Adhyaya 14
Ashramavasika ParvaAdhyaya 1415 Verses

Adhyaya 14

धृतराष्ट्रस्य क्षमायाचनं तथा युधिष्ठिरे न्यासदानम् / Dhṛtarāṣṭra’s Request for Forgiveness and the Entrustment to Yudhiṣṭhira

Upa-parva: Nagarānuśāsana / Kṣamā-yācñā Episode (Dhṛtarāṣṭra’s public request for pardon)

Dhṛtarāṣṭra addresses the assembled citizens and countryfolk, recalling the righteous governance of Śaṃtanu and Vicitravīrya (protected by Bhīṣma) and noting Pāṇḍu’s beloved status and proper rule. He acknowledges his own service to the people, asking that any shortcomings be forgiven. He then identifies Duryodhana’s untroubled enjoyment of the kingdom and admits that the ensuing great conflict arose from the prince’s errors and from Dhṛtarāṣṭra’s own misgovernance. Seeking reconciliation, he requests that the community not retain resentment and asks permission to depart, emphasizing his old age, bereavement, and suffering. He presents Gāndhārī as equally afflicted and requests similar compassion for her. Dhṛtarāṣṭra publicly affirms Yudhiṣṭhira as the Kuru king to be regarded in all circumstances, praising the Pāṇḍava brothers as capable counselors aligned with dharma and artha. He frames Yudhiṣṭhira as a ‘nyāsa’ (entrusted charge) given to the people and conversely the people as entrusted to the king, then asks pardon for any offenses committed by his sons or other dependents. The chapter closes with the public’s wordless, tearful reaction and mutual glances, signaling collective grief and the gravity of ethical transition.

Chapter Arc: कार्तिक-पूर्णिमा की प्रभात बेला में अंबिकासुत धृतराष्ट्र पाण्डवों को बुलाकर वन-प्रस्थान का निश्चय प्रकट करते हैं—राजमहल के भीतर ही संन्यास का शंखनाद गूंज उठता है। → वेदपारंगत ब्राह्मणों से यात्राकालोचित इष्टि कराकर, अग्निहोत्र को आगे रख, वल्कल-अजिन धारण कर धृतराष्ट्र गृह से निकलते हैं। नगर-जन और अंतःपुर की स्त्रियाँ शोकाकुल होकर राजमार्ग पर उमड़ पड़ती हैं; पाण्डवों के मन में पुरानी वनवास-यात्राओं और द्यूतसभा की स्मृतियाँ फिर से जाग उठती हैं। → अर्जुन तीव्र दुःख से बार-बार निःश्वास लेते हुए युधिष्ठिर से विनय करते हैं—‘ऐसा न हो’—पर स्वयं को रोककर दीनवत्‌ शिथिल पड़ जाते हैं; उसी क्षण कुंती, नेत्रबद्ध गांधारी का हाथ थामकर उसे सहारा देती हैं और धृतराष्ट्र गांधारी के कंधे पर हाथ रखकर, मौन दृढ़ता से आगे बढ़ते हैं—वैर का युग मानो करुणा में गलकर विदा लेता है। → भीम, अर्जुन, माद्रीपुत्र (नकुल-सहदेव), विदुर, संजय, धौम्य आदि आचार्य-जन तथा अन्य अनुयायी अश्रुपूरित कंठ से साथ चलते हैं; हस्तिनापुर का पौरवर्ग धृतराष्ट्र के वन-गमन से वैसा ही शोकग्रस्त होता है जैसा कभी पाण्डवों के वनवास-प्रस्थान पर हुआ था। → वन-मार्ग पर यह करुण यात्रा आगे किस आश्रम-जीवन और किस अंतिम परिणति की ओर बढ़ेगी—यह प्रश्न नगर के आँसुओं के बीच अधूरा रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। अऑि-छऋायज पज्चदशो< ध्याय: गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान वैशम्पायन उवाच ततः प्रभाते राजा स धृतराष्ट्रो<म्बिकासुत: । आहुय पाण्डवान्‌ वीरान्‌ वनवासे कृतक्षण:

वैशम्पायन बोले—तदनन्तर प्रभात होते ही अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र ने वीर पाण्डवों को बुलाया और वनवास के लिए निश्चय कर लिया।

Verse 2

कार्तिक्यां कारयित्वेष्टिं ब्राह्मुणैवेंदपारगै:

वैशम्पायन बोले—कार्तिक की पूर्णिमा के दिन वेदपारंगत ब्राह्मणों से यात्राकालोचित इष्टि कराकर राजा धृतराष्ट्र ने वल्कल और मृगचर्म धारण किया। अग्निहोत्र को आगे रखकर और पुत्र-वधुओं से घिरे हुए वे राजभवन से बाहर निकले।

