अध्याय १५ (Āśramavāsika-parva): धृतराष्ट्रस्य वनवासानुज्ञायाचनम् — Dhṛtarāṣṭra’s renewed plea for consent to forest-dwelling
क्व सा बुद्धिरियं चाद्य भवत्या यच्छुतं मया । क्षत्रधर्मे स्थितिं चोक्त्वा तस्याश्ष्यवितुमिच्छसि
कहाँ आपकी वह बुद्धि और कहाँ आज का यह विचार! आपने हमें क्षत्रिय-धर्म में स्थित रहने का उपदेश दिया था, और अब आप स्वयं उससे गिरना चाहती हैं?
वैशम्पायन उवाच