लोकपालोपमैनरै:
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! तत्पश्चात् भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने अपनी सेना को कूच करने की आज्ञा दी—अर्जुन आदि अग्रणी वीरों द्वारा सुरक्षित, जो लोकपालों के समान पराक्रमी थे।
Verse 2
योगो योग इति प्रीत्या ततः शब्दो महानभूत् | क्रोशतां सादिनां तत्र युज्यतां युज्यतामिति
तब प्रेमपूर्ण आज्ञा—“जोत दो, जोत दो”—पाते ही वहाँ बड़ा शब्द होने लगा। घुड़सवार चारों ओर पुकारने लगे—“जुताओ, जुताओ!” और उस घोषणा से महान् कोलाहल मच गया।
Verse 3
केचिद् यानैर्नरा जम्मु: केचिदश्वैर्महाजवै: । काज्चनैश्व रथै: केचिज्ज्वलितज्वलनोपमै:
कुछ लोग पालकियों पर सवार होकर चले, कुछ महावेगशाली घोड़ों पर। और कितने ही मनुष्य सुवर्णमय रथों पर आरूढ़ होकर प्रस्थित हुए, जो प्रज्वलित अग्नि के समान दीप्तिमान थे।
Verse 4
गजेन्द्रैश्न तथैवान्ये केचिदुष्टरैनराधिप । पदातिनस्तथैवान्ये नखरप्रासयोधिन:,नरेश्वर! कुछ लोग गजराजोंपर सवार थे और कुछ ऊँटोंपर। कितने ही बधनखों और भालोंसे युद्ध करनेवाले वीर पैदल ही चल रहे थे
नरेश्वर! कुछ लोग गजेन्द्रों पर सवार थे और कुछ ऊँटों पर। और कुछ पदाति वीर, जो बधनखों तथा भालों से युद्ध करने में निपुण थे, पैदल ही आगे बढ़ रहे थे।
Verse 5
पौरजानपदाश्वैव यानैर्बहुविधेस्तथा । अन्वयु: कुरुराजान धृतराष्ट्रं दिदृक्षव:,नगर और जनपदके लोग भी राजा धुृतराष्ट्रको देखनेकी इच्छासे नाना प्रकारके वाहनोंद्वारा कुरुराज युधिष्ठिरका अनुसरण करते थे
नगर और जनपद के लोग भी राजा धृतराष्ट्र को देखने की इच्छा से नाना प्रकार के वाहनों द्वारा कुरुराज युधिष्ठिर के पीछे-पीछे चले।
Verse 6
स चापि राजवचनादाचार्यो गौतम: कृप: । सेनामादाय सेनानी: प्रययावाश्रमं प्रति,राजा युधिष्ठिरके आदेशसे सेनापति कृपाचार्य भी सेनाको साथ लेकर आश्रमकी ओर चल दिये
राजा युधिष्ठिर के आदेश से गौतमवंशी कृपाचार्य—जो सेनापति थे—सेना को साथ लेकर आश्रम की ओर चल दिए।
Verse 7
ततो द्विजै: परिवृत: कुरुराजो युधिष्ठिर: । संस्तूयमानो बहुभि: सूतमागधबन्दिभि:
तत्पश्चात् ब्राह्मणों से घिरे हुए कुरुराज युधिष्ठिर, अनेक सूत, मागध और वन्दीजन के मुख से स्तुति सुनते हुए आगे बढ़े।
Verse 8
पाण्डुरेणातपत्रेण प्रियमाणेन मूर्थनि । रथानीकेन महता निर्जगाम कुरूद्वह:
मस्तक पर श्वेत छत्र धारण किए, विशाल रथ-सेना के साथ कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर वहाँ से निकल पड़े।
Verse 9
गजैश्वाचलसंकाशैर्भीमकर्मा वृकोदर: । सज्जयमन्त्रायुधोपेतै: प्रययौँ पवनात्मज:
भयंकर पराक्रम वाले पवनपुत्र भीमसेन पर्वताकार गजराजों के साथ चले; उन पर अनेक यन्त्र और आयुध सुसज्जित थे।
Verse 10
माद्रीपुत्रावपि तथा हयारोहौ सुसंवृतौ । जग्मतु: शीघ्रगमनौ संनद्धकवचध्वजौ
वैशम्पायन बोले—माद्री के दोनों पुत्र नकुल और सहदेव भी घोड़ों पर सवार थे। वे अन्य घुड़सवारों से घिरे हुए शीघ्रता से आगे बढ़ रहे थे। उनके शरीर पर कवच बँधा था और घोड़ों पर ध्वज सुरक्षित बँधे थे।
Verse 11
अर्जुनश्व महातेजा रथेनादित्यवर्चसा | वशी श्वेतैर्हयैर्युक्ति्दिव्येनान्वगमन्नूपम्
वैशम्पायन बोले—महातेजस्वी, जितेन्द्रिय अर्जुन श्वेत घोड़ों से जुते हुए सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर राजा युधिष्ठिर का अनुसरण कर रहे थे।
Verse 12
द्रौपदीप्रमुखाश्नापि स्त्रीसंघा: शिबिकायुता: । स्त्र्यध्यक्षगुप्ता: प्रययुर्विसृजन्तो5मितं वसु
वैशम्पायन बोले—द्रौपदी के नेतृत्व में अन्य स्त्रियाँ भी पालकियों में बैठीं, स्त्री-अध्यक्षों की रक्षा में चलीं। चलते-चलते वे अपार धन का दान-वितरण करती जा रही थीं।
Verse 13