Verse 3

अगन्निहोत्रं पुरस्कृत्य वल्कलाजिनसंवृत: । वधूजनवृतो राजा निर्ययौ भवनात्‌ ततः

अग्निहोत्र को आगे करके, वल्कल और मृगचर्म से आवृत, तथा पुत्र-वधुओं से घिरे हुए राजा तब राजभवन से बाहर निकले।

Verse 4

ततः स्त्रिय: कौरवपाण्डवानां याक्षापरा: कौरवराजवंश्या: । तासां नाद: प्रादुरासीत्‌ तदानीं वैचित्रवीर्ये नृपतौ प्रयाते

तब कौरवों और पाण्डवों की वे स्त्रियाँ—कौरव राजवंश की कुलवधुएँ—शोक से व्याकुल होकर, वैचित्रवीर्यवंशी नृप के प्रस्थान करते ही उसी समय ऊँचे स्वर से विलाप करने लगीं।

Verse 5

विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार प्रस्थान करनेपर कौरवों और पाण्डवोंकी स्त्रियाँ तथा कौरवराजवंशकी अन्यान्य महिलाएँ सहसा रो पड़ीं। उनके रोनेका महान्‌ शब्द उस समय सब ओर गूँज उठा था ।।

वैशम्पायन बोले—जब विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र इस प्रकार प्रस्थान करने लगे, तब कौरवों और पाण्डवों की स्त्रियाँ तथा कुरुवंश की अन्य राजमहिलाएँ सहसा रो पड़ीं। उनके विलाप का महान् शब्द उस समय चारों दिशाओं में गूँज उठा। तत्पश्चात् राजा ने लावा और नाना रंगों के ताजे पुष्पों से उस राजभवन की पूजा की; और समस्त सेवकवर्ग को धन देकर सम्मानित करके, उन सबको विदा कर, महाराज वहाँ से चल दिए।

Verse 6

ततो राजा प्राञ्जलिवेंपमानो युधिष्ठिर: सस्वरं बाष्पकण्ठ: । विमुच्योच्चैर्महानादं हि साधो क्व यास्यसीत्यपतत्‌ तात भूमौ

तब राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़कर काँपने लगे; आँसुओं से उनका गला भर आया। वे ऊँचे स्वर में महान् आर्तनाद कर फूट-फूटकर रोने लगे और—“महात्मन्! मुझे छोड़कर आप कहाँ जा रहे हैं?”—ऐसा कहते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े।

Verse 7

तथार्जुनस्तीव्रदु:खाभितप्तो मुहुर्मुहुर्नि:श्वसन्‌ भारता ग्र्यः । युधिष्ठिरं मैवमित्येवमुक्त्वा निगृह्माथो दीनवत्‌ सीदमान:

तब भरतवंश के अग्रगण्य वीर अर्जुन असह्य दुःख से संतप्त होकर बार-बार लंबी साँस लेते हुए युधिष्ठिर से बोले—“भैया, आप ऐसे अधीर न हों।” यह कहकर उन्होंने उन्हें दोनों हाथों से थाम लिया और स्वयं दीन की भाँति शिथिल होकर बैठ गए।

Verse 8

वृकोदर: फाल्गुनश्चैव वीरौ माद्रीपुत्रौ विदुरः संजयश्च । वैश्यापुत्र: सहितो गौतमेन धौम्यो विदप्राश्चान्वयुर्बाष्पकण्ठा:

इसके बाद युधिष्ठिर के साथ भीमसेन (वृकोदर), अर्जुन (फाल्गुन), वीर माद्रीपुत्र (नकुल-सहदेव), विदुर, संजय, वैश्यापुत्र युयुत्सु, कृपाचार्य (गौतम), धौम्य तथा और भी बहुत-से ब्राह्मण आँसू बहाते हुए, गद्गद कण्ठ होकर उनके पीछे-पीछे चले। आगे-आगे कुन्ती अपने कंधे पर रखे गान्धारी के हाथ को थामे चल रही थीं; उनके पीछे आँखों पर पट्टी बाँधे गान्धारी थीं; और राजा धृतराष्ट्र गान्धारी के कंधे पर हाथ रखे निश्चिन्त भाव से आगे बढ़ रहे थे।

Verse 9

कुन्ती गान्धारीं बद्धनेत्रां व्रजन्तीं स्कन्धासक्तं हस्तमथोद्वहन्ती । राजा गान्धार्या: स्कन्धदेशेडवसज्य पा्िं ययौ धृतराष्ट्र: प्रतीत:

