अध्याय १५ (Āśramavāsika-parva): धृतराष्ट्रस्य वनवासानुज्ञायाचनम् — Dhṛtarāṣṭra’s renewed plea for consent to forest-dwelling
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त: स धर्मात्मा भ्रातृभि: सहितो वशी । विषादमगमद् धीमान् न च किंचिदुवाच ह
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! माता के ऐसा कहने पर मन को वश में रखने वाले धर्मात्मा और बुद्धिमान युधिष्ठिर भाइयों सहित अत्यन्त विषाद में डूब गए; पर वे मुख से कुछ भी न बोले।
वैशम्पायन उवाच