द्रौपदी आदि स्त्रियाँ भी शिबिकाओंमें बैठकर दीन-दुखियोंको असंख्य धन बाँटती हुई जा रही थीं। रनिवासके अध्यक्ष सब ओरसे उनकी रक्षा कर रहे थे ।।
वैशम्पायन बोले—द्रौपदी आदि स्त्रियाँ भी पालकियों में बैठकर दीन-दुखियों को असंख्य धन बाँटती हुई आगे बढ़ रही थीं। अंतःपुर के अध्यक्ष सब ओर से उनकी रक्षा कर रहे थे। उस समय, भरतश्रेष्ठ! रथ, हाथी और घोड़ों से समृद्ध पाण्डव-सेना वंशी और वीणा के नाद से गूँजती हुई अत्यन्त शोभायमान हो रही थी।
Verse 14
नदीतीरेषु रम्येषु सर:सु च विशाम्पते । वासान् कृत्वा क्रमेणाथ जम्मुस्ते कुरुपुड्वा:,प्रजानाथ! वे कुरुश्रेष्ठ वीर नदियोंके रमणीय तटों तथा अनेक सरोवरोंपर पड़ाव डालते हुए क्रमश: आगे बढ़ते गये
वैशम्पायन बोले—प्रजानाथ! वे कुरुश्रेष्ठ वीर रमणीय नदी-तटों तथा सरोवरों के पास क्रमशः पड़ाव डालते हुए आगे बढ़ते गए।
Verse 15
युयुत्सुश्न महातेजा धौम्यश्वैव पुरोहित: । युधिष्ठटिरस्य वचनात् पुरगुप्तिं प्रचक्रतु:,महातेजस्वी युयुत्सु और पुरोहित धौम्य मुनि युधिष्ठिरके आदेशसे हस्तिनापुरमें ही रहकर राजधानीकी रक्षा करते थे
वैशम्पायन बोले—महातेजस्वी युयुत्सु और पुरोहित धौम्य मुनि, युधिष्ठिर की आज्ञा से, हस्तिनापुर में ही रहकर नगर-रक्षा की व्यवस्था करने लगे और राजधानी की सुरक्षा में तत्पर रहे।
Verse 16
ततो युधिष्छिरो राजा कुरुक्षेत्रमवातरत् । क्रमेणोत्तीर्य यमुनां नदीं परमपावनीम्,उधर राजा युधिष्ठिर क्रमश: आगे बढ़ते हुए परम पावन यमुना नदीको पार करके कुरक्षेत्रमें जा पहुँचे
तदनन्तर राजा युधिष्ठिर कुरुक्षेत्र की ओर चले। क्रमशः आगे बढ़ते हुए उन्होंने परम पावनी यमुना नदी को पार किया और उस पवित्र क्षेत्र में जा पहुँचे।
Verse 17
स ददर्शाश्रमं दूराद् राजर्षेस्तस्य धीमत: । शतयूपस्य कौरव्य धृतराष्ट्रस्य चैव ह,कुरुनन्दन! वहाँ पहुँचकर उन्होंने दूरसे ही बुद्धिमान् राजर्षि शतयूप तथा धृतराष्ट्रके आश्रमको देखा
वैशम्पायन बोले—कौरवनन्दन! वहाँ पहुँचकर उन्होंने दूर से ही उस बुद्धिमान् राजर्षि शतयूप के आश्रम को, और धृतराष्ट्र के आश्रम को भी देखा।
Verse 18
तत: प्रमुदित: सर्वो जनस्तद् वनमञठ्जसा | विवेश सुमहानादैरापूर्य भरतर्षभ,भरतभूषण! इससे उन सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उस वनमें महान् कोलाहल फैलाते हुए अनायास ही प्रवेश किया
वैशम्पायन बोले—भरतश्रेष्ठ! तब समस्त जन अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और बड़े-बड़े नाद करते हुए, उस वन में सहज ही प्रवेश कर गए; उनके कोलाहल से वन गूँज उठा।
Verse 23
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्राअ्रमगमने त्रयोविंशो 5 ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्रमवासिकपर्व के अन्तर्गत आश्रमवास-प्रकरण में धृतराष्ट्र के आश्रम-गमन तथा युधिष्ठिर आदि के वहाँ जाने का वर्णन करने वाला तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Whether Kuntī’s duty lies in remaining within the restored kingdom as a stabilizing elder or in joining the forest-retreat as an act of service, penance, and solidarity with Dhṛtarāṣṭra and Gāndhārī.
Ethical repair after catastrophe involves accountability and constructive action: Kuntī frames remorse (especially regarding Karṇa) not as paralysis but as a mandate for dāna, vigilance, and sustained family cohesion.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as narrative-ethical testimony, emphasizing how renunciation and governance each claim legitimacy within dharma when guided by responsibility rather than impulse.