वैशम्पायन बोले—कुन्ती आगे-आगे चलती हुई आँखों पर पट्टी बाँधे गान्धारी का हाथ अपने कंधे पर टिकाए उसे संभाल रही थीं। राजा धृतराष्ट्र गान्धारी के कंधे पर अपना हाथ रखे, शांत और आश्वस्त भाव से आगे बढ़ रहे थे। उनके पीछे युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, वीर माद्रीपुत्र (नकुल-सहदेव), विदुर, संजय, वैश्यापुत्र युयुत्सु, कृपाचार्य, धौम्य तथा अनेक ब्राह्मण आँसुओं से गद्गद कण्ठ होकर चले आ रहे थे।

Verse 10

पाव जा ए-स्प्य्ल्न है24 उ ॥। ि |! हि 8] नल 28९ ५ कह |] 52 4 | ४ ॥ 0७४७5 |! तथा कृष्णा द्रौपदी सात्वती च बालापत्या चोत्तरा कौरवी च । चित्राड़दा याश्र काश्रित्स्त्रियो5न्या: सार्थ राज्ञा प्रस्थितास्ता वधूभि:

वैशम्पायन बोले—द्रौपदी (कृष्णा) भी चलीं, सात्वतवंश की सुभद्रा भी, और कुरुकुल की उत्तरा भी, जो अपने छोटे बालक को लिये हुए थीं। चित्रांगदा तथा अन्तःपुर की अन्य जितनी स्त्रियाँ थीं, वे सब अपनी बहुओं सहित राजा धृतराष्ट्र के साथ प्रस्थित हो गईं।

Verse 11

तासां नादो रुदतीनां तदासीदू राजन्‌ दुःखात्‌ कुररीणामिवोच्चै: । ततो निष्पेतुर्रह्यिणक्षत्रियाणां विट्शूद्राणां चैव भार्या: समान्तात्‌

वैशम्पायन बोले—राजन्! उस समय उन स्त्रियों के रोने का शब्द दुःख से कुररियों के समान ऊँचा उठ रहा था। तब चारों ओर से क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के गृहस्थों की पत्नियाँ भी (अपने घरों से) निकल पड़ीं।

Verse 12

तन्निर्याणे दु:खित: पौरवर्गो गजाह्वये चैव बभूव राजन्‌ | यथा पूर्व गच्छतां पाण्डवानां द्यूते राजन्‌ कौरवाणां सभाया:

वैशम्पायन बोले—राजन्! उनके प्रस्थान के समय गजाह्वय (हस्तिनापुर) के समस्त नागरिक दुःख में डूब गए। जैसे पहले द्यूतक्रीड़ा के बाद कौरवों की सभा से निकलकर वनवास के लिये पाण्डव चले थे, तब नगरवासी शोक से व्याकुल हो उठे थे; वैसे ही धृतराष्ट्र के जाते समय भी सब पुरवासी विलाप से संतप्त हो गए।

Verse 13

या नापश्यंश्वन्द्रमसं न सूर्य रामा: कदाचिदपि तस्मिन्‌ नरेन्द्रे । महावनं गच्छति कौरवेन्द्रे शोकेनार्ता राजमार्ग प्रपेदु:

वैशम्पायन बोले—राजन्! जो रानिवास की रमणियाँ उस नरेन्द्र के रहते कभी चन्द्रमा और सूर्य तक को नहीं देख पाई थीं, वे ही कौरवेश्वर के महावन को जाते समय शोक से व्याकुल होकर राजमार्ग पर आ पहुँचीं।

Verse 15

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्याणे पज्चदशो<ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्रमवासिक पर्व में धृतराष्ट्र-निर्याण प्रसंग का पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 16

गान्धारीसहितो धीमानभ्यनन्दद्‌ यथाविधि । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर ग्यारहवें दिन प्रात:ःकाल गान्धारीसहित बुद्धिमान्‌ अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने वनवासकी तैयारी करके वीर पाण्डवोंको बुलाया और उनका यथावत्‌ अभिनन्दन किया

वैशम्पायन बोले— जनमेजय! इसके बाद ग्यारहवें दिन प्रातःकाल गान्धारी सहित बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र ने वनवास की तैयारी करके वीर पाण्डवों को बुलाया और विधिपूर्वक उनका अभिनन्दन किया।

Frequently Asked Questions

He confronts the tension between personal attachment to his sons and the duty of impartial kingship, admitting that partiality and permissiveness contributed to systemic harm and now require public atonement.

Legitimate authority after crisis is stabilized through truth-speaking, acceptance of responsibility, and forgiveness-seeking, coupled with a clear handover of protective obligations to a dharma-aligned successor.

No explicit phalaśruti appears in these verses; the meta-function is narrative-ethical—modeling reconciliation and the formal ‘nyāsa’ mechanism as part of the epic’s transition from conflict to renunciation.